बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
[Header] पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४१६
काव्यशिल्पादिभिर्बोधे जैवे देवद्विजाकरैः । शुक्रे रजतगोरत्नैर्मा दे हिंसाश्रमाधमैः ॥१६६॥ स्वोच्चेष्वार्की तथा ज्यारैरुक्तैकांगे नृपाधिपाः । लग्ने वर्गोत्तमेऽब्जे वा चतुराद्यग्रहेक्षिते ॥१७०॥ द्वाविंशत्यूबास्तु गेऽर्कृचापेंर्केन्दूयमस्तनों । भूपकृत्तुंगगोर्केगेस्तेसाजार्काखिभे गुरौ ॥१७१॥ यमेंदुतुंगगौ लग्ने षष्ठेऽर्कज्ञौ तुलाजगा । सितासृजो गुरौ कर्कौ साराजे लग्नगे नृपाः ॥१७२॥ वृषेगेन्जेर्केज्यसौरैः सुहृज्जायाखगैर्नृपः । मंदे मृगांगेव्यर्थ्यकांशस्थैरजादिभिर्नृप ॥१७३॥ सेज्याजेश्वे मृगमुखे कुजे तुंगेशेभार्गवौ । लग्नेऽथ सेज्यककेंगे ज्ञानशुकौ भंवोपगैः ॥१७४॥ मेषेऽर्के भूमिपासैंदौ एषे षांग्रैकंपासेजः । सिंहकुंभमृगस्थाइचेद्भूषः सारेतनावजे ॥१७५॥ आर्के जीवे तनौ वापि नृपोऽधोः कुजभास्करौ । धीस्थौ गुर्विन्दुकवयो भूमौ स्तयगे बुधेर्नृपः ॥१७६॥ मृगास्यलग्नगैः सौरेजाब्जक्षं हरयः सयाः । कविक्वौ तुलयुग्मस्थौ वै भूपः कीर्तिमान्भवेत् ॥१७७॥ यस्य कस्यापि तनयः प्रोक्तैर्योगैर्नृपो भवेत् । वक्ष्यमाणैर्नृपसुतो ज्ञेयो भूयो मुनीश्वर ॥१७८॥
शिल्पकलादि से, गुरु के नवमांश में हों तो देवता और ब्राह्मणों के द्वारा तथा लोहा, सोना आदि के खान से, शुक्र के नवमांश में हों तो चाँदी, गौ तथा रत्न आदि से और शनि केनवमांश में हों तो परपीडन, परिश्रम और नीच कर्म द्वारा धन की प्राप्ति होती है ॥१६७-१६९॥ राजयोग का वर्णन--शनि, सूर्य, गुरु और मंगल—ये चारों यदि अपने-अपने उच्च में हों और इन्हीं में कोई एक लग्न में हो तो इन चारों लग्नों में जन्म लेने वाले राजा होते हैं। लग्न अथवा चन्द्रमा वर्गोत्तम नवमांश में हो और उस पर ४, ५ या ६ ग्रह की दृष्टि हो तो इसके २२ भेद से २२ प्रकार के राजयोग होते हैं। मंगल अपने उच्च में हो, रवि और चन्द्रमा धन राशि में हों और मकरस्थ शनि लग्न में हो तो जातक राजा होता है। रवि लग्न में उच्चस्थ हो, चन्द्रमा सहित शनि सप्तम भाव में हो, बृहस्पति स्वगृह (धनु या मीन) में हो तो जातक राजा होता है ॥१७०-१७१॥ शनि अथवा चन्द्रमा अपने उच्चस्थ होकर लग्न में हों, षष्ठ भाव में सूर्य और बुध हों, शुक्र तुला में, मंगल मेष में और गुरु कर्क में हो तो इन दोनों लग्नों में जन्म लेने वाला राजा होता है। उच्चस्थ मंगल यदि चन्द्रमा के साथ वृष लग्न में हो तो भी जातक राजा होता है। चन्द्रमा वृष लग्न में हो और सूर्य, गुरु तथा शनि ये क्रम से ४, ७, १०वें स्थान में हों तो जातक राजा होता है। मकर लग्न में शनि हो और लग्न से ३, ६, ९ एवं १२वें भाव में क्रमशः चन्द्रमा, मंगल, बुध तथा बृहस्पति हों तो जातक राजा होता है ॥१७२-१७३॥ गुरु सहित चन्द्रमा धन में और मंगल मकर में हों तथा बुध या शुक्र अपने उच्च में स्थित होकर लग्न में विद्यमान हों तो उन दोनों योगों में जन्म लेने वाला राजा होता है। बृहस्पति कर्क लग्न में हो, बुध, चन्द्रमा तथा शुक्र तीनों ११वें भाव में हों और सूर्य मेष में हो तो जातक राजा होता है। चन्द्रमा मीन लग्न में हो, सूर्य शनि, मंगल—ये क्रम से सिंह, कुम्भ और मकर में हों तो जातक राजा होता है। मंगल सहित मेष लग्न हो, बृहस्पति कर्क में हो अथवा कर्कस्थ बृहस्पति लग्न में हो तो जातक राजा होता है। मंगल और शनि पंचम भाव में, गुरु, चन्द्रमा तथा शुक्र चतुर्थ भाव में और बुध कन्या लग्न में हों तो जातक राजा होता है ॥१७४-१७६॥ मकर लग्न में शनि हो तथा मेष, कर्क, सिंह—ये अपने-अपने स्वामी से युक्त हों, शुक्र तुला में और बुध मिथुन में हों तो बालक यशस्वी राजा होता है ॥१७७॥ मुनीश्वर ! इन बताये हुए योगों में जन्म लेने वाला जिस किसी का पुत्र भी राजा होता है। तथा आगे जो योग बताये जाएँगे, उनमें जन्म लेने वाले राजकुमार को ही राजा समझना चाहिए। (यदि अन्य व्यक्ति इस योग में उत्पन्न हुआ हो तो वह राजा के तुल्य होता है, राजा नहीं ॥१७८॥
४२० नारदीयपुराणम् स्वोच्चे त्रिकोणभगस्तैस्त्याद्यैर्बलयुतैर्नृपः । सिंहेऽर्के मेषलग्नेऽब्जे मृगे भौमेघटेऽष्टमे ॥१७९॥ चापे जीवे धरानाथःस्यादथ स्वक्षगे भृगौ । पातालगे धर्मगेऽब्जे शुभदृष्टे युते मुने ॥१८०॥ त्रिलग्नभवगैःशेषैर्धराधीशः प्रजायते । सौम्ये वीर्ययुतेऽगस्थे बलाढ्ये शुभगे शुभे ॥१८१॥ धर्मार्थोपचयस्थैश्च शेषैर्धर्मयुतोन्नृपः । मेषूरणायतनुगाः शशिसूर्यजसुरयः ॥१८२॥ ज्ञारौ धने शितरवा हिबुके भूपतिस्तदा । वृषेऽगेऽब्जोधनारिस्थो जीवाकी लाभगाः परे ॥१८३॥ सुखे गुरुःखेंरखेंदूयमो लग्ने भवे करै । लग्ने वक्रासितौ चंद्रेज्यसितार्कबुधाः क्रमात् ॥१८४॥ सुखास्तु शुभखार्पिस्तथा नरेशं जनयंत्यपि । कर्मलग्नगखेटस्य दशायां राज्य संगतिः ॥१८५॥ प्रबलस्य दशायां वा शत्रुनीचा दिगातिदाः । आसन्नकेंद्रद्वयगैर्वर्गदाख्यः सकलग्रहैः ॥१८६॥ तन्वस्तगैश्च सकटं विहगो राज्यबंधुगैः । शृङ्गाटकं धिगौगस्थैलंग्नान्यस्थैर्हलं मतम् ॥१८७॥ वज्रोंऽङ्गेस्थे सत्वसतयु तुर्यखस्थैर्यवोन्था । विमिश्रैः कमलं प्राहुर्याकंटकबाह्यगैः ॥१८८॥ लग्नाच्चतुर्भुगैर्यूपःशरस्तूर्याच्चतुर्भुगेः । द्यूनाद्वे दक्षगैः शक्ति र्दण्डादिचतुर्भुगैः ॥१८९॥ तीन या अधिक ग्रह बली होकर अपने-अपने उच्च या मूल त्रिकोण में हों तो बालक राजा होता है। सिंह में सूर्य, मेष लग्न में चन्द्रमा, मकर में मंगल, कुम्भ में शनि और धनु में बृहस्पति हो तो उत्पन्न शिशु भूपाल होता है। मुने ! शुक्र अपनी राशि में होकर चतुर्थ स्थान में स्थित हों, चन्द्रमा नवम भाव में रहकर शुभ ग्रह से दृष्ट या युक्त हों तथा शेष ग्रह ६, ५, ३, ६, १० और ११वें भाव में हों तो उत्पन्न बालक धर्मात्मा नरेश होता है। चन्द्रमा, शनि और बृहस्पति क्रमशः दसवें, ग्यारहवें तथा लग्न में स्थित हों, बुध और मंगल द्वितीय भाव में तथा शुक्र और रवि चतुर्थ भाव में स्थित हों तो जातक भूपाल होता है। वृष लग्न में चन्द्रमा, द्वितीय में गुरु, ११वें में शनि तथा शेष ग्रह भी स्थित हों तो बालक नरेश होता है ॥१७९-१८३॥ चतुर्थ भाव में गुरु, १०वें भाव में सूर्य और चन्द्रमा, लग्न में शनि और ११वें भाव में शेष ग्रह हों तो जातक राजा होता है। मंगल और शनि लग्न में हों, चन्द्रमा, गुरु, शुक्र, सूर्य और बुध—ये क्रम से ४, ७, ९, १० और ११वें में हों तो ये सब ग्रह भावी नरेश को जन्म देते हैं। मुनीश्वर ! ऊपर कहे हुए योगों में उत्पन्न मनुष्य के दशम भाव या लग्न में जो ग्रह हो, उसकी दशा-अन्तर्दशा आने पर उसे राज्य की प्राप्ति होती है। उन दोनों स्थानों में ग्रह न हो तो जन्म समय में जो ग्रह बलवान् हो, उसकी दशा में राज्यलाभ समझना चाहिए तथा जो ग्रह जन्म-समय में शत्रुराशि या अपनी नीच राशि में हो, उसकी राशि में क्लेश, पीडा आदि की प्राप्ति होती है ॥१८४-१८५॥ नाभस योग कथन—समीपवर्ती दो केन्द्र-स्थानों में हो (रवि से शनिपर्यन्त) सब ग्रह हों तो 'गदा' नामक योग होता है। केवल लग्न और सप्तम दो ही स्थानों में सब ग्रह हों तो 'शकट' योग होता है। दशम और चतुर्थ में ही सब ग्रह हों तो 'विहग' योग होता है। ५, ९ और लग्न--इन तीन ही स्थानों में सब ग्रह हों तो शृङ्गारक योग होता है। इसी प्रकार यदि लग्न भिन्न स्थान से त्रिकोण स्थानों में ही सब ग्रह हों तो 'हल' नामक योग होता है ॥१८६-१८७॥ लग्न और सप्तम में सब शुभ ग्रहों तथा चतुर्थ-दशम में सब पापग्रह हों तो 'वज्र' योग होता है। इसके विपरीत यदि लग्न, सप्तम में सब पापग्रह तथा चतुर्थ-दशम में सब शुभग्रह हों तो 'यव' योग होता है, यदि चारों केन्द्रों में सब (शुभ और पाप) ग्रह मिलकर बैठे हों तो 'कमल' योग होता है ॥१८८॥ लग्न से लगातार ४ स्थान (१, २, ३, ४) में ही सब ग्रह स्थित हों तो 'शर' योग होता है। सप्तम से ४ स्थान (७, ८, ९, १०) में ही सब ग्रह स्थित हो तो 'शक्ति' योग होता है। और दशम से ४ स्थान (१०, ११, १२, १) में ही सब ग्रह हों तो दण्ड योग होता है ॥१८९॥ लग्न से क्रमशः सात स्थानों (१, २, ३,
पञ्चपञ्चाशतमोऽध्यायः ४२१ लग्नात्क्रमात्सप्तभगैर्नौ' काकूटस्तु नुर्यतः । छत्रमस्तात्स्वभाग्याद्योन्त्यस्मादर्द्धेन्दुर्नामकः ॥१९६०॥ लग्नादेकान्तरगतैश्चक्रमर्थात्सरित्पतिः । बहु स्थानेषु वीणाद्याः सप्तसप्तर्क्षसंस्थितैः ॥१९६१॥ वीणादामपाशकेदारशूलयुगगोलकाः । ग्रहैः सर्वैश्चरभगै राजयोगः प्रकीर्तितः ॥१९६२॥ स्थिरस्थैर्मुसलं नाम द्विशरीणतैर्नलः । भाला केंद्रस्थितैः सौम्यैः पापैस्सर्प उदाहृतः ॥१९६३॥ ईर्ष्यारुध्वरुची रज्ज्वां मुसले धनमानयुक् । व्यंमा स्थिरा लोनल्जो मोगीस्रग्जोहिजोदितः ॥१९६४॥ वीणोद्भवोतिनिपुणः गीतनृत्यरुचिर्भृशम् । दाता स द्वो दामोत्थः याशजो धनशीलथुक् ॥१९६५॥ केदारोत्थः कृषिकरः शूले शूरोक्षतो धनः । युगं पाखंडयुर्गोले विधनो मलिनस्तथा ॥१९६६॥ भूपवंद्यपदश्चक्रे समुद्रे नृपभोगयुक् । शुभगांगोर्द्धचापात्सुखीशूरश्च चामरः ॥१९६७॥ ४, ५, ६, ७) में सब ग्रह हों तो 'नौका' योग, चतुर्थ भाव से आरम्भ करके लगातार सात स्थानों में सभी ग्रह हों तो 'कूट' योग, सप्तम भाव से आरम्भ करके लगातार सात स्थानों में सभी ग्रह हों तो 'छत्र' योग और दशम से आरंभ करके सात स्थानों में सब ग्रह स्थित हों तो 'चाप' नामक योग होता है । इसी प्रकार केन्द्र भिन्न स्थान से आरम्भ करके लगातार सात स्थानों में सब ग्रह हों तो 'अर्धचन्द्र' नामक योग होता है ॥१९९०॥ लग्न से आरम्भ करके एक स्थान का अन्तर देखकर क्रमशः १, ३, ५, ७, ९, और ११ इन) ६ स्थानों में ही सब ग्रह स्थित हों तो 'चक्र' नामक योग होता है और द्वितीय भाव से लेकर एक स्थान का अन्तर देकर क्रमशः ६ स्थानों (२, ४, ६, ८, १०, १२) में ही सब ग्रह विद्यमान हों तो 'समुद्र' नामक योग होता है । ७ से १ राशि तक में सब ग्रह के रहने पर क्रमशः वीणा आदि नाम वाले ७ योग होते हैं। जैसे-७ स्थानों में सब ग्रह हों तो 'वीणा' ६ स्थानों में सब ग्रह हों तो 'दाम', ५ स्थानों में सब ग्रह हों तो 'पाश', ४ स्थानों में सब ग्रह हों तो 'क्षेत्र', ३ स्थानों में सब ग्रह हों तो 'शूल', २ स्थानों में सब ग्रह हों तो 'युग' और एक ही स्थान में सब ग्रह हों तो 'गोल' नामक योग होता है । सब ग्रह चर राशि में हों तो 'रज्जु', स्थिर राशि में हों तो 'मुसल' और द्विखभाव में हों तों 'नल' नामक योग होता है। सब शुभग्रह केन्द्रस्थानों में हों तो 'माला' और सब पापग्रह केन्द्रस्थानों में हों तो 'सर्प' नामक योग होता है ॥१९९१-१९९३॥ इन योगों में जन्म लेने वालों के फल- रज्जुयोग में जन्म लेने वाला ईर्ष्यावान् और भ्रमण की इच्छा वाला होता है । मुसलयोग में उत्पन्न शिशु धन और मान से युक्त होता है । नलयोंग में उत्पन्न पुरुष अंगहीन, स्थिरबुद्धि और धनी होता है । मालायोग में उत्पन्न जातक भोगी होता है तथा सर्पयोग में उत्पन्न पुरुष दुःख से पीड़ित होता है ॥१९९४॥ वीणायोग में उत्पन्न मनुष्य सब कार्यों में निपुण तथा संगीत और नृत्य में रुचि रखने वाला होता है। दामयोग में उत्पन्न मनुष्य दाता और धनाढ्य होता है । पाशयोग में उत्पन्न धनवान् और सुशील होता है । केदार (क्षेत्र) योग में पैदा हुआ खेती से जीविका चलानेवाला होता है तथा शूलयोग में उत्पन्न पुरुष शूरवीर, शस्त्र से आघात न पाने वाला और निर्धन होता है । युगयोग में उत्पन्न होने वाला पाखंडी तथा गोलयोग में उत्पन्न मनुष्य मलिन और निर्धन होता है ॥१९९५-१९६६॥ चक्रयोग में जन्म लेने वाले पुरुष के चरणों में राजा लोग भी मस्तक झुकाते हैं । समुद्रयोग में उत्पन्न पुरुष राजोचित भोगों से सम्पन्न होता है । अर्धचन्द्र में पैदा हुआ बालक सुन्दर शरीर वाला तथा चापयोग में उत्पन्न शिशु सुखो और शूरवीर होता है ॥१९९७॥ छत्रयोग में उत्पन्न मनुष्य मित्रों का उपकारक तथा कूटयोग
४२२ नारदीयपुराणम् मित्रोपकारकृच्छत्रे कूटे चानृतबंधराट् । नौजः सकीर्तिः सुखभाक् मानवो भवति ध्रुवम् ॥१९६॥ त्यागी यज्वात्मवान् यपे हिंस्रो गुह्याधिपः शरैः । । शक्तौ नीचोऽलसो निःस्वो दण्डे प्रियवियोगभाक् ॥१९८॥ व्यर्कैः स्वांत्योभयगतैः खेटैः स्यात्सुनफानफा । दुरुधरा चैव विधौ ज्ञेयः केमद्रुमोऽन्यथा ॥२००॥ स्वोपार्जितार्थभुग्दाता सुनफायां धनी सुखी । नीरोगः शीलवान् ख्यातः सुवेषश्चानफाभवः ॥२०१॥ भोगी सुखी धनीदानी त्यागी दुरुधरोद्भवः । केमद्रुमेऽतिमलिनो दुःखी नीचोऽथ निर्धनः ॥२०२॥ यन्त्राश्मकारंशाजोको भौमपुष्ककृते ध्वगः । सुज्ञः सुकीर्तिर्निपुणं विद्वांसं धनिनं तथा ॥२०३॥ सेन्योन्यकार्यनिरतं सास्फुजिच्छस्त्रजीवनम् । समंदो धातुकुशलं तथा भाडविदं मुने ॥२०४॥ कूटस्त्र्याशवपण्याठं नसासंगिदुः प्रसूद्विषम् । कुर्यात्सज्ञोऽर्थनिपुणं नम्रं सत्कीर्तिसंयुक्तम् ॥२०५॥ सेज्योऽस्थिरवयं वंश्यं विक्रांतं च समर्थिनम् । ससितोसुक्रवेत्तारं सार्किपौनर्भवं मुने ॥२०६॥ आरे सज्ञे बाहुयोधी पुराध्यक्षः सगौष्पतौ । सशुक्रे द्यूतकृच्छौंड्यो नृती द्यूती समंदके ॥२०७॥ में उत्पन्न मिथ्याभाषी और जेल का अधीक्षक होता है। नौका योग में उत्पन्न पुरुष निश्चय ही यशस्वी और सुखी होता है। यूपयोग में जन्म लेने वाला मनुष्य दानी, यज्ञकर्ता और मनस्वी होता है। शरयोग में उत्पन्न मनुष्य दूसरों को कष्ट देने वाला और गोपनीय स्थानों का स्वामी होता है। शक्तियोग में उत्पन्न नीच, आलसी और निर्धन होता है। दण्डयोग में उत्पन्न पुरुष अपने प्रियवियोग का कष्ट भोगता है ॥१९७-१९९॥ चतुर्योग का कथन—यदि चन्द्रमा से द्वितीय में सूर्य को छोड़कर कोई भी अन्य ग्रह हो तो 'सुनफा' योग होता है। द्वादश में हो तो 'अनफा' और दोनों (२, १२) स्थानों में ग्रह हों तो 'दुरुधरा' योग होता है। अन्यथा (अर्थात् २, १२ में कोई ग्रह नहीं हो तो) 'केमद्रुम' योग होता है ॥२००॥ उक्तयोगों का फल—सुनफा योग में जन्म लेने वाला पुरुष अपने भुजबल से उपार्जित धन का भोगी, दाता, धनवान् और सुखी होता है। अनफायोग में उत्पन्न मनुष्य नीरोग, सुशील, विख्यात और सुन्दर होता है। दुरुधरा में जन्म लेने वाला भोगी, सुखी, धनवान्, दाता और विषयों से निःस्पृह होता है। केमद्रुम योग में उत्पन्न पुरुष मलिन, दुःखी नीच और निर्धन होता है ॥२०१-२०२॥ द्विग्रहयोगफल—मुने ! सूर्य यदि चन्द्रमा से युक्त हो तो भाँति-भाँति के यन्त्र और पत्थर के कार्य में कुशल बनाता है। मंगल से युक्त हो तो वह बालक को नीच कर्म में लगाता है। बुध से युक्त हो तो यशस्वी, कार्यकुशल, विद्वान् एवं धनी बनाता है, गुरु से युक्त हो तो दूसरों के कार्य करने वाला, शुक्र से युक्त हो तो धातुओं (ताँबा आदि) के कार्य में निपुण तथा पात्र-निर्माण-कला का जानकार बनाता है ॥२०३-२०४॥ चन्द्रमा यदि मंगल से युक्त हो तो जातक कूटवस्तु (नकली सामान), स्त्री और आसव-अरिष्टादि का क्रय-विक्रय करने वाला तथा माता-पिता का द्रोही होता है। बुध के साथ चन्द्रमा हो तो उत्पन्न शिशु को धनी, कार्यकुशल, विनयी एवं यशस्वी बनाता है; गुरु से युक्त हो तो चंचलवृद्धि, कुल में मुख्य, पराक्रमी और धनाढ्य बनाता है। मुने ! यदि शुक्र से युक्त चन्द्रमा हो तो बालक को वस्त्रनिर्माण-कला का ज्ञाता बनाता है और यदि शनि से युक्त हो तो वह बालक ऐसी स्त्री से उत्पन्न होता है, जिसने पति के मरने पर या जीते जी दूसरे पति से सम्बन्ध स्थापित कर लिया हो ॥२०५-२०६॥ मंगल यदि बुध से युक्त हो तो उत्पन्न हुआ बालक बाहु से युद्ध करने वाला (पहलवान) होता है। गुरु से युक्त हो तो नगर का स्वामी, शुक्र से युक्त हो तो जूआ खेलने वाला तथा गायों का पालक और शनि से युक्त हो तो मिथ्यावादी तथा जुआड़ो होता है ॥२०७॥
पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४२३ सेज्येज्ञे नृत्यगीताढ्यो मायादक्षः [सभार्यवे]। समंदे लुब्धकः क्रूरो नरो भवति नारद ॥१२०८॥ सशुक्रे वाक्पतौ विद्वान्सासितेऽन्नघटंकरः । कवौ समंदमंदाक्षो वनिताश्रयवित्तवान् ॥१२०९॥ एकस्थैश्चतुराद्यैस्तु खवार्थाः खचरैः पृथक् । कुजज्ञेज्यांशुकार्किसूर्यैः परिव्रजेन्नरः ॥२१०॥ शाक्याजीवकवृद्धार्थिचरकाखफलाशनः । तत्स्वामिभिः पराजितैः प्रव्रज्याप्रच्युतिर्भवेत् ॥२११॥ अदीक्षितोऽल्पस्तगतैः सबलैस्तत्स्थभक्तयः । जन्मपोऽन्यैरद्यदृष्टो मंदं पश्यति नारद ॥२१२॥ मंदो वा जन्मपं नष्टं तथा च मंदकाङ्गण । भौमार्कांशे सौरदृष्टे चंद्रे वा दीक्षितो भवेत् ॥२१३॥ सुरूपो भूषितोऽश्विन्यां दक्षः सत्यवचा यमे । बह्नुपदासक्तौ स्थिरधीः प्रियवाक्तथा ॥२१४॥ ब्राह्मे धनीमृगे भोगी रौद्रे हिंस्रः शठोऽघकृत् । दांतो रोगी शुभोऽदित्यां पुष्येऽर्जन्मा कविः सुखी॥२१५॥ धूर्तः शठः कृतघ्नोऽह्नौ पापः सर्वाशनो भवेत् । पन्ने भोगी धनी भक्तो दाता प्रियवचा भगे ॥२१६॥ धनी भोगी नरोर्यम्णे स्तेनो धृष्टो घृणी करे । चित्रांवरः सुदृक्तवाष्ट्रे न च धर्मदयापरः ॥२१७॥ दीशे लुब्धः पटुः क्रोधी मदैंचो आठनोविदेशगः । शाक्रे धर्मपरस्तुष्टो मूले मानी धनी सुखी ॥२१८॥ आप्ये मानी सुखी हृष्टो वैश्वे नम्रश्च धार्मिकः । कर्णे धनी सुखी ख्यातो दाता शूरो धनी वसौ ॥२१९॥
नारद ! बुध यदि बृहस्पति से युक्त हो तो उत्पन्न शिशु नृत्य और संगीत का प्रेमो होता है। शुक्र से युक्त हो तो मायावी और शनि से युक्त हो तो उत्पन्न मनुष्य लोभी और क्रूर होता है ॥१२०८॥ गुरु यदि शुक्र से युक्त हो तो मनुष्य विद्वान, शनि से युक्त हो तो रसोइया अथवा घटनिर्माता होता है। शुक्र यदि शनि से युक्त हो तो मंद दृष्टि वाला तथा स्त्री के सहारे धनोपार्जन करने वाला होता है ॥१२०९॥ प्रव्रज्या योग—यदि जन्म-समय में चार या चार से अधिक ग्रह एक स्थान में हों तो मनुष्य गृहत्यागी संन्यासी होता है। उन ग्रहों में मंगल, बुध, गुरु, चन्द्रमा, शुक्र, शनि और सूर्य बली हों तो मनुष्य क्रमशः शाक्य (बौद्ध), आजीवक (दण्डी), भिक्षु (यति), वृद्ध (वृद्धश्रावक), चरक (चक्रधारी), अह्नी (नग्न) और फलाहारी होता है। प्रव्रज्याकारक ग्रह यदि अन्य ग्रह से पराजित हो तो मनुष्य उस प्रव्रज्या से च्युत हो जाता है। यदि प्रव्रज्याकारक ग्रह सूर्य-सन्निध्यवश अस्त हो तो मनुष्य उसकी दीक्षा ही नहीं लेता और यदि वह ग्रह बलवान् हो तो उसकी प्रव्रज्या में प्रीति रहती है। जन्मराशीश पर यदि अन्य ग्रह की दृष्टि न हो और जन्मराशीश यदि शनि को देखता हो अथवा निर्बल जन्मराशीश को शनि देखता हो या शनि के द्रेष्काण अथवा मंगल या शनि के नवमांश में चन्द्रमा हो और उस पर शनि की दृष्टि हो तो इन योगों में विरक्त होकर गृहत्याग करने वाला पुरुष संन्यास-धर्म की दीक्षा लेता है ॥२१०-२१३॥ अश्विन्यादि नक्षत्रों में जन्म का फल--अश्विनी नक्षत्र में उत्पन्न बालक सुन्दर और भूषणप्रिय होता है। भरणी में उत्पन्न शिशु सब कार्य में दक्ष और सत्यवादी होता है। कृत्तिका में उत्पन्न अमिताहारी, परस्त्री में आसक्त, स्थिरबुद्धि और प्रियवक्ता होता है, रोहिणी में, पैदा हुआ मनुष्य धनवान्; मृगशिरा में उत्पन्न भोगी; आर्द्रा में उत्पन्न हिंसास्वभाव वाला, शठ और अपराधी; पुनर्वसु में जितेन्द्रिय, रोगी ओर सुशील तथा पुष्य में कवि और सुखी होता है ॥२१४-२१५॥ आश्लेषा नक्षत्र में उत्पन्न मनुष्य धूर्त, शठ, कृतघ्न, नीच और खान-पान में अविवेकी या सर्वभक्षी, मघा में भोगी, धनी तथा देवादि का भक्त होता है। पूर्वा फाल्गुनी में दाता और प्रियवक्ता होता है। उत्तराफाल्गुनी में धनी और भोगी; हस्त में चोरस्वभाव, ढीठ और निर्लज्ज तथा चित्रा में नाना प्रकार के वस्त्र धारण करने वाला धर्मात्मा और दयालु होता है। विशाखा में लोभी, चतुर और क्रोधी; अनुराधा में भ्रमणशील और विदेशवासी; ज्येष्ठा में धर्मात्मा और सन्तोषी तथा मूल में धनीमानी और सुखी होता है। पूर्वाषाढ़ में मानी, सुखी और हृष्ट; उत्तराषाढ़ में विनयी और धर्मात्मा; श्रवण में धनी सुखी और
