बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४१५ सौम्यस्यार्द्धेन पापस्य समग्रेणेति निश्चयः । गुणकघ्नाश्चायुरंशाः संस्कारोऽयमुदाहृतः ॥१३२॥ आयुर्शकलावभक्ताद्विशत्याब्दा इनाहतम् । शेषं द्विशतभक्तं स्युर्मासाः शेषा दिनादिकम् ॥१३३॥ लग्नायुरंशास्त्रिगुणादिग्भक्ता स्युः समास्ततः । शेषेऽर्कादिगुणे [भक्ते दिग्भर्मासादिकं भवेत् ॥१३४॥ सबलेंगेभतुल्यान्दैर्यु तमायुर्भवेत्स्फुटम् । अंशद्विघ्नमक्षांशं मासाः खल्यादिसंगुणात् ॥१३५॥ शेषा दिनादिकं योज्यं नैतत्पिण्डनिसर्गयोः । लग्नाऽर्कचन्द्रमध्ये तु यो बली तद्दशा पुरा ॥१३६॥ ततः केंद्रादिगानां तु द्वित्यादौ सबलस्य च । बह्वापुर्यो वीर्यसाम्येर्काद्युतस्य प्राक् याचकः ॥१३७॥ षड्वगार्द्धस्य त्रिंशस्य त्रिकोणगश्च स्मरगः । सप्तमासस्य तूर्यस्य चतुरस्रगतस्य च ॥१३८॥ क्रमः केंद्रादिकोऽत्रापि द्वित्यादौ सबलस्य च । पाकपस्याब्धिनागाश्च द्वयर्णवा सहगस्य च ॥१३९॥ त्रिकोणस्थस्य चाष्टाक्षिसूर्या द्यूनगतस्य च । तुर्याष्टगस्य तु स्वर्गा गुणकाः परिकीर्तिताः ॥१४०॥ के अंश को गुणा करे तो संस्कृत अंश होता है । यह संस्कार कहा गया है । इस संस्कृत आयुर्दाय के अंश को कलात्मक बनाकर २०० से भाग देकर लब्धि को वर्ष समझे । फिर शेष की १२ से गुणा करके गुणनफल में २०० का भाग देने से लब्धि को मास होते हैं । तत्पश्चात् शेष में ३० आदि से गुणा करके २०० का भाग देने से लब्धि को दिन एवं घटी आदि होते हैं । लग्न के आयुर्दाय अंशादि को ३ से गुणा करके गुणनफल में १० का भाग देने से जो लब्धि हो, वह वर्ष है । फिर शेष को १२ आदि से गुणा करके १० से भाग देने पर जो लब्धि हो वह मासादि होता है । (लग्न को आयु में इतनी विशेषता है कि) यदि लग्न सबल हो तो लग्न की जितनी भुक्त राशि-संख्या हो उतने वर्ष और अधिक जोड़े । तथा अंशादि को २ से गुणा करके ५ का भाग देकर लब्धि को मास समझकर उसे भी जोड़े तथा शेष को ३० आदि से गुणा करके हर से भाग देकर जो लब्धि आये, उसके तुल्य दिनादि रूप फल भी जोड़े तो लग्नायु स्पष्ट होती है । यह क्रिया पिण्डायु और निसर्गायु में नहीं की जाती है ॥१२६-१३५॥ दशा-निरूपण-लग्न, सूर्य और चन्द्रमा-इन तीनों में जो अधिक बली हैं, पहले उसी की दशा होती फिर उसके पश्चात् केन्द्रस्थित ग्रहों की, तदनन्तर 'पणफर' स्थित ग्रहों की, तत्पश्चात् 'आपोक्लिम, स्थित ग्रहों की दशा होती है । केन्द्रादि-स्थित ग्रहों में भी बल के अनुसार ही पूर्व-पूर्व दशा होती है । एक स्थान में स्थित दो या तीन ग्रहों में बल की समानता होने पर उनमें जिसकी अधिक आयु हो उसकी प्रथम दशा होती है । आयु के वर्षादि में समता हो तो जिस ग्रह का सूर्य-सान्निध्य से प्रथम उदय हुआ हो, उसकी प्रथम दशा होती है ॥१३६-१३७॥ (अन्तर्दशा कथन)-दशापति पूर्णदशा का पाचक है, तथा उसके साथ रहने वाला ग्रह आधे (१/२) का दशापति से त्रिकोण (५, ९) में स्थित ग्रह (१/३ का,) दधेश से सप्तम में रहने वाला सप्तमांश (१/७) का तथा दशेश से (४, । ८) में रहने वाला ग्रह चतुर्थांश (१/४) अन्तर्दशा का पाचक होता है । इससे सिद्ध है कि इन स्थानों से भिन्न स्थान में स्थित ग्रहों को अन्तर्दशा नहीं होती है ॥१३८ १/२॥ (अन्तर्दशा साधन के गुणक)--मूल दशापति का ८४, उसके साथ रहने वाले का ४२, त्रिकोण में रहने वाले का २८, सप्तम में रहने वाले का १२ तथा चतुर्थ-अष्टम में रहने वाले का २१ गुणक कहा गया है। वर्षादि रूप दशा-प्रमाण को अपने-अपने गुणक से गुणा करके सब गुणकों के योग से भाग देने पर जो लब्धि आये वह वर्ष होता है । शेष को १२, ३० आदि से गुणा करके गुणनफल में गुणक के योग से भाग देने पर जो लब्धि