बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 439, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें४२० नारदीयपुराणम् स्वोच्चे त्रिकोणभगस्तैस्त्याद्यैर्बलयुतैर्नृपः । सिंहेऽर्के मेषलग्नेऽब्जे मृगे भौमेघटेऽष्टमे ॥१७९॥ चापे जीवे धरानाथःस्यादथ स्वक्षगे भृगौ । पातालगे धर्मगेऽब्जे शुभदृष्टे युते मुने ॥१८०॥ त्रिलग्नभवगैःशेषैर्धराधीशः प्रजायते । सौम्ये वीर्ययुतेऽगस्थे बलाढ्ये शुभगे शुभे ॥१८१॥ धर्मार्थोपचयस्थैश्च शेषैर्धर्मयुतोन्नृपः । मेषूरणायतनुगाः शशिसूर्यजसुरयः ॥१८२॥ ज्ञारौ धने शितरवा हिबुके भूपतिस्तदा । वृषेऽगेऽब्जोधनारिस्थो जीवाकी लाभगाः परे ॥१८३॥ सुखे गुरुःखेंरखेंदूयमो लग्ने भवे करै । लग्ने वक्रासितौ चंद्रेज्यसितार्कबुधाः क्रमात् ॥१८४॥ सुखास्तु शुभखार्पिस्तथा नरेशं जनयंत्यपि । कर्मलग्नगखेटस्य दशायां राज्य संगतिः ॥१८५॥ प्रबलस्य दशायां वा शत्रुनीचा दिगातिदाः । आसन्नकेंद्रद्वयगैर्वर्गदाख्यः सकलग्रहैः ॥१८६॥ तन्वस्तगैश्च सकटं विहगो राज्यबंधुगैः । शृङ्गाटकं धिगौगस्थैलंग्नान्यस्थैर्हलं मतम् ॥१८७॥ वज्रोंऽङ्गेस्थे सत्वसतयु तुर्यखस्थैर्यवोन्था । विमिश्रैः कमलं प्राहुर्याकंटकबाह्यगैः ॥१८८॥ लग्नाच्चतुर्भुगैर्यूपःशरस्तूर्याच्चतुर्भुगेः । द्यूनाद्वे दक्षगैः शक्ति र्दण्डादिचतुर्भुगैः ॥१८९॥ तीन या अधिक ग्रह बली होकर अपने-अपने उच्च या मूल त्रिकोण में हों तो बालक राजा होता है। सिंह में सूर्य, मेष लग्न में चन्द्रमा, मकर में मंगल, कुम्भ में शनि और धनु में बृहस्पति हो तो उत्पन्न शिशु भूपाल होता है। मुने ! शुक्र अपनी राशि में होकर चतुर्थ स्थान में स्थित हों, चन्द्रमा नवम भाव में रहकर शुभ ग्रह से दृष्ट या युक्त हों तथा शेष ग्रह ६, ५, ३, ६, १० और ११वें भाव में हों तो उत्पन्न बालक धर्मात्मा नरेश होता है। चन्द्रमा, शनि और बृहस्पति क्रमशः दसवें, ग्यारहवें तथा लग्न में स्थित हों, बुध और मंगल द्वितीय भाव में तथा शुक्र और रवि चतुर्थ भाव में स्थित हों तो जातक भूपाल होता है। वृष लग्न में चन्द्रमा, द्वितीय में गुरु, ११वें में शनि तथा शेष ग्रह भी स्थित हों तो बालक नरेश होता है ॥१७९-१८३॥ चतुर्थ भाव में गुरु, १०वें भाव में सूर्य और चन्द्रमा, लग्न में शनि और ११वें भाव में शेष ग्रह हों तो जातक राजा होता है। मंगल और शनि लग्न में हों, चन्द्रमा, गुरु, शुक्र, सूर्य और बुध—ये क्रम से ४, ७, ९, १० और ११वें में हों तो ये सब ग्रह भावी नरेश को जन्म देते हैं। मुनीश्वर ! ऊपर कहे हुए योगों में उत्पन्न मनुष्य के दशम भाव या लग्न में जो ग्रह हो, उसकी दशा-अन्तर्दशा आने पर उसे राज्य की प्राप्ति होती है। उन दोनों स्थानों में ग्रह न हो तो जन्म समय में जो ग्रह बलवान् हो, उसकी दशा में राज्यलाभ समझना चाहिए तथा जो ग्रह जन्म-समय में शत्रुराशि या अपनी नीच राशि में हो, उसकी राशि में क्लेश, पीडा आदि की प्राप्ति होती है ॥१८४-१८५॥ नाभस योग कथन—समीपवर्ती दो केन्द्र-स्थानों में हो (रवि से शनिपर्यन्त) सब ग्रह हों तो 'गदा' नामक योग होता है। केवल लग्न और सप्तम दो ही स्थानों में सब ग्रह हों तो 'शकट' योग होता है। दशम और चतुर्थ में ही सब ग्रह हों तो 'विहग' योग होता है। ५, ९ और लग्न--इन तीन ही स्थानों में सब ग्रह हों तो शृङ्गारक योग होता है। इसी प्रकार यदि लग्न भिन्न स्थान से त्रिकोण स्थानों में ही सब ग्रह हों तो 'हल' नामक योग होता है ॥१८६-१८७॥ लग्न और सप्तम में सब शुभ ग्रहों तथा चतुर्थ-दशम में सब पापग्रह हों तो 'वज्र' योग होता है। इसके विपरीत यदि लग्न, सप्तम में सब पापग्रह तथा चतुर्थ-दशम में सब शुभग्रह हों तो 'यव' योग होता है, यदि चारों केन्द्रों में सब (शुभ और पाप) ग्रह मिलकर बैठे हों तो 'कमल' योग होता है ॥१८८॥ लग्न से लगातार ४ स्थान (१, २, ३, ४) में ही सब ग्रह स्थित हों तो 'शर' योग होता है। सप्तम से ४ स्थान (७, ८, ९, १०) में ही सब ग्रह स्थित हो तो 'शक्ति' योग होता है। और दशम से ४ स्थान (१०, ११, १२, १) में ही सब ग्रह हों तो दण्ड योग होता है ॥१८९॥ लग्न से क्रमशः सात स्थानों (१, २, ३,