४२४ नारदीयपुराणम् शेतऽरिहंता व्यसनी स्त्रीजितो जाहिभेदिनी । बुध्ने वक्ता सुखी कांतः पौष्णे शूरो धनी शुचिः ॥२२०॥ कामी शूरः कृतज्ञोऽजे कांतस्त्यागी क्षमी वृषे । युग्मे स्त्रीद्यूतशास्त्रज्ञः स्त्रैणो ह्रस्वः स्वभे विधौ ॥२२१॥ स्त्रीद्विट् क्रोधी हरौ मानी विक्रांतः स्थिरधीः सुखी । धर्मी श्लक्ष्णः सुधीः षष्ठे प्राज्ञः प्रांशुर्धनी घटे ॥२२२॥ रोगी पूज्यः क्षती कौर्प्ये कविः शिल्पीज्यभे धनी । मृगेऽलसोऽटनः स्वक्षः परदारार्थहृद्धटे ॥२२३॥ सबलेभेभयेवापिसबलेऽखिलफलम् ॥ अन्यथा विपरीतं तत्फलमेवं परेऽपि न । ख्यातः स्त्रीद्विट् धनी तीक्ष्णोज्ञः कविः शौंडिको धनी ॥२२४॥ पूज्यो लुब्धोऽधनसखो मेषादौ भास्करे जनौ । निःस्वोऽर्कभे भूमिपुत्रे धनी चांद्रे स्वभेदनः । बौधे कृतज्ञो जैवे तु ख्यातः शौक्रेऽन्यदारिकः ॥२२५॥
धनवान् होता है । शतभिषा में शत्रु को जीतने वाला व्यसन में आसक्त, पूर्व भाद्रपद में स्त्री के वशीभूत और धनवान्; उत्तरभाद्रपद में वक्ता, सुखी और सुन्दर तथा रेवती में जन्म लेने वाला वीर, धनी और पवित्र हृदय वाला होता है ॥२१६-२२०॥ मेषादि चन्द्रराशि में जन्मराशि का फल- मेषराशि में जन्म लेने वाला कामी, और कृतज्ञ; वृष में सुन्दर, दानी और क्षमावान्; मिथुन में स्त्रीभोगासक्त, द्यूतविद्या को जानने वाला होता है । सिंहराशि में स्त्रीद्वेषी, क्रोधी, मानी, पराक्रमी, स्थिरबुद्धि और सुखी होता है । तुलाराशि में उत्पन्न मनुष्य पण्डित, ऊँचे कदवाला और धनवान् होता है । वृश्चिक राशि में उत्पन्न रोगी, लोक में पूज्य और क्षत (आघात) युक्त होता है । धनु में जन्म लेने वाला कवि, शिल्पज्ञ और धनवान्; मकर में उत्पन्न पुरुष कार्य करने में अनुत्साही, व्यर्थ घूमने वाला और सुन्दर नेत्रों से युक्त; कुम्भ में परस्त्री और परधन हरण करने के स्वभाव वाला तथा मीन में धनुसदृश (कवि और शिल्पज्ञ) होता है ॥२२१-२२३॥ यदि चन्द्रमा की राशि बली हो तथा राशि का स्वामी और चन्द्रमा दोनों बलवान् हों तो ऊपर कहे हुए फल पूर्ण रूप से संघटित होते हैं-ऐसा समझना चाहिए । अन्यथा विपरीत फल (अर्थात् निर्बल हों तो फल का अभाव या बल के अनुसार फल में भी तारतम्य) जानना चाहिए । इसी प्रकार अन्य ग्रहों की राशि के अनुसार फल का विचार करना चाहिए ॥२२३॥ सूर्यादि-ग्रह-राशि-फल-सूर्य यदि मेष राशि में हो तो जातक लोक में विख्यात होता है । वृष में हो तो स्त्री का द्वेषी, मिथुन में हो तो धनवान्, कर्क में हो तो उग्र स्वभाव वाला, सिंह में हो तो मूर्ख, कन्या में हो तो कवि, तुला में हो तो मद्यविक्रेता, वृश्चिक में हो तो धनवान्, धनु में हो तो लोकपूज्य, मकर में हो तो लोभी, कुम्भ में हो तो निर्धन और मीन में हो तो सुख हीन होता है ॥२२४॥ मंगल यदि सिंह में हो तो जातक निर्धन, कर्क में हो तो धनवान्, स्वगृह में (मेष, वृश्चिक) में हो तो भ्रमण- शील कन्या-मिथुन में हो तो कृतज्ञ, गुरुराशि (धनु-मीन) में हो तो विख्यात, शुक्रराशि (वृष-तुला) में हो तो पर- स्त्री में आसक्त, मकर में हो तो बहुत पुत्र और धनवाला तथा कुम्भ में हो तो दुःखी, दुष्ट और मिथ्या स्वभाव वाला होता है ॥२२५॥
पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४२५ मृगे बह्वात्मजधनः कुम्भे दुःख्यनृती खलः । स्त्रीद्वेष्यः स्वजनद्वेषीनिर्यरत्यः सधीधनः ॥२२६॥ समानार्थः सपुत्रस्त्रीसणंः सूर्यादिभे बुधे । सेनानीः स्त्र्यर्थपुत्राढ्यः दक्षमैश्यः परिच्छदी ॥२२७॥ मंडलेशः सार्थसुखः सर्पास्याम्यर्कभाद्धरौ । स्वप्त्याप्तार्थो मंदशोकाढ्यो बंधुद्वेषी धनाढवान् ॥२२८॥ सार्थः प्राज्ञः समः ख्यातिः स्त्रीजितोऽर्कादिभे भृगौ । व्यंगजार्थो खप्रसूको विधिमित्रो सुखत्रयः ॥२२९॥ सत्पुत्रस्त्रीधनो राजा ग्रामे शोकादिभेऽर्कजे । भूपज्ञगुणि चौरास्वाद्दष्टेब्जेजेसृगादिभिः ॥२३०॥ निःस्वःस्तेननृपाः प्रज्ञप्रेष्यामविन्मिथुन्मगे । धात्वाजीवी नृपज्ञाभीतंतुवायाधनाः स्वभे ॥२३१॥ युयुत्सुकविसूरोज्यधातुजीविद्गगामयाः । ज्योतिर्ज्ञाढ्येज्यनु खलु नृपेज्ञादिकहैरौ ॥२३२॥ बुध यदि सूर्य की राशि (सिंह) में हो तो स्त्री का द्वेषी, चन्द्रराशि (कर्क) में हो तो अपने परिजनों का द्वेषी, मंगल की राशि (मेष-वृश्चिक) में हो तो निर्धन और सत्त्वहीन, अपनी राशि (मिथुन-कन्या) में हो तो बुद्धिमान् और धनवान्, गुरु की राशि (धनु-मीन) में हो तो मान और धन से युक्त, शुक्र की राशि (वृष-तुला) में हो तो पुत्र और स्त्री से युक्त तथा शनि की राशि (मकर-कुम्भ) में हो तो ऋणी होता है ॥२२६३॥ गुरु यदि सिंह में हो तो सेनापति, कर्क में हो तो स्त्रीपुत्रादि से युक्त एवं धनी, मंगल की राशि (मेष- वृश्चिक) में हो तो धनी और क्षमाशील, बुध की राशि (मिथुन-कन्या) में हो तो वस्त्रादि विभव से युक्त, अपनी राशि (धनु-मीन) में हो तो मण्डल का अधिपति, शुक्र की राशि (वृष-तुला) में हो तो धनी और सुखी तथा शनि की राशि (मकर-कुम्भ) में हो तो मकर में ऋणवान् और कुम्भ में धनवान् होता है ॥२२७३॥ शुक्र सिंह में हो तो जातक स्त्री द्वारा धनलाभ करने वाला, कर्क में हो तो अभिमानी और शोक युक्त, मंगल की राशि (मेष-वृश्चिक) में हो तो बन्धुओं का द्वेषी, बुध की राशि (मिथुन-कर्क) में हो तो धनी और पाप स्वभाव, गुरु की राशि (धनु-मीन) में हो तो धनी और पण्डित, अपनी राशि (वृष-तुला) में हो तो धन- वान् और क्षमावान् तथा शनि की राशि (मकर-कुम्भ) में हो तो स्त्री से पराजित होता है ॥२२९३॥ शनि यदि सिंह में हो तो पुत्र और धन से रहित, कर्क में हो तो धन और संतान से हीन, मंगल की राशि (मेष-वृश्चिक) में हो तो निर्बुद्धि और मित्रहीन, बुध की राशि (धनु-मीन) में हो तो सुपुत्र, उत्तम स्त्री और धन से युक्त, शुक्र की राशि (वृष-तुला) में हो तो राजा और अपनी राशि (मकर-कुम्भ) में हो तो जातक ग्राम का अधिपति होता है ॥२२६३॥ चन्द्र पर दृष्टि का फल-मेष स्थित चन्द्रमा पर मंगल आदि ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक क्रम से राजा, पण्डित, गुणवान्, चोर स्वभाव तथा निर्धन होता है ॥२३०॥ वृषस्थ चन्द्रमा पर मंगल आदि ग्रहों की दृष्टि हो तो क्रम से निर्धन, चोर-स्वभाव, राजा, पण्डित तथा प्रेष्य (भृत्य) होता है। मिथुन राशि में स्थित चन्द्रमा पर मंगल आदि ग्रहों की दृष्टि होने से मनुष्य क्रमशः धातुओं से आजीविका करने वाला, राजा, पण्डित, निर्भय, वस्त्र बनाने वाला तथा धनहीन होता है। अपनी राशि (कर्क) में स्थित चन्द्रमा पर यदि मंगलादि ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक क्रमशः योद्धा, कवि, पण्डित, धनी, धातु से जीविका करने वाला तथा नेत्ररोगी होता है। सिंह राशिस्थ चन्द्रमा पर यदि बुधादि ग्रहों की दृष्टि हो तो मनुष्य क्रमशः ज्योतिषी, धनवान्, लोक में पूज्य, नाई, राजा तथा नरेश होता है। कन्याराशिस्थित चन्द्रमा ५४ ना० पु०
४२६ नारदीयपुराणम् षष्ठे शुभैर्नृपचमूपनैपुण्यवतिताशयाः । जूके भूपस्वर्णकारवणिजः शेषैर्वृगुते ॥२३३॥ द्विपैतृकाब्धिध्वजिनो व्यंगा स्वक्षितिपा अलौ । ज्ञातिक्षमाजनपाश्चापे सद्धिर्मदम्भीशठस्तथा ॥२३४॥ भूपपण्डितसखे ज्यामृगे भूपान्यदारिकौ । कुम्भे शेषैश्च हास्यज्ञनृपज्ञाः सद्धिर्भरंत्यभे ॥२३५॥ होरेशर्क्षदलस्थैस्तु दृष्टो युक्तः शशी शुभः । त्र्यंशे तत्पतिमित्रर्क्षगतैर्युक्त क्षितस्तथा ॥२३६॥ द्वादशांशे फलं प्रोक्तं नवांशेऽप्यथ कीर्त्यते । आरक्षेको वधरुचिर्नियुद्धकुशलोऽर्थवान् ॥२३७॥ कलहः क्षितिजांश्ये शौक्रे मूर्खोऽन्यदारदः । कविः सुखी बुधांशे तु नटचौरज्ञशिल्पिनः ॥२३८॥ स्वांशे त्वल्पतनुः सखस्तपस्वी लोभतत्परः । क्रोधी निधीशो मात्यो वा नृपो हिंस्रो सुतो हरेः ॥२३९॥ पर बुध आदि ग्रहों की दृष्टि हो तो शुभग्रहों (बुध, गुरु, शुक्र) की दृष्टि होने पर जातक क्रमशः राजा, सेनापति एवं निपुण होता है और अशुभ (शनि, मंगल, रवि) की दृष्टि होने पर स्त्री के आश्रय से जीविका चलाने वाला होता है। तुलाराशिस्थ चन्द्रमा पर यदि बुध आदि (बुध, गुरु, शुक्र) की दृष्टि हो तो उत्पन्न बालक क्रम से भूपति, सोनार और व्यापारी होता है तथा शेष ग्रह (शनि, रवि और मंगल) की दृष्टि होने पर वह हिंसा के स्वभाव वाला होता है ॥२३१-२३३॥ वृश्चिक राशिस्थ चन्द्रमा पर बुध आदि ग्रहों की दृष्टि होने पर क्रम से जातक दो संतान का पिता, मृदुस्वभाव, वस्त्रादि को रंगाई करने वाला, अंगहीन, निर्धन और भूमिपति होता है। धनुराशिस्थ चन्द्रमा पर बुध आदि शुभग्रहों की दृष्टि हो तो उत्पन्न बालक क्रमशः अपने कुल, पृथ्वी तथा जनसमूह का पालक होता है। शेष ग्रहों (शनि, रवि तथा मंगल) की दृष्टि हो तो जातक दंभी और शठ होता है ॥२३४॥ मकरराशिस्थित चन्द्रमा पर बुध आदि की दृष्टि हो तो वह क्रमशः भूमिपति, पण्डित, धनी, लोक में पूज्य, भूपति तथा परस्त्री में आसक्त होता है। कुम्भराशिस्थ चन्द्रमा पर भी उक्त ग्रहों की दृष्टि होने पर भी इसी प्रकार (मकरराशिस्थ के समान) फल समझना चाहिए। मीनराशिस्थ चन्द्रमा पर शुभग्रहों (बुध, गुरु और शुक्र) की दृष्टि हो तो जातक क्रमशः हास्यप्रिय, राजा और पण्डित होता है। (तथा शेष ग्रहों (पापग्रहों) की दृष्टि होने पर अनिष्ट फल होता है ॥२३५॥ होरा (लग्न) के स्वामी की होरा में स्थित चन्द्रमा पर उसी होरा में स्थित ग्रहों की दृष्टि हो तो वह शुभप्रद होता है। जिस तृतीयांश (द्रेष्काण) में चन्द्रमा हो उसके स्वामी से तथा मित्रराशिस्थ ग्रहों से युक्त या दृष्ट चन्द्रमा शुभफल देता है ॥२३६॥ प्रत्येक राशि में स्थित चन्द्रमा पर ग्रहों की दृष्टि होने से जो-जो फल कहे गये हैं, उन राशियों के द्वादशांश में स्थित चन्द्रमा पर भी उन-उन ग्रहों की दृष्टि होने से वे ही फल प्राप्त होते हैं। अब नवमांश में स्थित चन्द्रमा पर भिन्न-भिन्न ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक क्रमशः मूर्ख, परस्त्री में आसक्त, सुखी, काव्यकर्ता, सुखी तथा परस्त्री में आसक्ति रखने वाला होता है। बुध के नवमांश में स्थित चन्द्रमा पर यदि सूर्यादि ग्रहों की दृष्टि हो तो बालक क्रमशः नर्तक, चोर स्वभाव, पण्डित, मन्त्री, संगीतज्ञ तथा शिल्पकार होता है ॥२३७-२३८॥ अपने (कर्क) नवमांश में स्थित चन्द्रमा पर यदि सूर्यादि ग्रहों की दृष्टि हो तो वह छोटे शरीर वाला, धनवान्, तपस्वी, लोभी, अपनी स्त्री की कमाई पर पलने वाला तथा कर्तव्यपरायण होता है। सूर्य के नवमांश (सिंह) में स्थित चन्द्रमा पर यदि सूर्यादि ग्रहों की दृष्टि हो तो बालक क्रमशः क्रोधी, राजमन्त्री, निधिपति या मन्त्री, राजा, हिंसा के स्वभाव वाला तथा पुत्रहीन होता है। गुरु के नवमांश में स्थित चन्द्रमा पर
पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४२७ जीवांशे हास्यविद्योधा बली मंत्री च धार्मिकः । अल्पापत्यो दुःखितो खो दुष्टस्त्रीसौरिभागगे ॥२४०॥ भानावित्त्यादिदृष्टे नु तद्वदेव फलं वदेत् । वर्गोत्तमे खे परभे फलमुक्तं शुभं क्रमात् ॥२४१॥ पुष्टं मध्यं लघु ज्ञेयं यदि चांशपतिर्बली । राशीक्षणफलं रुद्ध्वा दद्यात्त्यंशफलं स्फुटम् ॥२४२॥ शूरस्तब्धो विकलदृग्निघृणोऽर्के तनुस्थिते । मेषे धनी तैमिरकः सिंहे रात्र्यंध एव च ॥२४३॥ नीचोद्योस्वः कर्कगेऽर्के उद्बुवाक्षस्तनुस्थिते । द्वितीयेऽर्के बहुधनो नृपदण्ड्यो मुखामयी ॥२४४॥ त्रिगे बुधो विक्रमी च विमुखः पीडितो भुवि । धनापत्योक्तितो धीस्थे बली शत्रुजितोरिगे ॥२४५॥ स्त्रीजितो द्यूनसंस्थे च निधनेलपात्मजोऽल्पदृक् । सुतार्थसुखभा भाग्ये दशमे श्रुतशौर्यवान् ॥२४६॥ लाभे बहुधनो मानी पतितो खोऽव्यये रवौ । मूकोऽधो बधिरः प्रेष्यो जेगे खाच्चाजगे धनी ॥२४७॥ सूर्यादि ग्रहों की दृष्टि हो तो बालक क्रमशः हास्यप्रिय, रण में कुशल, बलवान्, मन्त्री, धर्मात्मा तथा धर्मशील होता है । शनि के नवमांश में स्थित चन्द्रमा पर यदि सूर्यादि ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक क्रमशः अल्पसन्तति, दुःखी, अभिमानी, अपने कार्य में तत्पर, दुष्ट स्त्री का पति तथा कृपण होता है। जिस प्रकार मेषादि राशि या उसके नवमांश में स्थित चन्द्रमा पर सूर्यादि ग्रहों के दृष्टिफल कहे गये हैं, इसी प्रकार मेषादि राशि या नवमांश में स्थित सूर्य पर चन्द्रादि ग्रहों की दृष्टि से भी प्राप्त होने वाले फल समझने चाहिए ॥२३९-२४०१/२॥ फलों में न्यूनाधिक्य--चन्द्रमा यदि वर्गोत्तम नवमांश में हो तो पूर्वोक्त शुभ फल पूर्ण, अपने नवमांश में हो तो मध्यम (आधा) और अन्य नवमांश में हो तो अल्प समझना चाहिए। (इसी से यह भी सिद्ध हो जाता है कि जो अशुभ फल कहे गये हैं, वे भी विपरीत दशा में विपरीत होते हैं अर्थात् वर्गोत्तम में चन्द्रमा हो तो अशुभ फल अल्प, अपने नवमांश में होतो आधा और अन्य नवमांश में हो तो पूर्ण होते हैं।) राशि और नवमांश के फलों में भिन्नता होने पर यदि नवमांश का स्वामी बली हो तो वह राशिफल को रोककर ही फल देता है ॥२४२॥ द्वादश भावगत ग्रहों के फल-सूर्य यदि लग्न में हो तो शिशु शूरवीर, दीर्घसूत्री, दुर्बल दृष्टि वाला और निर्दय होता है। यदि मेष में रहकर लग्न में हो तो धनवान और तिमिर रोग वाला होता है और सिंह लग्न में हो तो रात्र्यन्ध (रतौंधी वाला), तुला लग्न में हो तो अंधा और निर्धन होता है। कर्क लग्न में हो तो जातक की आँख में फूली होती है ॥१२३१/२॥ द्वितीय भाव में सूर्य हो तो बालक बहुत धनी, राजदण्ड पाने वाला और मुख का रोगी होता है । तृतीय स्थान में हो तो पण्डित और पराक्रमी होता है। चतुर्थ स्थान में सूर्य हो तो सुखहीन और पीड़ायुक्त होता है। सूर्य पञ्चम भाव में हो तो मनुष्य धनहीन और पुत्रहीन होता है। षष्ठ भाव में हो तो बलवान् और शत्रुओं को जीतने वाला होता है ॥२४५॥ सप्तम भाव में स्थित हो तो मनुष्य अपनी स्त्री से पराजित होता है । अष्टम भाव में हो तो उसके पुत्र थोड़े होते हैं और उसे दिखायी भी कम ही देता है। नवम भाव में हो तो जातक पुत्र- वान्, धनवान् और सुखी होता है । दशम भाव में हो तो विद्वान् और पराक्रमी होता है ॥२४६॥ एकादश भाव में हो तो अधिक धनवान् ओर मानी होता है। यदि द्वादश भाव में सूर्य हो तो उत्पन्न बालक नीच और धनहीन होता है ॥॥२४६१/२॥ चन्द्रमा यदि मेष लग्न में हो तो जातक गूंगा, बहिरा, अंधा और दूसरों का नौकर होता है। वृष लग्न में हो तो वह धनी होता है, द्वितीय भाव में हो तो विद्वान् और धनवान्, तृतीय भाव में हो तो हिंसक स्वभाव
४२८ नारदीयपुराणम् बहुर्वा धनवानर्थे हिंस्रो विक्रमगे भवेत् । साधुभावः सुखगते धीस्थे कन्याप्रजोलसः ॥२४८॥ अल्पाग्निकामस्तीक्ष्णोरौर्ह्र्ष्युस्तन्विमदोजखे । ॥२४६॥ व्याधिपीडान्वितो मृत्यौ भानुधर्मे मित्रधनान्वितः धर्मधीधनयुग्राज्ये ख्यातधीधनयुग्भवेत् । क्षुद्रोऽगहीनो व्ययगे चन्द्रे प्रोक्तं फलं बुधैः ॥२५०॥ लग्ने कुजे क्षततनुर्द्धनगे तु कदन्नभुक् । धर्मपापसमाचारोऽन्यत्र सूर्यसमो मतः ॥२५१॥ विद्वान् धनी च प्रखरः पंडितः सचिवोरियुक् । धर्मज्ञो विस्तृतगुणो गाधो ज्ञेयस्तोऽर्कवत् ॥२५२॥ विद्वान्सुवाच्यः कृपणो सुक्षाक्षो रिपुगुद्धिमान् । नीचस्तपस्वी चषणवनी लोभीदुष्टस्तनोगुरौ ॥२५३॥ स्मरी सुखी विलग्नस्थे कलही सुरतोत्सुकः । सुखितस्तनपश्ये च भृगौ जीववदन्यतः ॥२५४॥ निःस्वो रोगी कामवशो मलिनः शैशवातियुक् । अलसो लग्नगे मंदे धर्मात्स्वोच्चगते नृपः ॥२५५॥ ग्रामाधिपः स विद्वांश्च चावंगोऽन्यत्र सूर्यवत् । पूर्णमुच्चेथ पादोनफलं मूलत्रिकोणे ॥२५६॥ वाला, चतुर्थ स्थान में हो तो सुख, गृहादि से सम्पन्न, पञ्चम भाव में हो तो कन्या-संतान वाला और आलसी होता है । छठे भाव में हो तो बालक मन्दाग्नि का रोगी होता है। उसे अभीष्ट भोग बहुत कम मिलते हैं तथा वह उग्र स्वभाव का होता है । सप्तम भाव में हो तो जातक ईर्ष्यावान् और अत्यन्त कामी होता है । अष्टम भाव में हो तो रोग से पीड़ित, नवम भाव में हो तो मित्र और धन से युक्त, दशम भाव में हो तो धर्मात्मा, बुद्धिमान् और धनवान् होता है। एकादश भाव में हो तो उत्पन्न शिशु विख्यात, बुद्धिमान् और धनवान् होता है तथा द्वादश भाव में हो तो जातक क्षुद्र और अंगहीन होता है ॥२४७-२५०॥ मंगल लग्न में हो तो उत्पन्न शिशु क्षत शरीर वाला होता है। द्वितीय भाव में हो तो वह कदन्नभोजों तथा नवम भाव में हो तो पाप स्वभाव होता है। इनसे भिन्न (३, ४, ५, ६, ७, ८, १०, ११, १२) स्थानों में यदि मंगल हो तो उसके फल सूर्य के समान ही होते हैं ॥२५१॥ बुध लग्न में हो तो जातक पण्डित होता है । द्वितीय भाव में हो तो शिशु धनवान्, तृतीय भाव में हो तो दुष्ट स्वभाव, चतुर्थ भाव में हो तो पण्डित, पञ्चम भाव में हो तो राजमंत्री, षष्ठ भाव में हो तो शत्रुहीन, सप्तम भाव में हो तो धर्मज्ञाता, अष्टम भाव में हो तो विख्यात गुण वाला और शेष (६, १०, ११, १२) भावों में हो तो जैसे सूर्य के फल कहे गये हैं वैसे ही उसके फल भी समझने चाहिए ॥२५२॥ बृहस्पति लग्न में हों तो जातक विद्वान्, द्वितीय भाव में हो तो प्रियभाषी, तृतीय भाव में हो तो कृपण, चतुर्थ में हों तो सुखी, पञ्चम में हों तो विज्ञ, षष्ठ में हों तो शत्रुसहित, सप्तम में हों तो सम्पत्तिशाली, अष्टम में हों तो नीच स्वभाव वाला, नवम में हों तो तपस्वी, दशम में हों तो धनवान्, एकादश में हो तो नित्य लाभ करने वाला और द्वादश में हो तो दुष्ट हृदय वाला होता है ॥२५३॥ शुक्र लग्न में हों तो जातक कामी और सुखी, सप्तम भाव में हो तो कामी तथा पञ्चम भाव में हो तो सुखी होता है और अन्य भावों (२, ३, ४, ६, ८, ६, १०, ११, १२,) में हों तो बृहस्पति के समान ही फल होता है ॥२५४॥ शनि लग्न में हो तो जातक निर्धन, रोगी, कामातुर, मलिन, बाल्यावस्था में रोगी और आलसी होता है। किन्तु यदि अपनी राशि (मकर-कुम्भ) या अपने उच्च (तुला) में हो तो जातक भूपति, ग्रामपति, पण्डित और सुन्दर शरीर वाला होता है । अन्य (द्वितीय आदि) भावों में सूर्य के समान ही शनि के फल होते हैं ॥२५५½॥ फल में न्यूनाधिकत्व-शुभग्रह यदि अपने उच्च में हों तो पूर्ण रूप से उपर्युक्त फल प्राप्त होता है। यदि अपने मूल त्रिकोण में हो तो तीन चरण, अपनी राशि में हों तो आधा, मित्र के गृह में हों तो एक चरण तथा शत्रु की राशि में हों तो उससे भी कम फल प्राप्त होता है और नीच में या अस्त हों तो कुछ भी फल
पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४२६ शुभग्रहे बलं स्वक्षे मित्रभेऽङ्घ्रिमितं फलम् । शत्रुभेऽल्पं तथा नीचास्तंगते फलशून्यता ॥२५७॥ खमराकादिके खेटे कुलतुल्यः कुलाधिकः । बंधुपूज्योऽथ धनवान्सुखी भोगी नृपः क्रमात् ॥२५८॥ परवित्तसुहृद्बंधुपोष्यागणबलाधिपौ । नृपश्च मित्रभस्थेषु खेटे ऽर्कादिषु क्रमात् ॥२५९॥ विषमक्षेष्वर्कहोरायां संस्थिते शुभभेषु च । ख्यातो महोद्यमी चातितेजा धीमान्धनी बली ॥२६०॥ शुभेषु चंद्रहोरायां स्थितेषु समराशिषु । कांतिमाद्ववसौभाग्यभोगधीमान्प्रवेन्नरः ॥२६१॥ सूर्यहोरागतः पापः समभेषु तु मध्यमाः । विषमक्षेषु भास्कर्या सौम्या नोक्तफलप्रदाः ॥२६२॥ स्वमित्रव्यंगशश्चंद्रः सुरूपं गुणिनं नरम् । करोत्यन्यगतस्तत्तत्तुल्यगुणरूपिणम् ॥२६३॥ व्यालायुधे चतुष्पादांऽजेषु च ह्यंशकेषु च । तीक्ष्णेऽतिहिंस्रश्च भवेद्गुरुतल्पगतोऽटनः ॥२६४॥ स्तेनो भोक्ता सधनधीर्नृपः क्लीबश्च शत्रुहा । विष्टिकृद्दासवृत्तिश्च पापोहिंलोऽमतिर्भवेत् ॥२६५॥ नहीं होता है। (इस प्रकार शुभग्रह-के फल कहने से सिद्ध होता है कि पापग्रह का फल इसके विपरीत होता है। अर्थात् पापग्रह नीच में या अस्त हो तो पूर्ण फल, शत्रु राशि में तीन चरण, मित्र राशि में आधा, अपनी राशि में एक चरण अपने मूल त्रिकोण में उससे भी अल्प और अपने उच्च में हो तो अपना कुछ भी फल नहीं देता है ॥२५७॥ स्वराशिस्थ ग्रहफल-यदि अपनी राशि में एक ग्रह हो तो जातक अपने पिता के सदृश धनवान् और यशस्वी होता है। दो ग्रह अपनी राशि में हों तो बालक अपने कुल में श्रेष्ठ, तीन ग्रह हों तो बन्धुओं में माननीय, चार ग्रह हो तो विशेष धनवान्, पाँच ग्रह हों तो सुखी, छह ग्रह हों तो भोगी और यदि सातों ग्रह अपनी राशि में स्थित हों तो जातक राजा होता है ॥२५८। यदि अपने मित्र की राशि में एक ग्रह हो तो जातक दूसरे के धन से पालित, दो ग्रह हों तो मित्रों के द्वारा पोषित और तीन ग्रह मित्रराशि में हों तो अपने बन्धुओं के द्वारा पालित होता है। यदि चार ग्रह मित्र- राशि में हों तो बालक अपने बाहुबल से जीवन-निर्वाह करता है। पाँच ग्रह हों तो बहुत लोगों का पालन करने वाला होता है। छह ग्रह हों तो सेनापति और सातों ग्रह मित्र-राशि में स्थित हों तो जातक राजा होता है ॥२५९॥ पापग्रह यदि विषम राशि और सूर्य की होरा (राशिपूर्वार्ध) में हो तो जातक लोक में विख्यात, महान् उद्योगी, अत्यन्त तेजस्वी, बुद्धिमान्, धनवान् और बलवान् होता है। तथा शुभग्रह यदि समराशि और चन्द्रमा की होरा में हो तो जातक कान्तिमान्, मृदु (कोमल) शरीर वाला, भाग्यवान्, भोगी और बुद्धिमान् होता है ॥२६१॥ यदि पापग्रह समराशि और सूर्य की होरा में हों तो पूर्वोक्त फल मध्यम (आधा) होता है। एवं शुभ यदि विषम राशि और सूर्य की होरा में हों तो पूर्वोक्त फल नहीं प्राप्त होते हैं ॥२६२॥ चन्द्रमा यदि अपने या अपने मित्र के द्रेष्काण में हो तो जातक सुन्दर स्वरूप वाला और गुणवान् होता है। अन्य द्रेष्काण में हो तो उस द्रेष्काण की राशि और द्रेष्काणपति के सदृश ही फल प्राप्त होता है। (सारांश यह है कि उस द्रेष्काणपति का स्वामी यदि चन्द्रमा का मित्र हो तो दो चरण (आधा) फल मिलता है तथा शत्रु हो तो एक चरण फल होता है ।) यदि सर्पद्रेष्काण, शस्त्रद्रेष्काण, चतुष्पदद्रेष्काण और पक्षी द्रेष्काण में चन्द्रमा हो तो जातक क्रमशः उग्रस्वभाव, हिंसा के स्वभाव वाला, गुरुतल्पगः (गुरुपत्नीगामी) और भ्रमणशील होता है ॥२६४॥ लग्ननवमांश राशिफल - लग्न में मेष का नवमांश हो तो जातक चोरस्वभाव, वृष-नवमांश हो तो भोगी, मिथुन-नवमांश हो तो धनी, कर्क नवमांश हो तो बुद्धिमान्, सिंह-नवमांश हो तो शत्रु को जीतने वाला,
४३० नारदीयपुराणम् मेषादिकोत्तमांशेषु द्वादशांशेषु राशिवत् । जायाबलविभूषाढ्यः सत्त्वयुक्तोऽतिसाहसी ॥२६६॥ तेजस्वी च नरः स्वाये त्रिंशांशेऽसृजिसंस्थिते । आमयी वा स्वभार्यायां विषमः पारदारिकः ॥२६७॥ दुःखी परिच्छदयुतो मलिनश्चार्कजे स्वके । सुधीधनकीर्त्यालुस्तेजस्वी लोकपूजितः ॥२६८॥ नोरगुह्यभवान्भोगी जीवे खंत्रिंशभागगे । मेधाकलाकाव्यशिल्पविवादकपटांचितः ॥२६९॥ शास्त्रार्थसाहसयुतो बुधे स्वत्रिंशभागगे । बह्वपत्यसुखारोग्यरोगरूपार्थसंयुतः ॥२७०॥ ललितांगो विप्रकीर्णेन्द्रियः स्याद्भार्गवे स्वके । शूरस्तब्धौ च विषमवधकौ सद्गुणान्वितौ ॥२७१॥ सुखेज्ञो चारु चेष्टांगौ चंद्राकौ चेत्कुजादिगौ । मूलत्रिकोणस्वर्क्षोच्चे कंठस्थास्तु च ये ग्रहाः ॥२७२॥ अन्योन्यकारकास्ते स्युः कर्मगस्तु विशेषतः । शुभं वर्गोत्तमे जन्म वेसिस्थाने वसद्ग्रहैः ॥२७३॥ अशून्येषु च केंद्रेषु कारकाख्यगृहेषु च । गुरुजन्मेलग्नेशाः केंद्रस्था मध्यसौख्यदाः ॥२७४॥ वृश्चिक-नवमांश हो तो बेगारी करने वाला, धनु का नवमांश हो तो दासकर्म करने वाला, मकर-नवमांश में हो तो पापस्वभाव, कुम्भ-नवमांश हो तो हिंसक स्वभाव वाला और मीन-नवमांश लग्न में हो तो बुद्धिहीन होता है ।। किन्तु यदि वर्गोत्तम नवमांश (अर्थात् जो राशि हो उसी का नवमांश भी) हो तो वह जातक इन (चोर- स्वभाव आदि सब) का शासक होता है। (जैसे मेष नवमांश में उत्पन्न मनुष्य चोर-स्वभाव होता है, किन्तु यदि मेष राशि में मेष का नवमांश हो तो वह चोरस्वभाव-वालों का शासक होता है, इत्यादि ।) इसी प्रकार मेषादि राशियों के द्वादशांश में मेषादि राशियों के समान फल प्राप्त होते हैं ।।२६५-२६८।। मंगल आदि ग्रहों के त्रिंशांशफल — मंगल अपने त्रिंशांश में हो तो जातक स्त्री, बल, आभूषण तथा परिजनादि से सम्पन्न, साहसी और तेजस्वी होता है । शनि अपने त्रिंशांश में हो तो रोगी, स्त्री के प्रति कुटिल, परस्त्री में आसक्त, दुःखी, वस्त्रादि आवश्यक सामग्री से सम्पन्न, किन्तु मलिन होता है। गुरु अपने त्रिंशांश में हो तो जातक सुखी, बुद्धिमान्, धनी, कीर्तिमान्, तेजस्वी, लोक में मान्य, रोगहीन, उद्यमी और भोगी होता है। बुध अपने त्रिंशांश में हो तो मनुष्य मेधावी, कलाकुशल, काव्य और शिल्पविद्या का ज्ञाता, विवादी, कपटी, शास्त्रतत्वज्ञ तथा साहसी होता है। शुक्र अपने त्रिंशांश में हो तो जातक अधिक सन्तान, सुख, आरोग्य, सौन्दर्य और धन से युक्त, मनोहर शरीर वाला तथा अजितेन्द्रिय होता है ।।२६९-२७०½।। सूर्य-चन्द्र-फल--मंगल के त्रिंशांश में सूर्य हो तो जातक शूरवीर, चन्द्रमा में हो तो दीर्घसूत्री, बुध के त्रिंशांश में सूर्य हो तो जातक कुटिल और चन्द्रमा हो तो हिंसा के स्वभाव वाला होता है। हिंसा के स्वभाववाला होता है। गुरु के त्रिंशांश में सूर्य और चन्द्रमा हो तो गुणी होता है। शुक्र के त्रिंशांश में सूर्य हो तो बालक सुखी और चन्द्रमा हो तो विद्वान् होता है। शनि के त्रिंशांश में सूर्य हो तो सुन्दर शरीर वाला तथा चन्द्रमा हो तो सर्वजनप्रिय होता है ।।२७३।। कारक ग्रह--अपने-अपने मूल त्रिकोण, स्वराशि या स्वोच्च में स्थित ग्रह यदि केन्द्र में हों तो वे सब परस्पर कारक (शुभफलदायक) होते हैं, उनमें दशम स्थान में रहने वाला सबसे अधिक कारक होता है ।।२७३।। शुभ जन्म लक्षण--लग्न या चन्द्रमा वर्गोत्तम नवमांश में हो या वेशि (सूर्य से द्वितीय) स्थान में शुभग्रह हो अथवा केन्द्रों में कारक ग्रह हों तो स्थिति में जन्म लेनेवाला बालक सुखी और यशस्वी होता है। २७६। गुरु, जन्मराशि और लग्नेश ये सभी या इनमें से एक भी केन्द्र में हो तो जीवन के मध्यभाग में सुखप्रद होते हैं। तथा पृष्ठोदय राशि में रहनेवाला ग्रह जीवन के अन्त में, द्विस्वभाव राशिस्थ ग्रह जीवन के मध्य में और शीर्षोदय राशिस्थ ग्रह जीवन के ग्रह आदि में अपने-अपने फल देते हैं ।।२७४½।।
पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४३१ पृष्ठोभवकोदपक्षंस्थितास्त्वंत्यांतरादिषु । प्रवेशे भास्करकुजौ भृग्वीज्यौ मध्यगौ तथा ॥२७५॥ चंद्राकीफल दावंत्ये सदा ज्ञः फलदायकः । लग्नात्पुत्रे कलत्रे वाब्जाच्छुभेशयुतेक्षिते ॥२७६॥ स्यात्तयोः संपदः स्वत्वमन्यथाऽथांगतोदयः । रवौ मीनेऽर्कजः स्त्रीघ्नः पुत्रस्थस्तु तथा कुजः ॥२७७॥ सिमातुर्याष्टगैः क्रूरैर्यद्वा क्रूरांतरे सितः । सद्ग्रहायुतदृष्टश्चेदग्निपातान्मृतिः स्त्रियाः ॥२७८॥ लग्नाद्यपाणिगतयोः शशिरव्योः सह स्त्रिया । एकेन यस्य जन्माहुरथ सप्तमसंस्थयोः ॥२७९॥ नवधीगतयोर्वापि विकलस्त्रीसितार्कयोः । कोणोदयेऽस्तांत्यसन्धौ भृगौ बंध्यापतेर्जिनः ॥२८०॥ सुतं भन्न सौम्याढ्यमथांत्यास्तोदयक्षंगैः । पापे धीस्थे विधौ क्षीणजन्मा सुतकलत्रिणः ॥२८१॥ शनौ खगेऽस्ते सशुक्रे तद्दृष्टे पारदारिकः । तौ चेत्सेदुस्त्रिया साद्धं पुंश्चलो जायते नरः ॥२८२॥ भृग्वब्जयोरस्तगयोर्नरो भार्या सुतोऽपि वा । नृस्त्रियो स्तु शुभैर्दृष्टौ तौ द्वौ परिणतांगकौ ॥२८३॥ खास्तांबुगैरेंदुशुकपापैर्वशविनाशकः । शिल्पी व्येशे बुधयुते केंद्रसंस्थाकिवीक्षिते ॥२८४॥
ग्रह गोचर फल समय-सूर्य और मंगल ये दोनों राशि में प्रवेश करते ही अपने राशि सम्बन्धो (गोचर) फल देते हैं। शुक्र और बृहस्पति राशि के मध्य में जाने पर और चन्द्रमा तथा शनि ये दोनों राशि के अन्तिम तृतीयांश में पहुँचने पर अपने शुभ या अशुभ गोचर फल देते हैं। तथा बुध सर्वदा (आदि, मध्य, अन्त में) अपने शुभाशुभ फल देता है ॥२७५३॥
शुभाशुभ योग- लग्न या चन्द्रमा से पञ्चम और सप्तम भाव शुभग्रह और अपने स्वामी से युक्त या दृष्ट हों तो जातक को पुत्र और स्त्री का सुख सुलभ होता है अन्यथा नहीं। तथा कन्या लग्न में सूर्य मीन लग्न में शनि हो तो ये दोनों स्त्री का नाश करने वाले होते हैं। इसी प्रकार पञ्चम भाव (मेष वृश्चिक के अतिरिक्त राशि) में मंगल हों तो पुत्र का नाश करने वाला होता है। यदि शुक्र से केन्द्र (१, ४, ७, १०) में पापग्रह हों अथवा दो पापग्रहों के बीच में शुक्र हों, उन पर शुभग्रह का योग या दृष्टि नहीं हो तो उस जातक की स्त्री का मरण अग्नि से या गिरने से होता है। लग्न से १२, ६ भावों में चन्द्रमा और सूर्य हों तो वह स्त्री-सहित एक नेत्र वाले (काण) पुरुष को जन्म देता है, ऐसा मुनियों ने कहा है। लग्न से सप्तम या नवम पञ्चम में शुक्र और सूर्य दोनों हों तो उस जातक की स्त्री विकलांग होती है ॥२७६-२७९३॥
