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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

४३२ नारदीयपुराणम् दास्यां जातः सौरिभागे रिःफगे भृगुनन्दने । नीचोऽर्केन्द्वोरस्तगयोर्दृष्टयोः सूर्यजेन वा ॥२८४॥ पापद्दष्टौ शनिकुजावस्तगौ वातरुकप्रदौ । कर्काल्यंशगते केंद्रे पापयुक्ते तु गुह्यरुक् ॥२८५॥ पापांतरगतेऽब्जे रवौ द्यूने तु कुष्ठयुक्त । चन्द्रे खेऽस्तंगते भौमे विकलो वेशिगेऽर्कजे ॥२८७॥ मिथो भांशगयोः शूली रवौन्द्वोर्युतयोः कृशः । निधनारिधनांत्यस्था रवौंद्यारयमा यदा ॥२८८॥ चलद्दृष्टेण दोषेण कुर्वन्त्यनयनं नरम् । सौम्या दृष्टा न वायदिधीगताः पापखेचराः ॥२८६॥ कर्णोपघातका द्यूने रदवैकृत्यकारकाः । लग्ने गुरौ द्यूने मंदे वातरोगान्वितो भवेत् ॥२६०॥ सुखेऽस्ते वा कुजे जीवे लग्ने वार्कियुतोदये । कुजेन वात्मजे द्यूने संज्ञेऽन्त्येऽब्जे च सोन्मवः ॥२६१॥ धीधर्मार्थान्त्यगैः पापैर्मसप्तस्यानिनबंधनम् । सर्पश्रृंखलया शाठ्यैर्दुष्टकैर्बल्यशुभेक्षितैः ॥२६२॥ समंदेऽब्जे वक्रदृष्टे पस्मरी दुर्वचाः क्षयी । रविमन्दकुजैः खस्थैः सौम्यदृष्टैः समंडलैः ॥२६३॥ मृतकाः पूर्व मुवितैर्वरंमध्याधमा नराः । पुंजनों तु फलं पण्यस्त्रीणां योग्यं वदेच्च तत् ॥२६४॥ है ॥२८४॥ शुक्र यदि शनि के नवमांश में होकर द्वादश भाव में स्थित हो तो जातक दासी का पुत्र होता है। सूर्य और चन्द्रमा दोनों सप्तम भाव में रहकर शनि से दृष्ट हों तो जातक नीच स्वभाव वाला होता है । २८५॥ शनि और मंगल दोनों सप्तम भाव में स्थित हों और उन पर पापग्रह की दृष्टि हो तो जातक वातरोगी होता है । कर्क या वृश्चिक के नवमांश में स्थित चन्द्रमा यदि पापग्रह से युक्त हो तो बालक गुप्त रोग से ग्रस्त होता है । चन्द्रमा यदि पापग्रहों के बीच में रहकर लग्न में स्थित हो तो उत्पन्न शिशु कुष्ठरोगी होता है । चन्द्रमा दशम भाव में, मंगल सप्तम भाव में और शनि वेशि (सूर्य से द्वितीय) स्थान में हो तो जातक विकलांग होता है ॥२८६-२८७॥ सूर्य और चन्द्रमा दोनों परस्पर नवमांश में हों तो बालक शूलरोगी होता है । यदि दोनों किसी एक ही स्थान में हों तो कृश (क्षीणशरीर) होता है । यदि सूर्य, चन्द्रमा, मंगल और शनि-ये चारों क्रमश: ८, ६, २, १२ भावों में स्थित हों तो इनमें जो बली हो, उस ग्रह के दोष (कफ, पित्त और वातसम्बन्धी विकार) से जातक नेत्रहीन होता है ॥२८८॥ यदि ९, ११, ३, ५-इन भावों में पापग्रह हों तथा उन पर शुभग्रह की दृष्टि नहीं हो तो उत्पन्न शिशु के लिए कर्णरोग उत्पन्न करते हैं । सप्तम भाव में स्थित पापग्रह यदि शुभग्रह से दृष्ट न हों तो वे दन्तरोग उत्पन्न करते हैं । लग्न में गुरु और सप्तम भाव में हो तो जातक वातरोग से पीड़ित होता है । ४ या ७ भाव में मंगल और लग्न में बृहस्पति हो अथवा शनि लग्न में और मंगल ९, ५, ७ भाव में हो अथवा बुध सहित चन्द्रमा द्वादश भाव में हो तो जातक उन्माद रोग से पीडित होता है ॥२८९-२९१॥ यदि ५, ९, २ और १२ भावों में पापग्रह हों तो उस जातक को बन्धन प्राप्त होता है (उसे जेल का कष्ट भोगना पड़ता है ।) लग्न में जैसी राशि हो उसके अनुकूल ही बन्धन समझना चाहिए । जैसे चतुष्पद राशि लग्न हो तो बिना बन्धन के हो वह जेल में रहता है ।) यदि सर्प, शृंखला, पाशसंज्ञक द्रेष्काण लग्न में हों तथा उन पर बली पापग्रह की दृष्टि हो तो भी पूर्वोक्त प्रकार से बन्धन प्राप्त होता है । मण्डल युक्त चन्द्रमा यदि शनि से युक्त और मंगल से दृष्ट हो तो जातक को मृगी रोग और क्षयरोग तथा वह कटुवादी होता है । मण्डल युक्त चन्द्रमा यदि दशम भावस्थित सूर्य, शनि और मंगल से दृष्ट हो तो जातक भृत्य होता है; उनमें भी एक से दृष्ट हो तो श्रेष्ठ, दो से दृष्ट हो तो मध्यम और तोनों से दृष्ट हो तो अधम भृत्य होता है ॥२९२-२९३॥ **स्त्री जातक की विशेषता--**ऊपर कहे हुए पुरुष जातक के जो-जो फल स्त्री-जातक में संभव हों वे वैसे योग में उत्पन्न स्त्रीमात्र के लिए समझने चाहिए । जो फल स्त्री में असंभव हों, वे सब उसके पति में समझने

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४३३ तत्स्वामिश्वखिलं कार्यं तद्भर्तुर्मरणं मृतौ । लग्नेन्दुगं वपुश्चैव यादयूपपतिद्युने ॥२६५॥ युग्मेषु लग्नशशिनोर्वनिता प्रकृतिस्थिता । सच्छीलभूषणयुता शुभसंदृष्टयोस्तयोः ॥२६६॥ पुरुषाकृतिशीलाढ्या तयोरोजस्थयोर्मता । अथ पापा गुणोनाश्च पापवीक्षितयोस्तयोः ॥२६७॥ कुजार्कीज्यज्ञशुक्राणां कुजर्क्षे क्रमशोऽङ्गना । बाल्यदुष्टा तथा दासी साध्वी मायावती त्वरा ॥२६८॥ दुष्टावाक् पुनर्भूः सगुणा विज्ञा ख्याता स्फुजिदगृहे । बौधे समाया क्लीबा च सती गुणवती चला ॥२६९॥ द्वंद्वभे स्वैरिणीघ्नी गुणाढ्या शिल्पिकाधमा । वाचाटा कुलटा सिंहे राज्ञी पुंधीरगम्यता ॥३००॥ जैवे गुणाढ्याऽल्परतिर्गुणज्ञा ज्ञानिनी सती । दासी नीचरता साध्वी मांदे दुष्टा नपत्यका ॥३०१॥

चाहिए। जो फल स्त्री में असंभव हों, वे सब उसके पति में समझने चाहिए। स्त्री के स्वामी की मृत्यु का विचार अष्टम भाव से, शरीर के शुभाशुभ फल का विचार लग्न और चन्द्रमा से तथा सौभाग्य और पति के स्वरूप, गुण आदि का विचार सप्तम भाव से करना चाहिए ॥२६५॥ स्त्री के जन्म समय में लग्न और चन्द्रमा दोनों समराशि और सम नवमांश में हों तो वह स्त्री अपनी प्रकृति (स्त्रीस्वभाव) से युक्त होती है। यदि उन दोनों (लग्न और चन्द्रमा) पर शुभग्रह की दृष्टि हो तो वह सुशीलता रूप आभूषण से विभूषित होती है। यदि वे दोनों (लग्न तथा चन्द्रमा) विषमराशि और विषम नवमांश में हों तो वह स्त्री पुरुष सदृश आकार और स्वभाव वाली होती है। यदि उन दोनों पर पापग्रह की दृष्टि हो तो स्त्री पापस्वभाव वाली और गुणहीना होती है ॥२६७॥ लग्न और चन्द्रमा के आश्रित मंगल की राशि (मेष-वृश्चिक) में यदि मंगल का त्रिंशांश हो तो वह स्त्री बाल्यावस्था में दुष्ट स्वभाव वाली होती है। शनि का त्रिंशांश हो तो दासी होती है। गुरु का त्रिंशांश हो तो सच्चरित्रा, बुध का त्रिंशांश हो तो मायावती और शुक्र का त्रिंशांश हो तो वह उतावली होती है ॥२६८॥ शुक्र राशि (वृषतुला) में स्थित लग्न या चन्द्रमा में मंगल का त्रिंशांश हो तो नारी बुरे स्वभाववाली, शनि का त्रिंशांश हो तो पुनर्भू (दूसरा पति करने वाली), गुरु का त्रिंशांश हो तो गुणवती, बुध का त्रिंशांश हो तो कलाओं को जानने वाली और शुक्र का त्रिंशांश हो तो लोक में विख्यात होती है। बुध राशि (मिथुन-कन्या) में स्थित लग्न या चन्द्रमा में यदि मंगल का त्रिंशांश हो तो मायावती, शनि का हो तो हिजड़ी, गुरु का हो तो पतिव्रता, बुध का हो तो गुणवती और शुक्र का हो तो चंचला होती है ॥२६९॥ चन्द्र-राशि (कर्क) में स्थित लग्न या चन्द्रमा में यदि मंगल का त्रिंशांश हो तो नारी स्वेच्छाचारिणी, शनि का हो तो पति के लिए घातक, गुरु का हो तो गुणवती, बुध का हो तो शिल्पकला जानने वाली और शुक्र का त्रिंशांश हो तो अधम स्वभाववाली होती है। सिंह राशिस्थ लग्न या चन्द्रमा में यदि मंगल का त्रिंशांश हो तो पुरुष के समान आचरण करने वाली, शनि का हो तो कुलटा स्वभाव वाली, गुरु का हो तो रानी, बुध का हो तो पुरुषसदृश बुद्धिवाली और शुक्र का त्रिंशांश हो तो अगम्यगामिनी होती है ॥३००॥ गुरुराशि (धनु-मीन) स्थित लग्न या चन्द्रमा में मंगल का त्रिंशांश हो तो नारी गुणवती, शनि का हो तो भोगों में अल्प आसक्ति वाली, गुरु का हो तो गुणवती, बुध का हो तो ज्ञानवती और शुक्र का त्रिंशांश हो तो पतिव्रता होती है। शनिराशि (मकर-कुम्भ) स्थित लग्न या चन्द्रमा में मंगल का त्रिंशांश हो तो स्त्री दासी, शनि का हो तो नीच पुरुष में आसक्त, गुरु का हो तो पतिव्रता, बुध का हो तो दुष्ट स्वभाव वाली और शुक्र का हो तो संतानहीन होती है। इस प्रकार लग्न और चन्द्राश्रित राशियों के फल ग्रहों के बल के अनुसार न्यून या अधिक समझने चाहिए ॥३०११/२॥ ५५ ना० पु०

४३४ नारदीयपुराणम् लग्नेन्दुयुक्तैस्त्रिंशांशैः फलमेतद्बलानुगम् । दृग्भैः मिथोंशे शुक्राकौ शुक्रे चेद्वा घटांशके ॥३०२॥ स्त्रीभिः स्त्री मैथुनं याति मदनानल्दीपिता । शून्ये कापुरुषो द्यूने बले क्लीबो न सद्‌दृशि ॥३०३॥ बुधाकर्योश्चरभे नित्यं परवेशपरायणः । तत्सृष्टा मदगे सूर्ये स्त्रीबालविधवा कुजे ॥३०४॥ पापदृष्टे शनौ द्यूने कन्यैवापद्यते जराम् । आग्नेयैर्विधवास्तस्थैः पुनर्भूमिश्रकैर्भवेत् ॥३०५॥ क्रूरे हीनबलेऽस्तस्थे परित्यक्ता न सद्‌दृशि । मिथोशगैः सितारौ तु कुरुतोऽन्यरतां स्त्रियम् ॥३०६॥ शीतरश्मिर्यदा द्यूने तदा भर्तुरनुज्ञया । सौरारक्षे लग्नगते सेंदुशुके तु बंधकी ॥३०७॥ मात्रा सार्द्धमसद्‌दृष्टे तथा कौजेंशकेऽस्तगे । मंददृष्टे व्याधियोनिः सद्ग्रहंशे पतिप्रिया ॥३०८॥ मंदर्क्षे वांशके द्यूने वृद्धो मूर्खः पतिः स्त्रियाः । स्त्रीलोलः क्रोधनः कौजे बौधे विद्वांश्च नैपुणः ॥३०८½॥ जितेंद्रियो गुणी जैवे चांद्रे कामी मृदुस्तथा । शौके सौभाग्ययुक्तकांतः सौरेति मृदुकर्मकृत् ॥३१०॥

