भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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४५२ | नारदीयपुराणम् अथाब्देशचमृनाथसस्यपानां बलाबलम् । तत्कालं ग्रहचारं च सम्यग् ज्ञात्वा फलं वदेत् ॥१२४॥ सौम्यायनं मासषट्कं मृगाद्यं भानुभुक्तितः । अहः सुराणां तद्रात्रिः कर्काद्यं दक्षिणायनम् ॥१२५॥ गृहप्रवेशवैवाहप्रतिष्ठामौजिबंधनम् । मघादि मंगलं कर्म विधेयं चोत्तरायणे ॥१२६॥ याम्यायने गर्हितं च कर्म यत्नात्प्रशस्यते । माघादिमासौ द्वौ द्वौ च ऋतवः शिशिरादयः ॥१२७॥ मृगाच्छिशिरखसंतश्च ग्रीष्माः स्युश्चोत्तरायणे । वर्षा शरद्च हेमंतः कर्काद्वै दक्षिणायने ॥१२८॥ चांद्रो दर्शाविधिः सौरः संक्रांत्या सावनो दिनैः । त्रिशिद्भश्चंद्रभागो मासो नाक्षत्रसंज्ञकः ॥१२६॥ मधुश्च माधवः शुक्रः शुचिश्चाय नभस्ततः । नभस्य इष ऊर्जश्च सहश्चैव सहस्यकः ॥१३०॥ तपास्तपस्य क्रमशश्चैत्रादीनां समाह्वयाः । यस्मिन्मासे पौर्णमासी येन धिष्ण्येन संयुता ॥१३१॥ तन्नक्षत्राद्वयो मासः पौर्णमासी तदाह्वया । तत्पक्षौ देवपित्राख्यौ शुक्लकृष्णौ तथापरे ॥१३२॥ शुभाशुभे कर्मणि च प्रशस्तौ भवतः सदा । क्रमात्तियीनां ब्रह्माग्नी विरिंचिविष्णुशैलजाः ॥१३३॥ विनायकमो नागचंद्रौ स्कंदोऽर्कवासवौ । महेन्द्रवासवौ नागदुर्गादंडधराह्वयः ॥१३४॥ शिवविष्णू हरिरवी कामः सर्वः कली ततः । चन्द्रविश्वेदशं संज्ञतिथीशाः पितरः स्मृताः ॥१३५॥ संवत्सर के राजा, मंत्री तथा धान्येश रूप ग्रहों के बला-बल का विचार करके तथा उनकी तात्कालिक स्थिति को भी भलीभांति जानकर संवत्सर का फल समझना चाहिए ॥१२४॥ मकरादि छह राशियों में छह मास तक सूर्य के भोग से सौम्यायन (उत्तरायण) होता है । वह देवताओं का दिन और कर्कादि छह राशियों में छह मास तक सूर्य के भोग से दक्षिणायन होता है, वह देवताओं की रात्रि है ॥१२५॥ गृहप्रवेश, विवाह, प्रतिष्ठा तथा यज्ञोपवीत आदि शुभ कर्म माघ आदि उत्तरायण के मासों में करने चाहिए ॥१२६॥ दक्षिणायन में उक्त कार्य गर्हित है माना गया है। अत्यन्त आवश्यकता हो तो उस समय पूजा आदि यत्न करने से शुभ होता है। माघ से दो-दो मासों को शिशिरादि छह ऋतुएं होती हैं ॥१२७॥ मकर से दो-दो राशियों में सूर्यभोग के अनुसार क्रमशः शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म-ये तीन ऋतुएं उत्तरायण में होती हैं, और कर्क से दो-दो राशियों में सूर्यभोग के अनुसार क्रमशः वर्षा, शरद् और हेमन्त-ये तीन ऋतुएं दक्षिणायन में होती हैं ॥१२८। शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक चान्द्र मास होता है । सूर्य की एक संक्रान्ति से दूसरी संक्रान्ति तक सौर मास होता है । तीस दिनों का एक सावन मास होता है । और चन्द्रमा द्वारा सब नक्षत्रों के उपभोग में जितने दिन लगते हैं उतने अर्थात् २७ दिनों का एक नाक्षत्र मास होता है ॥१२९॥ मधु, माधव, शुक्र, शुचि, नभः, नभस्य, इष, ऊर्ज, सहः, सहस्य, तप और तपस्य-ये चैत्रादि बारह मासों की संज्ञाएं हैं । जिस मास की पौर्णमासी जिस नक्षत्र से युक्त हो, उस नक्षत्र के नाम से ही उस मास का नामकरण होता है। (जैसे जिस मास की पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र से युक्त होती है, उस मास का नाम 'चैत्र' होता है और वह पौर्णमासी भी उसी नाम से विख्यात होती है, जैसे चैत्री, वैशाखी आदि ।) प्रत्येक मास के दो पक्ष क्रमशः देव-पक्ष और पितृपक्ष हैं, अन्य विद्वान् उन्हें शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष कहते हैं ॥१३०- १३२॥ वे दोनों पक्ष शुभाशुभ कार्यों में सदा उपयुक्त माने जाते हैं। ब्रह्मा, अग्नि, विरञ्चि, विष्णु, गौरी, गणेश, यम, सर्प, चन्द्रमा, कात्तिकेय, सूर्य, इन्द्र, महेन्द्र, वासव, नाग, दुर्गा, दण्डधर, शिव, विष्णु, हरि, रवि, काम, शङ्कर, कलाधर, यम, चन्द्रमा, (विष्णु, काम और शिव)-ये सब शुक्ल प्रतिपदा से लेकर क्रमशः उनतीस तिथियों के स्वामी होते हैं । अमावस्या नामक तिथि के स्वामी पितर माने गये हैं ।