बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४१३ शुभैर्दृष्टः सवीर्योऽगे केंद्रस्थे चायुरर्थदः । स्वोच्चोच्चोब्जे स्वक्षर्गेः सौम्यैः सवीर्येगाधिपे तनौ ॥११२॥ षष्ठचन्दकेंद्रसौम्येभ्राष्टशुद्धे सप्ततिर्गुरौ । मूलत्रिकोणगैः सौम्यैर्गुरौ स्वोच्चसमन्विते ॥११३॥ लग्नाधिपे बलयुतेशीत्यब्दं त्वायुरीरितम् । सवीर्ये सत्सु केंद्रेषु त्रिशच्छुद्धियुतेऽष्टमे ॥११४॥ लयेशे धर्मगे जीवेऽष्टस्थे क्रूरेक्षिते जिताः । लग्नाष्टमेशावष्टस्थौ भाब्दमायुःकरौ मतौ ॥११५॥ लग्नेऽशुभेज्यौ ग्लौदृष्टौ भृत्यौ कश्चन चाकृतिः । धर्मांगस्थे शनौ शुक्रे केंद्रेब्जे व्ययधर्मगे ॥११६॥ शताब्दं गीष्मतौ कर्के कंटकस्थसितेज्ययोः । लयेशेंगे शुभैहीनेऽष्टमे खाब्धिमितं वयः ॥११७॥ लग्ने शेष्टमगेष्टेशे तनुस्थे पंचवत्सरम् । कवीज्ययोगे सौम्याब्जौ लग्ने मृत्यौ च खेभवः ॥११८॥ एतद्योगजमायुः स्यादथ स्पष्टमुदीर्यते । सूर्याधिक बले पैंडं निसर्गाच्च विधोर्बले ॥११९॥ अंशायुः सबले लग्ने तत्साधनमथो शृणु । गोब्जास्तत्त्वतिथी सूर्यास्तिथिः स्वर्गा नखाः क्रमात् ॥१२०॥ नखा विधुर्द्वार्किकाश्च धृतिः स्वाक्षिखमार्गणाः । ॥१२१॥ पिंडे निसर्ये स्वोच्चे नो ग्रहः षड्भल्पको यदा चक्रशुद्धस्तदा ग्राह्योस्यांशा आयुषि संमताः ॥१२२॥ में हो, उस पर शुभग्रह की दृष्टि हो तो बालक धन सहित दीर्घायु होता है। चन्द्रमा अपने उच्च में हो, शुभग्रह अपनी राशि में हो, बली लग्नेश लग्न में हो तो जातक की आयु ६० वर्ष ही होती है। केन्द्र में शुभग्रह हों और अष्टमभाव शुद्ध (ग्रहरहित) हो तो ७० वर्ष की आयु होती है ॥११२॥ शुभग्रह अपने-अपने मूल त्रिकोण में हों, गुरु अपने उच्च में हो तथा लग्नेश बलवान् हों तो ८० वर्ष की आयु होती है ॥११३॥ सबल शुभग्रह केन्द्र में हों और अष्टम भाव में कोई ग्रह न हो तो ३० वर्ष की आयु होती है ॥११४॥ अष्टमेश नवम भाव में हों, बृहस्पति अष्टम भाव में रहकर पापग्रह से दृष्ट हों तो २४ वर्ष की आयु होती है। लग्नेश और अष्टमेश दोनों अष्टमभाव में स्थित हों तो २७ वर्ष की आयु होती है ॥११५॥ लग्न में पापग्रह सहित बृहस्पति हों, उस पर चन्द्रमा की दृष्टि हो तथा अष्टम में कोई ग्रह न हो तो २२ वर्ष की आयु समझनी चाहिए। शनि नवम भाव या लग्न में हों, शुक्र केन्द्रमें हो और चन्द्रमा १२ या ९ में हो तो १०० वर्ष की आयु होती है। बृहस्पति कर्क में हो अथवा बृहस्पति और शुक्र दोनों केन्द्र में हों तो १०० वर्ष की आयु प्राप्त होती है ॥११६॥ अष्टमेश लग्न में हो और अष्टम भाव में शुभग्रह न हो तो ४० वर्ष की आयु होती है। लग्नेश अष्टम भाव में और अष्टमेश लग्न में हों तो ५ वर्ष की आयु होती है। शुक्र और बृहस्पति एक राशि में हों अथवा बुध और चन्द्रमा लग्न या अष्टम भाव में हों तो ५० वर्ष की आयु होती है ॥११६-११८॥ मुने ! मैंने इस प्रकार ग्रहयोग-सम्बन्ध से आयुर्दाय का प्रमाण कहा है। अब गणित द्वारा स्पष्टायुर्दाय का का वर्णन करता हूँ। (सूर्य, चन्द्रमा और लग्न में से) यदि सूर्य अधिक बली हो तो पिण्डायु, चन्द्रमा बली हो तो निसर्गायु और लग्न बली हो तो अंशायु का साधन करना चाहिए। उसका साधन-प्रकार मैं बतलाता हूँ ॥११९॥ पिण्डायु और निसर्गायु का साधन-सूर्य आदि ग्रह अपने-अपने उच्च में हों तो क्रमशः १९, २५, १५, १२, १५, २१ और २० वर्ष पिण्डायु के प्रमाण होते हैं तथा २०, १, २, ९, १८, २०, ५० ये क्रमशः सूर्यादि ग्रहों के निसर्गायुर्दाय के प्रमाण होते हैं ॥१२०-१२१॥ पिण्डायु और निसर्गायु में आयु-साधन करना हो तो राश्यादि ग्रह में अपने उच्च को घटाना चाहिए। यदि वह ६ राशि से अल्प हो तो उसको १२ राशि में घटाकर ग्रहण करें। उसके अंश बनाने से वह आयुर्दाय-साधन