शुक्र के नवमांश में शनि और शनि के नवमांश में शुक्र हो अथवा शुक्रराशि (वृष-तुला) लग्न में कुम्भ का नवमांश हो तो इन दोनों योगों में जन्म लेने वाली स्त्री कामाग्नि से संतप्त हो स्त्रियों से भी रति क्रीड़ा करती है ॥३०२½॥ पति-भाव—स्त्री के जन्मलग्न से सप्तम भाव में कोई ग्रह न हो और उस पर शुभग्रह की दृष्टि न हों तो उसका पति कुत्सित होता है। सप्तम स्थान में बुध और शनि हो और शुभग्रह से दृष्ट न हो तो भी पति नपुंसक होता है। यदि सप्तम भाव में चरराशि हो तो उसका पति परदेशवासी होता है। सप्तम भाव में सूर्य हो तो उस स्त्री को पति त्याग देता है। मंगल हो तो वह स्त्री बालविधवा होती है। शनि सप्तम भाव में पापग्रह से दृष्ट हों तो वह स्त्री कन्या (अविवाहिता) रहकर ही वृद्धावस्था को प्राप्त होती है ॥३०३-३०४½॥ यदि सप्तम भाव में एक से अधिक पापग्रह हों तो भी स्त्री विधवा होती है, शुभ और पाप दोनों हों तो वह पुनर्भु होती है। यदि सप्तम भाव में पापग्रह निर्बल हो और उस पर शुभग्रह की दृष्टि न हों तो भी स्त्री अपने पति द्वारा त्याग दी जाती है, अन्यथा शुभग्रह की दृष्टि होने पर वह पतिप्रिया होती है ॥३०५½॥ मंगल के नवमांश में शुक्र के नवमांश में मंगल हो तो वह स्त्री परपुरुष में आसक्त होती है। इस योग में चन्द्रमा यदि सप्तम भाव में हो तो वह अपने पति की आज्ञा से कार्य करता है ॥३०६½॥ यदि चन्द्रमा और शुक्र से संयुक्त शनि एवं मंगल की राशि (मकर, कुम्भ, मेष और वृश्चिक) लग्न में हों तो वह स्त्री कुलटा-स्वभाव वाली होती है। यदि उक्त लग्न पर पाप ग्रह की दृष्टि हो तो वह स्त्री अपनी माता सहित कुलटा होती है। यदि सप्तम भाव में मंगल का नवमांश हो और उस पर शनि की दृष्टि हो तो वह नारी योनि रोग वाली होती है। यदि सप्तम भाव में शुभग्रह का नवमांश हो तब तो वह पति की प्रिया होती है ॥३०८॥ शनि की राशि या नवमांश सप्तम भाव में हो तो उस स्त्री का पति वृद्ध और मूर्ख होता है। सप्तम भाव में मंगल की राशि या नवमांश हो तो उसका पति स्त्रीलोलुप और क्रोधी होता है। बुध की राशि या नवमांश हो तो विद्वान् और निपुण होता है। गुरु का नवांश राशि या हो तो जितेन्द्रिय और गुणी होता है। चन्द्रमा की राशि या नवमांश हो तो कामी तथा मनोहर स्वरूप वाला होता है। शुक्र की राशि या नवमांश सप्तम में हो तो उसका पति भाग्यवान् और मनोहर रूप वाला होता है। सूर्य की राशि या नवमांश सप्तम भाव में हो तो उस स्त्री का पति अत्यन्त कोमल और कर्मठ होता है ॥३०९-३१०॥

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पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४३५ शुक्राब्जयोर्लग्नगयोः सुखिनीर्ष्यासन्विता । ज्ञेन्द्वोः कलासु निपुणा सुखिता च गुणान्विता ॥३११॥ शुक्रेज्ञयोस्तु सुभगा कलाज्ञा रुचिरांगना । अनेकसौख्यार्थगुणा लग्ने सौम्यत्रये स्थिते ॥३१२॥ क्रूरेऽष्टमेऽष्टमेशांशे यस्य स्यात्तद्वयः समे । वैधव्यं च मृतिस्तस्या स्वयं सत्स्वर्थगेषु तु ॥३१३॥ अल्पापत्यत्वमब्जेऽस्याः कन्यालिहरिगोष्ठ तु । सौरे मध्यबले चन्द्रशुक्रेज्ञर्बलवर्जितैः ॥३१४॥ शेषैः सबीर्यैरोजर्क्षे लग्ने कुरूपिणी भवेत् । जीवार्कविसौम्येषु बलिषु समभे तनौ ॥३१५॥ विख्यातानेकशास्त्रज्ञा वनिता ब्रह्मवादिनी । पापेऽस्ते नवमस्थस्य प्रव्रज्यानेति भामिनी ॥३१६॥ उद्वाहे वरणे प्रश्ने सर्वमेतद्धि चिंतयेत् । मृत्युस्थानं पश्यतां स्याद्बलिना धातुकोषतः ॥२१७॥ नृणां मृत्युहितं युक्तं भगात्रोत्थोपथसूरिभिः । सबीर्येर्बहुजोऽप्यापक्षत्ज्वररुगुद्भवः ॥३१८॥ तदृग्द्भवश्चाष्टमस्थैः सूर्याद्यैश्चं चरादिषु । परस्वाध्वप्रदेशेषु मृत्युः सूर्यमहीजयोः ॥३१९॥ स्वबंधुस्थितयोः पुंसः शैलाग्राभिरतस्य च । बंध्वस्तकर्मगैर्मन्दचन्द्रभूजैः प्रहौ मृतिः ॥३२०॥ स्त्रियां हिमोष्णकरयोः स्वजनात्पापदृक्तयोः । तोयमृतो रवौन्दू तु स्यातां यद्युभयोदये ॥३२१॥ शुक्र और चन्द्रमा लग्न में हों तो वह स्त्री सुखिनी तथा ईर्ष्यालु होतो है । यदि बुध और चन्द्रमा लग्न में हों तो कलाओं को जानने वालो तथा सुख और गुणों से युक्त होतो है शुक्र और बुध लग्न में हों तो सौभाग्यवती, कलाओं को जानने वाली और परमसुन्दरी होती है। लग्न में तीन शुभग्रह हों तो वह अनेक प्रकार के सुख, धन और गुणों से युक्त होती है ॥३११-३१२॥ पापग्रह अष्टम भाव में हो तो वह स्त्री अष्टमेश जिस ग्रह के नवमांश में हो उस ग्रह के पूर्वकथित बाल्य आदि वयस् में विधवा होती है। यदि द्वितीय भाव में शुभग्रह हों तो वह स्त्री स्वयं ही स्वामी के सम्मुख मृत्यु को प्राप्त होती है। कन्या, वृश्चिक, सिंह या वृष राशि में चन्द्रमा हों तो स्त्री थोड़ी संततिवाली होती है, यदि शनि मध्यम बली तथा चन्द्रमा, शुक्र और बुध ये तीनों निर्बल हों तथा शेष ग्रह (सूर्य मंगल और गुरु) बली होकर विषम राशि-लग्न में हों तो वह स्त्री कुरूपा होती है ॥३१३-३१४½॥ गुरु, मंगल, शुक्र, बुध ये चारों बली होकर समराशि लग्न में स्थित हों तथा वह स्त्री अनेक शास्त्रों को जानने वाली ब्रह्मवादिनी तथा लोक में विख्यात होती है ॥३१५½॥ जिस स्त्री के जन्म लग्न से सप्तम में पाप ग्रह हो और नवम भाव में कोई ग्रह हो स्त्री तो पूर्वकथित नवमस्थ ग्रहजनित प्रव्रज्या को प्राप्त होती है। इन (कहे हुए) विषयों का विवाह वरण या प्रश्नकाल में भी विचार करना चाहिए ॥३१६½॥ निर्वाण (मृत्यु) विचार— लग्न से अष्टम भाव को जो ग्रह देखते हैं, उनमें जो बलवान् हो उसके धातु (कफ, पित्त या वात) के प्रकोप से जातक (स्त्री-पुरुष) का मरण होता है। अष्टम भाव में जो राशि हो, वह कालपुरुष के जिस अंग (मस्तकादि) में पड़ती हो, उस अंग में रोग होने से जातक का मरण होता है। बहुत ग्रहों की दृष्टि या योग हो तो उन-उन ग्रहों से सम्बन्ध रखने वाले रोगों से मरण होता है। अष्टम में सूर्य हो तो अग्नि से, चन्द्रमा हो तो जल से, मंगल हो तो शस्त्रघात से, बुध हो तो ज्वर से, गुरु हो तो अज्ञात रोग से, शुक्र हो तो प्यास से और शनि हो तो भूख से मरण होता है। तथा अष्टम भाव में चर राशि हो तो परदेश में, स्थिर राशि हो तो स्वस्थान में और द्विस्वभाव राशि हो तो मार्ग में मृत्यु होती है। सूर्य और मंगल यदि १०, ४ भाव में हों तो पर्वत आदि उच्च स्थान से गिरने से मनुष्य की मृत्यु होतो है ॥३१७-३१९½॥ ४, ७, १० भावों में यदि शनि, चन्द्र, मंगल हों तो कुएं में गिरकर मृत्यु होती है। कन्याराशि में सूर्य और चन्द्रमा दोनों हों, उन पर पापग्रह की दृष्टि हो तो अपने सम्बन्धी के द्वारा मरण होता है। यदि उभयोदय (मीन) लग्न में चन्द्रमा और सूर्य दोनों हों तो जल में मरण होता है। यदि मंगल की राशि में स्थित चन्द्रमा दो पापग्रहों के बीच में हो तो शस्त्र या अग्नि से मृत्यु होती है ॥३२०-३२१½॥

४३६ नारदीयपुराणम् शस्त्राग्निरोगोऽशुभांतस्थे चंद्रे भौमगृहस्थिते । मृत्युश्चाथ मृगे चंद्रे कर्के मंदे जलोदरात् ॥३२२॥ स्त्रियामिदौ रक्तशोथात्सौरैरज्ज्वग्निपातजः । पुत्रधर्मस्थस्योर्बधात्पापयोः सददृष्टयोः ॥३२३॥ सपाशसर्पनिगडेॄङ्केमृत्यौ तु बंधनः । स्त्रियां सपापेऽब्जे द्यूने सिते मेषे रवौ तनौ ॥३२४॥ मरणं स्वीकृते गेहे ह्यथ तुर्य कुजे रवौ । यमे खैऽगत्रिकोणस्थैः क्षीणचंद्राशुभैः सकृत् ॥३२५॥ तुर्येऽर्के खे कुजे क्षीणचन्द्रदृष्टे समिद्धतः । रंध्रखांग जलैः क्षीणेंद्वारार्किविसंयुतैः ॥३२६॥ लकुटेनाथ तैरैव खांकांगतययस्थितैः । धूमानिबंधनैः कार्यः कुदनैर्मरणं भवेत् ॥३२७॥ बंध्वस्तखस्थैभौमार्कमंदैः शस्त्राग्निराजभिः । सौरेंद्वारैः स्वांबुखस्थैः क्षतकेभ्यंगया ततः ॥३२८॥ खेऽर्के तुर्ये कुजे यानपातादथ कुजेऽस्तगे । यंत्रोसीदुनतः क्षीणचंद्रयुक्ते मृतिमर्वेत् ॥३२९॥ भौमार्कशीतकिरणैर्जूकाशशनिभस्थितैः । क्षीणेंद्वर्ककुजैः खास्तांबुस्थैर्वारकरे मृतिः ॥३३०॥ बल्यारदृष्टे क्षीणेदौ मंदे निधनसंस्थिते । गुह्यरुक्क्रिमिशस्त्राग्निदाहजो मृत्युरंगिनः ॥३३१॥ सौरेऽर्केऽस्ते मृतो मंदे क्षीणेदौ भुव्यसंयुते । लग्नध्यायास्तपःस्थार्कभौमचन्द्रनिशाकरैः ॥३३२॥ शैलशृंगस्वरग्रपातोर्नुनिधनं भवेत् । दृक्कोत्तरे तुर्द्वाविंशस्तत्पतिर्मृत्युपोपि वा ॥३३३॥ मकर में चन्द्रमा और कर्क में शनि हो तो जलोदर रोग से मरण होता है। कन्याराशि में स्थित चन्द्रमा दो पापग्रहों के बीच में हो तो रक्तशोथ रोग से मृत्यु होती है, यदि दो पापग्रहों के बीच में स्थित चन्द्रमा, शनि की राशि (मकर और कुम्भ) में हों तो रज्जु (रस्सी), अग्नि अथवा ऊंचे स्थान से गिरकर मृत्यु होती है। ५, ९ भावों में पापग्रह हों और उन पर शुभग्रह की दृष्टि न हो तो बन्धन से मृत्यु होती है ॥३२३॥ अष्टम भाव में पाश, सर्प या निगड द्रेष्काण हो तो भी बंधन से ही मृत्यु होती है। पापग्रह के साथ बैठा हुआ चन्द्रमा यदि कन्याराशि में होकर सप्तम भाव में स्थित हो तथा मेष में शुक्र और लग्न में सूर्य हों तो अपने घर में स्त्री के निमित्त से मरण होता है। चतुर्थ भाव में मंगल या सूर्य हों, दशम भाव में शनि हो और लग्न, ५, ९ भावों में पापग्रहसहित चन्द्रमा हो अथवा चतुर्थ भाव में सूर्य और दशम में मंगल रहकर क्षीण चन्द्रमा से दृष्ट हों तो इन योगों में काष्ठ से आहत होकर मृत्यु होती है ॥३२४-३२५॥ यदि ८, १०, लग्न, तथा ४ भावों में क्षीण चन्द्रमा, मंगल, शनि और सूर्य हों तो लाठी के प्रहार से मृत्यु होती है। यदि वे ही (क्षीण चन्द्रमा, मंगल, शनि तथा सूर्य) १०, ९, लग्न और ५ भावों में हों तो मुद्गर आदि के आघात से मृत्यु होती है ॥३२६-३२७॥ यदि ४, ७, १० भावों में क्रमशः मंगल, रवि और शनि हों तो शस्त्र, अग्नि तथा राजा के द्वारा मृत्यु होती है यदि शनि, चन्द्रमा और मंगल-ये २, ४, १० भावों में हों तो कीड़ों के क्षत से मरण होता है ॥३२८॥ यदि दशम भाव में सूर्य और चतुर्थ भाव में मंगल हों तो सवारी पर से गिरने के कारण मृत्यु होती है। यदि क्षीण चन्द्रमा के साथ मंगल सप्तम भाव में हो तो यन्त्र (मशीन) के आघात से मृत्यु होती है ॥३२९॥ यदि मंगल, शनि और चन्द्रमा - ये तुला, मेष तथा शनि की राशि (मकर, कुम्भ) में हों अथवा क्षीण चन्द्रमा, सूर्य और मंगल - थे १०, ७, ४ भावों में स्थित हो तो विष्ठा के समीप मृत्यु होती है ॥३३०॥ क्षीण चन्द्रमा बली, मंगल से दृष्ट हो और शनि सप्तम भाव में हो तो गुह्य (बवासीर आदि) रोग या कीड़ा, शस्त्र, अग्नि अथवा काष्ठ के आघात से मृत्यु होती है। मंगल सहित सूर्य सप्तम भाव में, शनि अष्टम में और क्षीण चन्द्रमा चतुर्थ भाव में हो तो पक्षी द्वारा मृत्यु होती है, यदि लग्न, ५, ८, ९ भावों सूर्य, मंगल, शनि और चन्द्रमा हों तो पर्वत-शिखर से गिरने के कारण अथवा वज्रपात से या दीवार गिरने से मृत्यु होती है ॥३३१-३३२॥ लग्न से १२ वां द्रेष्काण अर्थात् अष्टम भाव का द्रेष्काण जो हो उसका स्वामी अथवा अष्टम भाव का स्वामी- ये दोनों या इनमें से जो बली हो वह अपने गुणों से (पूर्वोक्त अग्निशस्त्रादि द्वारा) मनुष्य के लिए मरण-

