भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 469

४५० नारदीयपुराणम् ह्रस्वः स्निग्धः सुप्रसन्नः श्वेतकेतुः सुवृष्टिकृत् । क्षिप्रादस्तमयं याति दीर्घकेतुरवृष्टिकृत् ॥९७॥ अनिष्टदो धूमकेतुः शक्रचापसमप्रभः । द्वित्रिचतुःशूलरूपः स च राज्यांतकृन्मतः ॥९८॥ मणिहारस्तु वर्णाभा दीप्तिमंतोऽर्कसूनवः । केतवश्चोदिताः पूर्वापरयोर्नृपहानिदाः ॥९९॥ किंशुकबिम्बक्षतजच्छुकतुण्डादिसन्निभाः । हुताशनोदितास्तेऽपि केतवः फलदाः स्मृताः ॥१००॥ भूसुता जलतैलाभा वर्तुलाः क्षुद्भयप्रदाः । सुभिक्षक्षेमदाः श्वेतकेतवः सोमसूनवः ॥१०१॥ पितामहात्मजः केतुस्त्रिवर्णस्त्रिदशान्वितः । ब्रह्मदण्डाद्धूमकेतुः प्रजानामंतकृन्मतः ॥१०२॥ ऐशान्यां भार्गवसुताः श्वेतरूपास्त्वनिष्टाः । अनिष्टदाः पंगुसुता विशिखाः कनकाह्वयाः ॥१०३॥ विकचाख्या गुरुसुता वेष्टा याम्ये स्थिता अपि । सूक्ष्माः शुक्ला बुधसुताश्चौररोगभयप्रदाः ॥१०४॥ कुजात्मजाः कुंकुमाख्या रक्ताः शूलास्त्वनिष्टदाः । अग्नेजा विश्वरूपाख्या अग्निवर्णाः सुखप्रदाः ॥१०५॥ अरुणाः श्यामलाकारा अर्कपुत्राश्च पापदाः । शुक्रजा ऋक्षसदृशाः केतवः शुभदायकाः ॥१०६॥ कृत्तिकासु भवो धूमकेतुर्नूनं प्रजाक्षयः । प्रासादवृक्षशैलेषु जातो राज्ञां विनाशकृत् ॥१०७॥ सुभिक्षकृत्कौमुदाख्यः केतुः कुमुदसन्निभः । आवर्तकेतुसंध्यायां सशिरो नेष्टदायकः ॥१०८॥ ह्रस्व, चिकना और प्रसन्न (स्वच्छ) श्वेत रंग का केतु सुवृष्टि देता है। शीघ्र अस्त होने वाला विशाल केतु अवृष्टि देता है ॥९७॥ इन्द्रधनुष के समान कान्ति वाला धूमकेतु तारा अनिष्टकारी होता है। दो, तीन या चार रूपों में प्रकट त्रिशूल के समान आकार वाला केतु राष्ट्र का विनाशक होता है ॥९८॥ पूर्व तथा पश्चिम दिशा में सूर्य सम्बन्धी मणि, हार एवं सुवर्ण के समान देदीप्यमान दिखाई देने वाले केतु उन दिशाओं के राजाओं की हानि करता है ॥९९॥ अग्निकोण में उदित होने वाला पलाश, बिम्बफल, रक्त और तोते की चोंच आदि के समान वर्ण का केतु शुभ फल देने वाला होता है ॥१००॥ भूमिसम्बन्धी केतु वर्तुल एवं उनकी कान्ति जल एवं तेल के समान होती है। वे भुखमरी का भय देते हैं। चन्द्रजनित केतुओं का वर्ण श्वेत होता है। वे सुभिक्ष और कल्याणप्रद होते हैं ॥१०१॥ ब्रह्मदण्ड से उत्पन्न तथा तीन रंग और तीन अवस्थाओं से युक्त धूमकेतु नामक पितामहजनित (आन्तरिक्ष) केतु प्रजा का विनाश करता है ॥१०२॥ ईशानकोण में उदित श्वेतवर्ण के शुक्रजनित केतु अनिष्टकारी होते हैं। शिखारहित एवं कनक नाम से प्रसिद्ध शनैश्चर सम्बन्धी केतु भी अनिष्ट फलदायक हैं ॥१०३॥ गुरु सम्बन्धी केतुओं की विकच संज्ञा है। वे दक्षिण दिशा में प्रकट होने पर भी अभीष्टसाधक माने गये हैं। उसी दिशा में सूक्ष्म तथा शुक्ल वर्ण वाले बुधसम्बन्धी केतु चोर तथा रोग का भय देते हैं ॥१०४॥ कुंकुम नाम से प्रसिद्ध मङ्गलसम्बन्धी केतु लाल रंग के होते हैं। उनकी आकृति सूर्य के समान होती है। वे भी उक्त दिशा में उदित होने पर अनिष्टदायक होते हैं। विश्वरूप नाम से प्रसिद्ध अग्नि के समान कान्ति वाले अग्नि सम्बन्धी केतु अग्निकोण में उदित होने पर सुखद होते हैं ॥१०५॥ श्यामवर्ण वाले सूर्य सम्बन्धी केतु अरुण कहलाते हैं। वे अनिष्टकारी होते हैं। रीछ के समान रंग वाले शुक्रसम्बन्धी केतु शुभदायक होते हैं ॥१०६॥ कृत्तिका तारा में उदित हुआ धूमकेतु निश्चय ही प्रजा का विनाशक होता है। राजमहल, वृक्ष और पर्वत पर प्रकट हुआ केतु राजाओं का नाश करने वाला होता है ॥१०७॥ कुमुदपुष्प के समान वर्ण वाला कौमुद नामक केतु सुभिक्ष लाने वाला होता है। संध्याकाल में मस्तक सहित उदित हुआ गोलाकार केतु अनिष्टफल देने वाला होता है ॥१०८॥