भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 475, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 475

४५६ नारदीयपुराणम् नैर्ऋत्युदकविश्वेजगोविन्दवसवस्तोयपाः । अजैकपादहिर्बुध्न्या पूषा चेति प्रकीर्तिताः ॥१७०॥ पूर्वात्रयं मघात्याग्निविशाखाग्रसमूलभम् । अधोमुखं तु नवकं भानौ तत्र विधीयते ॥१७१॥ बिलप्रवेशगणित भूतसाधनलेखनम् । शिल्पकर्मकलाकूपनिक्षेपोद्धरणादि यत् ॥१७२॥ मित्रेन्दूत्वाष्ट्रहस्तेन्द्रादितिभांत्यशिवायुभम् । तिर्यङ्मुखारख्यं नवकं भानौ तत्र विधीयते ॥१७३॥ हलप्रवाहगमनं गवीपत्रगजोष्ट्रकम् । खरगौरथयौवानलुलायहयकर्म च ॥१७४॥ ब्रह्मविष्णुमहेशार्यशततारावसुत्तराः । ऊर्द्ध्वास्यं नवकं भानां प्रोक्तमत्र विधीयते ॥१७५॥ नृपाभिषेकमाङ्गल्यवारणध्वजकर्म च । प्रासादतोरणारामप्राकारायं च सिद्ध्यति ॥१७६॥ स्थिरं रोहिण्युत्तराख्यं क्षिप्रं सूर्याशिवपुष्यभम् । साधारणं द्विदैवत्यं वह्निभं च प्रकीर्तितम् ॥१७७॥ वस्वदित्यंबुपुष्याणि विष्णुभं चरसंज्ञितम् । मृदिन्दुमित्रचित्रांत्यमुग्रं पूर्वामघात्रिकम् ॥१७८॥ मूलाद्रार्हिन्द्रभं तीक्ष्णं स्वनामसदृशं फलम् । चित्रादित्यर्चविष्ण्वंत्याधिमित्रवसूडुषु ॥१७९॥ समूगेज्येषु बालानां कर्णवेधक्रिया हिता । दस्रेन्द्रादितितिष्येषु कराद्वितितये तथा ॥१८०॥ १७ मित्र, १८ इन्द्र, १९ राक्षस (निर्रिति), २० जल, २१ विश्वेदेव, २२ ब्रह्मा, २३ विष्णु, २४ वसु, २५ वरुण, २६ अजैकपाद, २७ बहिर्बुध्न्य और २८ पूषा—ये क्रमशः (अभिजित् सहित) अश्विनी आदि २८ नक्षत्रों के स्वामी कहे गये हैं ॥१६८-१७०॥ (नक्षत्रों के मुख--) पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढ़, पूर्व भाद्रपद, मघा, अश्लेषा, कृत्तिका, विशाखा, भरणी, मूल--ये नौ नक्षत्र अधोमुख (नीचे मुख वाले) हैं। इनमें बिल प्रवेश (कुआँ, भूविवर या पाताल आदि में जाना), गणित, भूतसाधन, लेखन, शिल्प (चित्र आदि) कर्म, कला, कुआँ खोदना तथा गाड़े हुए धन को निकालना आदि सब कार्य सिद्ध होते हैं ॥१७१--१७२॥ अनुराधा, मृगशिरा, चित्रा, हस्त, ज्येष्ठा, पुनर्वसु, रेवती, अश्विनी और स्वाती--ये नौ नक्षत्र तिर्यक् (सामने) मुख वाले हैं। इनमें हल जोतना, यात्रा करना, गाड़ी बनाना, पत्र लिखकर भेजना, हाथी, ऊंट आदि की सवारी करना, गदहे, बैल आदि से चलने वाले रथ बनाना, नौका पर चलना तथा भैंस, घोड़े आदि सम्बन्धी कार्य करने चाहिए ॥१७३--१७४॥ रोहिणी, श्रवण, आर्द्रा, पुष्य, शतभिषा, धनिष्ठा, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ तथा उत्तरा भाद्रपद--ये नौ नक्षत्र ऊर्ध्वमुख (ऊपर मुख वाले) कहे गये हैं। इनमें राज्याभिषेक, मङ्गल (विवाहादि)--कार्य, गजारोहण, ध्वजारोहण, मन्दिरनिर्माण, तोरण (फाटक) बनाना, बगीचे लगाना और चहारदीवारी बनवाना आदि कार्य सिद्ध होते हैं ॥१७५--१७६॥ (नक्षत्रों की ध्रुवादिसंज्ञा--) रोहिणी, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ और उत्तरभाद्रपद--ये ध्रुव संज्ञक नक्षत्र हैं। हस्त, अश्विनी और पुष्य--ये क्षिप्रसंज्ञक हैं। विशाखा और कृत्तिका--ये दोनों साधारणसंज्ञक हैं। धनिष्ठा पुनर्वसु, शतभिषा, स्वाती और श्रवण--ये चरसंज्ञक हैं। मृगशिरा, अनुराधा, चित्रा तथा रेवती--ये मृदु-संज्ञक हैं। पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढ़, पूर्व भाद्रपद और भरणी--ये उग्रसंज्ञक नक्षत्र हैं। मूल आर्द्रा, अश्लेषा और ज्येष्ठा--ये तीक्ष्ण संज्ञक नक्षत्र हैं। ये सब अपने नाम के अनुसार ही फल देते हैं ॥१७७--१७८३॥ कर्णवेध मुहूर्त—चित्रा, पुनर्वसु, श्रवण, हस्त, रेवती, अश्विनी, अनुराधा, धनिष्ठा, मृगशिरा और पुष्य--इन नक्षत्रों में कर्णवेध शुभ होता है। हाथी और घोड़े सम्बन्धी कार्य—अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा और स्वाती

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 475, कुल 1008 में से · BharatKosha