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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४११ लग्नांशयसमानांगो बलिखेटं समोपि वा । चन्द्रनंदांशवद्वर्णः शीर्षाद्यंगविभागयुक् ॥९१॥ शीर्षकं दृक्श्रवेनासा कपोलहनवो मुखम् । कंठांसपार्श्वहृद्दोषः क्रोडनाभिश्च बास्तिकः ॥९२॥ शिश्नापाते च वृषणौ जघने जानुनी तथा । जंघे पादौ चोभयत्र त्र्यंशैः समुदितैर्वदेत् ॥९३॥ पापयुक्ते व्रणस्तस्मिन्नंगे लक्ष्म च तद्युते । स्वक्षांशे स्थिरयुक्ते तु नैज आगंतुकोऽन्यथा ॥९४॥ मंदेऽनिलाश्मजो भौमे विष्शस्त्राग्निजो बुधे । कुजोऽर्के काष्ठपशुजो जेतुः शृंग्यजयोनिजः ॥९५॥ यस्मिन्सञ्जास्त्रयः खेटा अंगेस्युस्तत्र निश्चितम् । व्रणोशुभकृतःषष्ठे तनौ राशिसमाश्रिते ॥९६॥ तिलकुन्मसकृद्दष्टसौम्यैर्युक्तश्च लक्ष्मवान् । चतुरस्रः पिंगदृक् च पैत्तिकोऽल्पकचो रविः ॥९७॥ वृत्तो वातकफी प्राज्ञो मंदवाक् शुभदृक् शशी । क्रूरदृक्तरुणो भौमः पैत्तिकश्चपलस्तथा ॥९८॥ विधानुपवृत्तिर्हास्यरुचिज्ञः श्लिष्टवाक्तथा । पिंगके श्लक्षणो दीर्घः कफी धीमान्गुरुर्मतः ॥९९॥ सुवपुलौचनः कृष्णवक्रकेशो भृगुः सुखी । दीर्घः कपिलदृग्भंदो निलिखरकचोलसः ॥१००॥

लग्न में जो नवमांश हो, उसके स्वामी ग्रह के समान अथवा जन्मसमय में जो ग्रह सबसे बली हो, उसके समान जातक का शरीर होता है । इसी प्रकार चन्द्रमा जिस नवमांश में हो उस राशि के समान वर्ण (गौर आदि) समझना चाहिए। एवं द्रेष्काणवश लग्न आदि भावों से जातक के मस्तक आदि अंग विभाग जानना चाहिए । यथा--लग्न में प्रथम द्रेष्काण हो तो लग्न मस्तक, २।१२ नेत्र, ३।११ कान, ४।१० नाक, ५।६ कपोल, ६।८ हनु (ठुड्डी) और ७ (सप्तम) भाव मुख। द्वितीय द्रेष्काण हो तो लग्न कण्ठ, २।१२ कंधा, ३।११ पसली, ४।१० हृदय, ५।९ भुज, ६।८ पेट और ७ नाभि । तृतीय द्रेष्काण हो तो लग्न वस्ति (नाभि और लिंग के मध्य का स्थान), २।१२ लिंग, गुदमार्ग, ३।१२ अंडकोश, ४।१० जांघ, ५।९ घुटना, ६।८ पिण्डली और सप्तम भाव पैर समझना चाहिए ॥९१-९३॥ जिस अंग की राशि में पापग्रह हो, उस अंग में व्रण और यदि उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो उस अंग में चिह्न (तिल मशक आदि) समझना चाहिए । पापग्रह अपनी राशि या नवमांश में, अथवा स्थिर राशि में हो तो जन्म के साथ ही व्रण होता है । शनि जिस अंग स्थान में हो उस अंग में वात या पत्थर के आघात से, मंगल के स्थान में विष, शस्त्र और अग्नि से, बुध के स्थान में पृथ्वी (मिट्टी) के आघात से, सूर्याश्रित अंग में काष्ठ और पशु से, क्षीण चन्द्राश्रित अंग में सींग वाले पशु और जलचर के आघात से व्रण होता है ॥९४-९५॥ जिस अंग की राशि में तीन पापग्रह हों, उस अंग में निश्चित रूप से व्रण होता है । षष्ठ भाव में पापग्रह हो तो उस राशि वाले अंग में व्रण होता है । यदि उस पर शुभग्रह की दृष्टि हो तो उस अंग में तिल या मसा होता है । यदि शुभग्रह का योग हो तो उस अंग में चिह्न (दाग) मात्र होता है ९४-९६१/२॥ (ग्रहों के स्वरूप और गुण का वर्णन-)सूर्य की आकृति चतुरस्र है, शरीर की कान्ति और नेत्र पिंगल हैं। पित्तप्रधान प्रकृति है और उनके मस्तक पर थोड़े-से केश हैं। चन्द्रमा आकार में गोल वात और कफ प्रकृति वाला पंडित और मृदुभाषी तथा बड़े सुन्दर नेत्र वाला है। मंगल क्रूर दृष्टि वाला, युवा पित्तप्रधान प्रकृति वाला और चंचल स्वभाव का है। बुध की प्रकृति में कफ, पित्त और वात की प्रधानता है, वह हास्यप्रिय और अनेकार्थक शब्द बोलने वाला है। बृहस्पति पिंगल अंगकान्ति, केश और नेत्र वाला हैं। दीर्घ शरीर और तथा कफप्रधान प्रकृति वाला है और वे बड़े बुद्धिमान् हैं। शुक्र सुन्दर अंग और नेत्र वाले हैं, मस्तक पर काले घुंघराले केश हैं और नेत्र कपिश वर्ण के हैं, उनकी वातप्रधान प्रकृति है, कठोर केश वाले और बड़े बालसी हैं ९७-१००॥

४१२ नारदीयपुराणम् स्नाय्वस्थिरक्तत्वक्शुक्रवसामज्जास्तु धातवः । मंदार्कचंद्रसौम्यासृग्जिज्जीवकुभुवः क्रमात् ॥१०१॥ चंद्रांगपापैर्भांत्यस्थैः सैंदुपापचतुष्टयैः । चक्रपूर्वापरे पापसौम्यैः कीटतनौ मृतिः ॥१०२॥ उदयास्तगते पापौ चंद्रः क्रूरयुतैः शुभैः । न चेद्दृष्टस्तदा मृत्युर्जातस्य भवति ध्रुवम् ॥१०३॥ क्षीणेऽब्जे व्ययगे पापैर्लग्नाष्टस्थैःशुभा न चेत् । केंद्रेषु वाब्जोसंयुक्तः स्मरांत्यमृतिलग्नगः ॥१०४॥ केंद्राद्या हस्त संख्यैतैरदृष्टो मृत्युदस्तथा । षष्ठेभैब्जेऽसंदृष्टेऽसद्यो मृत्युः शुभेक्षिते ॥१०५॥ समाष्टके मिश्रखेटैर्दृष्टेऽदृष्टे मृतिः शिशोः । क्षीणेऽब्जेंगे रन्ध्रकेन्द्रे पापे पापान्तरस्थिते ॥१०६॥ भृगूनूनिधने वाब्जे लग्नेऽप्येवं शिशोर्मृतिः । पापैश्चन्द्रास्तगैर्मात्रा सार्द्धं सद्दिष्टमंतरा ॥१०७॥ शुभादृष्टे भान्त्यगेब्जे त्रिकोणोपरतैः खलैः । लग्नस्थे वा विधौपापैरस्तस्थैर्मूतिमाप्नुयात् ॥१०८॥ ग्रस्तेऽब्जेऽसद्भिर्ध्रष्टस्थैः सूज्यवात्मजयोर्मृतिः । लग्ने रवौ तु शस्त्रेण सवीर्यांसद्भिभ्रष्टगैः ॥१०८॥ कर्केन्द्रीज्ययुते लग्ने केंद्रे सौम्ये च भार्गवे । शेषैस्त्र्यरीशोगैरायुर्मितं भवति ध्रुवम् ॥११०॥ वर्गोत्तमे मीनलग्ने वृषेऽन्जे तत्त्वलिप्तिके । स्वतुंगस्थेष्वशेषेषु परमायुः प्रकीर्तितम् ॥१११॥ (ग्रहों के धातु) - स्नायु (शिरा), हड्डी, शोणित, त्वचा, वीर्य, वसा और मज्जा ये क्रमशः शनि, सूर्य, चन्द्र, बुध, शुक्र, गुरु और मंगल के धातु हैं ॥१०१॥ (अरिष्टकथन) - चन्द्रमा, लग्न और पापग्रह- ये राशि के अन्तिमांश में हों अथवा चन्द्रमा और तीनों पापग्रह ये लग्नादि चारों केन्द्रों में हों तथा कर्क लग्न हो तो जातक की मृत्यु होती है। दो पापग्रह लग्न और सप्तम भाव में हों तथा चन्द्रमा एक पापग्रह से युक्त हो और शुभग्रह से दृष्ट न हो तो जातक का शीघ्र मरण होता है ॥१०२-१०३॥ क्षीण चन्द्रमा १२वें भाव में हों, पापग्रह लग्न और अष्टम भाव में हों तथा शुभग्रह केन्द्र में न हों तो जातक की मृत्यु होती है। अथवा पापयुक्त चन्द्रमा सप्तम द्वादश या लग्न में स्थित हो तथा उस पर केन्द्र से भिन्न स्थान में स्थित शुभग्रह की दृष्टिन हो तो जातक की मृत्यु होती है। यदि चन्द्रमा ६, ८ स्थान में रहकर पापग्रह से दृष्ट हो तो जातक का शीघ्र मरण होता है। शुभग्रह से दृष्ट हो तो ८ वर्ष में और शुभग्रह तथा पापग्रह दोनों से दृष्ट हो तो ४ वर्ष में जातक की मृत्यु हो जाती है। क्षीण चन्द्रमा लग्न में तथा पापग्रह ८, १, ४, ७, १० में स्थित हों तो जातक का मरण होता है। अथवा दो पाप- ग्रहों के बीच में होकर चन्द्रमा ४, ७, ८ स्थान में स्थित हो या लग्न ही दो पापग्रहों के बीच में हो तो जातक की मृत्यु हो जाती है ॥१०४-१०६॥ पापग्रह ७, ८ में हों और उन पर शुभग्रह की दृष्टि न हो तो माता सहित शिशु की मृत्यु हो जाती है ॥१०७॥ राशि के अन्तिमांश में चन्द्रमा पापग्रह से अदृष्ट हो तथा पापग्रह त्रिकोण (५, ९) में हो अथवा लग्न में चन्द्रमा ओर सप्तम में पापग्रह हो तो शिशु का मरण होता है ॥१०८॥ राहुग्रस्त चन्द्रमा पापग्रह से युक्त हो और मंगल अष्टम स्थान में स्थित हो तो माता और शिशु दोनों की मृत्यु होती है। इसी प्रकार राहुग्रस्त सूर्य यदि पापग्रह से युक्त हो तथा बली पापग्रह अष्टम भाव में स्थित हो तो माता और शिशु का शस्त्र से मरण होता है ॥१०८-१०९॥ आयुर्दाय कथन - चन्द्रमा और बृहस्पति से युक्त कर्क लग्न हो, बुध और शुक्र केन्द्र में हों और शेष ग्रह (रवि, मंगल एवं शनि) ३, ६, ११ स्थान में हों तो ऐसे योग में उत्पन्न जातक की आयु बहुत अधिक होती है ॥११०॥ मीन लग्न में मीन का नवमांश हो, बुध वृष में २५ कला पर हो तथा शेष सब ग्रह अपने-अपने उच्च स्थान में हो तो जातक परम आयु (१२० वर्ष ५ दिन की) प्राप्त करता है ॥१११॥ लग्नेश बली होकर केन्द्र