शनि लग्न में और शुक्र सप्तम भाव में राशिसन्धि (कर्क, वृश्चिक, मीन के अन्तिमांश) में हों तो वह जातक वन्ध्या स्त्री का पति होता है। यदि पञ्चम भाव शुभग्रह से युक्त या दृष्ट न हो, लग्न से १२, ७ में ओर लग्न में यदि पापग्रह हों तथा पञ्चम भाव में क्षीणचन्द्रमा स्थित हों तो वह पुरुष पुत्र ओर स्त्री से रहित होता है ॥२८०-२८१॥ शनि के वर्ग (राशि-नवांश) में शुक्र सप्तम भाव में हो और शनि से दृष्ट हो तो वह जातक परस्त्री में आसक्त होता है। यदि वे दोनों (शनि और शुक्र) चन्द्रमा के साथ हों तो वह स्वयं परस्त्री में आसक्त और उसकी पत्नी परपुरुष में आसक्त होती है ॥२८२॥
शुक्र और चन्द्रमा दोनों सप्तम भाव में हों और उन पर शुभग्रहों की दृष्टि हो तो पति-पत्नी दोनों परिणताङ्ग (परमायुर्दाय भोग कर वृद्धावस्था तक जीने वाले) होते हैं ॥२८३॥ दशम, सप्तम और चतुर्थ भाव में क्रमशः चन्द्रमा, शुक्र और पापग्रह हों तो जातक वंश का नाशक होता है। अर्थात् उसका वंश नष्ट हो जाता है। बुध जिस द्रेष्काण में हो उस पर यदि केन्द्र-स्थित शनि की दृष्टि हो तो जातक शिल्पकला में कुशल होता
४३२ नारदीयपुराणम् दास्यां जातः सौरिभागे रिःफगे भृगुनन्दने । नीचोऽर्केन्द्वोरस्तगयोर्दृष्टयोः सूर्यजेन वा ॥२८४॥ पापद्दष्टौ शनिकुजावस्तगौ वातरुकप्रदौ । कर्काल्यंशगते केंद्रे पापयुक्ते तु गुह्यरुक् ॥२८५॥ पापांतरगतेऽब्जे रवौ द्यूने तु कुष्ठयुक्त । चन्द्रे खेऽस्तंगते भौमे विकलो वेशिगेऽर्कजे ॥२८७॥ मिथो भांशगयोः शूली रवौन्द्वोर्युतयोः कृशः । निधनारिधनांत्यस्था रवौंद्यारयमा यदा ॥२८८॥ चलद्दृष्टेण दोषेण कुर्वन्त्यनयनं नरम् । सौम्या दृष्टा न वायदिधीगताः पापखेचराः ॥२८६॥ कर्णोपघातका द्यूने रदवैकृत्यकारकाः । लग्ने गुरौ द्यूने मंदे वातरोगान्वितो भवेत् ॥२६०॥ सुखेऽस्ते वा कुजे जीवे लग्ने वार्कियुतोदये । कुजेन वात्मजे द्यूने संज्ञेऽन्त्येऽब्जे च सोन्मवः ॥२६१॥ धीधर्मार्थान्त्यगैः पापैर्मसप्तस्यानिनबंधनम् । सर्पश्रृंखलया शाठ्यैर्दुष्टकैर्बल्यशुभेक्षितैः ॥२६२॥ समंदेऽब्जे वक्रदृष्टे पस्मरी दुर्वचाः क्षयी । रविमन्दकुजैः खस्थैः सौम्यदृष्टैः समंडलैः ॥२६३॥ मृतकाः पूर्व मुवितैर्वरंमध्याधमा नराः । पुंजनों तु फलं पण्यस्त्रीणां योग्यं वदेच्च तत् ॥२६४॥ है ॥२८४॥ शुक्र यदि शनि के नवमांश में होकर द्वादश भाव में स्थित हो तो जातक दासी का पुत्र होता है। सूर्य और चन्द्रमा दोनों सप्तम भाव में रहकर शनि से दृष्ट हों तो जातक नीच स्वभाव वाला होता है । २८५॥ शनि और मंगल दोनों सप्तम भाव में स्थित हों और उन पर पापग्रह की दृष्टि हो तो जातक वातरोगी होता है । कर्क या वृश्चिक के नवमांश में स्थित चन्द्रमा यदि पापग्रह से युक्त हो तो बालक गुप्त रोग से ग्रस्त होता है । चन्द्रमा यदि पापग्रहों के बीच में रहकर लग्न में स्थित हो तो उत्पन्न शिशु कुष्ठरोगी होता है । चन्द्रमा दशम भाव में, मंगल सप्तम भाव में और शनि वेशि (सूर्य से द्वितीय) स्थान में हो तो जातक विकलांग होता है ॥२८६-२८७॥ सूर्य और चन्द्रमा दोनों परस्पर नवमांश में हों तो बालक शूलरोगी होता है । यदि दोनों किसी एक ही स्थान में हों तो कृश (क्षीणशरीर) होता है । यदि सूर्य, चन्द्रमा, मंगल और शनि-ये चारों क्रमश: ८, ६, २, १२ भावों में स्थित हों तो इनमें जो बली हो, उस ग्रह के दोष (कफ, पित्त और वातसम्बन्धी विकार) से जातक नेत्रहीन होता है ॥२८८॥ यदि ९, ११, ३, ५-इन भावों में पापग्रह हों तथा उन पर शुभग्रह की दृष्टि नहीं हो तो उत्पन्न शिशु के लिए कर्णरोग उत्पन्न करते हैं । सप्तम भाव में स्थित पापग्रह यदि शुभग्रह से दृष्ट न हों तो वे दन्तरोग उत्पन्न करते हैं । लग्न में गुरु और सप्तम भाव में हो तो जातक वातरोग से पीड़ित होता है । ४ या ७ भाव में मंगल और लग्न में बृहस्पति हो अथवा शनि लग्न में और मंगल ९, ५, ७ भाव में हो अथवा बुध सहित चन्द्रमा द्वादश भाव में हो तो जातक उन्माद रोग से पीडित होता है ॥२८९-२९१॥ यदि ५, ९, २ और १२ भावों में पापग्रह हों तो उस जातक को बन्धन प्राप्त होता है (उसे जेल का कष्ट भोगना पड़ता है ।) लग्न में जैसी राशि हो उसके अनुकूल ही बन्धन समझना चाहिए । जैसे चतुष्पद राशि लग्न हो तो बिना बन्धन के हो वह जेल में रहता है ।) यदि सर्प, शृंखला, पाशसंज्ञक द्रेष्काण लग्न में हों तथा उन पर बली पापग्रह की दृष्टि हो तो भी पूर्वोक्त प्रकार से बन्धन प्राप्त होता है । मण्डल युक्त चन्द्रमा यदि शनि से युक्त और मंगल से दृष्ट हो तो जातक को मृगी रोग और क्षयरोग तथा वह कटुवादी होता है । मण्डल युक्त चन्द्रमा यदि दशम भावस्थित सूर्य, शनि और मंगल से दृष्ट हो तो जातक भृत्य होता है; उनमें भी एक से दृष्ट हो तो श्रेष्ठ, दो से दृष्ट हो तो मध्यम और तोनों से दृष्ट हो तो अधम भृत्य होता है ॥२९२-२९३॥ **स्त्री जातक की विशेषता--**ऊपर कहे हुए पुरुष जातक के जो-जो फल स्त्री-जातक में संभव हों वे वैसे योग में उत्पन्न स्त्रीमात्र के लिए समझने चाहिए । जो फल स्त्री में असंभव हों, वे सब उसके पति में समझने
पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४३३ तत्स्वामिश्वखिलं कार्यं तद्भर्तुर्मरणं मृतौ । लग्नेन्दुगं वपुश्चैव यादयूपपतिद्युने ॥२६५॥ युग्मेषु लग्नशशिनोर्वनिता प्रकृतिस्थिता । सच्छीलभूषणयुता शुभसंदृष्टयोस्तयोः ॥२६६॥ पुरुषाकृतिशीलाढ्या तयोरोजस्थयोर्मता । अथ पापा गुणोनाश्च पापवीक्षितयोस्तयोः ॥२६७॥ कुजार्कीज्यज्ञशुक्राणां कुजर्क्षे क्रमशोऽङ्गना । बाल्यदुष्टा तथा दासी साध्वी मायावती त्वरा ॥२६८॥ दुष्टावाक् पुनर्भूः सगुणा विज्ञा ख्याता स्फुजिदगृहे । बौधे समाया क्लीबा च सती गुणवती चला ॥२६९॥ द्वंद्वभे स्वैरिणीघ्नी गुणाढ्या शिल्पिकाधमा । वाचाटा कुलटा सिंहे राज्ञी पुंधीरगम्यता ॥३००॥ जैवे गुणाढ्याऽल्परतिर्गुणज्ञा ज्ञानिनी सती । दासी नीचरता साध्वी मांदे दुष्टा नपत्यका ॥३०१॥
चाहिए। जो फल स्त्री में असंभव हों, वे सब उसके पति में समझने चाहिए। स्त्री के स्वामी की मृत्यु का विचार अष्टम भाव से, शरीर के शुभाशुभ फल का विचार लग्न और चन्द्रमा से तथा सौभाग्य और पति के स्वरूप, गुण आदि का विचार सप्तम भाव से करना चाहिए ॥२६५॥ स्त्री के जन्म समय में लग्न और चन्द्रमा दोनों समराशि और सम नवमांश में हों तो वह स्त्री अपनी प्रकृति (स्त्रीस्वभाव) से युक्त होती है। यदि उन दोनों (लग्न और चन्द्रमा) पर शुभग्रह की दृष्टि हो तो वह सुशीलता रूप आभूषण से विभूषित होती है। यदि वे दोनों (लग्न तथा चन्द्रमा) विषमराशि और विषम नवमांश में हों तो वह स्त्री पुरुष सदृश आकार और स्वभाव वाली होती है। यदि उन दोनों पर पापग्रह की दृष्टि हो तो स्त्री पापस्वभाव वाली और गुणहीना होती है ॥२६७॥ लग्न और चन्द्रमा के आश्रित मंगल की राशि (मेष-वृश्चिक) में यदि मंगल का त्रिंशांश हो तो वह स्त्री बाल्यावस्था में दुष्ट स्वभाव वाली होती है। शनि का त्रिंशांश हो तो दासी होती है। गुरु का त्रिंशांश हो तो सच्चरित्रा, बुध का त्रिंशांश हो तो मायावती और शुक्र का त्रिंशांश हो तो वह उतावली होती है ॥२६८॥ शुक्र राशि (वृषतुला) में स्थित लग्न या चन्द्रमा में मंगल का त्रिंशांश हो तो नारी बुरे स्वभाववाली, शनि का त्रिंशांश हो तो पुनर्भू (दूसरा पति करने वाली), गुरु का त्रिंशांश हो तो गुणवती, बुध का त्रिंशांश हो तो कलाओं को जानने वाली और शुक्र का त्रिंशांश हो तो लोक में विख्यात होती है। बुध राशि (मिथुन-कन्या) में स्थित लग्न या चन्द्रमा में यदि मंगल का त्रिंशांश हो तो मायावती, शनि का हो तो हिजड़ी, गुरु का हो तो पतिव्रता, बुध का हो तो गुणवती और शुक्र का हो तो चंचला होती है ॥२६९॥ चन्द्र-राशि (कर्क) में स्थित लग्न या चन्द्रमा में यदि मंगल का त्रिंशांश हो तो नारी स्वेच्छाचारिणी, शनि का हो तो पति के लिए घातक, गुरु का हो तो गुणवती, बुध का हो तो शिल्पकला जानने वाली और शुक्र का त्रिंशांश हो तो अधम स्वभाववाली होती है। सिंह राशिस्थ लग्न या चन्द्रमा में यदि मंगल का त्रिंशांश हो तो पुरुष के समान आचरण करने वाली, शनि का हो तो कुलटा स्वभाव वाली, गुरु का हो तो रानी, बुध का हो तो पुरुषसदृश बुद्धिवाली और शुक्र का त्रिंशांश हो तो अगम्यगामिनी होती है ॥३००॥ गुरुराशि (धनु-मीन) स्थित लग्न या चन्द्रमा में मंगल का त्रिंशांश हो तो नारी गुणवती, शनि का हो तो भोगों में अल्प आसक्ति वाली, गुरु का हो तो गुणवती, बुध का हो तो ज्ञानवती और शुक्र का त्रिंशांश हो तो पतिव्रता होती है। शनिराशि (मकर-कुम्भ) स्थित लग्न या चन्द्रमा में मंगल का त्रिंशांश हो तो स्त्री दासी, शनि का हो तो नीच पुरुष में आसक्त, गुरु का हो तो पतिव्रता, बुध का हो तो दुष्ट स्वभाव वाली और शुक्र का हो तो संतानहीन होती है। इस प्रकार लग्न और चन्द्राश्रित राशियों के फल ग्रहों के बल के अनुसार न्यून या अधिक समझने चाहिए ॥३०११/२॥ ५५ ना० पु०
