बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४५५ ऋक्षेशे कांतिभङ्गोमे व्याधि सौभाग्यमिन्दुजे । जीवे नैवं सिते हानिर्मन्दे सर्वसमृद्धयः ॥१५८॥ लंकोदयात्स्याद्बारादिस्तस्मादूर्ध्वमथोऽपिवा । देशांतरस्वचरार्द्धनाडीभिरपरे भवेत् ॥१५९॥ बलप्रदस्य खेटस्य कर्म सिद्धयति यत्कृतम् । तत्कर्म बलहीनस्य दुःखैनापि न सिद्धयति ॥१६०॥ इंदुज्ञजीवशुक्राणां वासराः सर्वकर्मसु । फलदास्त्वितरे क्रूरे कर्मस्वभिमतप्रदाः ॥१६१॥ रक्तवर्णो रविश्चंद्रो गौरो भौमस्तु लोहितः । दूर्वावर्णो बुधो जीवः पीतः श्वेतस्तु भार्गवः ॥१६२॥ कृष्णः सौरिः स्ववारेषु स्वस्ववर्णक्रिया हिताः । अद्रिबाणाश्च यस्तर्कपातालवसुधाधराः ॥१६३॥ वाणाग्निलोचनानिङ्गवेदबाहुशिलोमुखाः । त्र्येकाहयो नेत्रगोत्ररामाश्चंद्ररसर्तवः ॥१६४॥ कुलिकाश्चोपकुलिका वारवेलास्तथा क्रमात् । प्रहरार्द्धप्रमाणास्ते विज्ञेयाः सूर्यवासरात् ॥१६५॥ यस्मिन्वारे क्षणो वारदृष्टस्तद्वासराधिपः । आद्यः षष्ठो द्वितीयोस्मात्तत्षष्ठस्तु तृतीयकः ॥१६६॥ षष्ठः षष्ठश्चेतरेषां कालहोराध्यपाः स्मृताः । सोर्द्धनाडीद्वयेनैव दिवा रात्रौ यथाक्रमात् ॥१६७॥ वारप्रोक्तं कर्मकार्ये तद्ग्रहस्य क्षणेऽपि सन् । नक्षत्रेशाः क्रमाद्दस्रय मवह्नपितामहाः ॥१६८॥ चंद्रेशादितिजीवाहिपितरो भगसंज्ञकः । अर्यमाकस्त्वष्ट्मरुच्छक्राग्निमित्रवासवः ॥१६९॥
गुरुवार को सौभाग्य को हानि होती है । शुक्रवार को भी हानि होती है तथा शनिवार को तेल लगाने से धन-सम्पत्ति की हानि होती है ॥१५६-१५८॥ रवि आदि वारों का आरंभकाल--जिस समय लंका में (भूमध्यरेखा पर) सूर्योदय होता है, उसी समय से सर्वत्र रवि आदि वारों का आरंभ होता है । उस समय से देशान्तर (लंकोदयकाल से अपने उदय काल का अन्तर) और चरार्ध घटीतुल्य आगे या पीछे अन्य देश में सूर्योदय हुआ करता है ॥१५९॥ जो ग्रह बलवान् होता है, उसके वारे में जो कोई भी कार्य किया जाता है, वह सिद्ध हुआ करता है, किन्तु जो ग्रह बलहीन (जातक-अध्याय में कहे हुए बल से रहित) होता है, उसके बारे में बहुत यत्न करने पर भी कार्य सिद्ध नहीं होता है ॥१६०॥ सोम, बुध, वृहस्पति और शुक्र सम्पूर्ण शुभ कार्यों में शुभप्रद होते हैं, अन्य वार (शनि, रवि और मङ्गल) क्रूर कर्म में इष्टसिद्धिदायक होते हैं ॥१६१॥ सूर्य का वर्ण लाल है, चन्द्रमा का गौर वर्ण है, मङ्गल अधिक लाल हैं, बुध की कान्ति दुर्वादल के समान श्याम है, गुरु का वर्ण सुवर्ण के समान पीला है, शुक्र श्वेत और शनि कृष्ण वर्ण के हैं; इसलिए उन ग्रहों के वारों में उनके गुण और वर्ण के अनुरूप कार्य ही सिद्ध एवं हितकर होते हैं । (निन्द्य मुहूर्त--)रविवार से आरंभ करके रवि में ७,५,४; सोम में ६,४,७; मङ्गल में ५,३,२; बुध में ४,२,५; गुरुवार में ३,१,८; शुक्रवार में २,७,३ और शनि में १,६,८-ये प्रहरार्ध क्रमशः कुलिक, उपकुलिक वारवेला कहे गये हैं इनका मान आधे पहर का समझना चाहिए ॥१६२-१६५॥ (प्रत्येक वार में क्षणवार-कथन--) जिस बार में क्षणवार जानना हो, उस वार में प्रथम क्षणवार उसी वारपति का होता है । उससे छठे वारेश का द्वितीय, उससे भी छठे का तृतीय, इस प्रकार छठे-छठे के क्रम से दिन-रात में २४ क्षणवार (काल होरा या होरा) होते हैं । एक-एक क्षणवार का मान ढाई-ढाई घटी (या १घंटा) है ॥१६६-१६७॥ (क्षणवार का प्रयोजन--) जिस वार में जो कर्म शुभ या अशुभ कहा गया है, वह उसके क्षणवार में भी उसी प्रकार शुभ या अशुभ समझना चाहिए ॥१६७३॥ (नक्षत्राधिपति-कथन--) १ दस्र (अश्विनी कुमार), २ यम, ३ अग्नि, ४ ब्रह्मा, ५ चन्द्र, ६ शिव ७ अदिति, ८ गुरु, ९ सर्प, १० पितर, ११ भग, १२ अर्यमा, १३ सूर्य, १४ विश्वकर्मा, १५ वायु, १६ इन्द्र और अग्नि