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४१३ शुभैर्दृष्टः सवीर्योऽगे केंद्रस्थे चायुरर्थदः । स्वोच्चोच्चोब्जे स्वक्षर्गेः सौम्यैः सवीर्येगाधिपे तनौ ॥११२॥ षष्ठचन्दकेंद्रसौम्येभ्राष्टशुद्धे सप्ततिर्गुरौ । मूलत्रिकोणगैः सौम्यैर्गुरौ स्वोच्चसमन्विते ॥११३॥ लग्नाधिपे बलयुतेशीत्यब्दं त्वायुरीरितम् । सवीर्ये सत्सु केंद्रेषु त्रिशच्छुद्धियुतेऽष्टमे ॥११४॥ लयेशे धर्मगे जीवेऽष्टस्थे क्रूरेक्षिते जिताः । लग्नाष्टमेशावष्टस्थौ भाब्दमायुःकरौ मतौ ॥११५॥ लग्नेऽशुभेज्यौ ग्लौदृष्टौ भृत्यौ कश्चन चाकृतिः । धर्मांगस्थे शनौ शुक्रे केंद्रेब्जे व्ययधर्मगे ॥११६॥ शताब्दं गीष्मतौ कर्के कंटकस्थसितेज्ययोः । लयेशेंगे शुभैहीनेऽष्टमे खाब्धिमितं वयः ॥११७॥ लग्ने शेष्टमगेष्टेशे तनुस्थे पंचवत्सरम् । कवीज्ययोगे सौम्याब्जौ लग्ने मृत्यौ च खेभवः ॥११८॥ एतद्योगजमायुः स्यादथ स्पष्टमुदीर्यते । सूर्याधिक बले पैंडं निसर्गाच्च विधोर्बले ॥११९॥ अंशायुः सबले लग्ने तत्साधनमथो शृणु । गोब्जास्तत्त्वतिथी सूर्यास्तिथिः स्वर्गा नखाः क्रमात् ॥१२०॥ नखा विधुर्द्वार्किकाश्च धृतिः स्वाक्षिखमार्गणाः । ॥१२१॥ पिंडे निसर्ये स्वोच्चे नो ग्रहः षड्भल्पको यदा चक्रशुद्धस्तदा ग्राह्योस्यांशा आयुषि संमताः ॥१२२॥ में हो, उस पर शुभग्रह की दृष्टि हो तो बालक धन सहित दीर्घायु होता है। चन्द्रमा अपने उच्च में हो, शुभग्रह अपनी राशि में हो, बली लग्नेश लग्न में हो तो जातक की आयु ६० वर्ष ही होती है। केन्द्र में शुभग्रह हों और अष्टमभाव शुद्ध (ग्रहरहित) हो तो ७० वर्ष की आयु होती है ॥११२॥ शुभग्रह अपने-अपने मूल त्रिकोण में हों, गुरु अपने उच्च में हो तथा लग्नेश बलवान् हों तो ८० वर्ष की आयु होती है ॥११३॥ सबल शुभग्रह केन्द्र में हों और अष्टम भाव में कोई ग्रह न हो तो ३० वर्ष की आयु होती है ॥११४॥ अष्टमेश नवम भाव में हों, बृहस्पति अष्टम भाव में रहकर पापग्रह से दृष्ट हों तो २४ वर्ष की आयु होती है। लग्नेश और अष्टमेश दोनों अष्टमभाव में स्थित हों तो २७ वर्ष की आयु होती है ॥११५॥ लग्न में पापग्रह सहित बृहस्पति हों, उस पर चन्द्रमा की दृष्टि हो तथा अष्टम में कोई ग्रह न हो तो २२ वर्ष की आयु समझनी चाहिए। शनि नवम भाव या लग्न में हों, शुक्र केन्द्रमें हो और चन्द्रमा १२ या ९ में हो तो १०० वर्ष की आयु होती है। बृहस्पति कर्क में हो अथवा बृहस्पति और शुक्र दोनों केन्द्र में हों तो १०० वर्ष की आयु प्राप्त होती है ॥११६॥ अष्टमेश लग्न में हो और अष्टम भाव में शुभग्रह न हो तो ४० वर्ष की आयु होती है। लग्नेश अष्टम भाव में और अष्टमेश लग्न में हों तो ५ वर्ष की आयु होती है। शुक्र और बृहस्पति एक राशि में हों अथवा बुध और चन्द्रमा लग्न या अष्टम भाव में हों तो ५० वर्ष की आयु होती है ॥११६-११८॥ मुने ! मैंने इस प्रकार ग्रहयोग-सम्बन्ध से आयुर्दाय का प्रमाण कहा है। अब गणित द्वारा स्पष्टायुर्दाय का का वर्णन करता हूँ। (सूर्य, चन्द्रमा और लग्न में से) यदि सूर्य अधिक बली हो तो पिण्डायु, चन्द्रमा बली हो तो निसर्गायु और लग्न बली हो तो अंशायु का साधन करना चाहिए। उसका साधन-प्रकार मैं बतलाता हूँ ॥११९॥ पिण्डायु और निसर्गायु का साधन-सूर्य आदि ग्रह अपने-अपने उच्च में हों तो क्रमशः १९, २५, १५, १२, १५, २१ और २० वर्ष पिण्डायु के प्रमाण होते हैं तथा २०, १, २, ९, १८, २०, ५० ये क्रमशः सूर्यादि ग्रहों के निसर्गायुर्दाय के प्रमाण होते हैं ॥१२०-१२१॥ पिण्डायु और निसर्गायु में आयु-साधन करना हो तो राश्यादि ग्रह में अपने उच्च को घटाना चाहिए। यदि वह ६ राशि से अल्प हो तो उसको १२ राशि में घटाकर ग्रहण करें। उसके अंश बनाने से वह आयुर्दाय-साधन

४१४ नारदीयपुराणम् अंशोनाः शत्रुभे कार्या ग्रहं वक्रगतिं विना । मंदशुक्रौ विनाऽर्द्धांना ग्रहस्यास्तंगतस्य च ॥१२३॥ हानिद्वयेऽधिकाः कार्या यदा क्रूरस्तनौ तदा । विहायारीनंशाद्यैर्हन्यादायुर्बलवान् भजेत् ॥१२४॥ भगणांशैलैब्धहीनास्तेषां कार्या विचक्षणैः । पापस्यांशाः समग्नोना सौम्यस्यार्द्धविवर्जिताः ॥१२५॥ स्पष्टास्तेंशाः षषट्‌ह्यासा गुणयित्वा स्वकैर्गुणैः । ॥१२६॥ वर्षाणि शेषमर्कघ्नं हारात्संमासकाः स्मृताः तच्छेषश्च त्रिगुणितः तेनैवाप्तं दिनानि च । शेषे षष्ट्या हते भक्ते हारेण घटिकादिकम् ॥१२७॥ हित्वा भाज्यंभागादीन्कलीकृत्य खखाक्षिभिः । भजेद्वर्षाणि शेषे तु गुणिते द्वादशादिभिः ॥१२८॥ द्विसप्तांशे च मासादिलग्नायुर्जायते स्फुटम् । अंशायुषी सलग्नानां खेटानामंशका हताः ॥१२९॥ खयुगैरायुशंः स्युस्तत्संस्कारं वदामि ते । ग्रहोत्तलग्नं षड्रात्यं चेत्संस्कारोऽन्यथा नहि ॥१३०॥ तदंशः खाययो भक्ता लब्धोनोऽसृग्गुणो भवेत् । ॥१३१॥ यदैकाल्पं तदास्र्यांशाः स्वाग्रयाप्तोना च भूगुणः में उपयोगी होता है । जो ग्रह शत्रु की राशि में हो उसके अंशों में उसी का तृतीयांश घटाये । यदि वह वक्रगति न हो तभी ऐसा करना चाहिए। (यदि ग्रह वक्रगति हो तो शत्रु राशि में रहने पर भी तृतीयांश नहीं घटाना चाहिए) तथा शनि और शुक्र को छोड़कर अन्य ग्रह अस्त हों तो उनके अंशों में आधा घटा देना चाहिए । शनि अस्त हों तो भी उनके अंशों में आधा घटा देना चाहिए ।) यदि किसो ग्रह में दोनों हानि प्राप्त हो (अर्थात् वह शत्रुग्रह में हो और अस्त भी हो) तो उसमें अधिक हानि मात्र करें (अर्थात् केवल आधा घटाये, तृतीयांश नहीं) । यदि लग्न में पापग्रह हो तो उसकी राशि को छोड़कर केवल अंशादि से आयुर्दाय के अंश को गुणा करके गुणनफल में ३६० का भाग देकर लब्ध अंशादि को पूर्वोक्त अंश में घटाये। इस प्रकार पापग्रह के समस्त लब्धांश घटाये । यदि उसमें शुभग्रह का योग या दृष्टि हो तो लब्धांश का आधा वटाना चाहिए । इस तरह आगे बताये जाने वाले प्रकार से आयुर्दाय-साधन योग्य स्पष्ट अंश उपलब्ध होते हैं ॥१२२-१२५॥ पिण्डायु-साधन -- उन स्पष्टांशों को अपने-अपने पूर्वोक्त गुणक (उच्चस्थ वर्षसंख्या १९ आदि) से गुणा करके गुणनफल में ३६० से भाग देने पर लब्धि वर्ष-संख्या होती है । शेष को १२ से गुणा करके ३६० से भाग देने पर लब्धि मास-संख्या होती है । पुनः शेष को ३० से गुणा करके ३६० के द्वारा भाग देने पर लब्धि दिन- संख्या होगी । फिर शेष को ६० गुणा कर ३६० से भाग देने पर लब्धि घटी एवं पलादि रूप होगी ॥१२६-१२७॥ लग्नायु-साधन - लग्न की राशियों को छोड़कर अंशादि को कला बनाकर २०० से भाग देने पर लब्धि वर्ष-संख्या होगी । शेष को १२ से गुणा करके २०० से भाग देने पर लब्धि मास-संख्या होगी । पुनः पूर्ववत् ३० आदि से गुणा करके हर से भाग देने पर लब्धि दिनादि होगी ।।१२८½।। अंशायुदौय-साधन - लग्न सहित ग्रहों के पृथक्-पृथक् अंश बनाकर ४० से भाग देकर जो शेष बचे वह आयुर्दाय साधनोपयोगी अंशादि है; उसमें जो विशेष संस्कार करना चाहिए, उसका वर्णन करता हूँ। लग्न में ग्रह को घटाये । यदि शेष ६ राशि से अन्य हो तो उसमें निम्नांकित संस्कार विशेष करना चाहिए, अन्यथा नहीं । यदि घटाया हुआ ग्रह ६ राशि से अल्प और १ राशि से अधिक हो तो उन अंशों से ३० में भाग देकर लब्धि को घटाये और शेष को गुणक समझे । यदि ग्रह घटाया हुआ लग्न १ राशि से अल्प हो तो उन्हीं अंशों में ३० का भाग देकर लब्धि को एक में घटाने से शेष गुणक होता है । इस प्रकार शुभग्रह के गुणक को आधा करके गुणक समझे और पाप-ग्रह के समस्त गुणकों को ग्रहण करे । फिर इस प्रकार के गुणकों से उपर्युक्त आयुर्दाय

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४१५ सौम्यस्यार्द्धेन पापस्य समग्रेणेति निश्चयः । गुणकघ्नाश्चायुरंशाः संस्कारोऽयमुदाहृतः ॥१३२॥ आयुर्शकलावभक्ताद्विशत्याब्दा इनाहतम् । शेषं द्विशतभक्तं स्युर्मासाः शेषा दिनादिकम् ॥१३३॥ लग्नायुरंशास्त्रिगुणादिग्भक्ता स्युः समास्ततः । शेषेऽर्कादिगुणे [भक्ते दिग्भर्मासादिकं भवेत् ॥१३४॥ सबलेंगेभतुल्यान्दैर्यु तमायुर्भवेत्स्फुटम् । अंशद्विघ्नमक्षांशं मासाः खल्यादिसंगुणात् ॥१३५॥ शेषा दिनादिकं योज्यं नैतत्पिण्डनिसर्गयोः । लग्नाऽर्कचन्द्रमध्ये तु यो बली तद्दशा पुरा ॥१३६॥ ततः केंद्रादिगानां तु द्वित्यादौ सबलस्य च । बह्वापुर्यो वीर्यसाम्येर्काद्युतस्य प्राक् याचकः ॥१३७॥ षड्वगार्द्धस्य त्रिंशस्य त्रिकोणगश्च स्मरगः । सप्तमासस्य तूर्यस्य चतुरस्रगतस्य च ॥१३८॥ क्रमः केंद्रादिकोऽत्रापि द्वित्यादौ सबलस्य च । पाकपस्याब्धिनागाश्च द्वयर्णवा सहगस्य च ॥१३९॥ त्रिकोणस्थस्य चाष्टाक्षिसूर्या द्यूनगतस्य च । तुर्याष्टगस्य तु स्वर्गा गुणकाः परिकीर्तिताः ॥१४०॥ के अंश को गुणा करे तो संस्कृत अंश होता है । यह संस्कार कहा गया है । इस संस्कृत आयुर्दाय के अंश को कलात्मक बनाकर २०० से भाग देकर लब्धि को वर्ष समझे । फिर शेष की १२ से गुणा करके गुणनफल में २०० का भाग देने से लब्धि को मास होते हैं । तत्पश्चात् शेष में ३० आदि से गुणा करके २०० का भाग देने से लब्धि को दिन एवं घटी आदि होते हैं । लग्न के आयुर्दाय अंशादि को ३ से गुणा करके गुणनफल में १० का भाग देने से जो लब्धि हो, वह वर्ष है । फिर शेष को १२ आदि से गुणा करके १० से भाग देने पर जो लब्धि हो वह मासादि होता है । (लग्न को आयु में इतनी विशेषता है कि) यदि लग्न सबल हो तो लग्न की जितनी भुक्त राशि-संख्या हो उतने वर्ष और अधिक जोड़े । तथा अंशादि को २ से गुणा करके ५ का भाग देकर लब्धि को मास समझकर उसे भी जोड़े तथा शेष को ३० आदि से गुणा करके हर से भाग देकर जो लब्धि आये, उसके तुल्य दिनादि रूप फल भी जोड़े तो लग्नायु स्पष्ट होती है । यह क्रिया पिण्डायु और निसर्गायु में नहीं की जाती है ॥१२६-१३५॥ दशा-निरूपण-लग्न, सूर्य और चन्द्रमा-इन तीनों में जो अधिक बली हैं, पहले उसी की दशा होती फिर उसके पश्चात् केन्द्रस्थित ग्रहों की, तदनन्तर 'पणफर' स्थित ग्रहों की, तत्पश्चात् 'आपोक्लिम, स्थित ग्रहों की दशा होती है । केन्द्रादि-स्थित ग्रहों में भी बल के अनुसार ही पूर्व-पूर्व दशा होती है । एक स्थान में स्थित दो या तीन ग्रहों में बल की समानता होने पर उनमें जिसकी अधिक आयु हो उसकी प्रथम दशा होती है । आयु के वर्षादि में समता हो तो जिस ग्रह का सूर्य-सान्निध्य से प्रथम उदय हुआ हो, उसकी प्रथम दशा होती है ॥१३६-१३७॥ (अन्तर्दशा कथन)-दशापति पूर्णदशा का पाचक है, तथा उसके साथ रहने वाला ग्रह आधे (१/२) का दशापति से त्रिकोण (५, ९) में स्थित ग्रह (१/३ का,) दधेश से सप्तम में रहने वाला सप्तमांश (१/७) का तथा दशेश से (४, । ८) में रहने वाला ग्रह चतुर्थांश (१/४) अन्तर्दशा का पाचक होता है । इससे सिद्ध है कि इन स्थानों से भिन्न स्थान में स्थित ग्रहों को अन्तर्दशा नहीं होती है ॥१३८ १/२॥ (अन्तर्दशा साधन के गुणक)--मूल दशापति का ८४, उसके साथ रहने वाले का ४२, त्रिकोण में रहने वाले का २८, सप्तम में रहने वाले का १२ तथा चतुर्थ-अष्टम में रहने वाले का २१ गुणक कहा गया है। वर्षादि रूप दशा-प्रमाण को अपने-अपने गुणक से गुणा करके सब गुणकों के योग से भाग देने पर जो लब्धि आये वह वर्ष होता है । शेष को १२, ३० आदि से गुणा करके गुणनफल में गुणक के योग से भाग देने पर जो लब्धि

