बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 470, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंषट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४५१ ब्रह्मदेवमनोर्मानं पित्र्यं सौरं च सावनम् । चान्द्रमार्कं गुरोर्मानमिति मानानि वै नव ॥१०८॥ एतेषां नवमानानां व्यवहारोऽत्र पञ्चभिः । तेषां पृथक्पृथक्कार्यं वक्ष्यते व्यवहारतः ॥११०॥ ग्रहाणां निखिलश्चारो गृह्यते सौरमानतः । वृष्टेर्विधानं स्त्रीगर्भः सावनेनैव गृह्यते ॥१११॥ प्रवर्षणं समे गर्भो नाक्षत्रेण प्रगृह्यते । यात्रोद्वाहव्रतक्षौरे तिथिवर्षेशनिर्णयः ॥११२॥ पर्ववास्तूपवासादि कृत्स्नं चान्द्रेण गृह्यते । गृह्यते गुरुमानेन प्रभवाद्यब्दलक्षणम् ॥११३॥ तत्तन्मासैर्द्वादशभिस्तत्तदब्दो भवेत्ततः । गुरुमध्यमचारेण षष्ट्यब्दाः प्रभवादयः ॥११४॥ प्रभवो विभवः शुक्लः प्रमोदोऽथ प्रजापतिः । अंगिराः श्रीमुखो भावो युवा धाता तथैव च ॥११५॥ ईश्वरो बहुधान्यश्च प्रमाथी विक्रमो वृषः । चित्रभानुस्सुभानुश्च तारणः पार्थिवोऽव्ययः ॥११६॥ सर्वजित्सर्वधारी च विरोधी विकृतः खरः । नंदनॊ विजयश्चैव जयो मन्मथदुर्मुखौ ॥११७॥ हेमलंबो विलंबश्च विकारी शर्वरी प्लवः । शुभकृच्छोभनः क्रोधी विश्वावसुपरावभौ ॥११८॥ प्लवंगः कीलकः सौम्यः सामाप्तश्च विरोधकृत् । परिभावी प्रमादी च आनन्दो राक्षसोऽनलः ॥११९॥ पिंगलः कालयुक्तश्च सिद्धार्थो रौद्रदुर्मती । दुंदुभी रुधिरोद्गारी रक्ताक्षः क्रोधनः क्षयः ॥१२०॥ नामतुल्यफलाः सर्वे विज्ञेयाः षष्टिवत्सराः । युगं स्यात्पञ्चभिर्वर्षैर्युगान्येवं तु द्वादश ॥१२१॥ तेषामीशाः क्रमाज्ज्ञेया विष्णुर्देवपुरोहितः । पुरंदरो लोहितश्च त्वष्टाहिर्बुध्न्यसंज्ञकः ॥१२२॥ पितरश्च ततो विश्वे शशेंद्राग्न्यश्विनो भगः । तथा युगस्य वर्षेखास्त्वग्निनेन्दुविधोश्वराः ॥१२३॥
**कालमान—**ब्राह्म, दैव, मानव, पित्र्य, सौर, सावन, चान्द्र, नाक्षत्र तथा बार्हस्पत्य—ये नौ मान होते हैं ॥१०९॥ इस लोक में इन नौ मानों में से पाँच के ही द्वारा व्यवहार होता है। किन्तु उन नवों मानों का व्यवहार के अनुसार पृथक्-पृथक् कार्य बताया जायगा ॥११०॥ सौर मान से ग्रहों की सब प्रकार की गति (भगणादि) ज्ञात की जाती है । वर्षा का समय तथा स्त्री के प्रसव का समय सावन मान से ही ग्रहण किया जाता है ॥१११॥ वर्षा के भीतर का घटीमान आदि नाक्षत्र मान से ही लिया जाता है । यज्ञोपवीत, मुण्डन, तिथि एवं वर्षेश निर्णय तथा पर्व, उप- वास आदि का निश्चय चान्द्र मान से किया जाता है । बार्हस्पत्य मान से प्रभवादि संवत्सर का स्वरूप ग्रहण किया जाता है ॥११२-११३॥ उन-उन मानों के अनुसार बारह मासों तक उनका अपना-अपना विभिन्न वर्ष होता है । वृहस्पति की अपनी मध्यम गति से प्रभव आदि नाम वाले साठ संवत्सर होते हैं ॥११४॥ प्रभव, विभव, शुक्ल, प्रमोद, प्रजापति, अंगिरा, श्रीमुख, भाव, युवा, धाता, ईश्वर, बहुधान्य, प्रमाथी, विक्रम, वृष, चित्रभानु, सुभानु, तारण, पार्थिव, व्यय, सर्वजित, सर्वधारी, विरोधी, विकृत, खर, नन्दन, विजय, जय, मन्मथ, दुर्मुख, हेमलम्ब, विलम्ब, विकारी, शर्वरी, प्लव, शुभकृत्, शोभन, क्रोधी, विश्वावसु, पराभव, प्लवंग, कीलक, सौम्य, समान, विरोधकृत, परिभावी, प्रमादी, आनन्द, राक्षस, अनल, पिंगल, कालयुक्त, सिद्धार्थ, रौद्र, दुर्मति, दुन्दुभि, रुधिरोद्- गारी, रक्ताक्ष, क्रोधन तथा क्षय —ये साठ संवत्सर जानने चाहिए । सभी अपने नाम के अनुरूप फल देते हैं । पाँच वर्षों का युग होता है । इस तरह साठ संवत्सरों में बारह युग होते हैं ॥११५-१२१॥ उन युगों के स्वामी क्रमशः इस प्रकार जानने चाहिए-विष्णु, वृहस्पति, इंद्र, लोहित, त्वष्टा, अहिर्बुध्न्य, पितर, विश्वेदेव, चन्द्रमा, इन्द्राग्नि, अश्विनीकुमार तथा भग । इसी प्रकार युग के भीतर जो पाँच वर्ष होते हैं, उनके स्वामी क्रमशः अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, ब्रह्मा और शिव हैं ॥१२२-१२३॥