बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 473, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें४५४ नारदीयपुराणम् कार्त्तिके शुक्लनवमी त्वादिः कृतयुगस्य च । त्रेतादिर्माधवे शुक्ले तृतीया पुण्यसंज्ञिता ॥१४७॥ कृष्णा पंचदशी माघे द्वापरादिमुदीरिता । कल्पादिः स्यात्कृष्णपक्षे नभस्यस्य त्रयोदशी ॥१४८॥ द्वादश्यूर्जे शुक्लपक्षे नवम्यच्छेश्र्वयुज्यपि । चैत्रे भाद्रपदे चैव तृतीया शुक्लसंज्ञिता ॥१४९॥ एकादशी सिता पौषे ह्याषाढे दशमीसिता । माघे च सप्तमी शुक्ला नभस्ये त्वसिताष्टमी ॥१५०॥ श्रावणे मास्यमावास्या फाल्गुने मासि पौर्णिमा । आषाढे कार्त्तिके मासि ज्येष्ठे चैत्रे च पौर्णिमा ॥१५१॥ मन्वादयो मानवानां श्राद्धेष्वत्यंतपुण्यदा । भाद्रे कृष्णत्रयोदश्यां सधर्मांशुः करे रविः ॥१५२॥ गजच्छाया तदा ज्ञेया श्राद्धे ह्यत्यंतपुण्यदा । एकस्मिन्वासरे तिस्रस्तिथयः स्युस्तिथिक्षयः ॥१५३॥ तिथित्रितये त्वेका ह्यधिका द्वे च निन्दिते । सूर्यास्तमनपर्यन्तं यस्मिन्वारे तु या तिथिः ॥१५४॥ विद्यते सा त्वखंडा स्यान्न्यूना चेत्खंडसंज्ञिता । तिथेः पंचदशो भागः क्रमात्प्रतिपदादयः ॥१५५॥ क्षणसंज्ञास्तदर्द्धानि तासामर्द्धप्रमाणतः । रविः स्थिरश्चरश्चन्द्रः क्रूरो वक्रोऽखिलो बुधः ॥१५६॥ लघुरिज्यो मृदुः शुक्रस्तीक्ष्णो दिनकरात्मजः । अभ्यक्तो भानुवारे यः स नरः क्लेशवान्भवेत् ॥१५७॥
(युगादि तिथियाँ)—कार्त्तिक शुक्लपक्ष की नवमी सत्ययुग की आदि तिथि है । वैशाख-शुक्लपक्ष की पुण्यमयी तृतीया त्रेतायुग की आदि तिथि है । माघ की अमावास्या द्वापरयुग की आदि तिथि और भाद्रपद-कृष्ण त्रयोदशी कलियुग की आदि तिथि है ॥१४७-१४८॥ (मन्वादि तिथियाँ--) कार्त्तिक-शुक्ला द्वादशी, आश्विन-शुक्ला नवमी, चैत्र-शुक्ला तृतीया, भाद्रपद शुक्ला तृतीया, पौषशुक्ला एकादशी, आषाढशुक्ला दशमी, माघशुक्ला सप्तमी, भाद्रपद कृष्णा अष्टमी, श्रावण की अमा- वास्या, फाल्गुन की पूर्णिमा, आषाढ़ की पूर्णिमा, कार्त्तिक की पूर्णिमा, ज्येष्ठ की पौर्णमासी और चैत्र की पूर्णिमा—ये चौदह मन्वादि तिथियाँ हैं । ये सब तिथियां मनुष्यों के लिए पितृकर्म (पार्वण श्राद्ध) में अत्यन्त पुण्य देने वाली हैं ॥१४९-१५१॥ (गजच्छाया-योग--) भादों के कृष्णपक्ष की (शुक्लादि क्रम से भाद्रकृष्ण और कृष्णादि क्रम से आश्विन कृष्णपक्ष की) त्रयोदशी में यदि सूर्य हस्त नक्षत्र में और चन्द्रमा मघा में हो तो 'गजच्छाया' नामक योग होता है, जो पितरों के पार्वणादि श्राद्ध कर्म में अत्यन्त पुण्य-प्रद है ॥१५२॥ किसी एक दिन में तीन तिथियों का स्पर्श हो तो क्षयतिथि तथा एक ही तिथि का तीन दिन में स्पर्श हो तो अधिक तिथि (अधितिथि) होती है । ये दोनों ही निन्दित हैं । जिस दिन सूर्योदय से सूर्यास्तपर्यन्त जो तिथि रहती है, उस दिन वह अखण्ड तिथि कहलाती है । यदि सूर्यास्त से पूर्व ही समाप्त होती है तो वह खण्ड तिथि कही जाती है ॥१५३-१५४॥ (क्षणतिथिकथन--) प्रत्येक तिथि में तिथिमान का पन्द्रहवां भाग क्षणतिथि कहलाता है । (अर्थात् प्रत्येक तिथि में उसी तिथि से आरंभ करके पन्द्रह तिथियों के अन्तर्भाग होते हैं ।) तथा उन क्षणतिथियों का भी आधा क्षण तिथ्यर्ध (क्षण करण) होता है ॥१५५॥ (वारप्रकरण--) रवि स्थिर, सोम चर, मंगल क्रूर, बुध अखिल (सम्पूर्ण), गुरु लघु, शुक्र मृदु और शनि तीक्ष्ण धर्म वाला है । वारों में तेल लगाने का फल--जो मनुष्य रविवार को तेल लगाता है, वह रोगी होता है । सोमवार को तेल लगाने से कान्ति बढ़ती हैं । मङ्गल को व्याधि होती है । बुध को तैलाभ्यंग से सौभाग्य की वृद्धि होती है ।