बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[Header] पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४१६
काव्यशिल्पादिभिर्बोधे जैवे देवद्विजाकरैः । शुक्रे रजतगोरत्नैर्मा दे हिंसाश्रमाधमैः ॥१६६॥ स्वोच्चेष्वार्की तथा ज्यारैरुक्तैकांगे नृपाधिपाः । लग्ने वर्गोत्तमेऽब्जे वा चतुराद्यग्रहेक्षिते ॥१७०॥ द्वाविंशत्यूबास्तु गेऽर्कृचापेंर्केन्दूयमस्तनों । भूपकृत्तुंगगोर्केगेस्तेसाजार्काखिभे गुरौ ॥१७१॥ यमेंदुतुंगगौ लग्ने षष्ठेऽर्कज्ञौ तुलाजगा । सितासृजो गुरौ कर्कौ साराजे लग्नगे नृपाः ॥१७२॥ वृषेगेन्जेर्केज्यसौरैः सुहृज्जायाखगैर्नृपः । मंदे मृगांगेव्यर्थ्यकांशस्थैरजादिभिर्नृप ॥१७३॥ सेज्याजेश्वे मृगमुखे कुजे तुंगेशेभार्गवौ । लग्नेऽथ सेज्यककेंगे ज्ञानशुकौ भंवोपगैः ॥१७४॥ मेषेऽर्के भूमिपासैंदौ एषे षांग्रैकंपासेजः । सिंहकुंभमृगस्थाइचेद्भूषः सारेतनावजे ॥१७५॥ आर्के जीवे तनौ वापि नृपोऽधोः कुजभास्करौ । धीस्थौ गुर्विन्दुकवयो भूमौ स्तयगे बुधेर्नृपः ॥१७६॥ मृगास्यलग्नगैः सौरेजाब्जक्षं हरयः सयाः । कविक्वौ तुलयुग्मस्थौ वै भूपः कीर्तिमान्भवेत् ॥१७७॥ यस्य कस्यापि तनयः प्रोक्तैर्योगैर्नृपो भवेत् । वक्ष्यमाणैर्नृपसुतो ज्ञेयो भूयो मुनीश्वर ॥१७८॥
शिल्पकलादि से, गुरु के नवमांश में हों तो देवता और ब्राह्मणों के द्वारा तथा लोहा, सोना आदि के खान से, शुक्र के नवमांश में हों तो चाँदी, गौ तथा रत्न आदि से और शनि केनवमांश में हों तो परपीडन, परिश्रम और नीच कर्म द्वारा धन की प्राप्ति होती है ॥१६७-१६९॥ राजयोग का वर्णन--शनि, सूर्य, गुरु और मंगल—ये चारों यदि अपने-अपने उच्च में हों और इन्हीं में कोई एक लग्न में हो तो इन चारों लग्नों में जन्म लेने वाले राजा होते हैं। लग्न अथवा चन्द्रमा वर्गोत्तम नवमांश में हो और उस पर ४, ५ या ६ ग्रह की दृष्टि हो तो इसके २२ भेद से २२ प्रकार के राजयोग होते हैं। मंगल अपने उच्च में हो, रवि और चन्द्रमा धन राशि में हों और मकरस्थ शनि लग्न में हो तो जातक राजा होता है। रवि लग्न में उच्चस्थ हो, चन्द्रमा सहित शनि सप्तम भाव में हो, बृहस्पति स्वगृह (धनु या मीन) में हो तो जातक राजा होता है ॥१७०-१७१॥ शनि अथवा चन्द्रमा अपने उच्चस्थ होकर लग्न में हों, षष्ठ भाव में सूर्य और बुध हों, शुक्र तुला में, मंगल मेष में और गुरु कर्क में हो तो इन दोनों लग्नों में जन्म लेने वाला राजा होता है। उच्चस्थ मंगल यदि चन्द्रमा के साथ वृष लग्न में हो तो भी जातक राजा होता है। चन्द्रमा वृष लग्न में हो और सूर्य, गुरु तथा शनि ये क्रम से ४, ७, १०वें स्थान में हों तो जातक राजा होता है। मकर लग्न में शनि हो और लग्न से ३, ६, ९ एवं १२वें भाव में क्रमशः चन्द्रमा, मंगल, बुध तथा बृहस्पति हों तो जातक राजा होता है ॥१७२-१७३॥ गुरु सहित चन्द्रमा धन में और मंगल मकर में हों तथा बुध या शुक्र अपने उच्च में स्थित होकर लग्न में विद्यमान हों तो उन दोनों योगों में जन्म लेने वाला राजा होता है। बृहस्पति कर्क लग्न में हो, बुध, चन्द्रमा तथा शुक्र तीनों ११वें भाव में हों और सूर्य मेष में हो तो जातक राजा होता है। चन्द्रमा मीन लग्न में हो, सूर्य शनि, मंगल—ये क्रम से सिंह, कुम्भ और मकर में हों तो जातक राजा होता है। मंगल सहित मेष लग्न हो, बृहस्पति कर्क में हो अथवा कर्कस्थ बृहस्पति लग्न में हो तो जातक राजा होता है। मंगल और शनि पंचम भाव में, गुरु, चन्द्रमा तथा शुक्र चतुर्थ भाव में और बुध कन्या लग्न में हों तो जातक राजा होता है ॥१७४-१७६॥ मकर लग्न में शनि हो तथा मेष, कर्क, सिंह—ये अपने-अपने स्वामी से युक्त हों, शुक्र तुला में और बुध मिथुन में हों तो बालक यशस्वी राजा होता है ॥१७७॥ मुनीश्वर ! इन बताये हुए योगों में जन्म लेने वाला जिस किसी का पुत्र भी राजा होता है। तथा आगे जो योग बताये जाएँगे, उनमें जन्म लेने वाले राजकुमार को ही राजा समझना चाहिए। (यदि अन्य व्यक्ति इस योग में उत्पन्न हुआ हो तो वह राजा के तुल्य होता है, राजा नहीं ॥१७८॥