बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 449, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें४३० नारदीयपुराणम् मेषादिकोत्तमांशेषु द्वादशांशेषु राशिवत् । जायाबलविभूषाढ्यः सत्त्वयुक्तोऽतिसाहसी ॥२६६॥ तेजस्वी च नरः स्वाये त्रिंशांशेऽसृजिसंस्थिते । आमयी वा स्वभार्यायां विषमः पारदारिकः ॥२६७॥ दुःखी परिच्छदयुतो मलिनश्चार्कजे स्वके । सुधीधनकीर्त्यालुस्तेजस्वी लोकपूजितः ॥२६८॥ नोरगुह्यभवान्भोगी जीवे खंत्रिंशभागगे । मेधाकलाकाव्यशिल्पविवादकपटांचितः ॥२६९॥ शास्त्रार्थसाहसयुतो बुधे स्वत्रिंशभागगे । बह्वपत्यसुखारोग्यरोगरूपार्थसंयुतः ॥२७०॥ ललितांगो विप्रकीर्णेन्द्रियः स्याद्भार्गवे स्वके । शूरस्तब्धौ च विषमवधकौ सद्गुणान्वितौ ॥२७१॥ सुखेज्ञो चारु चेष्टांगौ चंद्राकौ चेत्कुजादिगौ । मूलत्रिकोणस्वर्क्षोच्चे कंठस्थास्तु च ये ग्रहाः ॥२७२॥ अन्योन्यकारकास्ते स्युः कर्मगस्तु विशेषतः । शुभं वर्गोत्तमे जन्म वेसिस्थाने वसद्ग्रहैः ॥२७३॥ अशून्येषु च केंद्रेषु कारकाख्यगृहेषु च । गुरुजन्मेलग्नेशाः केंद्रस्था मध्यसौख्यदाः ॥२७४॥ वृश्चिक-नवमांश हो तो बेगारी करने वाला, धनु का नवमांश हो तो दासकर्म करने वाला, मकर-नवमांश में हो तो पापस्वभाव, कुम्भ-नवमांश हो तो हिंसक स्वभाव वाला और मीन-नवमांश लग्न में हो तो बुद्धिहीन होता है ।। किन्तु यदि वर्गोत्तम नवमांश (अर्थात् जो राशि हो उसी का नवमांश भी) हो तो वह जातक इन (चोर- स्वभाव आदि सब) का शासक होता है। (जैसे मेष नवमांश में उत्पन्न मनुष्य चोर-स्वभाव होता है, किन्तु यदि मेष राशि में मेष का नवमांश हो तो वह चोरस्वभाव-वालों का शासक होता है, इत्यादि ।) इसी प्रकार मेषादि राशियों के द्वादशांश में मेषादि राशियों के समान फल प्राप्त होते हैं ।।२६५-२६८।। मंगल आदि ग्रहों के त्रिंशांशफल — मंगल अपने त्रिंशांश में हो तो जातक स्त्री, बल, आभूषण तथा परिजनादि से सम्पन्न, साहसी और तेजस्वी होता है । शनि अपने त्रिंशांश में हो तो रोगी, स्त्री के प्रति कुटिल, परस्त्री में आसक्त, दुःखी, वस्त्रादि आवश्यक सामग्री से सम्पन्न, किन्तु मलिन होता है। गुरु अपने त्रिंशांश में हो तो जातक सुखी, बुद्धिमान्, धनी, कीर्तिमान्, तेजस्वी, लोक में मान्य, रोगहीन, उद्यमी और भोगी होता है। बुध अपने त्रिंशांश में हो तो मनुष्य मेधावी, कलाकुशल, काव्य और शिल्पविद्या का ज्ञाता, विवादी, कपटी, शास्त्रतत्वज्ञ तथा साहसी होता है। शुक्र अपने त्रिंशांश में हो तो जातक अधिक सन्तान, सुख, आरोग्य, सौन्दर्य और धन से युक्त, मनोहर शरीर वाला तथा अजितेन्द्रिय होता है ।।२६९-२७०½।। सूर्य-चन्द्र-फल--मंगल के त्रिंशांश में सूर्य हो तो जातक शूरवीर, चन्द्रमा में हो तो दीर्घसूत्री, बुध के त्रिंशांश में सूर्य हो तो जातक कुटिल और चन्द्रमा हो तो हिंसा के स्वभाव वाला होता है। हिंसा के स्वभाववाला होता है। गुरु के त्रिंशांश में सूर्य और चन्द्रमा हो तो गुणी होता है। शुक्र के त्रिंशांश में सूर्य हो तो बालक सुखी और चन्द्रमा हो तो विद्वान् होता है। शनि के त्रिंशांश में सूर्य हो तो सुन्दर शरीर वाला तथा चन्द्रमा हो तो सर्वजनप्रिय होता है ।।२७३।। कारक ग्रह--अपने-अपने मूल त्रिकोण, स्वराशि या स्वोच्च में स्थित ग्रह यदि केन्द्र में हों तो वे सब परस्पर कारक (शुभफलदायक) होते हैं, उनमें दशम स्थान में रहने वाला सबसे अधिक कारक होता है ।।२७३।। शुभ जन्म लक्षण--लग्न या चन्द्रमा वर्गोत्तम नवमांश में हो या वेशि (सूर्य से द्वितीय) स्थान में शुभग्रह हो अथवा केन्द्रों में कारक ग्रह हों तो स्थिति में जन्म लेनेवाला बालक सुखी और यशस्वी होता है। २७६। गुरु, जन्मराशि और लग्नेश ये सभी या इनमें से एक भी केन्द्र में हो तो जीवन के मध्यभाग में सुखप्रद होते हैं। तथा पृष्ठोदय राशि में रहनेवाला ग्रह जीवन के अन्त में, द्विस्वभाव राशिस्थ ग्रह जीवन के मध्य में और शीर्षोदय राशिस्थ ग्रह जीवन के ग्रह आदि में अपने-अपने फल देते हैं ।।२७४½।।