भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 440, कुल 1008 में से

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पञ्चपञ्चाशतमोऽध्यायः ४२१ लग्नात्क्रमात्सप्तभगैर्नौ' काकूटस्तु नुर्यतः । छत्रमस्तात्स्वभाग्याद्योन्त्यस्मादर्द्धेन्दुर्नामकः ॥१९६०॥ लग्नादेकान्तरगतैश्चक्रमर्थात्सरित्पतिः । बहु स्थानेषु वीणाद्याः सप्तसप्तर्क्षसंस्थितैः ॥१९६१॥ वीणादामपाशकेदारशूलयुगगोलकाः । ग्रहैः सर्वैश्चरभगै राजयोगः प्रकीर्तितः ॥१९६२॥ स्थिरस्थैर्मुसलं नाम द्विशरीणतैर्नलः । भाला केंद्रस्थितैः सौम्यैः पापैस्सर्प उदाहृतः ॥१९६३॥ ईर्ष्यारुध्वरुची रज्ज्वां मुसले धनमानयुक् । व्यंमा स्थिरा लोनल्जो मोगीस्रग्जोहिजोदितः ॥१९६४॥ वीणोद्भवोतिनिपुणः गीतनृत्यरुचिर्भृशम् । दाता स द्वो दामोत्थः याशजो धनशीलथुक् ॥१९६५॥ केदारोत्थः कृषिकरः शूले शूरोक्षतो धनः । युगं पाखंडयुर्गोले विधनो मलिनस्तथा ॥१९६६॥ भूपवंद्यपदश्चक्रे समुद्रे नृपभोगयुक् । शुभगांगोर्द्धचापात्सुखीशूरश्च चामरः ॥१९६७॥ ४, ५, ६, ७) में सब ग्रह हों तो 'नौका' योग, चतुर्थ भाव से आरम्भ करके लगातार सात स्थानों में सभी ग्रह हों तो 'कूट' योग, सप्तम भाव से आरम्भ करके लगातार सात स्थानों में सभी ग्रह हों तो 'छत्र' योग और दशम से आरंभ करके सात स्थानों में सब ग्रह स्थित हों तो 'चाप' नामक योग होता है । इसी प्रकार केन्द्र भिन्न स्थान से आरम्भ करके लगातार सात स्थानों में सब ग्रह हों तो 'अर्धचन्द्र' नामक योग होता है ॥१९९०॥ लग्न से आरम्भ करके एक स्थान का अन्तर देखकर क्रमशः १, ३, ५, ७, ९, और ११ इन) ६ स्थानों में ही सब ग्रह स्थित हों तो 'चक्र' नामक योग होता है और द्वितीय भाव से लेकर एक स्थान का अन्तर देकर क्रमशः ६ स्थानों (२, ४, ६, ८, १०, १२) में ही सब ग्रह विद्यमान हों तो 'समुद्र' नामक योग होता है । ७ से १ राशि तक में सब ग्रह के रहने पर क्रमशः वीणा आदि नाम वाले ७ योग होते हैं। जैसे-७ स्थानों में सब ग्रह हों तो 'वीणा' ६ स्थानों में सब ग्रह हों तो 'दाम', ५ स्थानों में सब ग्रह हों तो 'पाश', ४ स्थानों में सब ग्रह हों तो 'क्षेत्र', ३ स्थानों में सब ग्रह हों तो 'शूल', २ स्थानों में सब ग्रह हों तो 'युग' और एक ही स्थान में सब ग्रह हों तो 'गोल' नामक योग होता है । सब ग्रह चर राशि में हों तो 'रज्जु', स्थिर राशि में हों तो 'मुसल' और द्विखभाव में हों तों 'नल' नामक योग होता है। सब शुभग्रह केन्द्रस्थानों में हों तो 'माला' और सब पापग्रह केन्द्रस्थानों में हों तो 'सर्प' नामक योग होता है ॥१९९१-१९९३॥ इन योगों में जन्म लेने वालों के फल- रज्जुयोग में जन्म लेने वाला ईर्ष्यावान् और भ्रमण की इच्छा वाला होता है । मुसलयोग में उत्पन्न शिशु धन और मान से युक्त होता है । नलयोंग में उत्पन्न पुरुष अंगहीन, स्थिरबुद्धि और धनी होता है । मालायोग में उत्पन्न जातक भोगी होता है तथा सर्पयोग में उत्पन्न पुरुष दुःख से पीड़ित होता है ॥१९९४॥ वीणायोग में उत्पन्न मनुष्य सब कार्यों में निपुण तथा संगीत और नृत्य में रुचि रखने वाला होता है। दामयोग में उत्पन्न मनुष्य दाता और धनाढ्य होता है । पाशयोग में उत्पन्न धनवान् और सुशील होता है । केदार (क्षेत्र) योग में पैदा हुआ खेती से जीविका चलानेवाला होता है तथा शूलयोग में उत्पन्न पुरुष शूरवीर, शस्त्र से आघात न पाने वाला और निर्धन होता है । युगयोग में उत्पन्न होने वाला पाखंडी तथा गोलयोग में उत्पन्न मनुष्य मलिन और निर्धन होता है ॥१९९५-१९६६॥ चक्रयोग में जन्म लेने वाले पुरुष के चरणों में राजा लोग भी मस्तक झुकाते हैं । समुद्रयोग में उत्पन्न पुरुष राजोचित भोगों से सम्पन्न होता है । अर्धचन्द्र में पैदा हुआ बालक सुन्दर शरीर वाला तथा चापयोग में उत्पन्न शिशु सुखो और शूरवीर होता है ॥१९९७॥ छत्रयोग में उत्पन्न मनुष्य मित्रों का उपकारक तथा कूटयोग

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