बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 433, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें४१४ नारदीयपुराणम् अंशोनाः शत्रुभे कार्या ग्रहं वक्रगतिं विना । मंदशुक्रौ विनाऽर्द्धांना ग्रहस्यास्तंगतस्य च ॥१२३॥ हानिद्वयेऽधिकाः कार्या यदा क्रूरस्तनौ तदा । विहायारीनंशाद्यैर्हन्यादायुर्बलवान् भजेत् ॥१२४॥ भगणांशैलैब्धहीनास्तेषां कार्या विचक्षणैः । पापस्यांशाः समग्नोना सौम्यस्यार्द्धविवर्जिताः ॥१२५॥ स्पष्टास्तेंशाः षषट्ह्यासा गुणयित्वा स्वकैर्गुणैः । ॥१२६॥ वर्षाणि शेषमर्कघ्नं हारात्संमासकाः स्मृताः तच्छेषश्च त्रिगुणितः तेनैवाप्तं दिनानि च । शेषे षष्ट्या हते भक्ते हारेण घटिकादिकम् ॥१२७॥ हित्वा भाज्यंभागादीन्कलीकृत्य खखाक्षिभिः । भजेद्वर्षाणि शेषे तु गुणिते द्वादशादिभिः ॥१२८॥ द्विसप्तांशे च मासादिलग्नायुर्जायते स्फुटम् । अंशायुषी सलग्नानां खेटानामंशका हताः ॥१२९॥ खयुगैरायुशंः स्युस्तत्संस्कारं वदामि ते । ग्रहोत्तलग्नं षड्रात्यं चेत्संस्कारोऽन्यथा नहि ॥१३०॥ तदंशः खाययो भक्ता लब्धोनोऽसृग्गुणो भवेत् । ॥१३१॥ यदैकाल्पं तदास्र्यांशाः स्वाग्रयाप्तोना च भूगुणः में उपयोगी होता है । जो ग्रह शत्रु की राशि में हो उसके अंशों में उसी का तृतीयांश घटाये । यदि वह वक्रगति न हो तभी ऐसा करना चाहिए। (यदि ग्रह वक्रगति हो तो शत्रु राशि में रहने पर भी तृतीयांश नहीं घटाना चाहिए) तथा शनि और शुक्र को छोड़कर अन्य ग्रह अस्त हों तो उनके अंशों में आधा घटा देना चाहिए । शनि अस्त हों तो भी उनके अंशों में आधा घटा देना चाहिए ।) यदि किसो ग्रह में दोनों हानि प्राप्त हो (अर्थात् वह शत्रुग्रह में हो और अस्त भी हो) तो उसमें अधिक हानि मात्र करें (अर्थात् केवल आधा घटाये, तृतीयांश नहीं) । यदि लग्न में पापग्रह हो तो उसकी राशि को छोड़कर केवल अंशादि से आयुर्दाय के अंश को गुणा करके गुणनफल में ३६० का भाग देकर लब्ध अंशादि को पूर्वोक्त अंश में घटाये। इस प्रकार पापग्रह के समस्त लब्धांश घटाये । यदि उसमें शुभग्रह का योग या दृष्टि हो तो लब्धांश का आधा वटाना चाहिए । इस तरह आगे बताये जाने वाले प्रकार से आयुर्दाय-साधन योग्य स्पष्ट अंश उपलब्ध होते हैं ॥१२२-१२५॥ पिण्डायु-साधन -- उन स्पष्टांशों को अपने-अपने पूर्वोक्त गुणक (उच्चस्थ वर्षसंख्या १९ आदि) से गुणा करके गुणनफल में ३६० से भाग देने पर लब्धि वर्ष-संख्या होती है । शेष को १२ से गुणा करके ३६० से भाग देने पर लब्धि मास-संख्या होती है । पुनः शेष को ३० से गुणा करके ३६० के द्वारा भाग देने पर लब्धि दिन- संख्या होगी । फिर शेष को ६० गुणा कर ३६० से भाग देने पर लब्धि घटी एवं पलादि रूप होगी ॥१२६-१२७॥ लग्नायु-साधन - लग्न की राशियों को छोड़कर अंशादि को कला बनाकर २०० से भाग देने पर लब्धि वर्ष-संख्या होगी । शेष को १२ से गुणा करके २०० से भाग देने पर लब्धि मास-संख्या होगी । पुनः पूर्ववत् ३० आदि से गुणा करके हर से भाग देने पर लब्धि दिनादि होगी ।।१२८½।। अंशायुदौय-साधन - लग्न सहित ग्रहों के पृथक्-पृथक् अंश बनाकर ४० से भाग देकर जो शेष बचे वह आयुर्दाय साधनोपयोगी अंशादि है; उसमें जो विशेष संस्कार करना चाहिए, उसका वर्णन करता हूँ। लग्न में ग्रह को घटाये । यदि शेष ६ राशि से अन्य हो तो उसमें निम्नांकित संस्कार विशेष करना चाहिए, अन्यथा नहीं । यदि घटाया हुआ ग्रह ६ राशि से अल्प और १ राशि से अधिक हो तो उन अंशों से ३० में भाग देकर लब्धि को घटाये और शेष को गुणक समझे । यदि ग्रह घटाया हुआ लग्न १ राशि से अल्प हो तो उन्हीं अंशों में ३० का भाग देकर लब्धि को एक में घटाने से शेष गुणक होता है । इस प्रकार शुभग्रह के गुणक को आधा करके गुणक समझे और पाप-ग्रह के समस्त गुणकों को ग्रहण करे । फिर इस प्रकार के गुणकों से उपर्युक्त आयुर्दाय