४१६ नारदीयपुराणम् दशागुणैर्हता भक्त्या गुणैक्येन समागताः । शेषेऽर्कादिहते भक्ते मासाद्यैक्येन नारद ॥१४१॥ अंतर्दशासु विदशास्तासु चोपपशास्तथा । दशेशमित्रस्वोच्चर्क्षगोब्जोब्धयेकाद्रिवृद्धिगः ॥१४२॥ शुभगो यद्भगस्तद्विभस्त्वादिस्येन तद्विकृत् । प्रोक्तेतरस्थानगतस्तत्तद्भावक्षयं करः ॥१४३॥ खगस्य यद्‌भवेदद्रव्यं भावभे क्षणयोगजम् । जीविकादिफलं सर्वं दशायां तस्य योजयेत् ॥१४४॥ विशन्त्यापदशायां यो वैरिदृष्टो विपत्तिकृत् । शुभमित्रेक्षितश्चेष्टस्तद्वर्गस्थश्च यो ग्रहः ॥१४५॥ तत्काले बलवानापन्नाशकृत्समुदाहृतः । यस्याष्टवर्गजं चापि फलं पूर्णशुभं भवेत् ॥१४६॥ यश्च मूर्तितनुग्लाबो वृद्धिगः स्वोच्चभस्थितः । स्वत्रिकोणसुहृद्‌भस्थस्तस्य मध्यम सत्फलम् ॥१४७॥ श्रेष्ठं शुभतरं वाच्यं विपरीतगतस्य तु । नेष्टमुत्कटमिष्टं तु स्वल्पं ज्ञात्वा बलं वदेत् ॥१४८॥ चरे सन्मध्यदुष्टाभ्यामंगभंगे विपर्ययात् । स्थिरे नेष्टेष्टमध्या च होरायास्त्वंशकैः फलम् ॥१४९॥ स्वामीज्यज्ञयुता होरा दृष्टा व सत्फलावहा । विनाशादृष्टयुक्ता च पापांतरगतान्यथा ॥१५०॥ प्राञ्वांका बंधुमृत्याय तयोद्यने रविः स्वभात् । वक्रात्स्वादिवासाच्चार्के शुक्रादीनां तु बङ्गतः ॥१५१॥ आये, वह मास दिन आदि होती हैं। नारद ! इसी प्रकार अन्तर्दशा में उपदशा के मान समझने चाहिए । १३९-१४१३॥ (दशाफल) - दशारंभ-काल में यदि चन्द्रमा दशापति के मित्र की राशि स्वोच्च स्वराशि या दशापति से १, ४, ७, ३, १०, ११ में शुभ स्थान में हो तो जिस भाव में चन्द्रमा हो, उस भाव की विशेष रूप से पुष्टि करता हुआ शुभ फल देता है। इन स्थानों से भिन्न स्थान में हो तो उस भाव का नाशक होता है ॥१४२-१४३॥ पहले जिस ग्रह के जो द्रव्य बताये गये हैं, भाव और राशियों में जो इन ग्रहों की दृष्टि तथा योग का फल कहा गया है एवं आजीविका आदि जो जो फल बताये गये हैं, उन सबका विचार उस ग्रह की दशा में करना चाहिए। जो ग्रह पापदशा में प्रवेश के समय अपने शत्रु से देखा जाता है, वह विपत्तिकारक होता है तथा जो शुभग्रह मित्र से दृष्ट हो और शुभवर्ग में रहकर तत्काल बलवान् हो, वह सब आपत्ति को नष्ट कर देता है। जिसका (आगे बताया जाने वाला) अष्टक वर्ग से जन्य फल पूर्ण शुभ हो तथा जो ग्रह लग्न या चन्द्रमा से १, ३, ६, १०, ११ में, स्वोच्च स्थान में स्वराशि में, अपने मूल त्रिकोण में तथा मित्र की राशि में हो, उसका अशुभ फल भी कुछ कम हो जाता है, मध्यम फल श्रेष्ठ हो जाता है तथा शुभ फल तो अत्यन्त श्रेष्ठ होता है। यदि वह ग्रह इससे भिन्न स्थान में हों तो उसके पाप-फल की वृद्धि होती है और उसका शुभ फल भी अल्प हो जाता है। इन फलों को भी ग्रह के बलाबल को समझकर तदनुसार स्वल्प या अधिक कहना चाहिए ॥१४४-१४८॥ (लग्न दशाफल) - चर लग्न में प्रथम, द्वितीय, तृतीय द्रेष्काण हो तो क्रम से लग्न की दशा शुभ, मध्यम और अशुभ फल देने वाली होती है। द्विस्वभाव लग्न हो तो इससे विपरीत फल होता है। (अर्थात् प्रथ- मादि द्रेष्काण में क्रम से अशुभ, मध्यम और शुभ फल देने वाली दशा होती है)। स्थिर लग्न हो तो प्रथमादि द्रेष्काण में अशुभ, शुभ और मध्यम फल देने वाली दशा होती है। लग्न यदि अपने स्वामी गुरु और बुध से युक्त अथवा दृष्ट हो तो उसकी दशा शुभ फल देने वाली होती है। यदि वह पापग्रह से युक्त या दृष्ट हो अथवा पाप के मध्य में हो तो उसकी दशा अशुभ फल देने वाली होती है ॥१४९-१५०॥ (अष्टकवर्ग कथन) - सूर्य जन्मकालिक स्वाश्रित राशि से १।२।१०।४।८।११।९।७। इन स्थानों में शुभ होता है। मंगल और शनि से भी इन्हीं स्थानों में रहने पर वह शुभ होता है। शुक्र से ७। १२

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४५७ धर्मेध्यायारिगो जीवाद्दिकत्यरिगो विधोः । पृथ्यंत्यधीतपाः सुज्ञा ततोवृद्धंघत्यबंधुराः ॥१५२॥ वृद्धिगोंगात्सधनधीतपः स्वाराच्छशी शुभः । स्वद्व्वृध्यस्तादिषु पृधात्सप्ताष्टौ पंचयोभगः ॥१५३॥ षट्त्र्यायधीस्थो मंदाच्च ज्ञाद्विद्यायाष्टकेंद्रगः । ॥१५४॥ केंद्राष्टात्यांत्य इज्याद्वा ज्ञज्ञयायास्तत्र स्वे कवेः ॥१५५॥ वृद्धाविनात्सादिधिया मंगा मायारिगो विधोः । केंद्राष्टापार्थंगः स्वक्षान्मंदाद्गोष्टायकेंद्रगः ॥१५५॥ षट् त्रिधी भवतः सौम्यात्षड्वांशाष्टगो भृगोः । ॥१५६॥ कवेर्द्वर्चाषष्ठमोऽध्याये कर्मायव्ययषष्ठस्थो जीवाद्भौमः शुभः स्मृतः ॥१५७॥ सन्त्रोमंदान्सधीत्रये । साक्षास्ते भूमिजाज्जीवाद्यारिरिभवमृत्यगः ॥१५८॥ धर्मायारिसितांत्यैर्कात्साद्यत्रिस्र्वगता स्वभात् । ॥१५८॥ षट्स्वायाष्टानिधिखेष्विज्यात्सहायेषु विलग्नतः ॥१५९॥ विश्व्वाष्टाद्यस्तबंध्याये कुजात्खात्सत्रिके गुरुः । साध्यंके सन् रवेः शुकाद्धीखगो दिग्भवारिगः ॥१५९॥ चंद्राद्वीशार्यगोस्तेषु मन्दाद्वीत्रिषडंत्यगः । गोन्धिधीषट्खखाद्या ये ज्ञात्स्यूते विलग्नतः ॥१६०॥ ६ में, गुरु से ९ । ५ । ११ । ६ में, चन्द्रमा से १० । ३ । ११, ६ में, बुध से इन्हीं १० । ३ । ११ । ६ और १२ । ५ । ६ में भी वह शुभ होता है । लग्न से ३ । ६ । १० । ११ । १२ । ४ स्थानों में सूर्य शुभ होता है ॥१५१- १५२॥ चन्द्रमा लग्न से ६, ३, १०, ११ स्थानों में; मंगल से २, ५, ६ सहित इन्हीं ६, ३, १०, ११ स्थानों में; अपने स्थान से ३, ६, १०, ११, ७, १ में; सूर्य से ३, ६, १०, ७, ८ में; शनि से ६, ३, ११, ५ में; बुध से ५, ३, ८, १, ४, ७, १० में; गुरु से १, ४, ७, १०, ८, ११, १२ में और शुक्र से ४, ५, ९, ३, ११, ७, १० इन स्थानों में शुभ होता है ॥१५३-१५४॥ मंगल सूर्य से ३, ६, १०, ११, ५ में; लग्न से ३; ६, १०, ११, ५ में; लग्न से ३, ६, १०, ११, १ में चन्द्रमा से ३, ६, ११ में; अपने आश्रित स्थान से १, ४, ७, १०, ८, ११, २ में; शनि से ६, ८, ११, १, ४, ७, १० में, बुध से ६, ३, ५, ११, में, शुक्र से ६, ११, २, ८ में; और गुरु से १०, ११, १२, ६ स्थानों में शुभ होता है ॥१५५-१५६॥ बुध शुक्र से ५, ३ सहित २, १, ८, ६, ४, ११ स्थानों में; शनि और मंगल से १०, ७ सहित २, १, ८, ९, ४ और ११वें स्थान में; गुरु से १२, ६, ११, ८ वें स्थानों में; स्वाधिष्ठित स्थान से १, ३, १०, ६, ११, ६, ५, १२वें स्थानों में; चन्द्रमा से ६, १०, ११, ८, ४, १० में और लग्न से १ तथा पूर्वोक्त ६, १०, ११, ८, ४, १० स्थानों में शुभ होता है ॥१५७-१५८॥ गुरु मंगल से १०, २, ८, १, ७, ४, ११ स्थानों में; अपने आश्रित स्थान से ३ सहित पूर्वोक्त (१०, २, ८, १, ७, ४, ११) स्थानों में; सूर्य से ३, ६ सहित पूर्वोक्त (१०, २, ८, १, ७, ४, ११) स्थानों में; शुक्र से ५, २, ९, १०, ११, ६ में; चन्द्रमा से २, ११, ५, ९, ७ में; शनि से ५, ३, ६, १२ में; बुध से ९, ४, ५, ६, २, १०, १, ११ में; तथा लग्न से ७ सहित पूर्वोक्त (९, ४, ५, ६, २, १०, १, ११) स्थानों में शुभ होता है ॥१५९-१६०॥ ५६ ना० पृ०

आशु तेषाष्टगोष्वंगः त्सांतेष्वन्जात्सितः शुभः । स्वात्सज्ञेषु त्रिधोगोब्धौ दिक्छिद्रासिगतोकंर्जात् ॥१६१॥ रंध्रायव्ययगः सूर्यादोध्वष्टौखे सगौर्गुरौ । ज्ञान्धि त्र्यायारिगोरातिषट्ग्वध्यंत्यगोषु च ॥१६२॥ त्रिधोशारिषु मन्दः खात्साक्षांत्येषु शुभो मृतः । केंद्रायाष्टधनेष्वर्को लग्नाद्वृद्ध्यायबंधुषु ॥१६३॥ गोध्वष्टावारिखांत्येज्ञाच्चंद्राल्लाभत्रिपद्मतः । षडष्टांत्यगतः [शु द्गुकारोह्रै शांत्यशत्रुषु ॥१६४॥ उक्तस्थानेषु रेखादौ ह्यनुक्तेषु तु बिंदुदाः । जन्मभाद्वृद्धिमित्रोच्चखभेधिष्टं परेष्वसत् ॥१६५॥ कष्टमर्थक्षयः क्लेशः समतार्थसुखायमः । धनाप्तिः सुखमिष्टाप्तिरिति रेखाफलं क्रमात् ॥१६६॥ पितृमातृद्विषन्मित्रभ्रातृस्त्रीभृतकाद्रवेः । स्वामिलग्नाजपोः स्वस्थाद्मेदर्कस्वयशोशयात् ॥१६७॥ तृणस्वर्णाश्वधोरणखैरर्कांशे वृत्तिमादिशेत् । कृष्यंबुजस्त्रीभ्योब्जांशे कौजे धात्वस्त्रसाहसैः ॥१६८॥