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४३७ स्वगुणैर्निधनं कुर्याद्वलवान्यो द्वयोर्भवेत् । लग्नांशेशसदृक्स्थाने मृत्युर्योगेक्षणादिभिः ॥३३४॥ मोहोऽतेनुदितांशस्य तुल्यो द्विघ्नः स्वपेक्षते । शुभेक्षिते तु त्रिगुणः कल्प्यमन्यत्स्वबुद्धितः ॥३३५॥ वह्न्यम्बुभस्मसकलेदशोषव्यालैर्मृतिस्थितैः । बिद्रुतश्चिन्तनीयश्च यथोक्तो मृत्युरंगिनः ॥३३६॥ गुरुः शशांकशुक्रौ च सूर्यभौमौ यमेंदुजौ । देवपित्रतिरक्तोथ नारकान्कुर्युरष्टमे ॥३३७॥ रवींदुबलवंशनाथाच्छ्रेष्ठसममाधमाः । तुंगः सांदन्केनुगतिः षड्‌भ्रदृक्कपः ॥३३८॥ द्यूनस्थितो गुरुर्वापि रिपुकेंद्रविनाशगः । स्वोच्चस्थोऽंगे व्यये सौम्यभागे मोक्षो बलान्यतः ॥३३९॥ आधाने जन्मज्ञाने तु वृक्षतां लग्नतो वदेत् । पूर्वापराद्धैर्लग्नस्य सौम्ये वाच्यपनेजनिः ॥३४०॥ कारक होता है । लग्न में जो नवमांश होता है, उसका स्वामी जो ग्रह हो, उसके समानस्थान (अर्थात् वह जिस राशि में हो उस राशि का जैसा स्थान बताया गया है, वैसे स्थान) तथा उस पर जिस ग्रह का योग या दृष्टि हो उसके समान स्थान में, परदेश में मनुष्य का मरण होता है तथा लग्न के जितने अंश अनुदिन (भोग्य) हों, उन अंशों में जितने समय हों उतने समय तक मरणकाल में मोह होता है। यदि उस पर अपने स्वामी की दृष्टि हो तो उससे द्विगुणित समय पर्यन्त मोह होता है। शुभग्रह की दृष्टि हो त्रिगुण मोह होता है। इस विषय की अन्य बातें अपनी बुद्धि से विचार कर समझनी चाहिए ॥३३३-३३५॥ शव-परिणाम-अष्टम स्थान में जिस प्रकार का द्रेष्काण हो उसके अनुसार देहधारी की मृत्यु और उसके शव के परिणाम पर विचार करना चाहिए । यथा अग्नि (पापग्रह) का द्रेष्काण हो तो मृत्यु के बाद उसका शव जलाकर भस्म किया जाता है । जल (सौम्य) द्रेष्काण हो तो जल में फेंका जाने पर वहीं गल जाता है। यदि सौम्य द्रेष्काण पापग्रह से युक्त या पाप द्रेष्काण शुभग्रह से युक्त हो तो शव न जलाया जाता है, न जल में गलाया जाता है; अपितु सूर्यकिरण और वायु से सूख जाता है। यदि सर्प द्रेष्काण अष्टम भाव में हो तो उस शव को गीदड़ और कौए आदि नोंचकर खाते हैं ॥३३६॥ पूर्वजन्मस्थिति-सूर्य और चन्द्रमा में जो अधिक बलवान् हो, वह जिस द्रेष्काण में स्थित हो उस द्रेष्काण के स्वामी के अनुसार पूर्वजन्म की स्थिति समझी जाती है। यथा- उक्त द्रेष्काण का स्वामी गुरु हो तो जातक पूर्वजन्म में देवलोक में था। चन्द्रमा या शुक्र द्रेष्काण का स्वामी हो तो वह पितृ लोक में था। सूर्य या मंगल द्रेष्काण का स्वामी हो तो वह जातक पहले जन्म में भी मृत्युलोक में ही था और शनि या बुध हो तो वह पहले नरक लोक में रहा है-ऐसा समझना चाहिए। यदि उक्त द्रेष्काण का स्वामी अपने उच्च में हो तो जातक पूर्वजन्म में देवादि लोक में श्रेष्ठ था । यदि उच्च और नीच के मध्य में हो तो उस लोक में उसकी मध्यम स्थिति थी और यदि अपने नीच में हो तो वह उस लोक में निम्न कोटि की अवस्था में था- ऐसा उच्च और नीच स्थान के तारतम्य से समझना चाहिए ॥३३७॥ गति-भावी जन्म की स्थिति-षष्ठ और अष्टम भाव के द्रेष्काणों के स्वामी में से जो अधिक बली हो, मरने के बाद जातक उसी ग्रह के (पूर्वदर्शित) लोक में जाता है तथा सप्तम स्थान में स्थित ग्रह बली हो तो वह अपने लोक में ले जाता है ॥३३८॥ मोक्ष-योग-यदि वृहस्पति अपने उच्च में होकर ६, १, ४, ७, ८, १० अथवा १२ में शुभग्रह के नवमांश में हो और अन्य ग्रह निर्बल हों तो मरण होने पर मनुष्य का मोक्ष होता है। यह योग जन्म और मरण दोनों कालों से देखना चाहिए ॥३३९॥ अज्ञात जन्म-समय को जानने का प्रकार-जिस व्यक्ति के आधान या जन्म का समय अज्ञात हो, उसके प्रश्नलग्न से जन्म-समय समझना चाहिए। प्रश्नलग्न के पूर्वार्ध (१५ अंश तक) में उत्तरायण और उत्तरार्ध (१५ अंश के बाद) में दक्षिणायन जन्म का समय समझना चाहिए। त्र्यंश (द्रेष्काण) द्वारा क्रमशः लग्न,

४३८ नारदीयपुराणम् लग्नत्रिकोणे धीज्यत्यंशेविकल्पावयवाः समाः । ग्रीष्मोगेऽर्के परे रम्यापनतांप्रतुरर्कभात् ॥३४१॥ चन्द्रज्ञजीवावृव्यस्याः शुक्रारार्किभिरन्यथा । दृक्केराद्यैः पूर्वमासस्तिथिस्तत्वानुपातः ॥३४२॥ विलोमजन्म भागैश्च वेला रात्रियुसंज्ञके । त्रिकोणोत्तमवार्यवि लग्नं वा लग्भनामने ॥३४३॥ यावदूनो विधुर्लग्नात्तावच्चंद्राच्च जन्मभे । गोहरी युग्मवसुभे क्रियजूके मृगांगने ॥३४४॥ दशाष्टसप्तविषये गुण्याः शेषाः स्वसंख्यया । जीवसोमकर्विज्ञाः स्युः राघवाद्यायरेञ्जवत् ॥३४५॥ भानां नित्यो विधिः खेटवशाद्वर्गणास्तथा । सप्तघ्नं भहृतं शेषमृक्षं नवधनर्णतः ॥३४६॥

५, ९ राशि में गुरु समझकर फिर प्रश्नकर्ता के वयस् के अनुसार वर्षमान की कल्पना करनी चाहिए। लग्न में सूर्य हो तो ग्रीष्म ऋतु, अन्यथा अन्य ग्रहों के ऋतु का वर्णन पहले किया जा चुका है। अयन और ऋतु में भिन्नता हो तो चन्द्रमा, बुध और गुरु की ऋतुओं के स्थान में क्रम से शुक्र, मंगल, शनि की ऋतु परिवर्तित करके समझना चाहिए तथा ऋतु सर्वथा सूर्य की राशि से ही (सौर मास से ही) ग्रहण करनी चाहिए। इस प्रकार अयन और ऋतु के ज्ञान होने पर लग्न के द्रेष्काण में पूर्वार्ध हो तो ऋतु का प्रथम मास, उत्तरार्ध हो तो द्वितीय मास समझना चाहिए तथा द्रेष्काण के पूर्वार्ध या उत्तरार्ध के भुक्तांशों से अनुपात द्वारा तिथि (सूर्य के गत अंशादि) का ज्ञान करना चाहिए ॥३४०-३४२॥ दिन-रात्रि-जन्म-ज्ञान--प्रश्नलग्न में दिनसंज्ञक, रात्रिसंज्ञक राशियां हों तो विलोम क्रम से (दिनसंज्ञक राशि में रात्रि और रात्रिसंज्ञक राशि में दिन) जन्म का समय समझना चाहिए और लग्न के अंशादि से अनुपात द्वारा इष्ट घट्यादि को समझना चाहिए ! जन्मलग्नज्ञान--केवल जन्मलग्न जानने के लिए प्रश्नकर्ता प्रश्न करे तो लग्न से १, ५, ९ में जो राशि बली हो, वही उसका जन्मलग्न समझना चाहिए अथवा वह जिस अंग का स्पर्श करते हुए प्रश्न करे, उस अंग की राशि को ही जन्मलग्न कहना चाहिए ॥३४३॥ जन्मराशिज्ञान--जन्म-राशि जानने के लिए प्रश्न करे तो प्रश्नलग्न से जितने आगे चन्द्रमा हो, चन्द्रमा से उतने ही आगे जो राशि हो वह पूछने वाले की जन्मराशि समझनी चाहिए ॥३४३१/२॥ प्रकारान्तर से अज्ञात जन्मकालादि का ज्ञान--प्रश्नलग्न में वृष या सिंह हो तो लग्नराश्यादि को कलात्मक बनाकर १० से गुणा करे। मिथुन या वृश्चिक हो तो ८ से, मेष या तुला हो तो ७ से, मकर या कन्या हो तो ५ से गुणा करे। शेष राशियों (कर्क, धन, कुम्भ, मीन) में से कोई लग्न हो तो उसकी कला को अपनी संख्या से (जैसे-कर्क को ४ से) गुणा करे। यदि लग्न में ग्रह हो तो फिर उसी गुणनफल को ग्रहगुण कों से भी गुणा करे। जैसे--बृहस्पति हो तो १० से, मंगल हो तो ८ से, शुक्र हो तो ७ से, बुध हो तो ५ से, अन्य ग्रह (रवि) शनि और चन्द्रमा) हों तो ५ से गुणा करे। इस प्रकार लग्न की राशि के अनुसार गुणन तो निश्चित ही रहता है। यदि उसमें ग्रह हो तभी ग्रह का गुणन भी करना चाहिए। जितने ग्रह हों, सबके गुणक से गुणा करना चाहिए। इस प्रकार गुणनफल को ध्रुवपिण्ड मानकर उसको ७ से गुणा कर २७ के द्वारा भाग देकर १ आदि शेष के अनुसार अश्विनी आदि जन्मनक्षत्र समझना चाहिए। इस प्रणाली में विशेषता यह है कि उक्त रीति से आयी हुई संख्या में कभी ९ जोड़कर और कभी ९ घटाकर नक्षत्र लिया जाता है ॥३४४-३४६॥

