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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४५७ गजकर्माखिलं यत्तद्विधेयं स्थिरभेषु च । वाजिकर्माखिलं कार्यं सूर्यवारे विशेषतः ॥१८१॥ चित्रा वरुणवैरिञ्चद्युत्तरासु गमागमम् । दर्शाष्टम्यां चतुर्दश्यां च पशूनां न कदाचन ॥१८२॥ मृदुध्रुवक्षिप्रचरविशाखापितृभेषु च । हलप्रवाहं प्रथमं विदध्यान्मूलभे वृषैः ॥१८३॥ हलादौ वृषनाशाय भत्रयं सूर्यमुक्तभात् । अग्रे वृद्धयै त्रयं लक्ष्म्यै सौम्यपार्श्वे च पंचकम् ॥१८४॥ शूलत्रयेऽपि नवकं मरणाय च पंचकम् । श्रियै पुष्ट्यै त्रयं श्रेष्ठं स्याच्चक्रे लांगलाह्वये ॥१८५॥ मृदुध्रुवक्षिप्रभेषु पितृवायुवडुषु । समूलमेषु बीजोप्तिरत्युत्कृष्टफलप्रदा ॥१८६॥ भवेद्भत्रितयं मूध्नि धान्यनाशाय राहुभात् । गले त्रयं कज्जलाय वृद्धयै च द्वादशोदरे ॥१८७॥ निस्तंडुलत्वं लांगुले भचतुष्टयभीतिदम् । नाभौ वह्निः पंचकं यद्बीजोप्ताविति चिंतयेत् ॥१८८॥ स्थिरेष्वदितिसार्पांत्यपितृमारुतभेषु च । न कुर्याद्रोगमुक्तस्य स्नानमार्होन्दुशुक्रयोः ॥१८९॥ उत्तरात्रयमैलैन्द्रवसुवारुणभेषु च । पुष्यार्कपौष्णधिष्ण्येषु नृत्यारंभः प्रशस्यते ॥१९०॥ पूर्वाद्द्वयंयुजि पद्मानि पौष्णभादुद्भवत्ततः । मध्यंयुजि द्वादशाक्षाणीन्द्रमान्नवभानि च ॥१९१॥ इनमें तथा स्थिरसंज्ञक नक्षत्रों में हाथी सम्बन्धी सब कृत्य करने चाहिए। तथा इन्हीं नक्षत्रों में घोड़े के भी सब कृत्य शुभ होते हैं । किन्तु रविवार को इन कृत्यों का त्याग कर देना चाहिए ॥१७६--१८१॥ (अन्य पशुकृत्य--) चित्रा, शतभिषा, रोहिणी, तथा तीनों उत्तरा--इन नक्षत्रों में पशुओं को कहीं से लाना या ले जाना शुभ है । परन्तु अमावास्या, अष्टमी और चतुर्दशी को कदापि पशुओं का कोई कृत्य नहीं करना चाहिए ॥१८२॥ प्रथम हलप्रवाह हल-जोतना--मृदु, ध्रुव, क्षिप्र और चरसंज्ञक नक्षत्र, विशाखा, मघा और मूल--इन नक्षत्रों में बैलों द्वारा प्रथम बार हल जोतना शुभ होता है। सूर्य जिस नक्षत्र में हो उससे पिछले नक्षत्र से तीन नक्षत्र हल के आदि (मूल) में रहते हैं इनमें प्रथम बार हल जोतने जुताने से बैल का नाश होता है। उसके आगे तीन नक्षत्र हल के अग्रभाग में रहते हैं। इनमें हल जोतने से वृद्धि होती है। उससे आगे के पांच नक्षत्र उत्तर पार्श्व में रहते हैं, इनमें लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। तीन शूलों में नौ नक्षत्र रहते हैं। इनमें हल जोतने से कृषक का मरण होता है। उससे आगे पांच नक्षत्रों में सम्पत्ति की वृद्धि होती है। फिर उससे आगे के तीन नक्षत्रों में प्रथम बार हल जोतने से उत्तम फल प्राप्त होते हैं ॥१८३--१८५॥ बीजवपन--मृदु, ध्रुव और क्षिप्रसंज्ञक नक्षत्र, मघा, स्वाती, धनिष्ठा और मूल--इनमें धान्य के बीज बोना श्रेष्ठ होता है। इस बीज-वपन में राहु जिस नक्षत्र में हो, उससे तीन नक्षत्र लांगल-चक्र के अग्रभाग में रहते हैं। इन तीनों में बीजवपन से धान्य का नाश होता है। उससे आगे के तीन नक्षत्र गले में रहते हैं। उनमें बीजवपन से जल की अल्पता होती है। उससे आगे के बारह नक्षत्र उदर में रहते हैं, उनमें बीज बोने से धान्य की वृद्धि होती है। उससे आगे के चार नक्षत्र लांगल में रहते हैं, इनमें निस्तण्डुलत्व होता है (अर्थात् धान में दाने नहीं लगते, केवल भूसी मात्र रह जाती है)। उससे आगे के पाँच नक्षत्र नाभि में रहते हैं, इनमें प्रथम बीज-वपन से अग्नि भय प्राप्त होता है । इस चक्र का विचार बीज-वपन में अवश्य करना चाहिए ॥१८६-१८८॥ रोगविमुक्त का स्नान--स्थिरसंज्ञक, पुनर्वसु, अश्लेषा, रेवती, मघा और, स्वाती-इन नक्षत्रों में तथा सोम और शुक्र के दिन रोगमुक्त पुरुष को पहले पहल स्नान नहीं करना चाहिए ॥१८९॥ नृत्यारंभ-- उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ, उत्तर-भाद्रपद, अनुराधा, ज्येष्ठा, धनिष्ठा, शतभिषा, पुष्य, हस्त और रेवती-इन नक्षत्रों में नृत्यारंभ उत्तम होता है ॥१९०॥ ५८ ना० पृ०