शुक्र लग्न से १, २, ३, ४, ५, ११, ८, ९ स्थानों में; चन्द्रमा से भी इन्हीं स्थानों (१, २, ३, ४, ५, ११, ८, ९) में और १२वें स्थान में; अपने आश्रित स्थान से १० सहित उक्त (१, २, ३, ४, ५, ११, ८, ६) स्थानों में; शनि से ३, ५, ९, ४, १०, ८, ११ स्थानों में; सूर्य से ८, ११, १२ स्थानों में; गुरु से ९, ८, ५, १०, ११ स्थानों में; बुध से ५, ३, ११, ६, ९ स्थानों में और मंगल से ३, ६, ९, ५, ११ तथा बारहवें स्थानों में शुभ होता है ॥१६१-१६२॥ शनि अपने आश्रित स्थान से ३, ५, ११; ६ में; मंगल से १०, १२ सहित पूर्वोक्त (३, ५, ११, ६) स्थानों में; सूर्य से १, ४, ७, १०, ११, ८, २, में; लग्न से ३, ६, १०, ११, १, ४ में; बुध से ९, ८, ११, १०, १२, में चन्द्रमा से ११, ३, ६ में; शुक्र से ६, ११, में और गुरु से ५, ११, ६ स्थानों में शुभ होता है ॥१६३-१६४॥ उपर्युक्त स्थानों में ग्रह रेखा-प्रद और अनुक्त स्थानों में बिन्दुप्रद होते हैं। जो ग्रह लग्न या चन्द्रमा से वृद्ध या उपचय स्थान (३, ६, १०, ११) में हों, या अपने मित्रगृह में, उच्च स्थान में तथा स्वराशि में स्थित हों, उनके द्वारा शुभ फलकी अधिकता होती है ॥१६५॥ एकादि रेखा वाले स्थान का फल—उक्त प्रकार से जिस स्थान में एक रेखा हो, वहाँ ग्रह के जाने पर कष्ट होता है। दो रेखा वाले स्थान में जाने से धन का नाश होता है। तीन रेखा वाले में जाने से क्लेश होता है। चार रेखा वाले स्थान में ग्रह के पहुँचने से मध्यम फल होता है (शुभ अशुभ फल की तुल्यता होती है) पाँच रेखा वाले स्थान में सुख की प्राप्ति, छह रेखा वाले में धन का लाभ, सात रेखा वाले स्थान में सुख तथा आठ रेखा वाले स्थान में ग्रह के जाने पर अभीष्ट फल की सिद्धि होती है ॥१६६॥ आजीविका-कथन—जन्मकालिक लग्न और चन्द्रमा से १०वें स्थान में यदि सूर्य आदि ग्रह हों तो जातक क्रम से पिता, माता, शत्रु, मित्र, भाई, स्त्री और नौकर के द्वारा धन का लाभ होता है। जन्मलग्न, जन्मकालिक चन्द्र तथा जन्मकालिक सूर्य—इन तीनों से दशम स्थान के स्वामी जिस राशि के नवमांश हों, उस नवमांश के अधिपति की वृत्ति से आजीविका समझनी चाहिए। यथा—उक्त दशम स्थानों के स्वामी सूर्य के नवमांश में हों तो तृण (पत्र-पुष्पादि), सुवर्ण, औषध, ऊन तथा रेशम आदि से जीविका समझे। चन्द्रमा के नवमांश में हों तो खेती, जलज (मोती, मूंगा, शंख, सीप आदि), और स्त्री के द्वारा जीविका चलती है। मंगल के नवमांश में हों तो धातु, अस्त्र-शस्त्र और साहस से जीवन-निर्वाह होता है। बुध के नवमांश हों तो काव्य,

[Header] पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४१६

काव्यशिल्पादिभिर्बोधे जैवे देवद्विजाकरैः । शुक्रे रजतगोरत्नैर्मा दे हिंसाश्रमाधमैः ॥१६६॥ स्वोच्चेष्वार्की तथा ज्यारैरुक्तैकांगे नृपाधिपाः । लग्ने वर्गोत्तमेऽब्जे वा चतुराद्यग्रहेक्षिते ॥१७०॥ द्वाविंशत्यूबास्तु गेऽर्कृचापेंर्केन्दूयमस्तनों । भूपकृत्तुंगगोर्केगेस्तेसाजार्काखिभे गुरौ ॥१७१॥ यमेंदुतुंगगौ लग्ने षष्ठेऽर्कज्ञौ तुलाजगा । सितासृजो गुरौ कर्कौ साराजे लग्नगे नृपाः ॥१७२॥ वृषेगेन्जेर्केज्यसौरैः सुहृज्जायाखगैर्नृपः । मंदे मृगांगेव्यर्थ्यकांशस्थैरजादिभिर्नृप ॥१७३॥ सेज्याजेश्वे मृगमुखे कुजे तुंगेशेभार्गवौ । लग्नेऽथ सेज्यककेंगे ज्ञानशुकौ भंवोपगैः ॥१७४॥ मेषेऽर्के भूमिपासैंदौ एषे षांग्रैकंपासेजः । सिंहकुंभमृगस्थाइचेद्भूषः सारेतनावजे ॥१७५॥ आर्के जीवे तनौ वापि नृपोऽधोः कुजभास्करौ । धीस्थौ गुर्विन्दुकवयो भूमौ स्तयगे बुधेर्नृपः ॥१७६॥ मृगास्यलग्नगैः सौरेजाब्जक्षं हरयः सयाः । कविक्वौ तुलयुग्मस्थौ वै भूपः कीर्तिमान्भवेत् ॥१७७॥ यस्य कस्यापि तनयः प्रोक्तैर्योगैर्नृपो भवेत् । वक्ष्यमाणैर्नृपसुतो ज्ञेयो भूयो मुनीश्वर ॥१७८॥

शिल्पकलादि से, गुरु के नवमांश में हों तो देवता और ब्राह्मणों के द्वारा तथा लोहा, सोना आदि के खान से, शुक्र के नवमांश में हों तो चाँदी, गौ तथा रत्न आदि से और शनि केनवमांश में हों तो परपीडन, परिश्रम और नीच कर्म द्वारा धन की प्राप्ति होती है ॥१६७-१६९॥ राजयोग का वर्णन--शनि, सूर्य, गुरु और मंगल—ये चारों यदि अपने-अपने उच्च में हों और इन्हीं में कोई एक लग्न में हो तो इन चारों लग्नों में जन्म लेने वाले राजा होते हैं। लग्न अथवा चन्द्रमा वर्गोत्तम नवमांश में हो और उस पर ४, ५ या ६ ग्रह की दृष्टि हो तो इसके २२ भेद से २२ प्रकार के राजयोग होते हैं। मंगल अपने उच्च में हो, रवि और चन्द्रमा धन राशि में हों और मकरस्थ शनि लग्न में हो तो जातक राजा होता है। रवि लग्न में उच्चस्थ हो, चन्द्रमा सहित शनि सप्तम भाव में हो, बृहस्पति स्वगृह (धनु या मीन) में हो तो जातक राजा होता है ॥१७०-१७१॥ शनि अथवा चन्द्रमा अपने उच्चस्थ होकर लग्न में हों, षष्ठ भाव में सूर्य और बुध हों, शुक्र तुला में, मंगल मेष में और गुरु कर्क में हो तो इन दोनों लग्नों में जन्म लेने वाला राजा होता है। उच्चस्थ मंगल यदि चन्द्रमा के साथ वृष लग्न में हो तो भी जातक राजा होता है। चन्द्रमा वृष लग्न में हो और सूर्य, गुरु तथा शनि ये क्रम से ४, ७, १०वें स्थान में हों तो जातक राजा होता है। मकर लग्न में शनि हो और लग्न से ३, ६, ९ एवं १२वें भाव में क्रमशः चन्द्रमा, मंगल, बुध तथा बृहस्पति हों तो जातक राजा होता है ॥१७२-१७३॥ गुरु सहित चन्द्रमा धन में और मंगल मकर में हों तथा बुध या शुक्र अपने उच्च में स्थित होकर लग्न में विद्यमान हों तो उन दोनों योगों में जन्म लेने वाला राजा होता है। बृहस्पति कर्क लग्न में हो, बुध, चन्द्रमा तथा शुक्र तीनों ११वें भाव में हों और सूर्य मेष में हो तो जातक राजा होता है। चन्द्रमा मीन लग्न में हो, सूर्य शनि, मंगल—ये क्रम से सिंह, कुम्भ और मकर में हों तो जातक राजा होता है। मंगल सहित मेष लग्न हो, बृहस्पति कर्क में हो अथवा कर्कस्थ बृहस्पति लग्न में हो तो जातक राजा होता है। मंगल और शनि पंचम भाव में, गुरु, चन्द्रमा तथा शुक्र चतुर्थ भाव में और बुध कन्या लग्न में हों तो जातक राजा होता है ॥१७४-१७६॥ मकर लग्न में शनि हो तथा मेष, कर्क, सिंह—ये अपने-अपने स्वामी से युक्त हों, शुक्र तुला में और बुध मिथुन में हों तो बालक यशस्वी राजा होता है ॥१७७॥ मुनीश्वर ! इन बताये हुए योगों में जन्म लेने वाला जिस किसी का पुत्र भी राजा होता है। तथा आगे जो योग बताये जाएँगे, उनमें जन्म लेने वाले राजकुमार को ही राजा समझना चाहिए। (यदि अन्य व्यक्ति इस योग में उत्पन्न हुआ हो तो वह राजा के तुल्य होता है, राजा नहीं ॥१७८॥

४२० नारदीयपुराणम् स्वोच्चे त्रिकोणभगस्तैस्त्याद्यैर्बलयुतैर्नृपः । सिंहेऽर्के मेषलग्नेऽब्जे मृगे भौमेघटेऽष्टमे ॥१७९॥ चापे जीवे धरानाथःस्यादथ स्वक्षगे भृगौ । पातालगे धर्मगेऽब्जे शुभदृष्टे युते मुने ॥१८०॥ त्रिलग्नभवगैःशेषैर्धराधीशः प्रजायते । सौम्ये वीर्ययुतेऽगस्थे बलाढ्ये शुभगे शुभे ॥१८१॥ धर्मार्थोपचयस्थैश्च शेषैर्धर्मयुतोन्नृपः । मेषूरणायतनुगाः शशिसूर्यजसुरयः ॥१८२॥ ज्ञारौ धने शितरवा हिबुके भूपतिस्तदा । वृषेऽगेऽब्जोधनारिस्थो जीवाकी लाभगाः परे ॥१८३॥ सुखे गुरुःखेंरखेंदूयमो लग्ने भवे करै । लग्ने वक्रासितौ चंद्रेज्यसितार्कबुधाः क्रमात् ॥१८४॥ सुखास्तु शुभखार्पिस्तथा नरेशं जनयंत्यपि । कर्मलग्नगखेटस्य दशायां राज्य संगतिः ॥१८५॥ प्रबलस्य दशायां वा शत्रुनीचा दिगातिदाः । आसन्नकेंद्रद्वयगैर्वर्गदाख्यः सकलग्रहैः ॥१८६॥ तन्वस्तगैश्च सकटं विहगो राज्यबंधुगैः । शृङ्गाटकं धिगौगस्थैलंग्नान्यस्थैर्हलं मतम् ॥१८७॥ वज्रोंऽङ्गेस्थे सत्वसतयु तुर्यखस्थैर्यवोन्था । विमिश्रैः कमलं प्राहुर्याकंटकबाह्यगैः ॥१८८॥ लग्नाच्चतुर्भुगैर्यूपःशरस्तूर्याच्चतुर्भुगेः । द्यूनाद्वे दक्षगैः शक्ति र्दण्डादिचतुर्भुगैः ॥१८९॥ तीन या अधिक ग्रह बली होकर अपने-अपने उच्च या मूल त्रिकोण में हों तो बालक राजा होता है। सिंह में सूर्य, मेष लग्न में चन्द्रमा, मकर में मंगल, कुम्भ में शनि और धनु में बृहस्पति हो तो उत्पन्न शिशु भूपाल होता है। मुने ! शुक्र अपनी राशि में होकर चतुर्थ स्थान में स्थित हों, चन्द्रमा नवम भाव में रहकर शुभ ग्रह से दृष्ट या युक्त हों तथा शेष ग्रह ६, ५, ३, ६, १० और ११वें भाव में हों तो उत्पन्न बालक धर्मात्मा नरेश होता है। चन्द्रमा, शनि और बृहस्पति क्रमशः दसवें, ग्यारहवें तथा लग्न में स्थित हों, बुध और मंगल द्वितीय भाव में तथा शुक्र और रवि चतुर्थ भाव में स्थित हों तो जातक भूपाल होता है। वृष लग्न में चन्द्रमा, द्वितीय में गुरु, ११वें में शनि तथा शेष ग्रह भी स्थित हों तो बालक नरेश होता है ॥१७९-१८३॥ चतुर्थ भाव में गुरु, १०वें भाव में सूर्य और चन्द्रमा, लग्न में शनि और ११वें भाव में शेष ग्रह हों तो जातक राजा होता है। मंगल और शनि लग्न में हों, चन्द्रमा, गुरु, शुक्र, सूर्य और बुध—ये क्रम से ४, ७, ९, १० और ११वें में हों तो ये सब ग्रह भावी नरेश को जन्म देते हैं। मुनीश्वर ! ऊपर कहे हुए योगों में उत्पन्न मनुष्य के दशम भाव या लग्न में जो ग्रह हो, उसकी दशा-अन्तर्दशा आने पर उसे राज्य की प्राप्ति होती है। उन दोनों स्थानों में ग्रह न हो तो जन्म समय में जो ग्रह बलवान् हो, उसकी दशा में राज्यलाभ समझना चाहिए तथा जो ग्रह जन्म-समय में शत्रुराशि या अपनी नीच राशि में हो, उसकी राशि में क्लेश, पीडा आदि की प्राप्ति होती है ॥१८४-१८५॥ नाभस योग कथन—समीपवर्ती दो केन्द्र-स्थानों में हो (रवि से शनिपर्यन्त) सब ग्रह हों तो 'गदा' नामक योग होता है। केवल लग्न और सप्तम दो ही स्थानों में सब ग्रह हों तो 'शकट' योग होता है। दशम और चतुर्थ में ही सब ग्रह हों तो 'विहग' योग होता है। ५, ९ और लग्न--इन तीन ही स्थानों में सब ग्रह हों तो शृङ्गारक योग होता है। इसी प्रकार यदि लग्न भिन्न स्थान से त्रिकोण स्थानों में ही सब ग्रह हों तो 'हल' नामक योग होता है ॥१८६-१८७॥ लग्न और सप्तम में सब शुभ ग्रहों तथा चतुर्थ-दशम में सब पापग्रह हों तो 'वज्र' योग होता है। इसके विपरीत यदि लग्न, सप्तम में सब पापग्रह तथा चतुर्थ-दशम में सब शुभग्रह हों तो 'यव' योग होता है, यदि चारों केन्द्रों में सब (शुभ और पाप) ग्रह मिलकर बैठे हों तो 'कमल' योग होता है ॥१८८॥ लग्न से लगातार ४ स्थान (१, २, ३, ४) में ही सब ग्रह स्थित हों तो 'शर' योग होता है। सप्तम से ४ स्थान (७, ८, ९, १०) में ही सब ग्रह स्थित हो तो 'शक्ति' योग होता है। और दशम से ४ स्थान (१०, ११, १२, १) में ही सब ग्रह हों तो दण्ड योग होता है ॥१८९॥ लग्न से क्रमशः सात स्थानों (१, २, ३,