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४३६ द्विघ्ने समर्तुमासाः स्युः पक्षतिथ्यौ गजाहते । सप्तघ्नं होनिशाक्षणीबुधैर्नागांशेष्टहोरिका ॥३४७॥ पुमान्परशुधृक्कृष्णो रक्तदृग्रक्षितुं क्षमः । तृषार्तकपदाश्वास्यो रक्तवस्त्रो घटाकृतिः ॥३४८॥ कपिलो ह्यधदृक्क्रूरो रक्तवस्त्रः क्षतव्रतः । क्षुत्तृषातर्तिदुग्धपटो लूनकुंचितमूर्धजः ॥३४९॥ मलिनः क्षुत्परोजास्यो दक्षः कृष्यादिकर्मणि । द्विपकायः सरभपात्पिंगलो व्याकुलांतरः ॥३५०॥ सौचिकीरूपिणी साध्वी ह्यप्रजोच्छ्रितपाणिका । उद्याने कवची धन्वी क्रीडेच्छुर्गस्डाननः ॥३५१॥ नृत्यादिविद्वरुणवद्वहुरत्नोधनुर्धरः । द्विपास्यकंठक्रोडास्यः काननेशरमाहिकः ॥३५२॥ आतन्वशाखां पालाशीं रौति मूर्द्धाहिकर्कशा । चिपिटास्यो हि संवीतो नौस्थः स्त्यर्थवज्रज्जले ॥३५३॥ तथा उक्त ध्रुवपिण्ड को १० से गुणा करके गुणनफल से वर्ष, ऋतु और और मास समझे । पक्ष और तिथि जाननी हो तो ध्रुवपिण्ड को ८ से गुणा करके २ से भाग देकर एक शेष हो तो शुक्ल पक्ष और दो शेष हो तो कृष्णपक्ष समझे । इसमें भी ९ जोड़ या घटाकर ग्रहण करना चाहिए । अर्थात् गुणनफल में ९ जोड़ या घटाकर भाग देना चाहिए । इसी प्रकार पक्षज्ञान होने पर गुणनफल में ही १५ से भाग देकर शेष के अनुसार प्रतिपदा आदि तिथि समझे तथा अहोरात्र जानना हो तो ध्रुवपिण्ड को ७ से गुणा करके दो से भाग देकर एक शेष हो तो दिन और दो शेष हो तो रात्रि समझे । लग्न-नवमांश, इष्ट-घड़ी तथा होरा जानना हो तो ध्रुवपिण्ड को ५ से गुणा करके अपने-अपने विकल्प से (अर्थात् लग्न जानने के लिए १२ से, इष्टघड़ी जानने के लिए ६० से) अथवा दिन या रात का ज्ञान होने पर दिनमान या रात्रिमान-घटी से), नवमांश के लिए ९ से तथा होरा के लिए २ से भाग देकर शेष द्वारा सबका ज्ञान करना चाहिए । इस प्रकार जिनके जन्मसमय आदि का ज्ञान न हो उनके लिए इन सब बातों का विचार करना चाहिए ॥३४७॥ द्रेष्काण का स्वरूप-हाथ में फरसा लिये हुए काले रंग का पुरुष, जिसकी आँखें लाल हों और जो सब जीवों की रक्षा करने में समर्थ हो, मेष के प्रथम द्रेष्काण का स्वरूप है । प्यास से पीडित एक पैर से चलने वाला, घोड़े के समान मुख, रक्तवस्त्रधारी और घड़े के समान आकार--यह मेष के द्वितीय द्रेष्काण का स्वरूप है ॥३४८॥ कपिलवर्ण, क्रूरदृष्टि, क्रूरस्वभाव, लाल वस्त्रधारी और अपनी प्रतिज्ञा भंग करने वाला-यह मेष के तृतीय द्रेष्काण का स्वरूप है । भूख और प्यास से पीडित, कटे-छँटे घुँघराले केश तथा दूध के समान धवल वस्त्र-यह वृष के प्रथम द्रेष्काण का स्वरूप है ॥३४९॥ मलिनशरीर भूख से पीडित, बकरे के समान मुख और कृषि आदि कार्यों में कुशल -यह वृष के दूसरे द्रेष्काण का रूप है । हाथी के समान विशालकाय, शरभ के समान पैर वाला, पिंगलवर्ण और व्याकुलचित्त--यह वृषभ के तीसरे द्रेष्काण का स्वरूप है ॥३५०॥ सुई से सीने- पिरोने का काम करने वाली, रूपवती, सुशीला तथा सन्तानहीना नारी, जिसने हाथ को ऊपर उठा रखा है, मिथुन का प्रथम द्रेष्काण है। कवच और धनुष धारण किये हुए उपवन में क्रीडा करने की इच्छा से उपस्थित गरुडसदृश मुख वाला पुरुष मिथुन का दूसरा द्रेष्काण है ॥३५१॥ नृत्य आदि की कला में प्रवीण, वरुण के समान रत्नों के अनन्त भांडार से भरा-पूरा, धनुर्धर वीर पुरुष मिथुन का तीसरा द्रेष्काण है। गणेश के समान कण्ठ, शूकर के सदृश मुख, शरभ के-से पैर और वन में रहने वाला-यह कर्क के प्रथम द्रेष्काण का रूप है ॥३५२॥ सिर पर सर्प धारण किये, पलास की शाखा पकड़कर रोती हुई कर्कशा स्त्री--यह कर्क दूसरे द्रेष्काण का स्वरूप है । चिपटा मुख, सर्प से वेष्टित, स्त्री की खोज में नौका पर बैठकर जल में यात्रा करने वाला पुरुष-यह कर्क के तीसरे द्रेष्काण का रूप है ॥३५३॥ सेमल के वृक्ष के नीचे गोदड़ और गोध को लेकर रोता

४४० नारदीयपुराणम् श्वा नरो जंबुकंगृध्रं गृहीत्वा रौति शाल्मलौ । धन्वी कृष्णाजिनो सिंहवाश्वोन्नतमातुरः ॥३५४॥ फलामिषघ्नः कूर्ची ना भल्लास्यः कपिचेष्टितः । पुष्पपूर्णघटाकन्याविद्येल्ला मलिनांबरा ॥३५५॥ धन्वी व्ययापकृच्छ्यामो लिपिकृद्रोमशोनरः । गौरीधौतांशु कासूच्चाकुंभहस्तासुरालये ॥३५६॥ मानोन्मान्मापसोतौलीभांडमुल्यविविंचतकः । क्षुत्तृड्युतो नरः कुंभीगोध्वास्यः स्त्रीसुतोपगः ॥३५७॥ धन्वीकिंतरचेष्टस्तु हेमवर्मामृगानुगः । सिंधु कूलंव्रजंतीस्त्रीनानासर्पसितांध्रिका ॥३५८॥ सौख्यस्पृहाह्रावृतांगीमर्व्रथंकच्छपाकृतिः । कूर्मास्यो मलये सिंहः श्वक्रोडमृगभीषकः ॥३५९॥ वास्यः श्वकायो धानुष्को रक्षस्तापसयज्ञिये । चंपकाभासने मध्या सिंधुरत्नविवर्द्धिनी ॥३६०॥ कूर्चासने चंपकाभो दंडो कौशेयकानिनी । परमोऽर्थे गृध्रमुखः स्नेहमद्याशनस्पृहः ॥३६१॥ दग्धानस्था लोहधरा समूषाभांडकच्चरा । भांडी रोमश्रवाः श्यामः किरीटी फलयंतधृक् ॥३६२॥ हुआ कुत्ते-जैसा मनुष्य--यह सिंह के प्रथम द्रेष्काण का स्वरूप है। धनुष और कृष्णमृगचर्म धारण किये, सिंह सदृश पराक्रमी तथा घोड़े के समान आकृति वाला मनुष्य--यह सिंह के दूसरे द्रेष्काण का स्वरूप है ॥३५४॥ फल और भोज्य पदार्थ रखने वाला, लम्बी दाढ़ी से सुशोभित, भालू जैसा मुख और वानरों के चंचल स्वभाववाला मनुष्य सिंह के तृतीय द्रेष्काण का रूप है। फूल से भरे कलश वाली, विद्याभिलाषिणी, मलिन वस्त्रधारिणी कुमारी कन्या--यह कन्या राशि के प्रथम द्रेष्काण का स्वरूप है। हाथ में धनुष, आय-व्यय का हिसाब रखने वाला, श्याम वर्ण शरीर, लेखनकार्य में चतुर तथा रोएं से भरा मनुष्य--यह कन्या राशि के दूसरे द्रेष्काण का स्वरूप है। गोरे अंगों पर धुले हुए स्वच्छ वस्त्र, ऊँचा कद, हाथ में कलश लेकर देव-मन्दिर की ओर जाती हुई--यह कन्या राशि के तीसरे द्रेष्काण का परिचय है ॥३५५-३५६॥ हाथ में तराजू और बटखरे लिये बाजार में वस्तुएं तोलने वाला तथा बरतन-भांडों की कीमत कूतने वाला पुरुष तुलाराशि का प्रथम द्रेष्काण है। हाथ में कलश लिये भूख- प्यास से व्याकुल तथा गोध के समान मुखवाला पुरुष, जो स्त्री पुत्र के साथ विचरता है, तुला का दूसरा द्रेष्काण है ॥३५७॥ हाथ में धनुष लिये हरिण का पीछा करने वाला, किन्नर के समान चेष्टा वाला, सुवर्ण कवचधारी पुरुष तुला का तृतीय द्रेष्काण है। एक नारी, जिसके पैर नाना प्रकार के सर्प लिपटे होने से श्वेत दिखाई देते हैं, समुद्र से किनारे की ओर जा रही है, यही वृश्चिक के प्रथम द्रेष्काण का रूप है ॥३५८॥ जिसके सब अंग सर्पों से ढके हैं और आकृति कछुए के समान है तथा जो स्वामी के लिए सुख की इच्छा करने वाली है, ऐसी स्त्री वृश्चिक दूसरा द्रेष्काण है। मलयगिरि का निवासी सिंह, जिसकी मुखाकृति कछुए-जैसी है, कुत्ते, सूकर और हरिण आदिका को डरा रहा है, वही वृश्चिक का तीसरा द्रेष्काण है ॥३५९॥ मनुष्य के समान मुख, घोड़े-जैसा शरीर, हाथ में धनुष लेकर तपस्वी और यज्ञों की रक्षा करनेवाला पुरुष धनु राशि का प्रथम द्रेष्काण है। चम्पापुष्प के समान कान्तिवाली, आसन पर बैठी हुई, समुद्र के रत्नों को बढ़ाने वाली, मझोले कद की स्त्री धनु का दूसरा द्रेष्काण है ॥३६०॥ दाढ़ी-मूंछ बढ़ाये, आसन पर बैठा हुआ, चम्पापुष्प के समान कान्तिमान्, दण्ड, पट्टवस्त्र और मृगचर्म धारण करने वाला पुरुष धनु का तीसरा द्रेष्काण है। (मगर के समान दाँत, रोएं से भरा शरीर तथा सूअर जैसी आकृति वाला पुरुष मकर का प्रथम द्रेष्काण है। कमलदल के समान नेत्रों वाली, आभूषणप्रिया, श्यामा स्त्री मकर का दूसरा द्रेष्काण है। हाथ में धनुष, कम्बल, कलश और कवच धारण करने वाला किन्नर के समान पुरुष मकर का तीसरा द्रेष्काण है।) गोध के समान मुख, तेल, घी और मधु पीने की इच्छा वाला, कम्बलधारी पुरुष कुम्भ का प्रथम द्रेष्काण है, हाथ में लोहा, शरीर में आभूषण, तथा मस्तक पर भाँड़ (बर्तन) लिये मलिन वस्त्र पहनकर जली गाड़ी पर बैठी हुई स्त्री कुम्भ का दूसरा द्रेष्काण है। कान में बड़े-बड़े रोम,

नौस्थोऽधौसंविधिभूषार्थं नानारत्नकरोचितः । नौस्थाब्धेः कूलमायांती सयूथां चम्पकानना ॥३६३॥ गर्ते सर्पावृतो नग्नो रुदंश्चौरानलादितः । एतादृशाः क्रियाश्चास्तु षड्विंशदुदिताः क्रमात् ॥३६४॥ एतत्संक्षेपतः प्रोक्तं जातकं मुनिसत्तम । निबोध संहितास्कंधं लोककृत्युपयोगिनम् ॥३६५॥ इति श्रीनारदीयपुराणे पूर्वभागे द्वितीयपादे बृहदुपाख्याने जातकनिरूपणन्नाम पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५५॥ अथ षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः सनंदन उवाच क्रमाच्चैत्रादिमासेषु मेषाद्याः संक्रमा मताः । चैत्रशुक्लप्रतिपदि यो वारः स नृपः स्मृतः ॥१॥ मेषप्रवेषे सेनानीः कर्कटे शस्यपो भवेत् । समोद्यधीशवरः सूर्यो मध्यमश्चोत्तमो विधुः ॥२॥ नेष्टः कुजो बुधो जीवो भृगुस्त्वतिशुभंकरः । अधमो रविजो वाच्यो ज्ञात्वा चैषां बलाबलम् ॥३॥

शरीर में श्याम कान्ति, मस्तक पर किरीट तथा हाथ में फल-पत्र धारण करने वाला बर्तन का व्यापारी कुम्भ का तीसरा द्रेष्काण है। भूषण बनाने के लिए नाना प्रकार के रत्नों को हाथ में लेकर समुद्र में नौका पर बैठा हुआ पुरुष मीन का प्रथम द्रेष्काण है। जिसके मुख की कान्ति चम्पा के पुष्प के सदृश मनोहर है, वह अपने परिवार के साथ नौका पर बैठकर समुद्र के बीच से तट की ओर आती हुई स्त्री मीन का दूसरा द्रेष्काण है। गड्ढे के समीप तथा चोर और अग्नि से पीड़ित होकर रोता हुआ, सर्प से वेष्टित, नग्न शरीर वाला पुरुष मीन राशि का तीसरा द्रेष्काण है। इस प्रकार मेषादि बारह राशियों में होने वाले छत्तीस द्रेष्काणों के रूप क्रम से बताये गये हैं। मुनिश्रेष्ठ नारद ! यह संक्षेप में जातक नामक स्कन्ध कहा गया है। अब लोक व्यवहार के लिए उपयोगी संहिता स्कन्ध का वर्णन सुनो ॥३६१-३६५॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वभाग के द्वितीयपाद में जातक निरूपण नामक पचपनवां अध्याय समाप्त ॥५५॥

अध्याय ५६ त्रिस्कन्ध ज्योतिष का संहिताप्रकरण (विविध उपयोगी विषयों का वर्णन) सनन्दन बोले-नारद ! चैत्रादि मासों में क्रमशः मेषादि राशियों में सूर्य की संक्रान्ति होती है। चैत्र- शुक्ल-प्रतिपदा के आरम्भ में जो वार (दिन) हो, वही ग्रह उस (चान्द्र) वर्ष का राजा होता है। सूर्य के मेषराशि-प्रवेश के समय जो वार हो वह सेनापति (या मन्त्री) होता है। कर्क राशि की संक्रान्ति के समय जो वार हो, वह सस्य का अधिपति होता है। उक्त वर्ष आदि का अधिपति यदि सूर्य हो तो मध्यम (शुभ और अशुभ दोनों) फल देता है। चन्द्रमा हो तो उत्तम फल देता है। मंगल अधिपति हो तो (अशुभ) फल देता है। बुध, गुरु और शुक्र-ये तीनों अतिउत्तम फल देते हैं। शनि अधिपति हो तो अशुभ फल होता है। इन ग्रहों के बलाबल देखकर तदनुसार इसके न्यून या पूर्ण फल समझने चाहिए ॥१-३॥ ५६ ना० पु०

