बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 450, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४३१ पृष्ठोभवकोदपक्षंस्थितास्त्वंत्यांतरादिषु । प्रवेशे भास्करकुजौ भृग्वीज्यौ मध्यगौ तथा ॥२७५॥ चंद्राकीफल दावंत्ये सदा ज्ञः फलदायकः । लग्नात्पुत्रे कलत्रे वाब्जाच्छुभेशयुतेक्षिते ॥२७६॥ स्यात्तयोः संपदः स्वत्वमन्यथाऽथांगतोदयः । रवौ मीनेऽर्कजः स्त्रीघ्नः पुत्रस्थस्तु तथा कुजः ॥२७७॥ सिमातुर्याष्टगैः क्रूरैर्यद्वा क्रूरांतरे सितः । सद्ग्रहायुतदृष्टश्चेदग्निपातान्मृतिः स्त्रियाः ॥२७८॥ लग्नाद्यपाणिगतयोः शशिरव्योः सह स्त्रिया । एकेन यस्य जन्माहुरथ सप्तमसंस्थयोः ॥२७९॥ नवधीगतयोर्वापि विकलस्त्रीसितार्कयोः । कोणोदयेऽस्तांत्यसन्धौ भृगौ बंध्यापतेर्जिनः ॥२८०॥ सुतं भन्न सौम्याढ्यमथांत्यास्तोदयक्षंगैः । पापे धीस्थे विधौ क्षीणजन्मा सुतकलत्रिणः ॥२८१॥ शनौ खगेऽस्ते सशुक्रे तद्दृष्टे पारदारिकः । तौ चेत्सेदुस्त्रिया साद्धं पुंश्चलो जायते नरः ॥२८२॥ भृग्वब्जयोरस्तगयोर्नरो भार्या सुतोऽपि वा । नृस्त्रियो स्तु शुभैर्दृष्टौ तौ द्वौ परिणतांगकौ ॥२८३॥ खास्तांबुगैरेंदुशुकपापैर्वशविनाशकः । शिल्पी व्येशे बुधयुते केंद्रसंस्थाकिवीक्षिते ॥२८४॥
ग्रह गोचर फल समय-सूर्य और मंगल ये दोनों राशि में प्रवेश करते ही अपने राशि सम्बन्धो (गोचर) फल देते हैं। शुक्र और बृहस्पति राशि के मध्य में जाने पर और चन्द्रमा तथा शनि ये दोनों राशि के अन्तिम तृतीयांश में पहुँचने पर अपने शुभ या अशुभ गोचर फल देते हैं। तथा बुध सर्वदा (आदि, मध्य, अन्त में) अपने शुभाशुभ फल देता है ॥२७५३॥
शुभाशुभ योग- लग्न या चन्द्रमा से पञ्चम और सप्तम भाव शुभग्रह और अपने स्वामी से युक्त या दृष्ट हों तो जातक को पुत्र और स्त्री का सुख सुलभ होता है अन्यथा नहीं। तथा कन्या लग्न में सूर्य मीन लग्न में शनि हो तो ये दोनों स्त्री का नाश करने वाले होते हैं। इसी प्रकार पञ्चम भाव (मेष वृश्चिक के अतिरिक्त राशि) में मंगल हों तो पुत्र का नाश करने वाला होता है। यदि शुक्र से केन्द्र (१, ४, ७, १०) में पापग्रह हों अथवा दो पापग्रहों के बीच में शुक्र हों, उन पर शुभग्रह का योग या दृष्टि नहीं हो तो उस जातक की स्त्री का मरण अग्नि से या गिरने से होता है। लग्न से १२, ६ भावों में चन्द्रमा और सूर्य हों तो वह स्त्री-सहित एक नेत्र वाले (काण) पुरुष को जन्म देता है, ऐसा मुनियों ने कहा है। लग्न से सप्तम या नवम पञ्चम में शुक्र और सूर्य दोनों हों तो उस जातक की स्त्री विकलांग होती है ॥२७६-२७९३॥
शनि लग्न में और शुक्र सप्तम भाव में राशिसन्धि (कर्क, वृश्चिक, मीन के अन्तिमांश) में हों तो वह जातक वन्ध्या स्त्री का पति होता है। यदि पञ्चम भाव शुभग्रह से युक्त या दृष्ट न हो, लग्न से १२, ७ में ओर लग्न में यदि पापग्रह हों तथा पञ्चम भाव में क्षीणचन्द्रमा स्थित हों तो वह पुरुष पुत्र ओर स्त्री से रहित होता है ॥२८०-२८१॥ शनि के वर्ग (राशि-नवांश) में शुक्र सप्तम भाव में हो और शनि से दृष्ट हो तो वह जातक परस्त्री में आसक्त होता है। यदि वे दोनों (शनि और शुक्र) चन्द्रमा के साथ हों तो वह स्वयं परस्त्री में आसक्त और उसकी पत्नी परपुरुष में आसक्त होती है ॥२८२॥
शुक्र और चन्द्रमा दोनों सप्तम भाव में हों और उन पर शुभग्रहों की दृष्टि हो तो पति-पत्नी दोनों परिणताङ्ग (परमायुर्दाय भोग कर वृद्धावस्था तक जीने वाले) होते हैं ॥२८३॥ दशम, सप्तम और चतुर्थ भाव में क्रमशः चन्द्रमा, शुक्र और पापग्रह हों तो जातक वंश का नाशक होता है। अर्थात् उसका वंश नष्ट हो जाता है। बुध जिस द्रेष्काण में हो उस पर यदि केन्द्र-स्थित शनि की दृष्टि हो तो जातक शिल्पकला में कुशल होता