भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 452, कुल 1008 में से

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पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४३३ तत्स्वामिश्वखिलं कार्यं तद्भर्तुर्मरणं मृतौ । लग्नेन्दुगं वपुश्चैव यादयूपपतिद्युने ॥२६५॥ युग्मेषु लग्नशशिनोर्वनिता प्रकृतिस्थिता । सच्छीलभूषणयुता शुभसंदृष्टयोस्तयोः ॥२६६॥ पुरुषाकृतिशीलाढ्या तयोरोजस्थयोर्मता । अथ पापा गुणोनाश्च पापवीक्षितयोस्तयोः ॥२६७॥ कुजार्कीज्यज्ञशुक्राणां कुजर्क्षे क्रमशोऽङ्गना । बाल्यदुष्टा तथा दासी साध्वी मायावती त्वरा ॥२६८॥ दुष्टावाक् पुनर्भूः सगुणा विज्ञा ख्याता स्फुजिदगृहे । बौधे समाया क्लीबा च सती गुणवती चला ॥२६९॥ द्वंद्वभे स्वैरिणीघ्नी गुणाढ्या शिल्पिकाधमा । वाचाटा कुलटा सिंहे राज्ञी पुंधीरगम्यता ॥३००॥ जैवे गुणाढ्याऽल्परतिर्गुणज्ञा ज्ञानिनी सती । दासी नीचरता साध्वी मांदे दुष्टा नपत्यका ॥३०१॥

चाहिए। जो फल स्त्री में असंभव हों, वे सब उसके पति में समझने चाहिए। स्त्री के स्वामी की मृत्यु का विचार अष्टम भाव से, शरीर के शुभाशुभ फल का विचार लग्न और चन्द्रमा से तथा सौभाग्य और पति के स्वरूप, गुण आदि का विचार सप्तम भाव से करना चाहिए ॥२६५॥ स्त्री के जन्म समय में लग्न और चन्द्रमा दोनों समराशि और सम नवमांश में हों तो वह स्त्री अपनी प्रकृति (स्त्रीस्वभाव) से युक्त होती है। यदि उन दोनों (लग्न और चन्द्रमा) पर शुभग्रह की दृष्टि हो तो वह सुशीलता रूप आभूषण से विभूषित होती है। यदि वे दोनों (लग्न तथा चन्द्रमा) विषमराशि और विषम नवमांश में हों तो वह स्त्री पुरुष सदृश आकार और स्वभाव वाली होती है। यदि उन दोनों पर पापग्रह की दृष्टि हो तो स्त्री पापस्वभाव वाली और गुणहीना होती है ॥२६७॥ लग्न और चन्द्रमा के आश्रित मंगल की राशि (मेष-वृश्चिक) में यदि मंगल का त्रिंशांश हो तो वह स्त्री बाल्यावस्था में दुष्ट स्वभाव वाली होती है। शनि का त्रिंशांश हो तो दासी होती है। गुरु का त्रिंशांश हो तो सच्चरित्रा, बुध का त्रिंशांश हो तो मायावती और शुक्र का त्रिंशांश हो तो वह उतावली होती है ॥२६८॥ शुक्र राशि (वृषतुला) में स्थित लग्न या चन्द्रमा में मंगल का त्रिंशांश हो तो नारी बुरे स्वभाववाली, शनि का त्रिंशांश हो तो पुनर्भू (दूसरा पति करने वाली), गुरु का त्रिंशांश हो तो गुणवती, बुध का त्रिंशांश हो तो कलाओं को जानने वाली और शुक्र का त्रिंशांश हो तो लोक में विख्यात होती है। बुध राशि (मिथुन-कन्या) में स्थित लग्न या चन्द्रमा में यदि मंगल का त्रिंशांश हो तो मायावती, शनि का हो तो हिजड़ी, गुरु का हो तो पतिव्रता, बुध का हो तो गुणवती और शुक्र का हो तो चंचला होती है ॥२६९॥ चन्द्र-राशि (कर्क) में स्थित लग्न या चन्द्रमा में यदि मंगल का त्रिंशांश हो तो नारी स्वेच्छाचारिणी, शनि का हो तो पति के लिए घातक, गुरु का हो तो गुणवती, बुध का हो तो शिल्पकला जानने वाली और शुक्र का त्रिंशांश हो तो अधम स्वभाववाली होती है। सिंह राशिस्थ लग्न या चन्द्रमा में यदि मंगल का त्रिंशांश हो तो पुरुष के समान आचरण करने वाली, शनि का हो तो कुलटा स्वभाव वाली, गुरु का हो तो रानी, बुध का हो तो पुरुषसदृश बुद्धिवाली और शुक्र का त्रिंशांश हो तो अगम्यगामिनी होती है ॥३००॥ गुरुराशि (धनु-मीन) स्थित लग्न या चन्द्रमा में मंगल का त्रिंशांश हो तो नारी गुणवती, शनि का हो तो भोगों में अल्प आसक्ति वाली, गुरु का हो तो गुणवती, बुध का हो तो ज्ञानवती और शुक्र का त्रिंशांश हो तो पतिव्रता होती है। शनिराशि (मकर-कुम्भ) स्थित लग्न या चन्द्रमा में मंगल का त्रिंशांश हो तो स्त्री दासी, शनि का हो तो नीच पुरुष में आसक्त, गुरु का हो तो पतिव्रता, बुध का हो तो दुष्ट स्वभाव वाली और शुक्र का हो तो संतानहीन होती है। इस प्रकार लग्न और चन्द्राश्रित राशियों के फल ग्रहों के बल के अनुसार न्यून या अधिक समझने चाहिए ॥३०११/२॥ ५५ ना० पु०

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