४४२ नारदीयपुराणम् दंडाकारे कबन्धे वा ध्वांक्षाकारेडथ कीलके । दृष्टेऽर्क्रमण्डले व्याधिभ्रान्तिश्चोरार्थनाशनम् ॥४॥ छत्रध्वजपताकाद्यसन्निभैस्तिमितैर्ध्वनैः । रविमंडलगैर्धूमैः सस्फुलिंगैर्जगत्क्षयः ॥५॥ सितरक्तैः पीतकृष्णैर्वणैर्विप्रादिपीडनम् । घ्नंति द्वित्रिचतुर्वर्णैर्भुवि राजजनान्मुने ॥६॥ ऊर्ध्वभानुकरैस्ताम्रैर्नाशं याति चमूपतिः । पीतैर्नृपसुतः श्वेतैः पुरोधाश्चित्रितैर्जनाः ॥७॥ धूम्रैर्नृपपिशंगैस्तु जलदाधोमुखैर्जगत् । शुभोऽर्कः शिशिरे ताम्रः कुंकुमाभा वसंतिके ॥८॥ ग्रीष्मश्चपांडुरश्चैव विचित्रो जलदागमे । पद्मोदराभः शरदि हेमंते लोहितच्छविः ॥६॥ पीतः शीते सिते वृष्टौ ग्रीष्मे लोहितमा रविः । रोगानं वृष्टिभयकृत् क्रमादुक्तो मुनीश्वर ॥१०॥ इन्द्रचापार्द्धमूर्तिस्तु भानुर्भूपविरोधकृत् । शशरक्तनिभे भानौ संग्रामो न चिराद्भुवि ॥११॥ मयूरपत्रसंकाशो द्वादशाब्दं न वर्षति । चन्द्रमासदृशो भानुः कुर्याद्भूपान्तरं क्षितौ ॥१२॥ अर्के श्यामे कीटभयं भस्मामे राष्ट्रजं तथा । छिद्रेऽर्क्रमंडले दृष्टं महाराजविनाशनम् ॥१३॥ धूमकेतु-पुच्छलतारा आदि के फल--यदि कदाचित् सूर्य-मण्डल में दण्ड (लाठी, कबन्ध (मस्तकहीन शरीर) कौआ या कील के आकार वाले केतु (चिह्न) देखने में आये तो वहाँ व्याधि, भ्रान्ति तथा चोरों के उपद्रव से धन का नाश होता है ॥४॥ छत्र, ध्वज, पताका या सजल मेघखण्ड सदृश अथवा चिनगारो-सहित धूम सूर्य-मण्डल में दीख पड़े तो उस देश का नाश हो जाता है ॥५॥ श्वेत, लाल, पीला अथवा काला सूर्यमण्डल दीखने में आये तो क्रम से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों को पीड़ा होती है। मुनीश्वर ! यदि दो, तीन या चार प्रकार के रंग सूर्यमंडल में दीख पड़े तो राजाओं का विनाश करता है। यदि सूर्य की ऊर्ध्वगामिनी किरण लाल रंग की दीख पड़े तो सेनापति का नाश होता है। यदि उसका पीला वर्ण हो तो राजकुमार का, श्वेत वर्ण हो तो राज- पुरोहित का तथा उसके अनेक वर्ण हों तो प्रजाजनों का नाश होता है। इसी तरह धूम वर्ण हो तो राजा का और पिशंग (कपिल) वर्ण हो तो मेघ का नाश होता है। यदि सूर्य की उक्त किरणें नीचे की ओर हों तो संसार का नाश होता है ॥६-७१/२॥ सूर्य शिशिर ऋतु (माघ-फाल्गुन) में तांबे के समान (लाल) दीखे तो संसार के लिए शुभ (कल्याणकारी) होता है। ऐसे हो वसन्त (चैत्र-वैशाख) में कुंकुमवर्ण, ग्रीष्म में पाण्डु (श्वेतपीतमिश्रित)-वर्ण, वर्षा में अनेकवर्ण, शरद् ऋतु में कमलवर्ण तथा हेमन्त में रक्तवर्ण का सूर्यबिम्ब दिखाई दे, तो उसे शुभप्रद समझना चाहिए। मुनिश्रेष्ठ नारद ! यदि शीतकाल में (अगहन से फाल्गुन तक) सूर्य का बिम्ब पीला, वर्षा में (श्रावण से कार्तिक तक) श्वेत तथा ग्रीष्म में (चैत्र से आषाढ़ तक) लाल रंग का दीख पड़े तो क्रम से रोग, अवर्षण तथा भय उपस्थित करने वाला होता है ॥८-१०॥ यदि कदाचित् सूर्य का आधा बिम्ब इन्द्रधनुष के सदृश दीख पड़े तो राजाओं में परस्पर विरोध उत्पन्न करता है। खरगोश के रक्त के सदृश हो तो शीघ्र ही राजाओं में युद्ध होता है यदि सूर्य का वर्ण मोर की पांख के समान हो, तो वहाँ बारह वर्षों तक वर्षा नहीं होती है। यदि सूर्य कभी चन्द्रमा के समान दिखाई दे, तो वहाँ के राजाओं को जीतकर दूसरा राजा राज्य करता है ॥११-१२॥ यदि सूर्य श्याम रंग का दीख पड़े तो कीड़ों का भय होता है। भस्म समान दीख पड़े तो समूचे राज्य पर भय उपस्थित होता है और यदि सूर्य मण्डल में छिद्र दिखाई दे, तो वहाँ के सम्राट् का नाश

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४४३

घटाकृतिः क्षुद्भयकृत्पुरघ्ना तोरणाकृतिः । छत्राकृते देशहतिः खंडभानुर्नृपांतकृत् ॥१४॥ उदयास्तमये काले विद्युदुल्का शनैर्यदि । तदा नृपवधो ज्ञेयस्तथवा राजविग्रहः ॥१५॥ पक्षं पक्षाद्धमर्केन्दुपरिविष्टावहर्निशम् । राजानमन्यं कुरुतो लोहिताम्बुदयस्तमौ ॥१६॥ उदयास्तमये भानुराच्छिन्नः शस्त्रसन्निभैः । घनैर्युद्धं खरोष्ट्राद्यैः पापरूपैर्भयप्रदम् ॥१७॥ याम्यशृंगोन्नतश्चंद्रः शुभदो मीनमेषयोः । सौम्यशृंगोन्नतः श्रेष्ठो नृयुङ्मकरयोस्तथा ॥१८॥ घटोक्षणस्तु समः कर्कचापयोः शरसन्निभः । चापवत्कीर्महर्योश्च शूलवत्तुलकर्कयोः ॥१९॥ विपरीतोदितश्चंद्रो दुर्भिक्षकलहप्रदः । आषाढद्वयमूसेंद्रधिष्ण्यानां याम्यगः शशी ॥२०॥ अग्निप्रदस्तोयचरवनसर्पविनाशकृत् । विशाखा मित्रयोर्याम्यपार्श्वगः पापगः शशी ॥२१॥ मध्यमः पितृदैवत्ये द्विदैवे सौम्यगः शशी । अप्राप्यपौष्णभाद्रौद्रामदुक्षार्विशशी शुभः ॥२२॥ मध्यगो द्वारदक्षाणि अतीत्य नववासवात् । यमेंद्राहीशनायेशमरुत्सार्द्रांततारकाः ॥२३॥ ध्रुवादितिद्विदैवाः स्युरध्यर्द्धाऽश्वापराः समाः । याम्यशृंगोन्नतो नेष्टः शुभः शुक्ले पिपीलिका ॥२४॥


होता है ॥१३॥ कलश के समान आकार वाला सूर्य देश में भुखमरी का भय उपस्थित करता है। तोरणसदृश आकारवाला सूर्य ग्राम तथा नगरों का नाशक होता है। छत्राकार सूर्य उदित हो तो देश का नाश और सूर्य बिम्ब खण्डित दीख पड़े तो राजा का विनाश होता है ॥१३-१४॥ यदि सूर्योदय या सूर्यास्त के समय बिजली की गड़गड़ाहट और वज्रपात एवं उल्कापात हो तो राजा का नाश या राजाओं में परस्पर युद्ध होता है। यदि पन्द्रह या साढ़े सात दिन तक दिन में सूर्य पर तथा रात में चन्द्रमा पर परिवेश (मण्डल) हो अथवा उदय और अस्त-समय में वह अत्यन्त रक्तवर्ण का दिखाई दे, तो राजा का परिवर्तन होता है ॥१५-१६॥ उदय या अस्त के समय यदि सूर्य शस्त्र के समान आकार वाले या गदहे या ऊंट आदि के सदृश अशुभ आकार वाले मेघ से खण्डित-सा प्रतीत हो तो राजाओं में भयानक युद्ध होता है ॥१७॥ चन्द्रशृङ्गोन्नति-फल--मीन और मेष राशि में यदि (द्वितीया तिथि को उदयकाल में) चन्द्रमा का दक्षिण शृंग उन्नत हो तो वह शुभप्रद होता है। मिथुन और मकर में यदि उत्तर शृङ्ग उन्नत हो तो शुभ होता है कुम्भ और वृष में यदि दोनों शृंग सम हो तो शुभ है। कर्क और धनु में बाण के सदृश हो तो शुभ वृश्चिक और सिंह में भी धनुष सदृश हो तो शुभ है तथा तुला ओर कन्या में यदि चन्द्रमा का शृंग शूल के सदृश दीख पड़े तो शुभ फल समझना चाहिए। इससे विपरीत स्थिति में चन्द्रमा का उदय हो तो उस मास में पृथ्वी पर दुर्भिक्ष, राजाओं में परस्पर विरोध आदि अशुभ फल होते हैं ॥१८-१९३॥ पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, और मूल ज्येष्ठा--इन नक्षत्रों में चन्द्रमा यदि दक्षिण दिशा में हो तो जलचर, वन चर और सर्प का नाश तथा अग्नि का भय होता है। विशाखा और अनुराधा में यदि दक्षिण भाग में हो तो पापफल देने वाला होता है। मघा और विशाखा में यदि चन्द्रमा मध्यभाग में होकर चले तो भी शुभ प्रद होता है। रेवती से मृगशिरा पर्यन्त ६ नक्षत्र 'अनागत' आर्द्रा से अनुराधा पर्यन्त बारह नक्षत्र 'मध्ययोगी' ओर वासव (ज्येष्ठा) से नौ नक्षत्र 'गतयोगी' हैं। इनमें भी चन्द्रमा उत्तरभाग में रहने पर शुभप्रद होता है ॥२०-२२३॥ भरणी, ज्येष्ठा, अश्लेषा, आर्द्रा, शतभिषा और स्वाती—ये अर्धभोग (४०० कला), ध्रुव संज्ञक (तीनों उत्तरा, रोहिणी), पुनर्वसु और विशाखा—ये सार्धक इयोढ़ा (१२०० कला) भोग करने वाले हैं तथा अन्य नक्षत्र सम (पूर्ण) भोग (८०० कला) हैं। साधारणतया चन्द्रमा की दक्षिण शृङ्गोन्नति अशुभ और उत्तर शृङ्गोन्नति शुभ-

४४४ नारदीयपुराणम् कार्यहानिः कार्यवृद्धिर्हानिवृद्धियंथाक्रमम् । सुभिक्षकृद्विशालैन्दुर्विशालोधघनाशनः ॥२५॥ अधोमुखे शस्त्रभयं कलहो दण्डसन्निभे । कुजायैर्निहते शृंगे मंडले वा यथाक्रमम् ॥२६॥ क्षेमान्नं वृष्टिभूपालजननाशः प्रजायते । सत्याष्टनवमर्क्षेषु सोदयाद्विक्रमे कुजे ॥२७॥ तद्वक्रमुष्णसंज्ञं स्यात्प्रजापीडाग्निसंभ्रमः । दशमैकादशे ऋक्षे द्वादशर्वा प्रतीपयः ॥२८॥ कृक्रं वक्रमुखं ज्ञेयं सस्यवृष्टिविनाशकृत् । कुजे त्रयोदशे ऋक्षे वक्रिते वा चतुर्दशे ॥२९॥ व्यालास्यवक्रं तत्तस्मिन्सस्यवृष्टिविनाशनम् । पंचदशे षोडशर्के वक्रे स्याद्रुधिराननम् ॥३०॥ दुर्भिक्षं क्षुद्भयं रोगान्करोति क्षितिनंदनः । अष्टादशे सप्तदशे तद्वक्रं मुशलाह्वयम् ॥३१॥ दुर्भिक्षं धनधान्यादिनाशनं भयकृत्सदा । फाल्गुन्योरुदितो भौमो वैश्वदेवे प्रतीपगः ॥३२॥ अस्तगश्चतुरास्यार्के लोकत्रयविनाशकृत् । उदितः श्रवणे पुष्ये वक्रगोधनहानिदः ॥३३॥ यद्दिग्गोऽभ्युदितो भौमस्तद्दिग्भूपभयप्रदः । मघामध्यगतो भौमस्तत्र चैव प्रतीपगः ॥३४॥ अवृष्टिशस्त्रभयदः पीडद्यं देवा नृपांतकृत् । पितृद्विदैवधातॄणां भिद्यंते गंडतारकाः ॥३५॥ दुर्भिक्षं मरणं रोगं करोति क्षितिजस्तदा । त्रिषूत्तरासु रोहिण्यां नैर्ऋते श्रवणे मृगे ॥३६॥ अवृष्टिदश्चरन्भौमो दक्षिणेरोहिणीस्थितः । भूमिजः सर्वधिष्ण्यानामुद्गामी शुभप्रदः ॥३७॥


प्रद है। तिथि के अनुसार चन्द्रमा में यदि शुक्लता में (कमी) हो तो प्रजा के कार्यों में हानि और शुक्लता में वृद्धि (अधिकता) हो तो प्रजाजन की वृद्धि होती है। समता में समता होतो है। यदि चन्द्रमा का बिम्ब मध्यम मान से विशाल (बड़ा) देखने में आये तो सुभिक्षकारक और छोटा दीख पड़े तो दुर्भिक्षकारक होता है ॥२३-२५॥ चन्द्रमा का शृंग अधोमुख हो तो शस्त्र का भय लाता है। दण्डाकार हो तो (राजा-प्रजा में) कलह होता है। चन्द्रमा का शृंग अथवा बिम्ब मंगलादि ग्रहों (मंगल) बुध, गुरु, शुक्र तथा शनि) से आहत दीख पड़े तो क्रमशः क्षेम, अन्नादि, वर्षा, राजा और प्रजा का नाश होता है ॥२६॥

