भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 448

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४२६ शुभग्रहे बलं स्वक्षे मित्रभेऽङ्घ्रिमितं फलम् । शत्रुभेऽल्पं तथा नीचास्तंगते फलशून्यता ॥२५७॥ खमराकादिके खेटे कुलतुल्यः कुलाधिकः । बंधुपूज्योऽथ धनवान्सुखी भोगी नृपः क्रमात् ॥२५८॥ परवित्तसुहृद्बंधुपोष्यागणबलाधिपौ । नृपश्च मित्रभस्थेषु खेटे ऽर्कादिषु क्रमात् ॥२५९॥ विषमक्षेष्वर्कहोरायां संस्थिते शुभभेषु च । ख्यातो महोद्यमी चातितेजा धीमान्धनी बली ॥२६०॥ शुभेषु चंद्रहोरायां स्थितेषु समराशिषु । कांतिमाद्ववसौभाग्यभोगधीमान्प्रवेन्नरः ॥२६१॥ सूर्यहोरागतः पापः समभेषु तु मध्यमाः । विषमक्षेषु भास्कर्या सौम्या नोक्तफलप्रदाः ॥२६२॥ स्वमित्रव्यंगशश्चंद्रः सुरूपं गुणिनं नरम् । करोत्यन्यगतस्तत्तत्तुल्यगुणरूपिणम् ॥२६३॥ व्यालायुधे चतुष्पादांऽजेषु च ह्यंशकेषु च । तीक्ष्णेऽतिहिंस्रश्च भवेद्गुरुतल्पगतोऽटनः ॥२६४॥ स्तेनो भोक्ता सधनधीर्नृपः क्लीबश्च शत्रुहा । विष्टिकृद्दासवृत्तिश्च पापोहिंलोऽमतिर्भवेत् ॥२६५॥ नहीं होता है। (इस प्रकार शुभग्रह-के फल कहने से सिद्ध होता है कि पापग्रह का फल इसके विपरीत होता है। अर्थात् पापग्रह नीच में या अस्त हो तो पूर्ण फल, शत्रु राशि में तीन चरण, मित्र राशि में आधा, अपनी राशि में एक चरण अपने मूल त्रिकोण में उससे भी अल्प और अपने उच्च में हो तो अपना कुछ भी फल नहीं देता है ॥२५७॥ स्वराशिस्थ ग्रहफल-यदि अपनी राशि में एक ग्रह हो तो जातक अपने पिता के सदृश धनवान् और यशस्वी होता है। दो ग्रह अपनी राशि में हों तो बालक अपने कुल में श्रेष्ठ, तीन ग्रह हों तो बन्धुओं में माननीय, चार ग्रह हो तो विशेष धनवान्, पाँच ग्रह हों तो सुखी, छह ग्रह हों तो भोगी और यदि सातों ग्रह अपनी राशि में स्थित हों तो जातक राजा होता है ॥२५८। यदि अपने मित्र की राशि में एक ग्रह हो तो जातक दूसरे के धन से पालित, दो ग्रह हों तो मित्रों के द्वारा पोषित और तीन ग्रह मित्रराशि में हों तो अपने बन्धुओं के द्वारा पालित होता है। यदि चार ग्रह मित्र- राशि में हों तो बालक अपने बाहुबल से जीवन-निर्वाह करता है। पाँच ग्रह हों तो बहुत लोगों का पालन करने वाला होता है। छह ग्रह हों तो सेनापति और सातों ग्रह मित्र-राशि में स्थित हों तो जातक राजा होता है ॥२५९॥ पापग्रह यदि विषम राशि और सूर्य की होरा (राशिपूर्वार्ध) में हो तो जातक लोक में विख्यात, महान् उद्योगी, अत्यन्त तेजस्वी, बुद्धिमान्, धनवान् और बलवान् होता है। तथा शुभग्रह यदि समराशि और चन्द्रमा की होरा में हो तो जातक कान्तिमान्, मृदु (कोमल) शरीर वाला, भाग्यवान्, भोगी और बुद्धिमान् होता है ॥२६१॥ यदि पापग्रह समराशि और सूर्य की होरा में हों तो पूर्वोक्त फल मध्यम (आधा) होता है। एवं शुभ यदि विषम राशि और सूर्य की होरा में हों तो पूर्वोक्त फल नहीं प्राप्त होते हैं ॥२६२॥ चन्द्रमा यदि अपने या अपने मित्र के द्रेष्काण में हो तो जातक सुन्दर स्वरूप वाला और गुणवान् होता है। अन्य द्रेष्काण में हो तो उस द्रेष्काण की राशि और द्रेष्काणपति के सदृश ही फल प्राप्त होता है। (सारांश यह है कि उस द्रेष्काणपति का स्वामी यदि चन्द्रमा का मित्र हो तो दो चरण (आधा) फल मिलता है तथा शत्रु हो तो एक चरण फल होता है ।) यदि सर्पद्रेष्काण, शस्त्रद्रेष्काण, चतुष्पदद्रेष्काण और पक्षी द्रेष्काण में चन्द्रमा हो तो जातक क्रमशः उग्रस्वभाव, हिंसा के स्वभाव वाला, गुरुतल्पगः (गुरुपत्नीगामी) और भ्रमणशील होता है ॥२६४॥ लग्ननवमांश राशिफल - लग्न में मेष का नवमांश हो तो जातक चोरस्वभाव, वृष-नवमांश हो तो भोगी, मिथुन-नवमांश हो तो धनी, कर्क नवमांश हो तो बुद्धिमान्, सिंह-नवमांश हो तो शत्रु को जीतने वाला,