भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 437

आशु तेषाष्टगोष्वंगः त्सांतेष्वन्जात्सितः शुभः । स्वात्सज्ञेषु त्रिधोगोब्धौ दिक्छिद्रासिगतोकंर्जात् ॥१६१॥ रंध्रायव्ययगः सूर्यादोध्वष्टौखे सगौर्गुरौ । ज्ञान्धि त्र्यायारिगोरातिषट्ग्वध्यंत्यगोषु च ॥१६२॥ त्रिधोशारिषु मन्दः खात्साक्षांत्येषु शुभो मृतः । केंद्रायाष्टधनेष्वर्को लग्नाद्वृद्ध्यायबंधुषु ॥१६३॥ गोध्वष्टावारिखांत्येज्ञाच्चंद्राल्लाभत्रिपद्मतः । षडष्टांत्यगतः [शु द्गुकारोह्रै शांत्यशत्रुषु ॥१६४॥ उक्तस्थानेषु रेखादौ ह्यनुक्तेषु तु बिंदुदाः । जन्मभाद्वृद्धिमित्रोच्चखभेधिष्टं परेष्वसत् ॥१६५॥ कष्टमर्थक्षयः क्लेशः समतार्थसुखायमः । धनाप्तिः सुखमिष्टाप्तिरिति रेखाफलं क्रमात् ॥१६६॥ पितृमातृद्विषन्मित्रभ्रातृस्त्रीभृतकाद्रवेः । स्वामिलग्नाजपोः स्वस्थाद्मेदर्कस्वयशोशयात् ॥१६७॥ तृणस्वर्णाश्वधोरणखैरर्कांशे वृत्तिमादिशेत् । कृष्यंबुजस्त्रीभ्योब्जांशे कौजे धात्वस्त्रसाहसैः ॥१६८॥


शुक्र लग्न से १, २, ३, ४, ५, ११, ८, ९ स्थानों में; चन्द्रमा से भी इन्हीं स्थानों (१, २, ३, ४, ५, ११, ८, ९) में और १२वें स्थान में; अपने आश्रित स्थान से १० सहित उक्त (१, २, ३, ४, ५, ११, ८, ६) स्थानों में; शनि से ३, ५, ९, ४, १०, ८, ११ स्थानों में; सूर्य से ८, ११, १२ स्थानों में; गुरु से ९, ८, ५, १०, ११ स्थानों में; बुध से ५, ३, ११, ६, ९ स्थानों में और मंगल से ३, ६, ९, ५, ११ तथा बारहवें स्थानों में शुभ होता है ॥१६१-१६२॥ शनि अपने आश्रित स्थान से ३, ५, ११; ६ में; मंगल से १०, १२ सहित पूर्वोक्त (३, ५, ११, ६) स्थानों में; सूर्य से १, ४, ७, १०, ११, ८, २, में; लग्न से ३, ६, १०, ११, १, ४ में; बुध से ९, ८, ११, १०, १२, में चन्द्रमा से ११, ३, ६ में; शुक्र से ६, ११, में और गुरु से ५, ११, ६ स्थानों में शुभ होता है ॥१६३-१६४॥ उपर्युक्त स्थानों में ग्रह रेखा-प्रद और अनुक्त स्थानों में बिन्दुप्रद होते हैं। जो ग्रह लग्न या चन्द्रमा से वृद्ध या उपचय स्थान (३, ६, १०, ११) में हों, या अपने मित्रगृह में, उच्च स्थान में तथा स्वराशि में स्थित हों, उनके द्वारा शुभ फलकी अधिकता होती है ॥१६५॥ एकादि रेखा वाले स्थान का फल—उक्त प्रकार से जिस स्थान में एक रेखा हो, वहाँ ग्रह के जाने पर कष्ट होता है। दो रेखा वाले स्थान में जाने से धन का नाश होता है। तीन रेखा वाले में जाने से क्लेश होता है। चार रेखा वाले स्थान में ग्रह के पहुँचने से मध्यम फल होता है (शुभ अशुभ फल की तुल्यता होती है) पाँच रेखा वाले स्थान में सुख की प्राप्ति, छह रेखा वाले में धन का लाभ, सात रेखा वाले स्थान में सुख तथा आठ रेखा वाले स्थान में ग्रह के जाने पर अभीष्ट फल की सिद्धि होती है ॥१६६॥ आजीविका-कथन—जन्मकालिक लग्न और चन्द्रमा से १०वें स्थान में यदि सूर्य आदि ग्रह हों तो जातक क्रम से पिता, माता, शत्रु, मित्र, भाई, स्त्री और नौकर के द्वारा धन का लाभ होता है। जन्मलग्न, जन्मकालिक चन्द्र तथा जन्मकालिक सूर्य—इन तीनों से दशम स्थान के स्वामी जिस राशि के नवमांश हों, उस नवमांश के अधिपति की वृत्ति से आजीविका समझनी चाहिए। यथा—उक्त दशम स्थानों के स्वामी सूर्य के नवमांश में हों तो तृण (पत्र-पुष्पादि), सुवर्ण, औषध, ऊन तथा रेशम आदि से जीविका समझे। चन्द्रमा के नवमांश में हों तो खेती, जलज (मोती, मूंगा, शंख, सीप आदि), और स्त्री के द्वारा जीविका चलती है। मंगल के नवमांश में हों तो धातु, अस्त्र-शस्त्र और साहस से जीवन-निर्वाह होता है। बुध के नवमांश हों तो काव्य,