भौम-चार-फल- जिस नक्षत्र में मंगल का उदय हो, उससे सातवें, आठवें या नवें नक्षत्र में वक्र हो तो वह 'उष्ण' नामक वक्र होता है। उसमें प्रजा को पीड़ा और अग्नि का भय होता है। यदि उदय के नक्षत्र से दसवें, ग्यारहवें तथा बारहवें नक्षत्र में मंगल वक्र हो तो वह 'अश्वमुख' नामक वक्र होता है। उसमें अन्न और वर्षा का नाश होता है। यदि तेरहवें या चौदहवें नक्षत्र में वक्र हो तो 'व्यालमुख' वक्र कहलाता है। उसमें भी अन्न और वर्षा का नाश होता है। पन्द्रहवें या सोलहवें नक्षत्र में वक्र हो तो 'रुधिरानन' वक्र कहलाता है। उसमें मंगल दुर्भिक्ष, क्षुधा तथा रोग को बढ़ाता है। १७ वें या १८ वें नक्षत्र में वक्र हो तो वह 'मुसल' नामक वक्र होता है। उससे धन-धान्य का नाश तथा दुर्भिक्ष का भय होता है। यदि मंगल पूर्वाफाल्गुनी या उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में उदित होकर उत्तराषाढ़ में वक्र हो तथा रोहिणी में अस्त हो तो तीनों लोकों के लिए नाशकारी होता है। यदि मंगल श्रवण में उदित होकर पुष्य में वक्रगति हो तो धन की हानि करने वाला होता है ॥२७-३३॥

मंगल जिस दिशा में उदित होता है, उस दिशा के राजा के लिए भयकारक होता है। यदि मघा नक्षत्र के मध्य होकर चलता हुआ मंगल उसी में वक्र हो जाय तो अवर्षण और शस्त्र का भय लाता, है तथा राजा के लिए विनाशकारी होता है। यदि मंगल मघा, विशाखा या रोहिणी के योगतारा का भेदन करके चले तो दुर्भिक्ष मरण तथा रोग लाने वाला होता है। उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तर भाद्रपद, रोहिणी, मूल, श्रवण और मृगशिरा--इन नक्षत्रों के बीच में तथा रोहिणी के दक्षिण होकर मंगल चले तो अनावृष्टिकारक होता है। मंगल सब नक्षत्रों के उत्तर होकर चले तो शुभप्रद है और दक्षिण होकर चले तो अशुभ फल और मनुष्यों में विरोध होता है ॥३४-३७॥

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४४५ याम्यगोऽनिष्टफलदो भवेद्भेदकरो नृणाम् । विनोत्पातेन शशिनः कदाचिन्नोदय व्रजेत् ॥३८॥ अनावृष्ट्यग्निभयकृदनर्थनृपविग्रहः । वसुवैष्णवविश्वेशद्रुधातृभेषु चरन्बुधः ॥३९॥ भिनत्ति यदि तत्तारां बाधावृष्टिभयंकरः । आर्द्रादिपितृभांतेषु दृश्यते यदि चंद्रजः ॥४०॥ तदा दुर्भिक्षकलहरोगानावृष्टिभीतिकृत् । हस्तादिषट्सु तारासु विचरन्निदुनंदनः ॥४१॥ क्षेमं सुभिक्षमारोग्यं कुरुते रोगनाशनम् । अहिर्बुध्न्यैर्यमाग्नेययाम्यभेषु चरन्बुधः ॥४२॥ भिषक्तुरंगवाणिज्यवृत्तीनां नाशकृत्तदा । पूर्वात्रयेचरन्सौम्यो योगं तारां भिनत्ति चेत् ॥४३॥ क्षुच्छस्त्रानलचौरेभ्यो भयदः प्राणिनां तदा । याम्याग्निधातृवाय्व्यधिष्ण्येषु प्राकृता गतिः ॥४४॥ रौद्रेन्दुसार्पपित्र्येषु ज्ञेया मिश्राह्वया गतिः । भान्त्रार्यमेज्यादितिषु संक्षिप्ता गतिरुच्यते ॥४५॥ गतिस्तीक्ष्णाजचरणाहिर्बुध्न्यभाश्विभेषुया । योगान्तिकातिविश्वांबुमूलमत्स्यैन्द्रजस्य च ॥४६॥ घोरा गतिर्हरित्वाष्ट्रवसुवारुणभेषु च । इंद्राग्निमित्रमार्तंडभेषु पापाह्वया गतिः ॥४७॥ प्राकृताद्यासु गतिषु ह्युदितोऽस्तमितोपि वा । यावंत्येव दिनान्येष दृश्यस्तावत्यदृश्यगः ॥४८॥ चत्वारिंशत्क्रमात्त्रिंशद्विशद् भूयसुतो नव । पंचदशैकादशभिर्दिवसैः शशिनंदनः ॥४९॥ प्राकृतायां गतः सौम्यः क्षेमारोग्यसुभिक्षकृत् । मिश्रसंक्षिप्तयोर्मध्ये फलदोऽन्यासु वृष्टिदः ॥५०॥

बुध-चार-फल—यदि कदाचित् आंधी, मेघ आदि उत्पात न होने पर (शुद्ध आकाश में) भी बुध का उदय देखने में न आये तो अनावृष्टि, अग्निभय, अनर्थ और राजाओं में युद्ध होता है । धनिष्ठा, श्रवण, उत्तराषाढ़, मृगशिरा और रोहिणी में चलता हुआ बुध यदि उन नक्षत्रों के योगताराओं का भेदन करे तो वह लोक में बाधा और अनावृष्टि आदि और भय उत्पन्न करता है। यदि आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा और मघा—इन नक्षत्रों में बुध दृश्य हो तो दुर्भिक्ष, कलह, रोग तथा अनावृष्टि आदि का भय उपस्थित करता है। हस्त से छह (हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा तथा ज्येष्ठा) नक्षत्रों में बुध के रहने से लोक में कल्याण, सुभिक्ष तथा आरोग्य होता है। उत्तरभाद्रपद, उत्तरा फाल्गुनी, कृत्तिका और भरणी में विचरने वाला बुध वैद्य, घोड़े और व्यापारियों का नाश करता है। पूर्वाफाल्गुनी पूर्वाषाढ़ और पूर्वभाद्रपद में विचरता हुआ बुध यदि इन नक्षत्रों के योग ताराओं का भेदन करे तो क्षुधा, शस्त्र, अग्नि और चोरों से प्राणियों को भय प्राप्त होता है ॥३८-४३३॥ भरणी, कृत्तिका, रोहिणी और स्वाती—इन नक्षत्रों में बुध की गति 'प्राकृतिकी' मानी जाती है। आर्द्रा, मृगशिरा, आश्लेषा और मघा--इन नक्षत्रों में बुध की गति 'मिश्रा' मानी जाती है। पूर्वाफाल्गुनी, उत्तरा- फाल्गुनी, पुष्य पुनर्वसु—इनमें बुध की 'संक्षिप्ता' गति कही गई है। पूर्वभाद्रपद, उत्तरभाद्रपद, रेवती और अश्विनी--इनमें बुध की गति तीक्ष्णा' मानी जाती है। उत्तराषाढ़, पूर्वाषाढ़, और मूल में उनकी (योगान्तिका' गति मानी गई है। श्रवण, चित्रा, धनिष्ठा और शतभिषा में 'घोरा' गति और विशाखा, अनुराधा तथा हस्त— इन नक्षत्रों में बुध की 'पाप' संज्ञक गति होती है। इन प्राकृत आदि सात प्रकार की गतियों में उदित होने पर जितने दिन तक बुध दृश्य रहता है, उतने ही दिन में उनमें अस्त होने पर अदृश्य रहता है। उन दिनों की संख्या क्रम से ४०, ३०, २२, १८, ९, १५ और ११ है। बुध जब प्राकृत गति में रहता है, तब संसार में कल्याण, आरोग्य और सुभिक्ष करता है। मिश्र और संक्षिप्त गति में मध्यम फल देता है तथा अन्य गतियों में अनावृष्टि

४४६ नारदीयपुराणम् वैशाखे श्रावणे पौषे आषाढेऽभ्युदितो बुधः । जगतां पापफलदस्त्वितरेषु शुभप्रदः ॥५१॥ इषोर्जमासयोः शस्त्रदुर्भिक्षाग्निभयप्रदः । उदितश्चंद्रजः श्रेष्ठो रजतस्फटिकोपमः ॥५२॥ द्विभाटजोदिमास्तस्य पंचमैकादशास्त्रिभात् । यन्नक्षत्रादितो जीवस्तन्नक्षत्राख्यवत्सरः ॥५३॥ कार्त्तिको मार्गशीर्षश्च नृणां दुष्टफलप्रदः । शुभप्रदौ पौषमाघौ मध्यमौ फाल्गुनो मधुः ॥५४॥ माधवः शुभदो ज्येष्ठो नृणां मध्यफलप्रदः । शुचिर्मध्यो नभः श्रेष्ठो भाद्रः श्रेष्ठः क्वचिन्तरः ॥५५॥ अतिश्रेष्ठ इषः प्रोक्तो मासानां फलमीदृशम् । सौम्ये भागे चरन्भानां क्षेमारोग्यसुभिक्षकृत् ॥५६॥ विपरीतो गुर्याम्ये मध्ये चरंसि मध्यमम् । पीताग्निश्यामहरितरक्तवर्णोङ्गिराः क्रमात् ॥५७॥ व्याध्यग्निचौरशस्त्रास्त्रभयदः प्राणिनां भवेत् । अनावृष्टि धूमनिभः करोति सुरपूजितः ॥५८॥ दिवादृष्टो नृपव्याध्यामयं वा राष्ट्रनाशनम् । संवत्सरशरीरं स्यात्कृत्तिका रोहिणी तथा ॥५९॥ नाभिस्त्वषाढयुगलमार्द्रा हृत्कुसुमं मघा । दुर्भिक्षाम्ररुद्भौतः शरीरे क्रूरपीडिते ॥६०॥ नाभ्यां क्षुत्तृड्भयं पुष्ये सम्यङ्मूलफलक्षयः । हृदये शस्य निधनं शुभं स्यात्संयुक्तैः शुभैः ॥६१॥ कारक होता है। वैशाख, श्रावण, पौष और आषाढ में उदित होने पर बुध पाप रूप फल देता है और अन्य मासों में उदित होने पर वह शुभ फल देता है। आश्विन और कार्तिक में बुध का उदय हो तो शस्त्र, दुर्भिक्ष और अग्नि का भय उत्पन्न करता है। यदि उदित हुए बुध की कान्ति चांदी अथवा स्फटिक के समान स्वच्छ हो तो वह श्रेष्ठ फल देता है ॥४८-५२॥ बृहस्पति-चार-फल- कृत्तिका आदि दो नक्षत्रों के आश्रय से कार्तिक आदि मास होते हैं; परन्तु अन्तिम (आश्विन), पञ्चम (फाल्गुन) और एकादश (भाद्रपद)-ये तीन नक्षत्रों से पूर्ण होते हैं। इसी प्रकार बृहस्पति का जिस नक्षत्र में उदय होता है, उस नक्षत्र से (मध्यम के अनुसार) संवत्सर का नाम होता है। उन संवत्सरों में कार्तिक और मार्गशीर्ष नामक संवत्सर प्राणियों के लिए अशुभ होते हैं। पौष और माघ नामक संवत्सर शुभ फल देते हैं। फाल्गुन और चैत्र नामक संवत्सर मध्यम (शुभ-अशुभ दोनों) फल देते हैं। वैशाख शुभप्रद और ज्येष्ठ मध्यम फल देने वाला होता है। आषाढ़ मध्यम और श्रावण उत्तम होता है तथा भाद्रपद भी कभी श्रेष्ठ होता है और कभी नहीं होता; परन्तु आश्विन संवत्सर प्रजा के लिए अत्यन्त श्रेष्ठ होता है। मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार संवत्सरों का फल होता है ॥५३-५५३॥ बृहस्पति जब नक्षत्रों के उत्तर होकर चलता है, तब संसार में कल्याण, आरोग्य तथा सुभिक्ष करनेवाला होता है। जब नक्षत्रों के दक्षिण होकर चलता है, तब विपरीत परिणाम (अशुभ, रोगवृद्धि तथा दुर्भिक्ष) उपस्थित करता है। तथा जब मध्य होकर चलता है, उस समय मध्यम फल प्रस्तुत करता है। गुरु का बिम्ब यदि पीतवर्ण, अग्निसदृश, श्याम, हरित और लाल हो तो प्रजामें क्रमशः व्याधि, अग्नि, चोर, शस्त्र और अस्त्र का भय उप- स्थित करता है। यदि गुरु का वर्ण धुएं के समान हो तो वह अनावृष्टि कारक होता है। यदि गुरु दिन में (प्रातः सायं छोड़कर) दृश्य हो तो राजा का नाश, रोगभय अथवा राष्ट्र का विनाश होता है। कृत्तिका तथा रोहिणी ये संवत्सर के शरीर हैं। पूर्वाषाढ़ और उत्तराषाढ़ ये दोनों नाभि हैं, आर्द्रा हृदय और मघा संवत्सर का पुष्प हैं। यदि शरीर पापग्रह से पीड़ित हो तो दुर्भिक्ष, अग्नि और वायु का भय उपस्थित होता है। नाभि पापग्रह से युक्त हो तो क्षुधा और तृषा से पीड़ा होती है। पुष्य पापग्रह से आक्रान्त हो तो मूल और फलों का क्षय होता है। यदि हृदय-नक्षत्र पापग्रह से पीडित हो तो अन्नादि का नाश होता है। शरीर आदि शुभग्रह से संयुक्त हों तो

