बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४३२ नारदीयपुराणम् दास्यां जातः सौरिभागे रिःफगे भृगुनन्दने । नीचोऽर्केन्द्वोरस्तगयोर्दृष्टयोः सूर्यजेन वा ॥२८४॥ पापद्दष्टौ शनिकुजावस्तगौ वातरुकप्रदौ । कर्काल्यंशगते केंद्रे पापयुक्ते तु गुह्यरुक् ॥२८५॥ पापांतरगतेऽब्जे रवौ द्यूने तु कुष्ठयुक्त । चन्द्रे खेऽस्तंगते भौमे विकलो वेशिगेऽर्कजे ॥२८७॥ मिथो भांशगयोः शूली रवौन्द्वोर्युतयोः कृशः । निधनारिधनांत्यस्था रवौंद्यारयमा यदा ॥२८८॥ चलद्दृष्टेण दोषेण कुर्वन्त्यनयनं नरम् । सौम्या दृष्टा न वायदिधीगताः पापखेचराः ॥२८६॥ कर्णोपघातका द्यूने रदवैकृत्यकारकाः । लग्ने गुरौ द्यूने मंदे वातरोगान्वितो भवेत् ॥२६०॥ सुखेऽस्ते वा कुजे जीवे लग्ने वार्कियुतोदये । कुजेन वात्मजे द्यूने संज्ञेऽन्त्येऽब्जे च सोन्मवः ॥२६१॥ धीधर्मार्थान्त्यगैः पापैर्मसप्तस्यानिनबंधनम् । सर्पश्रृंखलया शाठ्यैर्दुष्टकैर्बल्यशुभेक्षितैः ॥२६२॥ समंदेऽब्जे वक्रदृष्टे पस्मरी दुर्वचाः क्षयी । रविमन्दकुजैः खस्थैः सौम्यदृष्टैः समंडलैः ॥२६३॥ मृतकाः पूर्व मुवितैर्वरंमध्याधमा नराः । पुंजनों तु फलं पण्यस्त्रीणां योग्यं वदेच्च तत् ॥२६४॥ है ॥२८४॥ शुक्र यदि शनि के नवमांश में होकर द्वादश भाव में स्थित हो तो जातक दासी का पुत्र होता है। सूर्य और चन्द्रमा दोनों सप्तम भाव में रहकर शनि से दृष्ट हों तो जातक नीच स्वभाव वाला होता है । २८५॥ शनि और मंगल दोनों सप्तम भाव में स्थित हों और उन पर पापग्रह की दृष्टि हो तो जातक वातरोगी होता है । कर्क या वृश्चिक के नवमांश में स्थित चन्द्रमा यदि पापग्रह से युक्त हो तो बालक गुप्त रोग से ग्रस्त होता है । चन्द्रमा यदि पापग्रहों के बीच में रहकर लग्न में स्थित हो तो उत्पन्न शिशु कुष्ठरोगी होता है । चन्द्रमा दशम भाव में, मंगल सप्तम भाव में और शनि वेशि (सूर्य से द्वितीय) स्थान में हो तो जातक विकलांग होता है ॥२८६-२८७॥ सूर्य और चन्द्रमा दोनों परस्पर नवमांश में हों तो बालक शूलरोगी होता है । यदि दोनों किसी एक ही स्थान में हों तो कृश (क्षीणशरीर) होता है । यदि सूर्य, चन्द्रमा, मंगल और शनि-ये चारों क्रमश: ८, ६, २, १२ भावों में स्थित हों तो इनमें जो बली हो, उस ग्रह के दोष (कफ, पित्त और वातसम्बन्धी विकार) से जातक नेत्रहीन होता है ॥२८८॥ यदि ९, ११, ३, ५-इन भावों में पापग्रह हों तथा उन पर शुभग्रह की दृष्टि नहीं हो तो उत्पन्न शिशु के लिए कर्णरोग उत्पन्न करते हैं । सप्तम भाव में स्थित पापग्रह यदि शुभग्रह से दृष्ट न हों तो वे दन्तरोग उत्पन्न करते हैं । लग्न में गुरु और सप्तम भाव में हो तो जातक वातरोग से पीड़ित होता है । ४ या ७ भाव में मंगल और लग्न में बृहस्पति हो अथवा शनि लग्न में और मंगल ९, ५, ७ भाव में हो अथवा बुध सहित चन्द्रमा द्वादश भाव में हो तो जातक उन्माद रोग से पीडित होता है ॥२८९-२९१॥ यदि ५, ९, २ और १२ भावों में पापग्रह हों तो उस जातक को बन्धन प्राप्त होता है (उसे जेल का कष्ट भोगना पड़ता है ।) लग्न में जैसी राशि हो उसके अनुकूल ही बन्धन समझना चाहिए । जैसे चतुष्पद राशि लग्न हो तो बिना बन्धन के हो वह जेल में रहता है ।) यदि सर्प, शृंखला, पाशसंज्ञक द्रेष्काण लग्न में हों तथा उन पर बली पापग्रह की दृष्टि हो तो भी पूर्वोक्त प्रकार से बन्धन प्राप्त होता है । मण्डल युक्त चन्द्रमा यदि शनि से युक्त और मंगल से दृष्ट हो तो जातक को मृगी रोग और क्षयरोग तथा वह कटुवादी होता है । मण्डल युक्त चन्द्रमा यदि दशम भावस्थित सूर्य, शनि और मंगल से दृष्ट हो तो जातक भृत्य होता है; उनमें भी एक से दृष्ट हो तो श्रेष्ठ, दो से दृष्ट हो तो मध्यम और तोनों से दृष्ट हो तो अधम भृत्य होता है ॥२९२-२९३॥ **स्त्री जातक की विशेषता--**ऊपर कहे हुए पुरुष जातक के जो-जो फल स्त्री-जातक में संभव हों वे वैसे योग में उत्पन्न स्त्रीमात्र के लिए समझने चाहिए । जो फल स्त्री में असंभव हों, वे सब उसके पति में समझने