पञ्चपञ्चाशतमोऽध्यायः ४२१ लग्नात्क्रमात्सप्तभगैर्नौ' काकूटस्तु नुर्यतः । छत्रमस्तात्स्वभाग्याद्योन्त्यस्मादर्द्धेन्दुर्नामकः ॥१९६०॥ लग्नादेकान्तरगतैश्चक्रमर्थात्सरित्पतिः । बहु स्थानेषु वीणाद्याः सप्तसप्तर्क्षसंस्थितैः ॥१९६१॥ वीणादामपाशकेदारशूलयुगगोलकाः । ग्रहैः सर्वैश्चरभगै राजयोगः प्रकीर्तितः ॥१९६२॥ स्थिरस्थैर्मुसलं नाम द्विशरीणतैर्नलः । भाला केंद्रस्थितैः सौम्यैः पापैस्सर्प उदाहृतः ॥१९६३॥ ईर्ष्यारुध्वरुची रज्ज्वां मुसले धनमानयुक् । व्यंमा स्थिरा लोनल्जो मोगीस्रग्जोहिजोदितः ॥१९६४॥ वीणोद्भवोतिनिपुणः गीतनृत्यरुचिर्भृशम् । दाता स द्वो दामोत्थः याशजो धनशीलथुक् ॥१९६५॥ केदारोत्थः कृषिकरः शूले शूरोक्षतो धनः । युगं पाखंडयुर्गोले विधनो मलिनस्तथा ॥१९६६॥ भूपवंद्यपदश्चक्रे समुद्रे नृपभोगयुक् । शुभगांगोर्द्धचापात्सुखीशूरश्च चामरः ॥१९६७॥ ४, ५, ६, ७) में सब ग्रह हों तो 'नौका' योग, चतुर्थ भाव से आरम्भ करके लगातार सात स्थानों में सभी ग्रह हों तो 'कूट' योग, सप्तम भाव से आरम्भ करके लगातार सात स्थानों में सभी ग्रह हों तो 'छत्र' योग और दशम से आरंभ करके सात स्थानों में सब ग्रह स्थित हों तो 'चाप' नामक योग होता है । इसी प्रकार केन्द्र भिन्न स्थान से आरम्भ करके लगातार सात स्थानों में सब ग्रह हों तो 'अर्धचन्द्र' नामक योग होता है ॥१९९०॥ लग्न से आरम्भ करके एक स्थान का अन्तर देखकर क्रमशः १, ३, ५, ७, ९, और ११ इन) ६ स्थानों में ही सब ग्रह स्थित हों तो 'चक्र' नामक योग होता है और द्वितीय भाव से लेकर एक स्थान का अन्तर देकर क्रमशः ६ स्थानों (२, ४, ६, ८, १०, १२) में ही सब ग्रह विद्यमान हों तो 'समुद्र' नामक योग होता है । ७ से १ राशि तक में सब ग्रह के रहने पर क्रमशः वीणा आदि नाम वाले ७ योग होते हैं। जैसे-७ स्थानों में सब ग्रह हों तो 'वीणा' ६ स्थानों में सब ग्रह हों तो 'दाम', ५ स्थानों में सब ग्रह हों तो 'पाश', ४ स्थानों में सब ग्रह हों तो 'क्षेत्र', ३ स्थानों में सब ग्रह हों तो 'शूल', २ स्थानों में सब ग्रह हों तो 'युग' और एक ही स्थान में सब ग्रह हों तो 'गोल' नामक योग होता है । सब ग्रह चर राशि में हों तो 'रज्जु', स्थिर राशि में हों तो 'मुसल' और द्विखभाव में हों तों 'नल' नामक योग होता है। सब शुभग्रह केन्द्रस्थानों में हों तो 'माला' और सब पापग्रह केन्द्रस्थानों में हों तो 'सर्प' नामक योग होता है ॥१९९१-१९९३॥ इन योगों में जन्म लेने वालों के फल- रज्जुयोग में जन्म लेने वाला ईर्ष्यावान् और भ्रमण की इच्छा वाला होता है । मुसलयोग में उत्पन्न शिशु धन और मान से युक्त होता है । नलयोंग में उत्पन्न पुरुष अंगहीन, स्थिरबुद्धि और धनी होता है । मालायोग में उत्पन्न जातक भोगी होता है तथा सर्पयोग में उत्पन्न पुरुष दुःख से पीड़ित होता है ॥१९९४॥ वीणायोग में उत्पन्न मनुष्य सब कार्यों में निपुण तथा संगीत और नृत्य में रुचि रखने वाला होता है। दामयोग में उत्पन्न मनुष्य दाता और धनाढ्य होता है । पाशयोग में उत्पन्न धनवान् और सुशील होता है । केदार (क्षेत्र) योग में पैदा हुआ खेती से जीविका चलानेवाला होता है तथा शूलयोग में उत्पन्न पुरुष शूरवीर, शस्त्र से आघात न पाने वाला और निर्धन होता है । युगयोग में उत्पन्न होने वाला पाखंडी तथा गोलयोग में उत्पन्न मनुष्य मलिन और निर्धन होता है ॥१९९५-१९६६॥ चक्रयोग में जन्म लेने वाले पुरुष के चरणों में राजा लोग भी मस्तक झुकाते हैं । समुद्रयोग में उत्पन्न पुरुष राजोचित भोगों से सम्पन्न होता है । अर्धचन्द्र में पैदा हुआ बालक सुन्दर शरीर वाला तथा चापयोग में उत्पन्न शिशु सुखो और शूरवीर होता है ॥१९९७॥ छत्रयोग में उत्पन्न मनुष्य मित्रों का उपकारक तथा कूटयोग

४२२ नारदीयपुराणम् मित्रोपकारकृच्छत्रे कूटे चानृतबंधराट् । नौजः सकीर्तिः सुखभाक् मानवो भवति ध्रुवम् ॥१९६॥ त्यागी यज्वात्मवान् यपे हिंस्रो गुह्याधिपः शरैः । । शक्तौ नीचोऽलसो निःस्वो दण्डे प्रियवियोगभाक् ॥१९८॥ व्यर्कैः स्वांत्योभयगतैः खेटैः स्यात्सुनफानफा । दुरुधरा चैव विधौ ज्ञेयः केमद्रुमोऽन्यथा ॥२००॥ स्वोपार्जितार्थभुग्दाता सुनफायां धनी सुखी । नीरोगः शीलवान् ख्यातः सुवेषश्चानफाभवः ॥२०१॥ भोगी सुखी धनीदानी त्यागी दुरुधरोद्भवः । केमद्रुमेऽतिमलिनो दुःखी नीचोऽथ निर्धनः ॥२०२॥ यन्त्राश्मकारंशाजोको भौमपुष्ककृते ध्वगः । सुज्ञः सुकीर्तिर्निपुणं विद्वांसं धनिनं तथा ॥२०३॥ सेन्योन्यकार्यनिरतं सास्फुजिच्छस्त्रजीवनम् । समंदो धातुकुशलं तथा भाडविदं मुने ॥२०४॥ कूटस्त्र्याशवपण्याठं नसासंगिदुः प्रसूद्विषम् । कुर्यात्सज्ञोऽर्थनिपुणं नम्रं सत्कीर्तिसंयुक्तम् ॥२०५॥ सेज्योऽस्थिरवयं वंश्यं विक्रांतं च समर्थिनम् । ससितोसुक्रवेत्तारं सार्किपौनर्भवं मुने ॥२०६॥ आरे सज्ञे बाहुयोधी पुराध्यक्षः सगौष्पतौ । सशुक्रे द्यूतकृच्छौंड्यो नृती द्यूती समंदके ॥२०७॥ में उत्पन्न मिथ्याभाषी और जेल का अधीक्षक होता है। नौका योग में उत्पन्न पुरुष निश्चय ही यशस्वी और सुखी होता है। यूपयोग में जन्म लेने वाला मनुष्य दानी, यज्ञकर्ता और मनस्वी होता है। शरयोग में उत्पन्न मनुष्य दूसरों को कष्ट देने वाला और गोपनीय स्थानों का स्वामी होता है। शक्तियोग में उत्पन्न नीच, आलसी और निर्धन होता है। दण्डयोग में उत्पन्न पुरुष अपने प्रियवियोग का कष्ट भोगता है ॥१९७-१९९॥ चतुर्योग का कथन—यदि चन्द्रमा से द्वितीय में सूर्य को छोड़कर कोई भी अन्य ग्रह हो तो 'सुनफा' योग होता है। द्वादश में हो तो 'अनफा' और दोनों (२, १२) स्थानों में ग्रह हों तो 'दुरुधरा' योग होता है। अन्यथा (अर्थात् २, १२ में कोई ग्रह नहीं हो तो) 'केमद्रुम' योग होता है ॥२००॥ उक्तयोगों का फल—सुनफा योग में जन्म लेने वाला पुरुष अपने भुजबल से उपार्जित धन का भोगी, दाता, धनवान् और सुखी होता है। अनफायोग में उत्पन्न मनुष्य नीरोग, सुशील, विख्यात और सुन्दर होता है। दुरुधरा में जन्म लेने वाला भोगी, सुखी, धनवान्, दाता और विषयों से निःस्पृह होता है। केमद्रुम योग में उत्पन्न पुरुष मलिन, दुःखी नीच और निर्धन होता है ॥२०१-२०२॥ द्विग्रहयोगफल—मुने ! सूर्य यदि चन्द्रमा से युक्त हो तो भाँति-भाँति के यन्त्र और पत्थर के कार्य में कुशल बनाता है। मंगल से युक्त हो तो वह बालक को नीच कर्म में लगाता है। बुध से युक्त हो तो यशस्वी, कार्यकुशल, विद्वान् एवं धनी बनाता है, गुरु से युक्त हो तो दूसरों के कार्य करने वाला, शुक्र से युक्त हो तो धातुओं (ताँबा आदि) के कार्य में निपुण तथा पात्र-निर्माण-कला का जानकार बनाता है ॥२०३-२०४॥ चन्द्रमा यदि मंगल से युक्त हो तो जातक कूटवस्तु (नकली सामान), स्त्री और आसव-अरिष्टादि का क्रय-विक्रय करने वाला तथा माता-पिता का द्रोही होता है। बुध के साथ चन्द्रमा हो तो उत्पन्न शिशु को धनी, कार्यकुशल, विनयी एवं यशस्वी बनाता है; गुरु से युक्त हो तो चंचलवृद्धि, कुल में मुख्य, पराक्रमी और धनाढ्य बनाता है। मुने ! यदि शुक्र से युक्त चन्द्रमा हो तो बालक को वस्त्रनिर्माण-कला का ज्ञाता बनाता है और यदि शनि से युक्त हो तो वह बालक ऐसी स्त्री से उत्पन्न होता है, जिसने पति के मरने पर या जीते जी दूसरे पति से सम्बन्ध स्थापित कर लिया हो ॥२०५-२०६॥ मंगल यदि बुध से युक्त हो तो उत्पन्न हुआ बालक बाहु से युद्ध करने वाला (पहलवान) होता है। गुरु से युक्त हो तो नगर का स्वामी, शुक्र से युक्त हो तो जूआ खेलने वाला तथा गायों का पालक और शनि से युक्त हो तो मिथ्यावादी तथा जुआड़ो होता है ॥२०७॥

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४२३ सेज्येज्ञे नृत्यगीताढ्यो मायादक्षः [सभार्यवे]। समंदे लुब्धकः क्रूरो नरो भवति नारद ॥१२०८॥ सशुक्रे वाक्पतौ विद्वान्सासितेऽन्नघटंकरः । कवौ समंदमंदाक्षो वनिताश्रयवित्तवान् ॥१२०९॥ एकस्थैश्चतुराद्यैस्तु खवार्थाः खचरैः पृथक् । कुजज्ञेज्यांशुकार्किसूर्यैः परिव्रजेन्नरः ॥२१०॥ शाक्याजीवकवृद्धार्थिचरकाखफलाशनः । तत्स्वामिभिः पराजितैः प्रव्रज्याप्रच्युतिर्भवेत् ॥२११॥ अदीक्षितोऽल्पस्तगतैः सबलैस्तत्स्थभक्तयः । जन्मपोऽन्यैरद्यदृष्टो मंदं पश्यति नारद ॥२१२॥ मंदो वा जन्मपं नष्टं तथा च मंदकाङ्गण । भौमार्कांशे सौरदृष्टे चंद्रे वा दीक्षितो भवेत् ॥२१३॥ सुरूपो भूषितोऽश्विन्यां दक्षः सत्यवचा यमे । बह्नुपदासक्तौ स्थिरधीः प्रियवाक्तथा ॥२१४॥ ब्राह्मे धनीमृगे भोगी रौद्रे हिंस्रः शठोऽघकृत् । दांतो रोगी शुभोऽदित्यां पुष्येऽर्जन्मा कविः सुखी॥२१५॥ धूर्तः शठः कृतघ्नोऽह्नौ पापः सर्वाशनो भवेत् । पन्ने भोगी धनी भक्तो दाता प्रियवचा भगे ॥२१६॥ धनी भोगी नरोर्यम्णे स्तेनो धृष्टो घृणी करे । चित्रांवरः सुदृक्तवाष्ट्रे न च धर्मदयापरः ॥२१७॥ दीशे लुब्धः पटुः क्रोधी मदैंचो आठनोविदेशगः । शाक्रे धर्मपरस्तुष्टो मूले मानी धनी सुखी ॥२१८॥ आप्ये मानी सुखी हृष्टो वैश्वे नम्रश्च धार्मिकः । कर्णे धनी सुखी ख्यातो दाता शूरो धनी वसौ ॥२१९॥

