भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४२७ जीवांशे हास्यविद्योधा बली मंत्री च धार्मिकः । अल्पापत्यो दुःखितो खो दुष्टस्त्रीसौरिभागगे ॥२४०॥ भानावित्त्यादिदृष्टे नु तद्वदेव फलं वदेत् । वर्गोत्तमे खे परभे फलमुक्तं शुभं क्रमात् ॥२४१॥ पुष्टं मध्यं लघु ज्ञेयं यदि चांशपतिर्बली । राशीक्षणफलं रुद्ध्वा दद्यात्त्यंशफलं स्फुटम् ॥२४२॥ शूरस्तब्धो विकलदृग्निघृणोऽर्के तनुस्थिते । मेषे धनी तैमिरकः सिंहे रात्र्यंध एव च ॥२४३॥ नीचोद्योस्वः कर्कगेऽर्के उद्बुवाक्षस्तनुस्थिते । द्वितीयेऽर्के बहुधनो नृपदण्ड्यो मुखामयी ॥२४४॥ त्रिगे बुधो विक्रमी च विमुखः पीडितो भुवि । धनापत्योक्तितो धीस्थे बली शत्रुजितोरिगे ॥२४५॥ स्त्रीजितो द्यूनसंस्थे च निधनेलपात्मजोऽल्पदृक् । सुतार्थसुखभा भाग्ये दशमे श्रुतशौर्यवान् ॥२४६॥ लाभे बहुधनो मानी पतितो खोऽव्यये रवौ । मूकोऽधो बधिरः प्रेष्यो जेगे खाच्चाजगे धनी ॥२४७॥ सूर्यादि ग्रहों की दृष्टि हो तो बालक क्रमशः हास्यप्रिय, रण में कुशल, बलवान्, मन्त्री, धर्मात्मा तथा धर्मशील होता है । शनि के नवमांश में स्थित चन्द्रमा पर यदि सूर्यादि ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक क्रमशः अल्पसन्तति, दुःखी, अभिमानी, अपने कार्य में तत्पर, दुष्ट स्त्री का पति तथा कृपण होता है। जिस प्रकार मेषादि राशि या उसके नवमांश में स्थित चन्द्रमा पर सूर्यादि ग्रहों के दृष्टिफल कहे गये हैं, इसी प्रकार मेषादि राशि या नवमांश में स्थित सूर्य पर चन्द्रादि ग्रहों की दृष्टि से भी प्राप्त होने वाले फल समझने चाहिए ॥२३९-२४०१/२॥ फलों में न्यूनाधिक्य--चन्द्रमा यदि वर्गोत्तम नवमांश में हो तो पूर्वोक्त शुभ फल पूर्ण, अपने नवमांश में हो तो मध्यम (आधा) और अन्य नवमांश में हो तो अल्प समझना चाहिए। (इसी से यह भी सिद्ध हो जाता है कि जो अशुभ फल कहे गये हैं, वे भी विपरीत दशा में विपरीत होते हैं अर्थात् वर्गोत्तम में चन्द्रमा हो तो अशुभ फल अल्प, अपने नवमांश में होतो आधा और अन्य नवमांश में हो तो पूर्ण होते हैं।) राशि और नवमांश के फलों में भिन्नता होने पर यदि नवमांश का स्वामी बली हो तो वह राशिफल को रोककर ही फल देता है ॥२४२॥ द्वादश भावगत ग्रहों के फल-सूर्य यदि लग्न में हो तो शिशु शूरवीर, दीर्घसूत्री, दुर्बल दृष्टि वाला और निर्दय होता है। यदि मेष में रहकर लग्न में हो तो धनवान और तिमिर रोग वाला होता है और सिंह लग्न में हो तो रात्र्यन्ध (रतौंधी वाला), तुला लग्न में हो तो अंधा और निर्धन होता है। कर्क लग्न में हो तो जातक की आँख में फूली होती है ॥१२३१/२॥ द्वितीय भाव में सूर्य हो तो बालक बहुत धनी, राजदण्ड पाने वाला और मुख का रोगी होता है । तृतीय स्थान में हो तो पण्डित और पराक्रमी होता है। चतुर्थ स्थान में सूर्य हो तो सुखहीन और पीड़ायुक्त होता है। सूर्य पञ्चम भाव में हो तो मनुष्य धनहीन और पुत्रहीन होता है। षष्ठ भाव में हो तो बलवान् और शत्रुओं को जीतने वाला होता है ॥२४५॥ सप्तम भाव में स्थित हो तो मनुष्य अपनी स्त्री से पराजित होता है । अष्टम भाव में हो तो उसके पुत्र थोड़े होते हैं और उसे दिखायी भी कम ही देता है। नवम भाव में हो तो जातक पुत्र- वान्, धनवान् और सुखी होता है । दशम भाव में हो तो विद्वान् और पराक्रमी होता है ॥२४६॥ एकादश भाव में हो तो अधिक धनवान् ओर मानी होता है। यदि द्वादश भाव में सूर्य हो तो उत्पन्न बालक नीच और धनहीन होता है ॥॥२४६१/२॥ चन्द्रमा यदि मेष लग्न में हो तो जातक गूंगा, बहिरा, अंधा और दूसरों का नौकर होता है। वृष लग्न में हो तो वह धनी होता है, द्वितीय भाव में हो तो विद्वान् और धनवान्, तृतीय भाव में हो तो हिंसक स्वभाव