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४४७ शस्यवृद्धिः प्रजारोग्यं युद्धं जीवात्यवर्षणम् । ईति द्विजातिमध्यां तु गोनृपस्त्रीसुखं महत् ॥६२॥ निःस्वनावृष्टिफणिभिर्वृष्टिः स्वास्थ्यं महोत्सवः । महार्धमपि संपत्चिर्देशनाशोऽतिवर्षणम् ॥६३॥ अवैरे रोगमभयं रोगभीः सस्यवर्षणे । रोगो धान्यं नभोऽदृष्टिमघाद्यक्षगते गुरौ ॥६४॥ सौम्यमध्यमयाम्येषु मार्गेषु वीथिकात्रयम् । शुक्रस्य दस्रभाज्ज्ञेयं पर्यायैश्च त्रिभिस्त्रिभिः ॥६५॥ नागेभैरावताश्चैव वृषभोष्ट्रखराह्वयाः । मृगाजदहनाह्वयाः स्युर्याम्यांता वीथयो नव ॥६६॥ सौम्यमार्गे च तिसृषु चरन्वीथिषु भार्गवः । धान्यार्थवृष्टिसस्यानां परिपूर्ति करोति हि ॥६७॥ मध्यमार्गे च तिसृषु सर्वमप्यधमं फलम् । पूर्वस्यां दिशि मेघस्तु शुभदः पितृपंचके ॥६८॥ स्वातित्रये पश्चिमायाँ तस्यां शुक्रस्तथाविधः । विपरीते त्वनावृष्टिर्वृष्टिकृद्बुधसंयुतः ॥६९॥ कृष्णाष्टम्यां चतुर्दश्याममायां च यदा सितः । उदयास्तमनं याति तदा जलमयी मही ॥७०॥ मिथः सप्तमराशिस्थौ पश्चात्प्राग्विथिसंस्थितौ । गुरुशुक्रावनावृष्टिदुर्भिक्षसमरप्रदौ ॥७१॥ कुजज्ञजीव रविजाः शुक्रस्याग्रेसरा यदि । युद्धातिवायुदुर्भिक्षजलनाशकरा मताः ॥७२॥ जलमिवार्यमार्द्राद्रनक्षत्रेषु सुभिक्षकृत् । सच्छस्त्रावृष्टिदो मूलेऽहिबुध्न्यर्त्यात्यभयोभयम् ॥७३॥

सुभिक्ष और कल्याणादि होते हैं ॥५६-६१॥ यदि मघा आदि नक्षत्रों में वृहस्पति हो तो वह क्रमशः शस्य-वृद्धि, प्रजा में आरोग्य, युद्ध, अनावृष्टि, द्विजातियों को पीड़ा, गोओं को सुख, राजाओं को सुख, स्त्री समाज को सुख, वायु का अवरोध, अनावृष्टि, सर्पभय, सुवृष्टि, स्वास्थ्य, उत्सववृद्धि, महार्ध, सम्पत्ति को वृद्धि, देश का नाश, अतिवृष्टि, निर्वैरता, रोग, अभय, रोगभय, अन्न की वृद्धि, वर्षा, रोग की वृद्धि, धान्य को वृद्धि और अनावृष्टि रूप फल देता है ॥६२-६४॥ शुक्र-चार-फल-शुक्र के तीन मार्ग हैं—सौम्य (उत्तर), मध्य और याम्य (दक्षिण) । इनमें से प्रत्येक में तीन-तीन वीथियां हैं और एक-एक वीथी में बारी-बारी से तीन-तीन नक्षत्र आते हैं। इन नक्षत्रों को अश्विनी से आरंभ करके जानना चाहिए । इस प्रकार उत्तर से दक्षिण तक शुक्र के मार्ग में क्रमशः नाग, इभ, ऐरावत, वृष, उष्ट्र, खर, मृग, अज तथा दहन-ये नौ वीथियां हैं ॥६५-६६॥ उत्तरमार्ग की तीन वीथियों में विचरण करने वाला शुक्र धान्य, धन, वृष्टि और शस्य-इन सब वस्तुओं को परिपूर्ण करता है, मध्यममार्ग की तीन वीथियों में शुक्र के जाने से सब अशुभ ही फल प्राप्त होते हैं । मघा से पाँच नक्षत्रों में शुक्र के जाने पर पूर्व दिशा में उठा हुआ मेघ सुवृष्टिकार क तथा शुभप्रद होता है । स्वाती से तीन नक्षत्र तक जब शुक्र रहता है, तब पश्चिम दिशा (देश) में मेघ सुवृष्टिकारक और शुभदायक होता है । शेष सब नक्षत्रों में उसका फल विपरीत (अनावृष्टि और दुर्भिक्ष करने वाला) होता है । शुक्र जब बुध के साथ रहता है तो सुवृष्टिकारक होता है । कृष्णपक्ष को अष्टमी, चतुर्दशी और अमावस्या में यदि शुक्र का उदय या अस्त हो तो पृथ्वी जल से परिपूर्ण होती है । गुरु और शुक्र परस्पर सप्तम राशि में हों तथा एक पूर्व वीथी में और दूसरा पश्चिम वीथी में विद्यमान हो तो वे दोनों देश में अनावृष्टि तथा दुर्भिक्षकारक और राजाओं में परस्पर युद्धप्रद होते हैं । मंगल, बुध, गुरु और शनि यदि शुक्र से आगे होते हैं तो युद्ध, अतिवायु, दुर्भिक्ष और अनावृष्टि करने वाले होते हैं ॥६७-७२॥ पूर्वाषाढ़, अनुराधा, उत्तरा फाल्गुनो, अश्लेषा, ज्येष्ठा-इन नक्षत्रों में शुक्र हो तो सुभिक्षकारक होता है। मूल में हो तो शस्त्रभय और अनावृष्टि, उत्तरभाद्रपद और रेवती में शुक्र के रहने पर भय प्राप्त होता है ॥७३॥

यहाँ पृष्ठ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति (लाइन मार्कर सहित) प्रस्तुत है:

४४८ नारदीयपुराणम् श्रवणानिलहस्तार्द्राभरणीभाग्यभेषु च । चरञ्छनैश्चरो नॄणां सुभिक्षारोग्यसस्यकृत् ॥७४॥ मुखे चैकं गुदे द्वे च त्रीणि के नयने द्वयम् । हृदये पञ्च ऋक्षाणि वामहस्ते चतुष्टयम् ॥७५॥ वामपादे तथा त्रीणि दक्षिणे त्रीणि भानि च । चत्वारि दक्षिणे हस्ते जन्मभाद्रविजस्थितिः ॥७६॥ रोगो लाभस्तथा हानिर्लाभः सौख्यं च बंधनम् । ॥७७॥ आयासः श्रेष्ठयात्रा च धनलाभः क्रमात्फलम् बहुधारविजस्त्वेवद्वक्रगः फलमीदृशम् । करोत्येव समः साम्यं शीघ्रगेषूक्तमात्फलम् ॥७८॥ विष्णुचक्रोत्कृत्तशिराः पङ्गुः पीयूषपानतः । अमृत्युतां गतस्तत्र खेटत्वे परिकल्पितः ॥७९॥ वरेण धातुरर्केन्दू तुदते सर्वपर्वणि । विक्षेपावनतेर्वंशाद्राहुर्द्रुरंगतस्तयोः ॥८०॥ षण्मासवृद्ध्या ग्रहणं शोधयेद्रविचन्द्रयोः । पर्वेशास्तु तथा सत्यदेवा रव्यादितः क्रमात् ॥८१॥ ब्रह्मेन्द्रिद्रधनाधीशवरुणाग्नियमह्वयाः । पशुसस्यद्विजातीनां वृद्धिर्ब्राह्मे तु पर्वणि ॥८२॥ तद्वदेव फलं सौम्ये श्लेष्मपीडा च पर्वणि । विरोधो भूभुजां दुःखमैन्द्रे सस्यविनाशनम् ॥८३॥ धनिनां धनहानिः स्यात्कौवेरं धान्यवर्धनम् । नृपाणामशिवं क्षेममितरेषां च वारुणे ॥८४॥ प्रवर्षणं सस्यवृद्धिः क्षेमं हौताशपर्वणि । अनावृष्टिः सस्यहानिर्दुर्भिक्षं याम्यपर्वणि ॥८५॥ **शनि-चार-फल--**श्रवण, स्वाती, हस्त, आर्द्रा, भरणी और पूर्वा फाल्गुनी—इन नक्षत्रों में विचरता शनि मनुष्यों के लिए सुभिक्ष, आरोग्य तथा शस्य (फसल) की वृद्धि करता है ॥७४॥ जन्म नक्षत्र से प्रारम्भ करके मनुष्याकृति शनि-चक्र के मुख में एक, गुदा में दो, सिर में तीन, नेत्रों में दो, हृदय में पाँच, बायें हाथ में चार, बायें पैर में तीन, दक्षिण पाद में तीन तथा दक्षिण हाथ में चार--इस तरह नक्षत्रों की स्थापना करे । शनि का वर्तमान नक्षत्र जिस अंग में पड़े, उसका फल निम्नलिखित रूप से जानना चाहिए । शनि नक्षत्र मुख में हो तो रोग, गुदा में हो तो लाभ, सिर में हो तो हानि, नेत्र में हो तो लाभ, हृदय में हो तो सुख, बायें हाथ में हो तो बन्धन, बायें पैर में हो तो परिश्रम, दाहिने पैर में हो तो श्रेष्ठ यात्रा और दाहिने हाथ हो तो धन-लाभ होता है। इस प्रकार क्रमशः फल कहे गये हैं ॥७५-७७॥ बहुधा वक्रगामी होने पर शनि इन फलों को प्राप्ति कराता ही है । यदि वह सम मार्गपर हो तो फल भी मध्यम होता है और यदि वह शीघ्रगति हो तो उत्तम फल प्राप्त होता है ॥७८॥ **राहु-चार-फल--**भगवान् विष्णु के द्वारा चक्र से राहु का मस्तक काट दिये जाने पर भी अमृत पी लेने के कारण उसकी मृत्यु नहीं हुई; अतः उसे ग्रह के पद पर प्रतिष्ठित कर लिया गया ॥७९॥ वह ब्रह्मा के वर से सम्पूर्ण पर्वों (पूर्णिमा और अमावास्या) के समय चन्द्रमा और सूर्य को पीड़ा देता है; किन्तु विक्षेप तथा 'अवनति' अधिक होने के कारण वह उन दोनों से दूर ही रहता है ॥८०॥ एक सूर्यग्रहण के बाद दूसरे सूर्यग्रहण का तथा एक चन्द्रग्रहण के बाद दूसरे चन्द्रग्रहण का विचार छह मास पर पुनः कर लेना चाहिए । प्रति छह मास पर क्रमशः ब्रह्मादि सात देवता पर्वेश (ग्रहण के अधिपति) होते हैं । उनके नाम इस प्रकार हैं--ब्रह्मा, चन्द्रमा, इन्द्र, कुबेर, वरुण, अग्नि तथा यम । ब्राह्मपर्व में ग्रहण होने पर पशु, धान्य और द्विजोँ की वृद्धि होती है ॥८१-८२॥ चन्द्र- पर्व में ग्रहण हो तो भी ऐसा ही फल होता है; किन्तु लोगों को कफ से पीड़ा होती है । इन्द्रपर्व में ग्रहण होने पर राजाओं में विरोध, जगत् में दुःख तथा कृषि और धन का नाश होता है । कुबेर के पर्व में ग्रहण होने पर धान्य की वृद्धि होती है वारुणपर्व में ग्रहण होने पर राजाओं का अकल्याण और प्रजा का कल्याण होता है ॥८३-८४॥ अग्निपर्व में ग्रहण होने पर वृष्टि, धान्यवृद्धि तथा कल्याण की प्राप्ति होती है और यमपर्व में ग्रहण होने पर वर्षा का अभाव, खेतों की हानि तथा दुर्भिक्ष रूप फल प्राप्त होते हैं ॥८५॥ वेलाहीन समय में अर्थात्

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४४६ वेलाहीने सस्यहानिर्नृपाणां दारुणं रणम् । अतिवेले पुष्पहानिर्भयं सस्यविनाशनम् ॥८६॥ एकस्मिन्नेव मासे तु चन्द्रार्कग्रहणं यदा । विरोधो धरणीशानामर्थवृष्टिविनाशनम् ॥८७॥ ग्रस्तोदितावस्तमितौ नृपधान्यविनाशदौ । सर्वग्रस्ताविनेन्दू तु क्षुद्व्याध्यग्निभयप्रदौ ॥८८॥ सौम्यायने क्षत्रविप्रानितरां हन्ति दक्षिणे । द्विजातींश्चक्रमाद्धंति राहुर्दृष्टोदगादितः ॥८९॥ तथैव ग्रासभेदाः स्युर्मोक्षभेदास्तथा दश । नो शक्ता लक्षितुं देवाः किं पुनः प्राकृता जनाः ॥९०॥ आनीय खेटान्गणितांस्तेषां चारं विचिंतयेत् । शुभाशुभाख्यैः कालस्य ग्राहयामो हि लक्षणम् ॥९१॥ तस्मादन्वेषणीयं तत्कालज्ञानाय धीमता । उत्पातरूपाः केतूनामुदयास्तमया नृणाम् ॥९२॥ दिव्यांतरिक्षा भौमास्ते शुभाशुभफलप्रदाः । यज्ञध्वजास्त्रभवनरवद्विद्गजोपमाः ॥९३॥ स्तम्भशूलांकुशाकारा आंतरिक्षाः प्रकीर्तिताः । नक्षत्रसंस्थिता दिव्या भौमा ये भूमिसंस्थिताः ॥९४॥ एकोऽपि भिन्नरूपः स्याज्जंतूनामशुभाय वै । यावन्तो दिवसान्केतुर्दृश्यते विविधात्मकः ॥९५॥ तावन्मासैः फलं यच्छत्यसौ सौरैर्व्यवत्सरैः । ये दिव्याः केतवस्तेऽपि शश्वज्जीवफलप्रदाः ॥९६॥