नारद ! बुध यदि बृहस्पति से युक्त हो तो उत्पन्न शिशु नृत्य और संगीत का प्रेमो होता है। शुक्र से युक्त हो तो मायावी और शनि से युक्त हो तो उत्पन्न मनुष्य लोभी और क्रूर होता है ॥१२०८॥ गुरु यदि शुक्र से युक्त हो तो मनुष्य विद्वान, शनि से युक्त हो तो रसोइया अथवा घटनिर्माता होता है। शुक्र यदि शनि से युक्त हो तो मंद दृष्टि वाला तथा स्त्री के सहारे धनोपार्जन करने वाला होता है ॥१२०९॥ प्रव्रज्या योग—यदि जन्म-समय में चार या चार से अधिक ग्रह एक स्थान में हों तो मनुष्य गृहत्यागी संन्यासी होता है। उन ग्रहों में मंगल, बुध, गुरु, चन्द्रमा, शुक्र, शनि और सूर्य बली हों तो मनुष्य क्रमशः शाक्य (बौद्ध), आजीवक (दण्डी), भिक्षु (यति), वृद्ध (वृद्धश्रावक), चरक (चक्रधारी), अह्नी (नग्न) और फलाहारी होता है। प्रव्रज्याकारक ग्रह यदि अन्य ग्रह से पराजित हो तो मनुष्य उस प्रव्रज्या से च्युत हो जाता है। यदि प्रव्रज्याकारक ग्रह सूर्य-सन्निध्यवश अस्त हो तो मनुष्य उसकी दीक्षा ही नहीं लेता और यदि वह ग्रह बलवान् हो तो उसकी प्रव्रज्या में प्रीति रहती है। जन्मराशीश पर यदि अन्य ग्रह की दृष्टि न हो और जन्मराशीश यदि शनि को देखता हो अथवा निर्बल जन्मराशीश को शनि देखता हो या शनि के द्रेष्काण अथवा मंगल या शनि के नवमांश में चन्द्रमा हो और उस पर शनि की दृष्टि हो तो इन योगों में विरक्त होकर गृहत्याग करने वाला पुरुष संन्यास-धर्म की दीक्षा लेता है ॥२१०-२१३॥ अश्विन्यादि नक्षत्रों में जन्म का फल--अश्विनी नक्षत्र में उत्पन्न बालक सुन्दर और भूषणप्रिय होता है। भरणी में उत्पन्न शिशु सब कार्य में दक्ष और सत्यवादी होता है। कृत्तिका में उत्पन्न अमिताहारी, परस्त्री में आसक्त, स्थिरबुद्धि और प्रियवक्ता होता है, रोहिणी में, पैदा हुआ मनुष्य धनवान्; मृगशिरा में उत्पन्न भोगी; आर्द्रा में उत्पन्न हिंसास्वभाव वाला, शठ और अपराधी; पुनर्वसु में जितेन्द्रिय, रोगी ओर सुशील तथा पुष्य में कवि और सुखी होता है ॥२१४-२१५॥ आश्लेषा नक्षत्र में उत्पन्न मनुष्य धूर्त, शठ, कृतघ्न, नीच और खान-पान में अविवेकी या सर्वभक्षी, मघा में भोगी, धनी तथा देवादि का भक्त होता है। पूर्वा फाल्गुनी में दाता और प्रियवक्ता होता है। उत्तराफाल्गुनी में धनी और भोगी; हस्त में चोरस्वभाव, ढीठ और निर्लज्ज तथा चित्रा में नाना प्रकार के वस्त्र धारण करने वाला धर्मात्मा और दयालु होता है। विशाखा में लोभी, चतुर और क्रोधी; अनुराधा में भ्रमणशील और विदेशवासी; ज्येष्ठा में धर्मात्मा और सन्तोषी तथा मूल में धनीमानी और सुखी होता है। पूर्वाषाढ़ में मानी, सुखी और हृष्ट; उत्तराषाढ़ में विनयी और धर्मात्मा; श्रवण में धनी सुखी और

४२४ नारदीयपुराणम् शेतऽरिहंता व्यसनी स्त्रीजितो जाहिभेदिनी । बुध्ने वक्ता सुखी कांतः पौष्णे शूरो धनी शुचिः ॥२२०॥ कामी शूरः कृतज्ञोऽजे कांतस्त्यागी क्षमी वृषे । युग्मे स्त्रीद्यूतशास्त्रज्ञः स्त्रैणो ह्रस्वः स्वभे विधौ ॥२२१॥ स्त्रीद्विट् क्रोधी हरौ मानी विक्रांतः स्थिरधीः सुखी । धर्मी श्लक्ष्णः सुधीः षष्ठे प्राज्ञः प्रांशुर्धनी घटे ॥२२२॥ रोगी पूज्यः क्षती कौर्प्ये कविः शिल्पीज्यभे धनी । मृगेऽलसोऽटनः स्वक्षः परदारार्थहृद्धटे ॥२२३॥ सबलेभेभयेवापिसबलेऽखिलफलम् ॥ अन्यथा विपरीतं तत्फलमेवं परेऽपि न । ख्यातः स्त्रीद्विट् धनी तीक्ष्णोज्ञः कविः शौंडिको धनी ॥२२४॥ पूज्यो लुब्धोऽधनसखो मेषादौ भास्करे जनौ । निःस्वोऽर्कभे भूमिपुत्रे धनी चांद्रे स्वभेदनः । बौधे कृतज्ञो जैवे तु ख्यातः शौक्रेऽन्यदारिकः ॥२२५॥

धनवान् होता है । शतभिषा में शत्रु को जीतने वाला व्यसन में आसक्त, पूर्व भाद्रपद में स्त्री के वशीभूत और धनवान्; उत्तरभाद्रपद में वक्ता, सुखी और सुन्दर तथा रेवती में जन्म लेने वाला वीर, धनी और पवित्र हृदय वाला होता है ॥२१६-२२०॥ मेषादि चन्द्रराशि में जन्मराशि का फल- मेषराशि में जन्म लेने वाला कामी, और कृतज्ञ; वृष में सुन्दर, दानी और क्षमावान्; मिथुन में स्त्रीभोगासक्त, द्यूतविद्या को जानने वाला होता है । सिंहराशि में स्त्रीद्वेषी, क्रोधी, मानी, पराक्रमी, स्थिरबुद्धि और सुखी होता है । तुलाराशि में उत्पन्न मनुष्य पण्डित, ऊँचे कदवाला और धनवान् होता है । वृश्चिक राशि में उत्पन्न रोगी, लोक में पूज्य और क्षत (आघात) युक्त होता है । धनु में जन्म लेने वाला कवि, शिल्पज्ञ और धनवान्; मकर में उत्पन्न पुरुष कार्य करने में अनुत्साही, व्यर्थ घूमने वाला और सुन्दर नेत्रों से युक्त; कुम्भ में परस्त्री और परधन हरण करने के स्वभाव वाला तथा मीन में धनुसदृश (कवि और शिल्पज्ञ) होता है ॥२२१-२२३॥ यदि चन्द्रमा की राशि बली हो तथा राशि का स्वामी और चन्द्रमा दोनों बलवान् हों तो ऊपर कहे हुए फल पूर्ण रूप से संघटित होते हैं-ऐसा समझना चाहिए । अन्यथा विपरीत फल (अर्थात् निर्बल हों तो फल का अभाव या बल के अनुसार फल में भी तारतम्य) जानना चाहिए । इसी प्रकार अन्य ग्रहों की राशि के अनुसार फल का विचार करना चाहिए ॥२२३॥ सूर्यादि-ग्रह-राशि-फल-सूर्य यदि मेष राशि में हो तो जातक लोक में विख्यात होता है । वृष में हो तो स्त्री का द्वेषी, मिथुन में हो तो धनवान्, कर्क में हो तो उग्र स्वभाव वाला, सिंह में हो तो मूर्ख, कन्या में हो तो कवि, तुला में हो तो मद्यविक्रेता, वृश्चिक में हो तो धनवान्, धनु में हो तो लोकपूज्य, मकर में हो तो लोभी, कुम्भ में हो तो निर्धन और मीन में हो तो सुख हीन होता है ॥२२४॥ मंगल यदि सिंह में हो तो जातक निर्धन, कर्क में हो तो धनवान्, स्वगृह में (मेष, वृश्चिक) में हो तो भ्रमण- शील कन्या-मिथुन में हो तो कृतज्ञ, गुरुराशि (धनु-मीन) में हो तो विख्यात, शुक्रराशि (वृष-तुला) में हो तो पर- स्त्री में आसक्त, मकर में हो तो बहुत पुत्र और धनवाला तथा कुम्भ में हो तो दुःखी, दुष्ट और मिथ्या स्वभाव वाला होता है ॥२२५॥

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४२५ मृगे बह्वात्मजधनः कुम्भे दुःख्यनृती खलः । स्त्रीद्वेष्यः स्वजनद्वेषीनिर्यरत्यः सधीधनः ॥२२६॥ समानार्थः सपुत्रस्त्रीसणंः सूर्यादिभे बुधे । सेनानीः स्त्र्यर्थपुत्राढ्यः दक्षमैश्यः परिच्छदी ॥२२७॥ मंडलेशः सार्थसुखः सर्पास्याम्यर्कभाद्धरौ । स्वप्त्याप्तार्थो मंदशोकाढ्यो बंधुद्वेषी धनाढवान् ॥२२८॥ सार्थः प्राज्ञः समः ख्यातिः स्त्रीजितोऽर्कादिभे भृगौ । व्यंगजार्थो खप्रसूको विधिमित्रो सुखत्रयः ॥२२९॥ सत्पुत्रस्त्रीधनो राजा ग्रामे शोकादिभेऽर्कजे । भूपज्ञगुणि चौरास्वाद्दष्टेब्जेजेसृगादिभिः ॥२३०॥ निःस्वःस्तेननृपाः प्रज्ञप्रेष्यामविन्मिथुन्मगे । धात्वाजीवी नृपज्ञाभीतंतुवायाधनाः स्वभे ॥२३१॥ युयुत्सुकविसूरोज्यधातुजीविद्गगामयाः । ज्योतिर्ज्ञाढ्येज्यनु खलु नृपेज्ञादिकहैरौ ॥२३२॥ बुध यदि सूर्य की राशि (सिंह) में हो तो स्त्री का द्वेषी, चन्द्रराशि (कर्क) में हो तो अपने परिजनों का द्वेषी, मंगल की राशि (मेष-वृश्चिक) में हो तो निर्धन और सत्त्वहीन, अपनी राशि (मिथुन-कन्या) में हो तो बुद्धिमान् और धनवान्, गुरु की राशि (धनु-मीन) में हो तो मान और धन से युक्त, शुक्र की राशि (वृष-तुला) में हो तो पुत्र और स्त्री से युक्त तथा शनि की राशि (मकर-कुम्भ) में हो तो ऋणी होता है ॥२२६३॥ गुरु यदि सिंह में हो तो सेनापति, कर्क में हो तो स्त्रीपुत्रादि से युक्त एवं धनी, मंगल की राशि (मेष- वृश्चिक) में हो तो धनी और क्षमाशील, बुध की राशि (मिथुन-कन्या) में हो तो वस्त्रादि विभव से युक्त, अपनी राशि (धनु-मीन) में हो तो मण्डल का अधिपति, शुक्र की राशि (वृष-तुला) में हो तो धनी और सुखी तथा शनि की राशि (मकर-कुम्भ) में हो तो मकर में ऋणवान् और कुम्भ में धनवान् होता है ॥२२७३॥ शुक्र सिंह में हो तो जातक स्त्री द्वारा धनलाभ करने वाला, कर्क में हो तो अभिमानी और शोक युक्त, मंगल की राशि (मेष-वृश्चिक) में हो तो बन्धुओं का द्वेषी, बुध की राशि (मिथुन-कर्क) में हो तो धनी और पाप स्वभाव, गुरु की राशि (धनु-मीन) में हो तो धनी और पण्डित, अपनी राशि (वृष-तुला) में हो तो धन- वान् और क्षमावान् तथा शनि की राशि (मकर-कुम्भ) में हो तो स्त्री से पराजित होता है ॥२२९३॥ शनि यदि सिंह में हो तो पुत्र और धन से रहित, कर्क में हो तो धन और संतान से हीन, मंगल की राशि (मेष-वृश्चिक) में हो तो निर्बुद्धि और मित्रहीन, बुध की राशि (धनु-मीन) में हो तो सुपुत्र, उत्तम स्त्री और धन से युक्त, शुक्र की राशि (वृष-तुला) में हो तो राजा और अपनी राशि (मकर-कुम्भ) में हो तो जातक ग्राम का अधिपति होता है ॥२२६३॥ चन्द्र पर दृष्टि का फल-मेष स्थित चन्द्रमा पर मंगल आदि ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक क्रम से राजा, पण्डित, गुणवान्, चोर स्वभाव तथा निर्धन होता है ॥२३०॥ वृषस्थ चन्द्रमा पर मंगल आदि ग्रहों की दृष्टि हो तो क्रम से निर्धन, चोर-स्वभाव, राजा, पण्डित तथा प्रेष्य (भृत्य) होता है। मिथुन राशि में स्थित चन्द्रमा पर मंगल आदि ग्रहों की दृष्टि होने से मनुष्य क्रमशः धातुओं से आजीविका करने वाला, राजा, पण्डित, निर्भय, वस्त्र बनाने वाला तथा धनहीन होता है। अपनी राशि (कर्क) में स्थित चन्द्रमा पर यदि मंगलादि ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक क्रमशः योद्धा, कवि, पण्डित, धनी, धातु से जीविका करने वाला तथा नेत्ररोगी होता है। सिंह राशिस्थ चन्द्रमा पर यदि बुधादि ग्रहों की दृष्टि हो तो मनुष्य क्रमशः ज्योतिषी, धनवान्, लोक में पूज्य, नाई, राजा तथा नरेश होता है। कन्याराशिस्थित चन्द्रमा ५४ ना० पु०