४३४ नारदीयपुराणम् लग्नेन्दुयुक्तैस्त्रिंशांशैः फलमेतद्बलानुगम् । दृग्भैः मिथोंशे शुक्राकौ शुक्रे चेद्वा घटांशके ॥३०२॥ स्त्रीभिः स्त्री मैथुनं याति मदनानल्दीपिता । शून्ये कापुरुषो द्यूने बले क्लीबो न सद्दृशि ॥३०३॥ बुधाकर्योश्चरभे नित्यं परवेशपरायणः । तत्सृष्टा मदगे सूर्ये स्त्रीबालविधवा कुजे ॥३०४॥ पापदृष्टे शनौ द्यूने कन्यैवापद्यते जराम् । आग्नेयैर्विधवास्तस्थैः पुनर्भूमिश्रकैर्भवेत् ॥३०५॥ क्रूरे हीनबलेऽस्तस्थे परित्यक्ता न सद्दृशि । मिथोशगैः सितारौ तु कुरुतोऽन्यरतां स्त्रियम् ॥३०६॥ शीतरश्मिर्यदा द्यूने तदा भर्तुरनुज्ञया । सौरारक्षे लग्नगते सेंदुशुके तु बंधकी ॥३०७॥ मात्रा सार्द्धमसद्दृष्टे तथा कौजेंशकेऽस्तगे । मंददृष्टे व्याधियोनिः सद्ग्रहंशे पतिप्रिया ॥३०८॥ मंदर्क्षे वांशके द्यूने वृद्धो मूर्खः पतिः स्त्रियाः । स्त्रीलोलः क्रोधनः कौजे बौधे विद्वांश्च नैपुणः ॥३०८½॥ जितेंद्रियो गुणी जैवे चांद्रे कामी मृदुस्तथा । शौके सौभाग्ययुक्तकांतः सौरेति मृदुकर्मकृत् ॥३१०॥
शुक्र के नवमांश में शनि और शनि के नवमांश में शुक्र हो अथवा शुक्रराशि (वृष-तुला) लग्न में कुम्भ का नवमांश हो तो इन दोनों योगों में जन्म लेने वाली स्त्री कामाग्नि से संतप्त हो स्त्रियों से भी रति क्रीड़ा करती है ॥३०२½॥ पति-भाव—स्त्री के जन्मलग्न से सप्तम भाव में कोई ग्रह न हो और उस पर शुभग्रह की दृष्टि न हों तो उसका पति कुत्सित होता है। सप्तम स्थान में बुध और शनि हो और शुभग्रह से दृष्ट न हो तो भी पति नपुंसक होता है। यदि सप्तम भाव में चरराशि हो तो उसका पति परदेशवासी होता है। सप्तम भाव में सूर्य हो तो उस स्त्री को पति त्याग देता है। मंगल हो तो वह स्त्री बालविधवा होती है। शनि सप्तम भाव में पापग्रह से दृष्ट हों तो वह स्त्री कन्या (अविवाहिता) रहकर ही वृद्धावस्था को प्राप्त होती है ॥३०३-३०४½॥ यदि सप्तम भाव में एक से अधिक पापग्रह हों तो भी स्त्री विधवा होती है, शुभ और पाप दोनों हों तो वह पुनर्भु होती है। यदि सप्तम भाव में पापग्रह निर्बल हो और उस पर शुभग्रह की दृष्टि न हों तो भी स्त्री अपने पति द्वारा त्याग दी जाती है, अन्यथा शुभग्रह की दृष्टि होने पर वह पतिप्रिया होती है ॥३०५½॥ मंगल के नवमांश में शुक्र के नवमांश में मंगल हो तो वह स्त्री परपुरुष में आसक्त होती है। इस योग में चन्द्रमा यदि सप्तम भाव में हो तो वह अपने पति की आज्ञा से कार्य करता है ॥३०६½॥ यदि चन्द्रमा और शुक्र से संयुक्त शनि एवं मंगल की राशि (मकर, कुम्भ, मेष और वृश्चिक) लग्न में हों तो वह स्त्री कुलटा-स्वभाव वाली होती है। यदि उक्त लग्न पर पाप ग्रह की दृष्टि हो तो वह स्त्री अपनी माता सहित कुलटा होती है। यदि सप्तम भाव में मंगल का नवमांश हो और उस पर शनि की दृष्टि हो तो वह नारी योनि रोग वाली होती है। यदि सप्तम भाव में शुभग्रह का नवमांश हो तब तो वह पति की प्रिया होती है ॥३०८॥ शनि की राशि या नवमांश सप्तम भाव में हो तो उस स्त्री का पति वृद्ध और मूर्ख होता है। सप्तम भाव में मंगल की राशि या नवमांश हो तो उसका पति स्त्रीलोलुप और क्रोधी होता है। बुध की राशि या नवमांश हो तो विद्वान् और निपुण होता है। गुरु का नवांश राशि या हो तो जितेन्द्रिय और गुणी होता है। चन्द्रमा की राशि या नवमांश हो तो कामी तथा मनोहर स्वरूप वाला होता है। शुक्र की राशि या नवमांश सप्तम में हो तो उसका पति भाग्यवान् और मनोहर रूप वाला होता है। सूर्य की राशि या नवमांश सप्तम भाव में हो तो उस स्त्री का पति अत्यन्त कोमल और कर्मठ होता है ॥३०९-३१०॥
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पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४३५ शुक्राब्जयोर्लग्नगयोः सुखिनीर्ष्यासन्विता । ज्ञेन्द्वोः कलासु निपुणा सुखिता च गुणान्विता ॥३११॥ शुक्रेज्ञयोस्तु सुभगा कलाज्ञा रुचिरांगना । अनेकसौख्यार्थगुणा लग्ने सौम्यत्रये स्थिते ॥३१२॥ क्रूरेऽष्टमेऽष्टमेशांशे यस्य स्यात्तद्वयः समे । वैधव्यं च मृतिस्तस्या स्वयं सत्स्वर्थगेषु तु ॥३१३॥ अल्पापत्यत्वमब्जेऽस्याः कन्यालिहरिगोष्ठ तु । सौरे मध्यबले चन्द्रशुक्रेज्ञर्बलवर्जितैः ॥३१४॥ शेषैः सबीर्यैरोजर्क्षे लग्ने कुरूपिणी भवेत् । जीवार्कविसौम्येषु बलिषु समभे तनौ ॥३१५॥ विख्यातानेकशास्त्रज्ञा वनिता ब्रह्मवादिनी । पापेऽस्ते नवमस्थस्य प्रव्रज्यानेति भामिनी ॥३१६॥ उद्वाहे वरणे प्रश्ने सर्वमेतद्धि चिंतयेत् । मृत्युस्थानं पश्यतां स्याद्बलिना धातुकोषतः ॥२१७॥ नृणां मृत्युहितं युक्तं भगात्रोत्थोपथसूरिभिः । सबीर्येर्बहुजोऽप्यापक्षत्ज्वररुगुद्भवः ॥३१८॥ तदृग्द्भवश्चाष्टमस्थैः सूर्याद्यैश्चं चरादिषु । परस्वाध्वप्रदेशेषु मृत्युः सूर्यमहीजयोः ॥३१९॥ स्वबंधुस्थितयोः पुंसः शैलाग्राभिरतस्य च । बंध्वस्तकर्मगैर्मन्दचन्द्रभूजैः प्रहौ मृतिः ॥३२०॥ स्त्रियां हिमोष्णकरयोः स्वजनात्पापदृक्तयोः । तोयमृतो रवौन्दू तु स्यातां यद्युभयोदये ॥३२१॥ शुक्र और चन्द्रमा लग्न में हों तो वह स्त्री सुखिनी तथा ईर्ष्यालु होतो है । यदि बुध और चन्द्रमा लग्न में हों तो कलाओं को जानने वालो तथा सुख और गुणों से युक्त होतो है शुक्र और बुध लग्न में हों तो सौभाग्यवती, कलाओं को जानने वाली और परमसुन्दरी होती है। लग्न में तीन शुभग्रह हों तो वह अनेक प्रकार के सुख, धन और गुणों से युक्त होती है ॥३११-३१२॥ पापग्रह अष्टम भाव में हो तो वह स्त्री अष्टमेश जिस ग्रह के नवमांश में हो उस ग्रह के पूर्वकथित बाल्य आदि वयस् में विधवा होती है। यदि द्वितीय भाव में शुभग्रह हों तो वह स्त्री स्वयं ही स्वामी के सम्मुख मृत्यु को प्राप्त होती है। कन्या, वृश्चिक, सिंह या वृष राशि में चन्द्रमा हों तो स्त्री थोड़ी संततिवाली होती है, यदि शनि मध्यम बली तथा चन्द्रमा, शुक्र और बुध ये तीनों निर्बल हों तथा शेष ग्रह (सूर्य मंगल और गुरु) बली होकर विषम राशि-लग्न में हों तो वह स्त्री कुरूपा होती है ॥३१३-३१४½॥ गुरु, मंगल, शुक्र, बुध ये चारों बली होकर समराशि लग्न में स्थित हों तथा वह स्त्री अनेक शास्त्रों को जानने वाली ब्रह्मवादिनी तथा लोक में विख्यात होती है ॥३१५½॥ जिस स्त्री के जन्म लग्न से सप्तम में पाप ग्रह हो और नवम भाव में कोई ग्रह हो स्त्री तो पूर्वकथित नवमस्थ ग्रहजनित प्रव्रज्या को प्राप्त होती है। इन (कहे हुए) विषयों का विवाह वरण या प्रश्नकाल में भी विचार करना चाहिए ॥३१६½॥ निर्वाण (मृत्यु) विचार— लग्न से अष्टम भाव को जो ग्रह देखते हैं, उनमें जो बलवान् हो उसके धातु (कफ, पित्त या वात) के प्रकोप से जातक (स्त्री-पुरुष) का मरण होता है। अष्टम भाव में जो राशि हो, वह कालपुरुष के जिस अंग (मस्तकादि) में पड़ती हो, उस अंग में रोग होने से जातक का मरण होता है। बहुत ग्रहों की दृष्टि या योग हो तो उन-उन ग्रहों से सम्बन्ध रखने वाले रोगों से मरण होता है। अष्टम में सूर्य हो तो अग्नि से, चन्द्रमा हो तो जल से, मंगल हो तो शस्त्रघात से, बुध हो तो ज्वर से, गुरु हो तो अज्ञात रोग से, शुक्र हो तो प्यास से और शनि हो तो भूख से मरण होता है। तथा अष्टम भाव में चर राशि हो तो परदेश में, स्थिर राशि हो तो स्वस्थान में और द्विस्वभाव राशि हो तो मार्ग में मृत्यु होती है। सूर्य और मंगल यदि १०, ४ भाव में हों तो पर्वत आदि उच्च स्थान से गिरने से मनुष्य की मृत्यु होतो है ॥३१७-३१९½॥ ४, ७, १० भावों में यदि शनि, चन्द्र, मंगल हों तो कुएं में गिरकर मृत्यु होती है। कन्याराशि में सूर्य और चन्द्रमा दोनों हों, उन पर पापग्रह की दृष्टि हो तो अपने सम्बन्धी के द्वारा मरण होता है। यदि उभयोदय (मीन) लग्न में चन्द्रमा और सूर्य दोनों हों तो जल में मरण होता है। यदि मंगल की राशि में स्थित चन्द्रमा दो पापग्रहों के बीच में हो तो शस्त्र या अग्नि से मृत्यु होती है ॥३२०-३२१½॥
४३६ नारदीयपुराणम् शस्त्राग्निरोगोऽशुभांतस्थे चंद्रे भौमगृहस्थिते । मृत्युश्चाथ मृगे चंद्रे कर्के मंदे जलोदरात् ॥३२२॥ स्त्रियामिदौ रक्तशोथात्सौरैरज्ज्वग्निपातजः । पुत्रधर्मस्थस्योर्बधात्पापयोः सददृष्टयोः ॥३२३॥ सपाशसर्पनिगडेॄङ्केमृत्यौ तु बंधनः । स्त्रियां सपापेऽब्जे द्यूने सिते मेषे रवौ तनौ ॥३२४॥ मरणं स्वीकृते गेहे ह्यथ तुर्य कुजे रवौ । यमे खैऽगत्रिकोणस्थैः क्षीणचंद्राशुभैः सकृत् ॥३२५॥ तुर्येऽर्के खे कुजे क्षीणचन्द्रदृष्टे समिद्धतः । रंध्रखांग जलैः क्षीणेंद्वारार्किविसंयुतैः ॥३२६॥ लकुटेनाथ तैरैव खांकांगतययस्थितैः । धूमानिबंधनैः कार्यः कुदनैर्मरणं भवेत् ॥३२७॥ बंध्वस्तखस्थैभौमार्कमंदैः शस्त्राग्निराजभिः । सौरेंद्वारैः स्वांबुखस्थैः क्षतकेभ्यंगया ततः ॥३२८॥ खेऽर्के तुर्ये कुजे यानपातादथ कुजेऽस्तगे । यंत्रोसीदुनतः क्षीणचंद्रयुक्ते मृतिमर्वेत् ॥३२९॥ भौमार्कशीतकिरणैर्जूकाशशनिभस्थितैः । क्षीणेंद्वर्ककुजैः खास्तांबुस्थैर्वारकरे मृतिः ॥३३०॥ बल्यारदृष्टे क्षीणेदौ मंदे निधनसंस्थिते । गुह्यरुक्क्रिमिशस्त्राग्निदाहजो मृत्युरंगिनः ॥३३१॥ सौरेऽर्केऽस्ते मृतो मंदे क्षीणेदौ भुव्यसंयुते । लग्नध्यायास्तपःस्थार्कभौमचन्द्रनिशाकरैः ॥३३२॥ शैलशृंगस्वरग्रपातोर्नुनिधनं भवेत् । दृक्कोत्तरे तुर्द्वाविंशस्तत्पतिर्मृत्युपोपि वा ॥३३३॥ मकर में चन्द्रमा और कर्क में शनि हो तो जलोदर रोग से मरण होता है। कन्याराशि में स्थित चन्द्रमा दो पापग्रहों के बीच में हो तो रक्तशोथ रोग से मृत्यु होती है, यदि दो पापग्रहों के बीच में स्थित चन्द्रमा, शनि की राशि (मकर और कुम्भ) में हों तो रज्जु (रस्सी), अग्नि अथवा ऊंचे स्थान से गिरकर मृत्यु होती है। ५, ९ भावों में पापग्रह हों और उन पर शुभग्रह की दृष्टि न हो तो बन्धन से मृत्यु होती है ॥३२३॥ अष्टम भाव में पाश, सर्प या निगड द्रेष्काण हो तो भी बंधन से ही मृत्यु होती है। पापग्रह के साथ बैठा हुआ चन्द्रमा यदि कन्याराशि में होकर सप्तम भाव में स्थित हो तथा मेष में शुक्र और लग्न में सूर्य हों तो अपने घर में स्त्री के निमित्त से मरण होता है। चतुर्थ भाव में मंगल या सूर्य हों, दशम भाव में शनि हो और लग्न, ५, ९ भावों में पापग्रहसहित चन्द्रमा हो अथवा चतुर्थ भाव में सूर्य और दशम में मंगल रहकर क्षीण चन्द्रमा से दृष्ट हों तो इन योगों में काष्ठ से आहत होकर मृत्यु होती है ॥३२४-३२५॥ यदि ८, १०, लग्न, तथा ४ भावों में क्षीण चन्द्रमा, मंगल, शनि और सूर्य हों तो लाठी के प्रहार से मृत्यु होती है। यदि वे ही (क्षीण चन्द्रमा, मंगल, शनि तथा सूर्य) १०, ९, लग्न और ५ भावों में हों तो मुद्गर आदि के आघात से मृत्यु होती है ॥३२६-३२७॥ यदि ४, ७, १० भावों में क्रमशः मंगल, रवि और शनि हों तो शस्त्र, अग्नि तथा राजा के द्वारा मृत्यु होती है यदि शनि, चन्द्रमा और मंगल-ये २, ४, १० भावों में हों तो कीड़ों के क्षत से मरण होता है ॥३२८॥ यदि दशम भाव में सूर्य और चतुर्थ भाव में मंगल हों तो सवारी पर से गिरने के कारण मृत्यु होती है। यदि क्षीण चन्द्रमा के साथ मंगल सप्तम भाव में हो तो यन्त्र (मशीन) के आघात से मृत्यु होती है ॥३२९॥ यदि मंगल, शनि और चन्द्रमा - ये तुला, मेष तथा शनि की राशि (मकर, कुम्भ) में हों अथवा क्षीण चन्द्रमा, सूर्य और मंगल - थे १०, ७, ४ भावों में स्थित हो तो विष्ठा के समीप मृत्यु होती है ॥३३०॥ क्षीण चन्द्रमा बली, मंगल से दृष्ट हो और शनि सप्तम भाव में हो तो गुह्य (बवासीर आदि) रोग या कीड़ा, शस्त्र, अग्नि अथवा काष्ठ के आघात से मृत्यु होती है। मंगल सहित सूर्य सप्तम भाव में, शनि अष्टम में और क्षीण चन्द्रमा चतुर्थ भाव में हो तो पक्षी द्वारा मृत्यु होती है, यदि लग्न, ५, ८, ९ भावों सूर्य, मंगल, शनि और चन्द्रमा हों तो पर्वत-शिखर से गिरने के कारण अथवा वज्रपात से या दीवार गिरने से मृत्यु होती है ॥३३१-३३२॥ लग्न से १२ वां द्रेष्काण अर्थात् अष्टम भाव का द्रेष्काण जो हो उसका स्वामी अथवा अष्टम भाव का स्वामी- ये दोनों या इनमें से जो बली हो वह अपने गुणों से (पूर्वोक्त अग्निशस्त्रादि द्वारा) मनुष्य के लिए मरण-
पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४३७ स्वगुणैर्निधनं कुर्याद्वलवान्यो द्वयोर्भवेत् । लग्नांशेशसदृक्स्थाने मृत्युर्योगेक्षणादिभिः ॥३३४॥ मोहोऽतेनुदितांशस्य तुल्यो द्विघ्नः स्वपेक्षते । शुभेक्षिते तु त्रिगुणः कल्प्यमन्यत्स्वबुद्धितः ॥३३५॥ वह्न्यम्बुभस्मसकलेदशोषव्यालैर्मृतिस्थितैः । बिद्रुतश्चिन्तनीयश्च यथोक्तो मृत्युरंगिनः ॥३३६॥ गुरुः शशांकशुक्रौ च सूर्यभौमौ यमेंदुजौ । देवपित्रतिरक्तोथ नारकान्कुर्युरष्टमे ॥३३७॥ रवींदुबलवंशनाथाच्छ्रेष्ठसममाधमाः । तुंगः सांदन्केनुगतिः षड्भ्रदृक्कपः ॥३३८॥ द्यूनस्थितो गुरुर्वापि रिपुकेंद्रविनाशगः । स्वोच्चस्थोऽंगे व्यये सौम्यभागे मोक्षो बलान्यतः ॥३३९॥ आधाने जन्मज्ञाने तु वृक्षतां लग्नतो वदेत् । पूर्वापराद्धैर्लग्नस्य सौम्ये वाच्यपनेजनिः ॥३४०॥ कारक होता है । लग्न में जो नवमांश होता है, उसका स्वामी जो ग्रह हो, उसके समानस्थान (अर्थात् वह जिस राशि में हो उस राशि का जैसा स्थान बताया गया है, वैसे स्थान) तथा उस पर जिस ग्रह का योग या दृष्टि हो उसके समान स्थान में, परदेश में मनुष्य का मरण होता है तथा लग्न के जितने अंश अनुदिन (भोग्य) हों, उन अंशों में जितने समय हों उतने समय तक मरणकाल में मोह होता है। यदि उस पर अपने स्वामी की दृष्टि हो तो उससे द्विगुणित समय पर्यन्त मोह होता है। शुभग्रह की दृष्टि हो त्रिगुण मोह होता है। इस विषय की अन्य बातें अपनी बुद्धि से विचार कर समझनी चाहिए ॥३३३-३३५॥ शव-परिणाम-अष्टम स्थान में जिस प्रकार का द्रेष्काण हो उसके अनुसार देहधारी की मृत्यु और उसके शव के परिणाम पर विचार करना चाहिए । यथा अग्नि (पापग्रह) का द्रेष्काण हो तो मृत्यु के बाद उसका शव जलाकर भस्म किया जाता है । जल (सौम्य) द्रेष्काण हो तो जल में फेंका जाने पर वहीं गल जाता है। यदि सौम्य द्रेष्काण पापग्रह से युक्त या पाप द्रेष्काण शुभग्रह से युक्त हो तो शव न जलाया जाता है, न जल में गलाया जाता है; अपितु सूर्यकिरण और वायु से सूख जाता है। यदि सर्प द्रेष्काण अष्टम भाव में हो तो उस शव को गीदड़ और कौए आदि नोंचकर खाते हैं ॥३३६॥ पूर्वजन्मस्थिति-सूर्य और चन्द्रमा में जो अधिक बलवान् हो, वह जिस द्रेष्काण में स्थित हो उस द्रेष्काण के स्वामी के अनुसार पूर्वजन्म की स्थिति समझी जाती है। यथा- उक्त द्रेष्काण का स्वामी गुरु हो तो जातक पूर्वजन्म में देवलोक में था। चन्द्रमा या शुक्र द्रेष्काण का स्वामी हो तो वह पितृ लोक में था। सूर्य या मंगल द्रेष्काण का स्वामी हो तो वह जातक पहले जन्म में भी मृत्युलोक में ही था और शनि या बुध हो तो वह पहले नरक लोक में रहा है-ऐसा समझना चाहिए। यदि उक्त द्रेष्काण का स्वामी अपने उच्च में हो तो जातक पूर्वजन्म में देवादि लोक में श्रेष्ठ था । यदि उच्च और नीच के मध्य में हो तो उस लोक में उसकी मध्यम स्थिति थी और यदि अपने नीच में हो तो वह उस लोक में निम्न कोटि की अवस्था में था- ऐसा उच्च और नीच स्थान के तारतम्य से समझना चाहिए ॥३३७॥ गति-भावी जन्म की स्थिति-षष्ठ और अष्टम भाव के द्रेष्काणों के स्वामी में से जो अधिक बली हो, मरने के बाद जातक उसी ग्रह के (पूर्वदर्शित) लोक में जाता है तथा सप्तम स्थान में स्थित ग्रह बली हो तो वह अपने लोक में ले जाता है ॥३३८॥ मोक्ष-योग-यदि वृहस्पति अपने उच्च में होकर ६, १, ४, ७, ८, १० अथवा १२ में शुभग्रह के नवमांश में हो और अन्य ग्रह निर्बल हों तो मरण होने पर मनुष्य का मोक्ष होता है। यह योग जन्म और मरण दोनों कालों से देखना चाहिए ॥३३९॥ अज्ञात जन्म-समय को जानने का प्रकार-जिस व्यक्ति के आधान या जन्म का समय अज्ञात हो, उसके प्रश्नलग्न से जन्म-समय समझना चाहिए। प्रश्नलग्न के पूर्वार्ध (१५ अंश तक) में उत्तरायण और उत्तरार्ध (१५ अंश के बाद) में दक्षिणायन जन्म का समय समझना चाहिए। त्र्यंश (द्रेष्काण) द्वारा क्रमशः लग्न,
४३८ नारदीयपुराणम् लग्नत्रिकोणे धीज्यत्यंशेविकल्पावयवाः समाः । ग्रीष्मोगेऽर्के परे रम्यापनतांप्रतुरर्कभात् ॥३४१॥ चन्द्रज्ञजीवावृव्यस्याः शुक्रारार्किभिरन्यथा । दृक्केराद्यैः पूर्वमासस्तिथिस्तत्वानुपातः ॥३४२॥ विलोमजन्म भागैश्च वेला रात्रियुसंज्ञके । त्रिकोणोत्तमवार्यवि लग्नं वा लग्भनामने ॥३४३॥ यावदूनो विधुर्लग्नात्तावच्चंद्राच्च जन्मभे । गोहरी युग्मवसुभे क्रियजूके मृगांगने ॥३४४॥ दशाष्टसप्तविषये गुण्याः शेषाः स्वसंख्यया । जीवसोमकर्विज्ञाः स्युः राघवाद्यायरेञ्जवत् ॥३४५॥ भानां नित्यो विधिः खेटवशाद्वर्गणास्तथा । सप्तघ्नं भहृतं शेषमृक्षं नवधनर्णतः ॥३४६॥
५, ९ राशि में गुरु समझकर फिर प्रश्नकर्ता के वयस् के अनुसार वर्षमान की कल्पना करनी चाहिए। लग्न में सूर्य हो तो ग्रीष्म ऋतु, अन्यथा अन्य ग्रहों के ऋतु का वर्णन पहले किया जा चुका है। अयन और ऋतु में भिन्नता हो तो चन्द्रमा, बुध और गुरु की ऋतुओं के स्थान में क्रम से शुक्र, मंगल, शनि की ऋतु परिवर्तित करके समझना चाहिए तथा ऋतु सर्वथा सूर्य की राशि से ही (सौर मास से ही) ग्रहण करनी चाहिए। इस प्रकार अयन और ऋतु के ज्ञान होने पर लग्न के द्रेष्काण में पूर्वार्ध हो तो ऋतु का प्रथम मास, उत्तरार्ध हो तो द्वितीय मास समझना चाहिए तथा द्रेष्काण के पूर्वार्ध या उत्तरार्ध के भुक्तांशों से अनुपात द्वारा तिथि (सूर्य के गत अंशादि) का ज्ञान करना चाहिए ॥३४०-३४२॥ दिन-रात्रि-जन्म-ज्ञान--प्रश्नलग्न में दिनसंज्ञक, रात्रिसंज्ञक राशियां हों तो विलोम क्रम से (दिनसंज्ञक राशि में रात्रि और रात्रिसंज्ञक राशि में दिन) जन्म का समय समझना चाहिए और लग्न के अंशादि से अनुपात द्वारा इष्ट घट्यादि को समझना चाहिए ! जन्मलग्नज्ञान--केवल जन्मलग्न जानने के लिए प्रश्नकर्ता प्रश्न करे तो लग्न से १, ५, ९ में जो राशि बली हो, वही उसका जन्मलग्न समझना चाहिए अथवा वह जिस अंग का स्पर्श करते हुए प्रश्न करे, उस अंग की राशि को ही जन्मलग्न कहना चाहिए ॥३४३॥ जन्मराशिज्ञान--जन्म-राशि जानने के लिए प्रश्न करे तो प्रश्नलग्न से जितने आगे चन्द्रमा हो, चन्द्रमा से उतने ही आगे जो राशि हो वह पूछने वाले की जन्मराशि समझनी चाहिए ॥३४३१/२॥ प्रकारान्तर से अज्ञात जन्मकालादि का ज्ञान--प्रश्नलग्न में वृष या सिंह हो तो लग्नराश्यादि को कलात्मक बनाकर १० से गुणा करे। मिथुन या वृश्चिक हो तो ८ से, मेष या तुला हो तो ७ से, मकर या कन्या हो तो ५ से गुणा करे। शेष राशियों (कर्क, धन, कुम्भ, मीन) में से कोई लग्न हो तो उसकी कला को अपनी संख्या से (जैसे-कर्क को ४ से) गुणा करे। यदि लग्न में ग्रह हो तो फिर उसी गुणनफल को ग्रहगुण कों से भी गुणा करे। जैसे--बृहस्पति हो तो १० से, मंगल हो तो ८ से, शुक्र हो तो ७ से, बुध हो तो ५ से, अन्य ग्रह (रवि) शनि और चन्द्रमा) हों तो ५ से गुणा करे। इस प्रकार लग्न की राशि के अनुसार गुणन तो निश्चित ही रहता है। यदि उसमें ग्रह हो तभी ग्रह का गुणन भी करना चाहिए। जितने ग्रह हों, सबके गुणक से गुणा करना चाहिए। इस प्रकार गुणनफल को ध्रुवपिण्ड मानकर उसको ७ से गुणा कर २७ के द्वारा भाग देकर १ आदि शेष के अनुसार अश्विनी आदि जन्मनक्षत्र समझना चाहिए। इस प्रणाली में विशेषता यह है कि उक्त रीति से आयी हुई संख्या में कभी ९ जोड़कर और कभी ९ घटाकर नक्षत्र लिया जाता है ॥३४४-३४६॥