बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४१६ नारदीयपुराणम् दशागुणैर्हता भक्त्या गुणैक्येन समागताः । शेषेऽर्कादिहते भक्ते मासाद्यैक्येन नारद ॥१४१॥ अंतर्दशासु विदशास्तासु चोपपशास्तथा । दशेशमित्रस्वोच्चर्क्षगोब्जोब्धयेकाद्रिवृद्धिगः ॥१४२॥ शुभगो यद्भगस्तद्विभस्त्वादिस्येन तद्विकृत् । प्रोक्तेतरस्थानगतस्तत्तद्भावक्षयं करः ॥१४३॥ खगस्य यद्भवेदद्रव्यं भावभे क्षणयोगजम् । जीविकादिफलं सर्वं दशायां तस्य योजयेत् ॥१४४॥ विशन्त्यापदशायां यो वैरिदृष्टो विपत्तिकृत् । शुभमित्रेक्षितश्चेष्टस्तद्वर्गस्थश्च यो ग्रहः ॥१४५॥ तत्काले बलवानापन्नाशकृत्समुदाहृतः । यस्याष्टवर्गजं चापि फलं पूर्णशुभं भवेत् ॥१४६॥ यश्च मूर्तितनुग्लाबो वृद्धिगः स्वोच्चभस्थितः । स्वत्रिकोणसुहृद्भस्थस्तस्य मध्यम सत्फलम् ॥१४७॥ श्रेष्ठं शुभतरं वाच्यं विपरीतगतस्य तु । नेष्टमुत्कटमिष्टं तु स्वल्पं ज्ञात्वा बलं वदेत् ॥१४८॥ चरे सन्मध्यदुष्टाभ्यामंगभंगे विपर्ययात् । स्थिरे नेष्टेष्टमध्या च होरायास्त्वंशकैः फलम् ॥१४९॥ स्वामीज्यज्ञयुता होरा दृष्टा व सत्फलावहा । विनाशादृष्टयुक्ता च पापांतरगतान्यथा ॥१५०॥ प्राञ्वांका बंधुमृत्याय तयोद्यने रविः स्वभात् । वक्रात्स्वादिवासाच्चार्के शुक्रादीनां तु बङ्गतः ॥१५१॥ आये, वह मास दिन आदि होती हैं। नारद ! इसी प्रकार अन्तर्दशा में उपदशा के मान समझने चाहिए । १३९-१४१३॥ (दशाफल) - दशारंभ-काल में यदि चन्द्रमा दशापति के मित्र की राशि स्वोच्च स्वराशि या दशापति से १, ४, ७, ३, १०, ११ में शुभ स्थान में हो तो जिस भाव में चन्द्रमा हो, उस भाव की विशेष रूप से पुष्टि करता हुआ शुभ फल देता है। इन स्थानों से भिन्न स्थान में हो तो उस भाव का नाशक होता है ॥१४२-१४३॥ पहले जिस ग्रह के जो द्रव्य बताये गये हैं, भाव और राशियों में जो इन ग्रहों की दृष्टि तथा योग का फल कहा गया है एवं आजीविका आदि जो जो फल बताये गये हैं, उन सबका विचार उस ग्रह की दशा में करना चाहिए। जो ग्रह पापदशा में प्रवेश के समय अपने शत्रु से देखा जाता है, वह विपत्तिकारक होता है तथा जो शुभग्रह मित्र से दृष्ट हो और शुभवर्ग में रहकर तत्काल बलवान् हो, वह सब आपत्ति को नष्ट कर देता है। जिसका (आगे बताया जाने वाला) अष्टक वर्ग से जन्य फल पूर्ण शुभ हो तथा जो ग्रह लग्न या चन्द्रमा से १, ३, ६, १०, ११ में, स्वोच्च स्थान में स्वराशि में, अपने मूल त्रिकोण में तथा मित्र की राशि में हो, उसका अशुभ फल भी कुछ कम हो जाता है, मध्यम फल श्रेष्ठ हो जाता है तथा शुभ फल तो अत्यन्त श्रेष्ठ होता है। यदि वह ग्रह इससे भिन्न स्थान में हों तो उसके पाप-फल की वृद्धि होती है और उसका शुभ फल भी अल्प हो जाता है। इन फलों को भी ग्रह के बलाबल को समझकर तदनुसार स्वल्प या अधिक कहना चाहिए ॥१४४-१४८॥ (लग्न दशाफल) - चर लग्न में प्रथम, द्वितीय, तृतीय द्रेष्काण हो तो क्रम से लग्न की दशा शुभ, मध्यम और अशुभ फल देने वाली होती है। द्विस्वभाव लग्न हो तो इससे विपरीत फल होता है। (अर्थात् प्रथ- मादि द्रेष्काण में क्रम से अशुभ, मध्यम और शुभ फल देने वाली दशा होती है)। स्थिर लग्न हो तो प्रथमादि द्रेष्काण में अशुभ, शुभ और मध्यम फल देने वाली दशा होती है। लग्न यदि अपने स्वामी गुरु और बुध से युक्त अथवा दृष्ट हो तो उसकी दशा शुभ फल देने वाली होती है। यदि वह पापग्रह से युक्त या दृष्ट हो अथवा पाप के मध्य में हो तो उसकी दशा अशुभ फल देने वाली होती है ॥१४९-१५०॥ (अष्टकवर्ग कथन) - सूर्य जन्मकालिक स्वाश्रित राशि से १।२।१०।४।८।११।९।७। इन स्थानों में शुभ होता है। मंगल और शनि से भी इन्हीं स्थानों में रहने पर वह शुभ होता है। शुक्र से ७। १२