४२६ नारदीयपुराणम् षष्ठे शुभैर्नृपचमूपनैपुण्यवतिताशयाः । जूके भूपस्वर्णकारवणिजः शेषैर्वृगुते ॥२३३॥ द्विपैतृकाब्धिध्वजिनो व्यंगा स्वक्षितिपा अलौ । ज्ञातिक्षमाजनपाश्चापे सद्धिर्मदम्भीशठस्तथा ॥२३४॥ भूपपण्डितसखे ज्यामृगे भूपान्यदारिकौ । कुम्भे शेषैश्च हास्यज्ञनृपज्ञाः सद्धिर्भरंत्यभे ॥२३५॥ होरेशर्क्षदलस्थैस्तु दृष्टो युक्तः शशी शुभः । त्र्यंशे तत्पतिमित्रर्क्षगतैर्युक्त क्षितस्तथा ॥२३६॥ द्वादशांशे फलं प्रोक्तं नवांशेऽप्यथ कीर्त्यते । आरक्षेको वधरुचिर्नियुद्धकुशलोऽर्थवान् ॥२३७॥ कलहः क्षितिजांश्ये शौक्रे मूर्खोऽन्यदारदः । कविः सुखी बुधांशे तु नटचौरज्ञशिल्पिनः ॥२३८॥ स्वांशे त्वल्पतनुः सखस्तपस्वी लोभतत्परः । क्रोधी निधीशो मात्यो वा नृपो हिंस्रो सुतो हरेः ॥२३९॥ पर बुध आदि ग्रहों की दृष्टि हो तो शुभग्रहों (बुध, गुरु, शुक्र) की दृष्टि होने पर जातक क्रमशः राजा, सेनापति एवं निपुण होता है और अशुभ (शनि, मंगल, रवि) की दृष्टि होने पर स्त्री के आश्रय से जीविका चलाने वाला होता है। तुलाराशिस्थ चन्द्रमा पर यदि बुध आदि (बुध, गुरु, शुक्र) की दृष्टि हो तो उत्पन्न बालक क्रम से भूपति, सोनार और व्यापारी होता है तथा शेष ग्रह (शनि, रवि और मंगल) की दृष्टि होने पर वह हिंसा के स्वभाव वाला होता है ॥२३१-२३३॥ वृश्चिक राशिस्थ चन्द्रमा पर बुध आदि ग्रहों की दृष्टि होने पर क्रम से जातक दो संतान का पिता, मृदुस्वभाव, वस्त्रादि को रंगाई करने वाला, अंगहीन, निर्धन और भूमिपति होता है। धनुराशिस्थ चन्द्रमा पर बुध आदि शुभग्रहों की दृष्टि हो तो उत्पन्न बालक क्रमशः अपने कुल, पृथ्वी तथा जनसमूह का पालक होता है। शेष ग्रहों (शनि, रवि तथा मंगल) की दृष्टि हो तो जातक दंभी और शठ होता है ॥२३४॥ मकरराशिस्थित चन्द्रमा पर बुध आदि की दृष्टि हो तो वह क्रमशः भूमिपति, पण्डित, धनी, लोक में पूज्य, भूपति तथा परस्त्री में आसक्त होता है। कुम्भराशिस्थ चन्द्रमा पर भी उक्त ग्रहों की दृष्टि होने पर भी इसी प्रकार (मकरराशिस्थ के समान) फल समझना चाहिए। मीनराशिस्थ चन्द्रमा पर शुभग्रहों (बुध, गुरु और शुक्र) की दृष्टि हो तो जातक क्रमशः हास्यप्रिय, राजा और पण्डित होता है। (तथा शेष ग्रहों (पापग्रहों) की दृष्टि होने पर अनिष्ट फल होता है ॥२३५॥ होरा (लग्न) के स्वामी की होरा में स्थित चन्द्रमा पर उसी होरा में स्थित ग्रहों की दृष्टि हो तो वह शुभप्रद होता है। जिस तृतीयांश (द्रेष्काण) में चन्द्रमा हो उसके स्वामी से तथा मित्रराशिस्थ ग्रहों से युक्त या दृष्ट चन्द्रमा शुभफल देता है ॥२३६॥ प्रत्येक राशि में स्थित चन्द्रमा पर ग्रहों की दृष्टि होने से जो-जो फल कहे गये हैं, उन राशियों के द्वादशांश में स्थित चन्द्रमा पर भी उन-उन ग्रहों की दृष्टि होने से वे ही फल प्राप्त होते हैं। अब नवमांश में स्थित चन्द्रमा पर भिन्न-भिन्न ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक क्रमशः मूर्ख, परस्त्री में आसक्त, सुखी, काव्यकर्ता, सुखी तथा परस्त्री में आसक्ति रखने वाला होता है। बुध के नवमांश में स्थित चन्द्रमा पर यदि सूर्यादि ग्रहों की दृष्टि हो तो बालक क्रमशः नर्तक, चोर स्वभाव, पण्डित, मन्त्री, संगीतज्ञ तथा शिल्पकार होता है ॥२३७-२३८॥ अपने (कर्क) नवमांश में स्थित चन्द्रमा पर यदि सूर्यादि ग्रहों की दृष्टि हो तो वह छोटे शरीर वाला, धनवान्, तपस्वी, लोभी, अपनी स्त्री की कमाई पर पलने वाला तथा कर्तव्यपरायण होता है। सूर्य के नवमांश (सिंह) में स्थित चन्द्रमा पर यदि सूर्यादि ग्रहों की दृष्टि हो तो बालक क्रमशः क्रोधी, राजमन्त्री, निधिपति या मन्त्री, राजा, हिंसा के स्वभाव वाला तथा पुत्रहीन होता है। गुरु के नवमांश में स्थित चन्द्रमा पर

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४२७ जीवांशे हास्यविद्योधा बली मंत्री च धार्मिकः । अल्पापत्यो दुःखितो खो दुष्टस्त्रीसौरिभागगे ॥२४०॥ भानावित्त्यादिदृष्टे नु तद्वदेव फलं वदेत् । वर्गोत्तमे खे परभे फलमुक्तं शुभं क्रमात् ॥२४१॥ पुष्टं मध्यं लघु ज्ञेयं यदि चांशपतिर्बली । राशीक्षणफलं रुद्ध्वा दद्यात्त्यंशफलं स्फुटम् ॥२४२॥ शूरस्तब्धो विकलदृग्निघृणोऽर्के तनुस्थिते । मेषे धनी तैमिरकः सिंहे रात्र्यंध एव च ॥२४३॥ नीचोद्योस्वः कर्कगेऽर्के उद्बुवाक्षस्तनुस्थिते । द्वितीयेऽर्के बहुधनो नृपदण्ड्यो मुखामयी ॥२४४॥ त्रिगे बुधो विक्रमी च विमुखः पीडितो भुवि । धनापत्योक्तितो धीस्थे बली शत्रुजितोरिगे ॥२४५॥ स्त्रीजितो द्यूनसंस्थे च निधनेलपात्मजोऽल्पदृक् । सुतार्थसुखभा भाग्ये दशमे श्रुतशौर्यवान् ॥२४६॥ लाभे बहुधनो मानी पतितो खोऽव्यये रवौ । मूकोऽधो बधिरः प्रेष्यो जेगे खाच्चाजगे धनी ॥२४७॥ सूर्यादि ग्रहों की दृष्टि हो तो बालक क्रमशः हास्यप्रिय, रण में कुशल, बलवान्, मन्त्री, धर्मात्मा तथा धर्मशील होता है । शनि के नवमांश में स्थित चन्द्रमा पर यदि सूर्यादि ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक क्रमशः अल्पसन्तति, दुःखी, अभिमानी, अपने कार्य में तत्पर, दुष्ट स्त्री का पति तथा कृपण होता है। जिस प्रकार मेषादि राशि या उसके नवमांश में स्थित चन्द्रमा पर सूर्यादि ग्रहों के दृष्टिफल कहे गये हैं, इसी प्रकार मेषादि राशि या नवमांश में स्थित सूर्य पर चन्द्रादि ग्रहों की दृष्टि से भी प्राप्त होने वाले फल समझने चाहिए ॥२३९-२४०१/२॥ फलों में न्यूनाधिक्य--चन्द्रमा यदि वर्गोत्तम नवमांश में हो तो पूर्वोक्त शुभ फल पूर्ण, अपने नवमांश में हो तो मध्यम (आधा) और अन्य नवमांश में हो तो अल्प समझना चाहिए। (इसी से यह भी सिद्ध हो जाता है कि जो अशुभ फल कहे गये हैं, वे भी विपरीत दशा में विपरीत होते हैं अर्थात् वर्गोत्तम में चन्द्रमा हो तो अशुभ फल अल्प, अपने नवमांश में होतो आधा और अन्य नवमांश में हो तो पूर्ण होते हैं।) राशि और नवमांश के फलों में भिन्नता होने पर यदि नवमांश का स्वामी बली हो तो वह राशिफल को रोककर ही फल देता है ॥२४२॥ द्वादश भावगत ग्रहों के फल-सूर्य यदि लग्न में हो तो शिशु शूरवीर, दीर्घसूत्री, दुर्बल दृष्टि वाला और निर्दय होता है। यदि मेष में रहकर लग्न में हो तो धनवान और तिमिर रोग वाला होता है और सिंह लग्न में हो तो रात्र्यन्ध (रतौंधी वाला), तुला लग्न में हो तो अंधा और निर्धन होता है। कर्क लग्न में हो तो जातक की आँख में फूली होती है ॥१२३१/२॥ द्वितीय भाव में सूर्य हो तो बालक बहुत धनी, राजदण्ड पाने वाला और मुख का रोगी होता है । तृतीय स्थान में हो तो पण्डित और पराक्रमी होता है। चतुर्थ स्थान में सूर्य हो तो सुखहीन और पीड़ायुक्त होता है। सूर्य पञ्चम भाव में हो तो मनुष्य धनहीन और पुत्रहीन होता है। षष्ठ भाव में हो तो बलवान् और शत्रुओं को जीतने वाला होता है ॥२४५॥ सप्तम भाव में स्थित हो तो मनुष्य अपनी स्त्री से पराजित होता है । अष्टम भाव में हो तो उसके पुत्र थोड़े होते हैं और उसे दिखायी भी कम ही देता है। नवम भाव में हो तो जातक पुत्र- वान्, धनवान् और सुखी होता है । दशम भाव में हो तो विद्वान् और पराक्रमी होता है ॥२४६॥ एकादश भाव में हो तो अधिक धनवान् ओर मानी होता है। यदि द्वादश भाव में सूर्य हो तो उत्पन्न बालक नीच और धनहीन होता है ॥॥२४६१/२॥ चन्द्रमा यदि मेष लग्न में हो तो जातक गूंगा, बहिरा, अंधा और दूसरों का नौकर होता है। वृष लग्न में हो तो वह धनी होता है, द्वितीय भाव में हो तो विद्वान् और धनवान्, तृतीय भाव में हो तो हिंसक स्वभाव

४२८ नारदीयपुराणम् बहुर्वा धनवानर्थे हिंस्रो विक्रमगे भवेत् । साधुभावः सुखगते धीस्थे कन्याप्रजोलसः ॥२४८॥ अल्पाग्निकामस्तीक्ष्णोरौर्ह्र्ष्युस्तन्विमदोजखे । ॥२४६॥ व्याधिपीडान्वितो मृत्यौ भानुधर्मे मित्रधनान्वितः धर्मधीधनयुग्राज्ये ख्यातधीधनयुग्भवेत् । क्षुद्रोऽगहीनो व्ययगे चन्द्रे प्रोक्तं फलं बुधैः ॥२५०॥ लग्ने कुजे क्षततनुर्द्धनगे तु कदन्नभुक् । धर्मपापसमाचारोऽन्यत्र सूर्यसमो मतः ॥२५१॥ विद्वान् धनी च प्रखरः पंडितः सचिवोरियुक् । धर्मज्ञो विस्तृतगुणो गाधो ज्ञेयस्तोऽर्कवत् ॥२५२॥ विद्वान्सुवाच्यः कृपणो सुक्षाक्षो रिपुगुद्धिमान् । नीचस्तपस्वी चषणवनी लोभीदुष्टस्तनोगुरौ ॥२५३॥ स्मरी सुखी विलग्नस्थे कलही सुरतोत्सुकः । सुखितस्तनपश्ये च भृगौ जीववदन्यतः ॥२५४॥ निःस्वो रोगी कामवशो मलिनः शैशवातियुक् । अलसो लग्नगे मंदे धर्मात्स्वोच्चगते नृपः ॥२५५॥ ग्रामाधिपः स विद्वांश्च चावंगोऽन्यत्र सूर्यवत् । पूर्णमुच्चेथ पादोनफलं मूलत्रिकोणे ॥२५६॥ वाला, चतुर्थ स्थान में हो तो सुख, गृहादि से सम्पन्न, पञ्चम भाव में हो तो कन्या-संतान वाला और आलसी होता है । छठे भाव में हो तो बालक मन्दाग्नि का रोगी होता है। उसे अभीष्ट भोग बहुत कम मिलते हैं तथा वह उग्र स्वभाव का होता है । सप्तम भाव में हो तो जातक ईर्ष्यावान् और अत्यन्त कामी होता है । अष्टम भाव में हो तो रोग से पीड़ित, नवम भाव में हो तो मित्र और धन से युक्त, दशम भाव में हो तो धर्मात्मा, बुद्धिमान् और धनवान् होता है। एकादश भाव में हो तो उत्पन्न शिशु विख्यात, बुद्धिमान् और धनवान् होता है तथा द्वादश भाव में हो तो जातक क्षुद्र और अंगहीन होता है ॥२४७-२५०॥ मंगल लग्न में हो तो उत्पन्न शिशु क्षत शरीर वाला होता है। द्वितीय भाव में हो तो वह कदन्नभोजों तथा नवम भाव में हो तो पाप स्वभाव होता है। इनसे भिन्न (३, ४, ५, ६, ७, ८, १०, ११, १२) स्थानों में यदि मंगल हो तो उसके फल सूर्य के समान ही होते हैं ॥२५१॥ बुध लग्न में हो तो जातक पण्डित होता है । द्वितीय भाव में हो तो शिशु धनवान्, तृतीय भाव में हो तो दुष्ट स्वभाव, चतुर्थ भाव में हो तो पण्डित, पञ्चम भाव में हो तो राजमंत्री, षष्ठ भाव में हो तो शत्रुहीन, सप्तम भाव में हो तो धर्मज्ञाता, अष्टम भाव में हो तो विख्यात गुण वाला और शेष (६, १०, ११, १२) भावों में हो तो जैसे सूर्य के फल कहे गये हैं वैसे ही उसके फल भी समझने चाहिए ॥२५२॥ बृहस्पति लग्न में हों तो जातक विद्वान्, द्वितीय भाव में हो तो प्रियभाषी, तृतीय भाव में हो तो कृपण, चतुर्थ में हों तो सुखी, पञ्चम में हों तो विज्ञ, षष्ठ में हों तो शत्रुसहित, सप्तम में हों तो सम्पत्तिशाली, अष्टम में हों तो नीच स्वभाव वाला, नवम में हों तो तपस्वी, दशम में हों तो धनवान्, एकादश में हो तो नित्य लाभ करने वाला और द्वादश में हो तो दुष्ट हृदय वाला होता है ॥२५३॥ शुक्र लग्न में हों तो जातक कामी और सुखी, सप्तम भाव में हो तो कामी तथा पञ्चम भाव में हो तो सुखी होता है और अन्य भावों (२, ३, ४, ६, ८, ६, १०, ११, १२,) में हों तो बृहस्पति के समान ही फल होता है ॥२५४॥ शनि लग्न में हो तो जातक निर्धन, रोगी, कामातुर, मलिन, बाल्यावस्था में रोगी और आलसी होता है। किन्तु यदि अपनी राशि (मकर-कुम्भ) या अपने उच्च (तुला) में हो तो जातक भूपति, ग्रामपति, पण्डित और सुन्दर शरीर वाला होता है । अन्य (द्वितीय आदि) भावों में सूर्य के समान ही शनि के फल होते हैं ॥२५५½॥ फल में न्यूनाधिकत्व-शुभग्रह यदि अपने उच्च में हों तो पूर्ण रूप से उपर्युक्त फल प्राप्त होता है। यदि अपने मूल त्रिकोण में हो तो तीन चरण, अपनी राशि में हों तो आधा, मित्र के गृह में हों तो एक चरण तथा शत्रु की राशि में हों तो उससे भी कम फल प्राप्त होता है और नीच में या अस्त हों तो कुछ भी फल

