बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४२८ नारदीयपुराणम् बहुर्वा धनवानर्थे हिंस्रो विक्रमगे भवेत् । साधुभावः सुखगते धीस्थे कन्याप्रजोलसः ॥२४८॥ अल्पाग्निकामस्तीक्ष्णोरौर्ह्र्ष्युस्तन्विमदोजखे । ॥२४६॥ व्याधिपीडान्वितो मृत्यौ भानुधर्मे मित्रधनान्वितः धर्मधीधनयुग्राज्ये ख्यातधीधनयुग्भवेत् । क्षुद्रोऽगहीनो व्ययगे चन्द्रे प्रोक्तं फलं बुधैः ॥२५०॥ लग्ने कुजे क्षततनुर्द्धनगे तु कदन्नभुक् । धर्मपापसमाचारोऽन्यत्र सूर्यसमो मतः ॥२५१॥ विद्वान् धनी च प्रखरः पंडितः सचिवोरियुक् । धर्मज्ञो विस्तृतगुणो गाधो ज्ञेयस्तोऽर्कवत् ॥२५२॥ विद्वान्सुवाच्यः कृपणो सुक्षाक्षो रिपुगुद्धिमान् । नीचस्तपस्वी चषणवनी लोभीदुष्टस्तनोगुरौ ॥२५३॥ स्मरी सुखी विलग्नस्थे कलही सुरतोत्सुकः । सुखितस्तनपश्ये च भृगौ जीववदन्यतः ॥२५४॥ निःस्वो रोगी कामवशो मलिनः शैशवातियुक् । अलसो लग्नगे मंदे धर्मात्स्वोच्चगते नृपः ॥२५५॥ ग्रामाधिपः स विद्वांश्च चावंगोऽन्यत्र सूर्यवत् । पूर्णमुच्चेथ पादोनफलं मूलत्रिकोणे ॥२५६॥ वाला, चतुर्थ स्थान में हो तो सुख, गृहादि से सम्पन्न, पञ्चम भाव में हो तो कन्या-संतान वाला और आलसी होता है । छठे भाव में हो तो बालक मन्दाग्नि का रोगी होता है। उसे अभीष्ट भोग बहुत कम मिलते हैं तथा वह उग्र स्वभाव का होता है । सप्तम भाव में हो तो जातक ईर्ष्यावान् और अत्यन्त कामी होता है । अष्टम भाव में हो तो रोग से पीड़ित, नवम भाव में हो तो मित्र और धन से युक्त, दशम भाव में हो तो धर्मात्मा, बुद्धिमान् और धनवान् होता है। एकादश भाव में हो तो उत्पन्न शिशु विख्यात, बुद्धिमान् और धनवान् होता है तथा द्वादश भाव में हो तो जातक क्षुद्र और अंगहीन होता है ॥२४७-२५०॥ मंगल लग्न में हो तो उत्पन्न शिशु क्षत शरीर वाला होता है। द्वितीय भाव में हो तो वह कदन्नभोजों तथा नवम भाव में हो तो पाप स्वभाव होता है। इनसे भिन्न (३, ४, ५, ६, ७, ८, १०, ११, १२) स्थानों में यदि मंगल हो तो उसके फल सूर्य के समान ही होते हैं ॥२५१॥ बुध लग्न में हो तो जातक पण्डित होता है । द्वितीय भाव में हो तो शिशु धनवान्, तृतीय भाव में हो तो दुष्ट स्वभाव, चतुर्थ भाव में हो तो पण्डित, पञ्चम भाव में हो तो राजमंत्री, षष्ठ भाव में हो तो शत्रुहीन, सप्तम भाव में हो तो धर्मज्ञाता, अष्टम भाव में हो तो विख्यात गुण वाला और शेष (६, १०, ११, १२) भावों में हो तो जैसे सूर्य के फल कहे गये हैं वैसे ही उसके फल भी समझने चाहिए ॥२५२॥ बृहस्पति लग्न में हों तो जातक विद्वान्, द्वितीय भाव में हो तो प्रियभाषी, तृतीय भाव में हो तो कृपण, चतुर्थ में हों तो सुखी, पञ्चम में हों तो विज्ञ, षष्ठ में हों तो शत्रुसहित, सप्तम में हों तो सम्पत्तिशाली, अष्टम में हों तो नीच स्वभाव वाला, नवम में हों तो तपस्वी, दशम में हों तो धनवान्, एकादश में हो तो नित्य लाभ करने वाला और द्वादश में हो तो दुष्ट हृदय वाला होता है ॥२५३॥ शुक्र लग्न में हों तो जातक कामी और सुखी, सप्तम भाव में हो तो कामी तथा पञ्चम भाव में हो तो सुखी होता है और अन्य भावों (२, ३, ४, ६, ८, ६, १०, ११, १२,) में हों तो बृहस्पति के समान ही फल होता है ॥२५४॥ शनि लग्न में हो तो जातक निर्धन, रोगी, कामातुर, मलिन, बाल्यावस्था में रोगी और आलसी होता है। किन्तु यदि अपनी राशि (मकर-कुम्भ) या अपने उच्च (तुला) में हो तो जातक भूपति, ग्रामपति, पण्डित और सुन्दर शरीर वाला होता है । अन्य (द्वितीय आदि) भावों में सूर्य के समान ही शनि के फल होते हैं ॥२५५½॥ फल में न्यूनाधिकत्व-शुभग्रह यदि अपने उच्च में हों तो पूर्ण रूप से उपर्युक्त फल प्राप्त होता है। यदि अपने मूल त्रिकोण में हो तो तीन चरण, अपनी राशि में हों तो आधा, मित्र के गृह में हों तो एक चरण तथा शत्रु की राशि में हों तो उससे भी कम फल प्राप्त होता है और नीच में या अस्त हों तो कुछ भी फल