वेला से पहले ग्रहण हो तो खेती को हानि तथा राजाओं को दारुण भय या युद्ध होता है । और 'अतिवेल' काल में अर्थात् वेला बिताकर ग्रहण हो तो फूलों की हानि भय और कृषि का नाश होता है ॥८६॥ जब एक ही मास में चन्द्रमा सूर्य—दोनों का ग्रहण हो तो राजाओं में विरोध होता है तथा धन और वृष्टि का विनाश होता है ॥८७॥ यदि सूर्य और चन्द्र ग्रस्त हुए ही उदित या अस्त हों तो राजा और धान्य का विनाश होता है। ग्रहण लगे हुए चन्द्रमा और सूर्य का सर्वग्रास ग्रहण हो तो वे भुखमरी, रोग तथा अग्नि का भय उपस्थित करने वाले होते हैं ॥८८॥ उत्तरायण में ग्रहण हो तो ब्राह्मणों और क्षत्रियों को तथा दक्षिणायन में ग्रहण होने पर अन्य वर्ण के लोगों को हानि पहुँचती है । सूर्य या चन्द्रमा के बिम्ब के उत्तर, पूर्व आदि भाग में यदि राहु का दर्शन हो (ग्रहण का स्पर्श दिखे) तो वह क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों को हानि पहुँचाता है ॥८९॥ इसी तरह ग्रहण के समय ग्रास के और मोक्ष के भी दस-दस भेद होते हैं जिनकी सूक्ष्म गति को देवता भी नहीं जान सकते फिर साधारण मनुष्यों की तो बात ही क्या है ॥९०॥ गणित द्वारा ग्रहों को लाकर उनके 'चार' (गतिमान) स्पर्श और मोक्षकाल की स्थिति) पर विचार करना चाहिए । जिससे उन ग्रहों द्वारा ग्रहणकाल के शुभ और अशुभ लक्षण (फल) को हम देख और जान सकें ॥९१॥ अतः बुद्धिमान्-पुरुष को चाहिए कि उस समय का ज्ञान प्राप्त करने के लिए अनुसन्धान करे । धूम-केतु आदि तारों का उदय और अस्त मनुष्यों के लिए उत्पातरूप होता है ॥९२॥ वे उत्पात दिव्य, भौम और अन्तरिक्ष भेद से तीन प्रकार के हैं । वे शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के फल देने वाले हैं । आकाश में यज्ञ की ध्वजा, अस्त्र-शस्त्र, भवन और बड़े हाथी के सदृश तथा खंभा, त्रिशूल और अंकुश-इन वस्तुओं के समान जो केतु दिखाई देते हैं, 'अन्तरिक्ष' उत्पात कहलाते हैं। साधारण तारा के साथ उदित होकर किसी नक्षत्र के साथ केतु हो तो 'दिव्य' उत्पात कहा गया है । भूलोक से सम्बन्ध रखने वाले (भूकम्प आदि) उत्पातों को 'भौम' उत्पात कहते हैं ॥९३-९४॥ केतु तारा एक होकर भी प्राणियों को अशुभ फल देने के लिए भिन्न-भिन्न रूप धारण करता है । जितने दिनों तक आकाश में विविधरूपधारी केतु देखने में आता है, उतने ही मास या सौर वर्षों तक वह अपना शुभाशुभ फल देता है। जो दिव्य केतु हैं, वे सदा प्राणियों को विविध फल देते हैं ॥९५-९६॥ ५७ ना० पु०

४५० नारदीयपुराणम् ह्रस्वः स्निग्धः सुप्रसन्नः श्वेतकेतुः सुवृष्टिकृत् । क्षिप्रादस्तमयं याति दीर्घकेतुरवृष्टिकृत् ॥९७॥ अनिष्टदो धूमकेतुः शक्रचापसमप्रभः । द्वित्रिचतुःशूलरूपः स च राज्यांतकृन्मतः ॥९८॥ मणिहारस्तु वर्णाभा दीप्तिमंतोऽर्कसूनवः । केतवश्चोदिताः पूर्वापरयोर्नृपहानिदाः ॥९९॥ किंशुकबिम्बक्षतजच्छुकतुण्डादिसन्निभाः । हुताशनोदितास्तेऽपि केतवः फलदाः स्मृताः ॥१००॥ भूसुता जलतैलाभा वर्तुलाः क्षुद्भयप्रदाः । सुभिक्षक्षेमदाः श्वेतकेतवः सोमसूनवः ॥१०१॥ पितामहात्मजः केतुस्त्रिवर्णस्त्रिदशान्वितः । ब्रह्मदण्डाद्धूमकेतुः प्रजानामंतकृन्मतः ॥१०२॥ ऐशान्यां भार्गवसुताः श्वेतरूपास्त्वनिष्टाः । अनिष्टदाः पंगुसुता विशिखाः कनकाह्वयाः ॥१०३॥ विकचाख्या गुरुसुता वेष्टा याम्ये स्थिता अपि । सूक्ष्माः शुक्ला बुधसुताश्चौररोगभयप्रदाः ॥१०४॥ कुजात्मजाः कुंकुमाख्या रक्ताः शूलास्त्वनिष्टदाः । अग्नेजा विश्वरूपाख्या अग्निवर्णाः सुखप्रदाः ॥१०५॥ अरुणाः श्यामलाकारा अर्कपुत्राश्च पापदाः । शुक्रजा ऋक्षसदृशाः केतवः शुभदायकाः ॥१०६॥ कृत्तिकासु भवो धूमकेतुर्नूनं प्रजाक्षयः । प्रासादवृक्षशैलेषु जातो राज्ञां विनाशकृत् ॥१०७॥ सुभिक्षकृत्कौमुदाख्यः केतुः कुमुदसन्निभः । आवर्तकेतुसंध्यायां सशिरो नेष्टदायकः ॥१०८॥ ह्रस्व, चिकना और प्रसन्न (स्वच्छ) श्वेत रंग का केतु सुवृष्टि देता है। शीघ्र अस्त होने वाला विशाल केतु अवृष्टि देता है ॥९७॥ इन्द्रधनुष के समान कान्ति वाला धूमकेतु तारा अनिष्टकारी होता है। दो, तीन या चार रूपों में प्रकट त्रिशूल के समान आकार वाला केतु राष्ट्र का विनाशक होता है ॥९८॥ पूर्व तथा पश्चिम दिशा में सूर्य सम्बन्धी मणि, हार एवं सुवर्ण के समान देदीप्यमान दिखाई देने वाले केतु उन दिशाओं के राजाओं की हानि करता है ॥९९॥ अग्निकोण में उदित होने वाला पलाश, बिम्बफल, रक्त और तोते की चोंच आदि के समान वर्ण का केतु शुभ फल देने वाला होता है ॥१००॥ भूमिसम्बन्धी केतु वर्तुल एवं उनकी कान्ति जल एवं तेल के समान होती है। वे भुखमरी का भय देते हैं। चन्द्रजनित केतुओं का वर्ण श्वेत होता है। वे सुभिक्ष और कल्याणप्रद होते हैं ॥१०१॥ ब्रह्मदण्ड से उत्पन्न तथा तीन रंग और तीन अवस्थाओं से युक्त धूमकेतु नामक पितामहजनित (आन्तरिक्ष) केतु प्रजा का विनाश करता है ॥१०२॥ ईशानकोण में उदित श्वेतवर्ण के शुक्रजनित केतु अनिष्टकारी होते हैं। शिखारहित एवं कनक नाम से प्रसिद्ध शनैश्चर सम्बन्धी केतु भी अनिष्ट फलदायक हैं ॥१०३॥ गुरु सम्बन्धी केतुओं की विकच संज्ञा है। वे दक्षिण दिशा में प्रकट होने पर भी अभीष्टसाधक माने गये हैं। उसी दिशा में सूक्ष्म तथा शुक्ल वर्ण वाले बुधसम्बन्धी केतु चोर तथा रोग का भय देते हैं ॥१०४॥ कुंकुम नाम से प्रसिद्ध मङ्गलसम्बन्धी केतु लाल रंग के होते हैं। उनकी आकृति सूर्य के समान होती है। वे भी उक्त दिशा में उदित होने पर अनिष्टदायक होते हैं। विश्वरूप नाम से प्रसिद्ध अग्नि के समान कान्ति वाले अग्नि सम्बन्धी केतु अग्निकोण में उदित होने पर सुखद होते हैं ॥१०५॥ श्यामवर्ण वाले सूर्य सम्बन्धी केतु अरुण कहलाते हैं। वे अनिष्टकारी होते हैं। रीछ के समान रंग वाले शुक्रसम्बन्धी केतु शुभदायक होते हैं ॥१०६॥ कृत्तिका तारा में उदित हुआ धूमकेतु निश्चय ही प्रजा का विनाशक होता है। राजमहल, वृक्ष और पर्वत पर प्रकट हुआ केतु राजाओं का नाश करने वाला होता है ॥१०७॥ कुमुदपुष्प के समान वर्ण वाला कौमुद नामक केतु सुभिक्ष लाने वाला होता है। संध्याकाल में मस्तक सहित उदित हुआ गोलाकार केतु अनिष्टफल देने वाला होता है ॥१०८॥

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४५१ ब्रह्मदेवमनोर्मानं पित्र्यं सौरं च सावनम् । चान्द्रमार्कं गुरोर्मानमिति मानानि वै नव ॥१०८॥ एतेषां नवमानानां व्यवहारोऽत्र पञ्चभिः । तेषां पृथक्पृथक्कार्यं वक्ष्यते व्यवहारतः ॥११०॥ ग्रहाणां निखिलश्चारो गृह्यते सौरमानतः । वृष्टेर्विधानं स्त्रीगर्भः सावनेनैव गृह्यते ॥१११॥ प्रवर्षणं समे गर्भो नाक्षत्रेण प्रगृह्यते । यात्रोद्वाहव्रतक्षौरे तिथिवर्षेशनिर्णयः ॥११२॥ पर्ववास्तूपवासादि कृत्स्नं चान्द्रेण गृह्यते । गृह्यते गुरुमानेन प्रभवाद्यब्दलक्षणम् ॥११३॥ तत्तन्मासैर्द्वादशभिस्तत्तदब्दो भवेत्ततः । गुरुमध्यमचारेण षष्ट्यब्दाः प्रभवादयः ॥११४॥ प्रभवो विभवः शुक्लः प्रमोदोऽथ प्रजापतिः । अंगिराः श्रीमुखो भावो युवा धाता तथैव च ॥११५॥ ईश्वरो बहुधान्यश्च प्रमाथी विक्रमो वृषः । चित्रभानुस्सुभानुश्च तारणः पार्थिवोऽव्ययः ॥११६॥ सर्वजित्सर्वधारी च विरोधी विकृतः खरः । नंदनॊ विजयश्चैव जयो मन्मथदुर्मुखौ ॥११७॥ हेमलंबो विलंबश्च विकारी शर्वरी प्लवः । शुभकृच्छोभनः क्रोधी विश्वावसुपरावभौ ॥११८॥ प्लवंगः कीलकः सौम्यः सामाप्तश्च विरोधकृत् । परिभावी प्रमादी च आनन्दो राक्षसोऽनलः ॥११९॥ पिंगलः कालयुक्तश्च सिद्धार्थो रौद्रदुर्मती । दुंदुभी रुधिरोद्गारी रक्ताक्षः क्रोधनः क्षयः ॥१२०॥ नामतुल्यफलाः सर्वे विज्ञेयाः षष्टिवत्सराः । युगं स्यात्पञ्चभिर्वर्षैर्युगान्येवं तु द्वादश ॥१२१॥ तेषामीशाः क्रमाज्ज्ञेया विष्णुर्देवपुरोहितः । पुरंदरो लोहितश्च त्वष्टाहिर्बुध्न्यसंज्ञकः ॥१२२॥ पितरश्च ततो विश्वे शशेंद्राग्न्यश्विनो भगः । तथा युगस्य वर्षेखास्त्वग्निनेन्दुविधोश्वराः ॥१२३॥

**कालमान—**ब्राह्म, दैव, मानव, पित्र्य, सौर, सावन, चान्द्र, नाक्षत्र तथा बार्हस्पत्य—ये नौ मान होते हैं ॥१०९॥ इस लोक में इन नौ मानों में से पाँच के ही द्वारा व्यवहार होता है। किन्तु उन नवों मानों का व्यवहार के अनुसार पृथक्-पृथक् कार्य बताया जायगा ॥११०॥ सौर मान से ग्रहों की सब प्रकार की गति (भगणादि) ज्ञात की जाती है । वर्षा का समय तथा स्त्री के प्रसव का समय सावन मान से ही ग्रहण किया जाता है ॥१११॥ वर्षा के भीतर का घटीमान आदि नाक्षत्र मान से ही लिया जाता है । यज्ञोपवीत, मुण्डन, तिथि एवं वर्षेश निर्णय तथा पर्व, उप- वास आदि का निश्चय चान्द्र मान से किया जाता है । बार्हस्पत्य मान से प्रभवादि संवत्सर का स्वरूप ग्रहण किया जाता है ॥११२-११३॥ उन-उन मानों के अनुसार बारह मासों तक उनका अपना-अपना विभिन्न वर्ष होता है । वृहस्पति की अपनी मध्यम गति से प्रभव आदि नाम वाले साठ संवत्सर होते हैं ॥११४॥ प्रभव, विभव, शुक्ल, प्रमोद, प्रजापति, अंगिरा, श्रीमुख, भाव, युवा, धाता, ईश्वर, बहुधान्य, प्रमाथी, विक्रम, वृष, चित्रभानु, सुभानु, तारण, पार्थिव, व्यय, सर्वजित, सर्वधारी, विरोधी, विकृत, खर, नन्दन, विजय, जय, मन्मथ, दुर्मुख, हेमलम्ब, विलम्ब, विकारी, शर्वरी, प्लव, शुभकृत्, शोभन, क्रोधी, विश्वावसु, पराभव, प्लवंग, कीलक, सौम्य, समान, विरोधकृत, परिभावी, प्रमादी, आनन्द, राक्षस, अनल, पिंगल, कालयुक्त, सिद्धार्थ, रौद्र, दुर्मति, दुन्दुभि, रुधिरोद्- गारी, रक्ताक्ष, क्रोधन तथा क्षय —ये साठ संवत्सर जानने चाहिए । सभी अपने नाम के अनुरूप फल देते हैं । पाँच वर्षों का युग होता है । इस तरह साठ संवत्सरों में बारह युग होते हैं ॥११५-१२१॥ उन युगों के स्वामी क्रमशः इस प्रकार जानने चाहिए-विष्णु, वृहस्पति, इंद्र, लोहित, त्वष्टा, अहिर्बुध्न्य, पितर, विश्वेदेव, चन्द्रमा, इन्द्राग्नि, अश्विनीकुमार तथा भग । इसी प्रकार युग के भीतर जो पाँच वर्ष होते हैं, उनके स्वामी क्रमशः अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, ब्रह्मा और शिव हैं ॥१२२-१२३॥