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४२६ शुभग्रहे बलं स्वक्षे मित्रभेऽङ्घ्रिमितं फलम् । शत्रुभेऽल्पं तथा नीचास्तंगते फलशून्यता ॥२५७॥ खमराकादिके खेटे कुलतुल्यः कुलाधिकः । बंधुपूज्योऽथ धनवान्सुखी भोगी नृपः क्रमात् ॥२५८॥ परवित्तसुहृद्बंधुपोष्यागणबलाधिपौ । नृपश्च मित्रभस्थेषु खेटे ऽर्कादिषु क्रमात् ॥२५९॥ विषमक्षेष्वर्कहोरायां संस्थिते शुभभेषु च । ख्यातो महोद्यमी चातितेजा धीमान्धनी बली ॥२६०॥ शुभेषु चंद्रहोरायां स्थितेषु समराशिषु । कांतिमाद्ववसौभाग्यभोगधीमान्प्रवेन्नरः ॥२६१॥ सूर्यहोरागतः पापः समभेषु तु मध्यमाः । विषमक्षेषु भास्कर्या सौम्या नोक्तफलप्रदाः ॥२६२॥ स्वमित्रव्यंगशश्चंद्रः सुरूपं गुणिनं नरम् । करोत्यन्यगतस्तत्तत्तुल्यगुणरूपिणम् ॥२६३॥ व्यालायुधे चतुष्पादांऽजेषु च ह्यंशकेषु च । तीक्ष्णेऽतिहिंस्रश्च भवेद्गुरुतल्पगतोऽटनः ॥२६४॥ स्तेनो भोक्ता सधनधीर्नृपः क्लीबश्च शत्रुहा । विष्टिकृद्दासवृत्तिश्च पापोहिंलोऽमतिर्भवेत् ॥२६५॥ नहीं होता है। (इस प्रकार शुभग्रह-के फल कहने से सिद्ध होता है कि पापग्रह का फल इसके विपरीत होता है। अर्थात् पापग्रह नीच में या अस्त हो तो पूर्ण फल, शत्रु राशि में तीन चरण, मित्र राशि में आधा, अपनी राशि में एक चरण अपने मूल त्रिकोण में उससे भी अल्प और अपने उच्च में हो तो अपना कुछ भी फल नहीं देता है ॥२५७॥ स्वराशिस्थ ग्रहफल-यदि अपनी राशि में एक ग्रह हो तो जातक अपने पिता के सदृश धनवान् और यशस्वी होता है। दो ग्रह अपनी राशि में हों तो बालक अपने कुल में श्रेष्ठ, तीन ग्रह हों तो बन्धुओं में माननीय, चार ग्रह हो तो विशेष धनवान्, पाँच ग्रह हों तो सुखी, छह ग्रह हों तो भोगी और यदि सातों ग्रह अपनी राशि में स्थित हों तो जातक राजा होता है ॥२५८। यदि अपने मित्र की राशि में एक ग्रह हो तो जातक दूसरे के धन से पालित, दो ग्रह हों तो मित्रों के द्वारा पोषित और तीन ग्रह मित्रराशि में हों तो अपने बन्धुओं के द्वारा पालित होता है। यदि चार ग्रह मित्र- राशि में हों तो बालक अपने बाहुबल से जीवन-निर्वाह करता है। पाँच ग्रह हों तो बहुत लोगों का पालन करने वाला होता है। छह ग्रह हों तो सेनापति और सातों ग्रह मित्र-राशि में स्थित हों तो जातक राजा होता है ॥२५९॥ पापग्रह यदि विषम राशि और सूर्य की होरा (राशिपूर्वार्ध) में हो तो जातक लोक में विख्यात, महान् उद्योगी, अत्यन्त तेजस्वी, बुद्धिमान्, धनवान् और बलवान् होता है। तथा शुभग्रह यदि समराशि और चन्द्रमा की होरा में हो तो जातक कान्तिमान्, मृदु (कोमल) शरीर वाला, भाग्यवान्, भोगी और बुद्धिमान् होता है ॥२६१॥ यदि पापग्रह समराशि और सूर्य की होरा में हों तो पूर्वोक्त फल मध्यम (आधा) होता है। एवं शुभ यदि विषम राशि और सूर्य की होरा में हों तो पूर्वोक्त फल नहीं प्राप्त होते हैं ॥२६२॥ चन्द्रमा यदि अपने या अपने मित्र के द्रेष्काण में हो तो जातक सुन्दर स्वरूप वाला और गुणवान् होता है। अन्य द्रेष्काण में हो तो उस द्रेष्काण की राशि और द्रेष्काणपति के सदृश ही फल प्राप्त होता है। (सारांश यह है कि उस द्रेष्काणपति का स्वामी यदि चन्द्रमा का मित्र हो तो दो चरण (आधा) फल मिलता है तथा शत्रु हो तो एक चरण फल होता है ।) यदि सर्पद्रेष्काण, शस्त्रद्रेष्काण, चतुष्पदद्रेष्काण और पक्षी द्रेष्काण में चन्द्रमा हो तो जातक क्रमशः उग्रस्वभाव, हिंसा के स्वभाव वाला, गुरुतल्पगः (गुरुपत्नीगामी) और भ्रमणशील होता है ॥२६४॥ लग्ननवमांश राशिफल - लग्न में मेष का नवमांश हो तो जातक चोरस्वभाव, वृष-नवमांश हो तो भोगी, मिथुन-नवमांश हो तो धनी, कर्क नवमांश हो तो बुद्धिमान्, सिंह-नवमांश हो तो शत्रु को जीतने वाला,

४३० नारदीयपुराणम् मेषादिकोत्तमांशेषु द्वादशांशेषु राशिवत् । जायाबलविभूषाढ्यः सत्त्वयुक्तोऽतिसाहसी ॥२६६॥ तेजस्वी च नरः स्वाये त्रिंशांशेऽसृजिसंस्थिते । आमयी वा स्वभार्यायां विषमः पारदारिकः ॥२६७॥ दुःखी परिच्छदयुतो मलिनश्चार्कजे स्वके । सुधीधनकीर्त्यालुस्तेजस्वी लोकपूजितः ॥२६८॥ नोरगुह्यभवान्भोगी जीवे खंत्रिंशभागगे । मेधाकलाकाव्यशिल्पविवादकपटांचितः ॥२६९॥ शास्त्रार्थसाहसयुतो बुधे स्वत्रिंशभागगे । बह्वपत्यसुखारोग्यरोगरूपार्थसंयुतः ॥२७०॥ ललितांगो विप्रकीर्णेन्द्रियः स्याद्भार्गवे स्वके । शूरस्तब्धौ च विषमवधकौ सद्गुणान्वितौ ॥२७१॥ सुखेज्ञो चारु चेष्टांगौ चंद्राकौ चेत्कुजादिगौ । मूलत्रिकोणस्वर्क्षोच्चे कंठस्थास्तु च ये ग्रहाः ॥२७२॥ अन्योन्यकारकास्ते स्युः कर्मगस्तु विशेषतः । शुभं वर्गोत्तमे जन्म वेसिस्थाने वसद्‌ग्रहैः ॥२७३॥ अशून्येषु च केंद्रेषु कारकाख्यगृहेषु च । गुरुजन्मेलग्नेशाः केंद्रस्था मध्यसौख्यदाः ॥२७४॥ वृश्चिक-नवमांश हो तो बेगारी करने वाला, धनु का नवमांश हो तो दासकर्म करने वाला, मकर-नवमांश में हो तो पापस्वभाव, कुम्भ-नवमांश हो तो हिंसक स्वभाव वाला और मीन-नवमांश लग्न में हो तो बुद्धिहीन होता है ।। किन्तु यदि वर्गोत्तम नवमांश (अर्थात् जो राशि हो उसी का नवमांश भी) हो तो वह जातक इन (चोर- स्वभाव आदि सब) का शासक होता है। (जैसे मेष नवमांश में उत्पन्न मनुष्य चोर-स्वभाव होता है, किन्तु यदि मेष राशि में मेष का नवमांश हो तो वह चोरस्वभाव-वालों का शासक होता है, इत्यादि ।) इसी प्रकार मेषादि राशियों के द्वादशांश में मेषादि राशियों के समान फल प्राप्त होते हैं ।।२६५-२६८।। मंगल आदि ग्रहों के त्रिंशांशफल — मंगल अपने त्रिंशांश में हो तो जातक स्त्री, बल, आभूषण तथा परिजनादि से सम्पन्न, साहसी और तेजस्वी होता है । शनि अपने त्रिंशांश में हो तो रोगी, स्त्री के प्रति कुटिल, परस्त्री में आसक्त, दुःखी, वस्त्रादि आवश्यक सामग्री से सम्पन्न, किन्तु मलिन होता है। गुरु अपने त्रिंशांश में हो तो जातक सुखी, बुद्धिमान्, धनी, कीर्तिमान्, तेजस्वी, लोक में मान्य, रोगहीन, उद्यमी और भोगी होता है। बुध अपने त्रिंशांश में हो तो मनुष्य मेधावी, कलाकुशल, काव्य और शिल्पविद्या का ज्ञाता, विवादी, कपटी, शास्त्रतत्वज्ञ तथा साहसी होता है। शुक्र अपने त्रिंशांश में हो तो जातक अधिक सन्तान, सुख, आरोग्य, सौन्दर्य और धन से युक्त, मनोहर शरीर वाला तथा अजितेन्द्रिय होता है ।।२६९-२७०½।। सूर्य-चन्द्र-फल--मंगल के त्रिंशांश में सूर्य हो तो जातक शूरवीर, चन्द्रमा में हो तो दीर्घसूत्री, बुध के त्रिंशांश में सूर्य हो तो जातक कुटिल और चन्द्रमा हो तो हिंसा के स्वभाव वाला होता है। हिंसा के स्वभाववाला होता है। गुरु के त्रिंशांश में सूर्य और चन्द्रमा हो तो गुणी होता है। शुक्र के त्रिंशांश में सूर्य हो तो बालक सुखी और चन्द्रमा हो तो विद्वान् होता है। शनि के त्रिंशांश में सूर्य हो तो सुन्दर शरीर वाला तथा चन्द्रमा हो तो सर्वजनप्रिय होता है ।।२७३।। कारक ग्रह--अपने-अपने मूल त्रिकोण, स्वराशि या स्वोच्च में स्थित ग्रह यदि केन्द्र में हों तो वे सब परस्पर कारक (शुभफलदायक) होते हैं, उनमें दशम स्थान में रहने वाला सबसे अधिक कारक होता है ।।२७३।। शुभ जन्म लक्षण--लग्न या चन्द्रमा वर्गोत्तम नवमांश में हो या वेशि (सूर्य से द्वितीय) स्थान में शुभग्रह हो अथवा केन्द्रों में कारक ग्रह हों तो स्थिति में जन्म लेनेवाला बालक सुखी और यशस्वी होता है। २७६। गुरु, जन्मराशि और लग्नेश ये सभी या इनमें से एक भी केन्द्र में हो तो जीवन के मध्यभाग में सुखप्रद होते हैं। तथा पृष्ठोदय राशि में रहनेवाला ग्रह जीवन के अन्त में, द्विस्वभाव राशिस्थ ग्रह जीवन के मध्य में और शीर्षोदय राशिस्थ ग्रह जीवन के ग्रह आदि में अपने-अपने फल देते हैं ।।२७४½।।