बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४५७ गजकर्माखिलं यत्तद्विधेयं स्थिरभेषु च । वाजिकर्माखिलं कार्यं सूर्यवारे विशेषतः ॥१८१॥ चित्रा वरुणवैरिञ्चद्युत्तरासु गमागमम् । दर्शाष्टम्यां चतुर्दश्यां च पशूनां न कदाचन ॥१८२॥ मृदुध्रुवक्षिप्रचरविशाखापितृभेषु च । हलप्रवाहं प्रथमं विदध्यान्मूलभे वृषैः ॥१८३॥ हलादौ वृषनाशाय भत्रयं सूर्यमुक्तभात् । अग्रे वृद्धयै त्रयं लक्ष्म्यै सौम्यपार्श्वे च पंचकम् ॥१८४॥ शूलत्रयेऽपि नवकं मरणाय च पंचकम् । श्रियै पुष्ट्यै त्रयं श्रेष्ठं स्याच्चक्रे लांगलाह्वये ॥१८५॥ मृदुध्रुवक्षिप्रभेषु पितृवायुवडुषु । समूलमेषु बीजोप्तिरत्युत्कृष्टफलप्रदा ॥१८६॥ भवेद्भत्रितयं मूध्नि धान्यनाशाय राहुभात् । गले त्रयं कज्जलाय वृद्धयै च द्वादशोदरे ॥१८७॥ निस्तंडुलत्वं लांगुले भचतुष्टयभीतिदम् । नाभौ वह्निः पंचकं यद्बीजोप्ताविति चिंतयेत् ॥१८८॥ स्थिरेष्वदितिसार्पांत्यपितृमारुतभेषु च । न कुर्याद्रोगमुक्तस्य स्नानमार्होन्दुशुक्रयोः ॥१८९॥ उत्तरात्रयमैलैन्द्रवसुवारुणभेषु च । पुष्यार्कपौष्णधिष्ण्येषु नृत्यारंभः प्रशस्यते ॥१९०॥ पूर्वाद्द्वयंयुजि पद्मानि पौष्णभादुद्भवत्ततः । मध्यंयुजि द्वादशाक्षाणीन्द्रमान्नवभानि च ॥१९१॥ इनमें तथा स्थिरसंज्ञक नक्षत्रों में हाथी सम्बन्धी सब कृत्य करने चाहिए। तथा इन्हीं नक्षत्रों में घोड़े के भी सब कृत्य शुभ होते हैं । किन्तु रविवार को इन कृत्यों का त्याग कर देना चाहिए ॥१७६--१८१॥ (अन्य पशुकृत्य--) चित्रा, शतभिषा, रोहिणी, तथा तीनों उत्तरा--इन नक्षत्रों में पशुओं को कहीं से लाना या ले जाना शुभ है । परन्तु अमावास्या, अष्टमी और चतुर्दशी को कदापि पशुओं का कोई कृत्य नहीं करना चाहिए ॥१८२॥ प्रथम हलप्रवाह हल-जोतना--मृदु, ध्रुव, क्षिप्र और चरसंज्ञक नक्षत्र, विशाखा, मघा और मूल--इन नक्षत्रों में बैलों द्वारा प्रथम बार हल जोतना शुभ होता है। सूर्य जिस नक्षत्र में हो उससे पिछले नक्षत्र से तीन नक्षत्र हल के आदि (मूल) में रहते हैं इनमें प्रथम बार हल जोतने जुताने से बैल का नाश होता है। उसके आगे तीन नक्षत्र हल के अग्रभाग में रहते हैं। इनमें हल जोतने से वृद्धि होती है। उससे आगे के पांच नक्षत्र उत्तर पार्श्व में रहते हैं, इनमें लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। तीन शूलों में नौ नक्षत्र रहते हैं। इनमें हल जोतने से कृषक का मरण होता है। उससे आगे पांच नक्षत्रों में सम्पत्ति की वृद्धि होती है। फिर उससे आगे के तीन नक्षत्रों में प्रथम बार हल जोतने से उत्तम फल प्राप्त होते हैं ॥१८३--१८५॥ बीजवपन--मृदु, ध्रुव और क्षिप्रसंज्ञक नक्षत्र, मघा, स्वाती, धनिष्ठा और मूल--इनमें धान्य के बीज बोना श्रेष्ठ होता है। इस बीज-वपन में राहु जिस नक्षत्र में हो, उससे तीन नक्षत्र लांगल-चक्र के अग्रभाग में रहते हैं। इन तीनों में बीजवपन से धान्य का नाश होता है। उससे आगे के तीन नक्षत्र गले में रहते हैं। उनमें बीजवपन से जल की अल्पता होती है। उससे आगे के बारह नक्षत्र उदर में रहते हैं, उनमें बीज बोने से धान्य की वृद्धि होती है। उससे आगे के चार नक्षत्र लांगल में रहते हैं, इनमें निस्तण्डुलत्व होता है (अर्थात् धान में दाने नहीं लगते, केवल भूसी मात्र रह जाती है)। उससे आगे के पाँच नक्षत्र नाभि में रहते हैं, इनमें प्रथम बीज-वपन से अग्नि भय प्राप्त होता है । इस चक्र का विचार बीज-वपन में अवश्य करना चाहिए ॥१८६-१८८॥ रोगविमुक्त का स्नान--स्थिरसंज्ञक, पुनर्वसु, अश्लेषा, रेवती, मघा और, स्वाती-इन नक्षत्रों में तथा सोम और शुक्र के दिन रोगमुक्त पुरुष को पहले पहल स्नान नहीं करना चाहिए ॥१८९॥ नृत्यारंभ-- उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ, उत्तर-भाद्रपद, अनुराधा, ज्येष्ठा, धनिष्ठा, शतभिषा, पुष्य, हस्त और रेवती-इन नक्षत्रों में नृत्यारंभ उत्तम होता है ॥१९०॥ ५८ ना० पृ०