बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४५३ नंदाभद्राजयारिक्ता पूर्णाः स्युस्तिथयः पुनः । त्रिरावृत्त्या क्रमाज्ज्ञेया नेष्टमध्येष्र्टदाः सिते ॥१३६॥ कृष्णपक्षे त्विष्टमध्यानिष्टदाः क्रमशतदा । अष्टमी द्वादशी षष्ठी चतुर्थी च चतुर्दशी ॥१३७॥ तिथयः पक्षरंध्राख्या ह्यतिरूक्षा प्रकीर्तिताः । समुद्रमनुरंध्रांकतत्त्वसंख्यास्तु नाडिकाः ॥१३८॥ त्याज्याः स्युस्तासु तिथिषु क्रमात्पंच च सर्वदा । अमावास्या च नवमी हित्वा विषमसंज्ञिका ॥१३९॥ तिथयस्तु प्रशस्ताःस्युर्मध्यमा प्रतिपत्सिता । षष्ठ्यां तैलं तथाष्टम्यां मांसं क्षौरं कलेस्तिथौ ॥१४०॥ पूर्णिमादर्शयोर्नारीसेवनं परिवर्जयेत् । दर्शो षष्ठ्यां प्रतिपदि द्वादश्यां प्रतिपर्वसु ॥१४१॥ नवम्यां च न कुर्वीत कदाचिद्दंतधावनम् । व्यतीपाते च संक्रांतावेकादश्यां च पर्वसु ॥१४२॥ अर्कभौमदिने षष्ठ्यां नाभ्यंगो वैधृतो तथा । यः करोति दशम्यां च स्नानमामलकैन॑रः ॥१४३॥ पुत्रहानिर्भवेत्तस्य त्रयोदश्यां धनक्षयः । अर्थपुत्रक्षयस्तस्य द्वितीयायां न संशयः ॥१४४॥ अमायां च नवम्यां च सप्तम्यां च कुलक्षयः । या पौर्णिमा दिवा चंद्रमती सानुमती स्मृता ॥१४५॥ रात्रौ चन्द्रवती राकाप्यमावास्या तथा द्विधा । सिनीवाली चेंदुमती कुहूर्नेदुमती मता ॥१४६॥ (तिथियों की नन्दादि पांच संज्ञा)--प्रतिपदा आदि तिथियों को क्रमशः नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा—ये पांच संज्ञाएँ मानी गई हैं । पन्द्रह तिथियों में इनकी तीन आवृत्ति करके इनका पृथक्-पृथक् ज्ञान प्राप्त करना चाहिए । शुक्लपक्ष में प्रथम आवृत्ति की (१,२,३,४,५-ये) तिथियां अधम, द्वितीय आवृत्ति को ६,७,८, ९,१०--ये तिथियां मध्यम और तृतीय आवृत्ति को (११,१२,१३,१४,१५ ये) तिथियां शुभ होती हैं, इसी प्रकार कृष्ण पक्ष की प्रथम आवृत्ति की नन्दादि तिथियाँ इष्ट (शुभ), द्वितीय आवृत्ति को मध्यम और तृतीय आवृत्ति की अनिष्टप्रद (अधम) होती हैं । दोनों पक्षों को ८,१२,६,४,९,१४--ये तिथियां पक्षरन्ध्र कही गई हैं। इन्हें अत्यन्त रूक्ष कहा गया है । इनमें क्रमशः आरंभ की ४,१४,९,९,२५ और ५ घड़ियां सब शुभ कार्यों में त्याज्य हैं । अमा- वास्या और नवमो को छोड़कर अन्य सब विषम तिथियां ३,५,७,११,१३) सब कार्यों में प्रशस्त हैं । शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा मध्यम है (कृष्णपक्ष की प्रतिपदा शुभ है)। षष्ठी में तेल, अष्टमी में मांस, चतुर्दशी में क्षोर एवं पूर्णिमा और अमावास्या में स्त्री का सेवन वर्जित है । अमावास्या, षष्ठी, प्रतिपदा, द्वादशी, सभी पर्व और नवमी--इन तिथियों में कभी दातून नहीं करना चाहिए । व्यतीपात, संक्रान्ति, एकादशी, पर्व, रवि और मंगलवार तथा षष्ठी तिथि और वैधृति-योग में अभ्यञ्जन (उबटन) नहीं करना चाहिए । जो मनुष्य दशमी तिथि में आंवले से स्नान करता है, उसको पुत्र की हानि उठानी पड़ती है। त्रयोदशी को आंवले से स्नान करने पर धन का नाश होता है और द्वितीया को उससे स्नान करने वालों के धन और पुत्र दोनों का नाश होता है, इसमें संशय नहीं । अमावास्या, नवमी और सप्तमी-इन तीन तिथियों में आँवले से स्नान करने वालों के कुल का विनाश होता है ॥१३३-१४४॥ जो पूर्णिमा दिन में पूर्ण चन्द्र से युक्त हो (अर्थात् जिसमें रात्रिके समय चन्द्रमा कलाहीन हो) वह पूर्णिमा 'अनुमती' कही जाती है और जो रात्रि में पूर्ण चन्द्रमा से युक्त हो वह 'राका' कहलाती है । इसी प्रकार अमा- वास्या भी दो प्रकार की होती है । जिसमें चन्द्रमा की कला का किंचित् अंश शेष रहता है, वह 'सिनोवाली' कही गई है तथा जिसमें चन्द्रमा को सम्पूर्ण कला लुप्त हो जाती है, वह अमावास्या 'कुहू' कही जाती है ॥१४५-१४६॥