४५८ नारदीयपुराणम् परार्द्धयुं जि क्रमशः संप्रीतिर्दम्पतोमिथः । जघन्यास्तोयदार्द्राहिपवनांतकनाकपाः ॥१९२॥ क्रमादितिद्विदैवत्या बृहत्ताराः पराः समाः । तासां प्रमाणघटिकास्त्रिंशन्नवतियष्टयः ॥१९३॥ क्रमादभ्युदिते चंद्रे नयत्यर्घसमानि च । अश्वश्रोत्रीज्यनक्षत्रंत्वष्ट्राब्जत्त्युत्तराभवाः ॥१९४॥ पितृद्विदैववस्वाख्यास्ताराः स्युः कुलसंज्ञिकाः । धातृज्येष्ठादितिस्वातीपौष्णार्कहरिदेवताः ॥१९५॥ अजाह्यंत्यकभौ जंगताराश्चैवाकुलाह्वयाः । शेषाः कुलाकुलास्तारास्तासां मध्ये कुलोडुषु ॥१९६॥ प्रयाति यदि भूपालस्तदाप्नोति पराजयम् । भेष्वकुलसंज्ञेषु जयमाप्नोति निश्चितम् ॥१९७॥ संधिर्वापि तयोः साम्यं कुलाकुलगणोडुषु । अर्कोकिभौमवारे चेद्भद्राया विषमांघ्रिभम् ॥१९८॥ त्रिपुष्करं त्रिगुणं द्विगुणं यमलाङ्घ्रिभम् । दद्यात्तद्दोषनाशाय गोत्रयं मूल्यमेव वा ॥१९९॥

रेवती से छह नक्षत्र पूर्वार्धयोगी, आर्द्रा से बारह नक्षत्र मध्ययोगी और धनिष्ठा से नौ नक्षत्र परार्धयोगी हैं। इनमें से पूर्वयोगी में यदि वर और कन्या-दोनों के नक्षत्र पड़ते हों तो स्त्री का स्वामी में अधिक प्रेम होता है। मध्ययोग में हों तो दोनों में परस्पर समान प्रेम होता है और परार्धयोगी में दोनों के नक्षत्र हों तो स्त्री में पति का अधिक प्रेम होता है ॥१९११/२॥ **बृहत्, सम और अधम नक्षत्र-**शतभिषा, आर्द्रा, आश्लेषा, स्वाती, भरणी और ज्येष्ठा—ये छह नक्षत्र जघन्य (अधम) कहे गये हैं। ध्रुवसंज्ञक, पुनर्वसु और विशाखा—ये नक्षत्र वृहत् (श्रेष्ठ) कहलाते हैं तथा अन्य नक्षत्र समसंज्ञक हैं। इनका विशोपक मान क्रमशः ३०,६० और ६० घड़ी कहा गया है ॥१९२--१६३॥ यदि द्वितीया तिथि को बृहतसंज्ञक नक्षत्र में चन्द्रोदय हो तो अन्न सस्ता होता है। समसंज्ञक नक्षत्र में चन्द्रदर्शन हो तो अन्नादि के भाव में समता होती है और जघन्यसंज्ञक नक्षत्र में चन्द्रोदय हो तो उस महीने में अन्न महँगा हो जाता है ॥१९३१/२॥ **यात्रा करने वाले को जय तथा पराजय देने वाले नक्षत्र-**अश्विनी, कृत्तिका, मृगशिरा पुष्य, मूल चित्रा, श्रवण, तीनों उत्तरा, पूर्वा फाल्गुनी, मघा, विशाखा, धनिष्ठा—ये नक्षत्र कुलसंज्ञक हैं। रोहिणी, ज्येष्ठा, पुनर्वसु, स्वाती, रेवती, हस्त, अनुराधा, पूर्वाभाद्रपद, भरणी और आश्लेषा—ये नक्षत्र अकुलसंज्ञक हैं। शेष नक्षत्र कुलाकुलसंज्ञक हैं। इनमें कुलसंज्ञक नक्षत्रों में विजय की इच्छा से यात्रा करने वाले राजा की पराजय होती है अकुलसंज्ञक नक्षत्रों में यात्रा करने से वह निश्चय ही शत्रु पर विजय प्राप्त करता है। और कुलाकुल संज्ञक नक्षत्रों में युद्धार्थ यात्रा करने पर शत्रुओं के साथ सन्धि होती है। अथवा यदि युद्ध हुआ तो भी दोनों में समानता सिद्ध होती है। (किसी एक पक्ष की हार या जीत नहीं होती) ॥१९४–१६७१/२॥ त्रिपुष्कर द्विपुष्कर योग-- रवि, शनि या मङ्गल वार में भद्रा (२,१२) तिथि तथा विषम चरण वाले नक्षत्र (कृत्तिका, पुनर्वसु, उत्तरा फाल्गुनी, विशाखा, उत्तराषाढ़ और पूर्व भाद्रपद) हों तो (इन तीनों के संयोग से 'त्रिपुष्कर' नामक योग होता है। तथा उन्हीं रवि, शनि और मंगलवार एवं भद्रा तिथियों में दो चरण वाले नक्षत्र (मृगशिरा, चित्रा और धनिष्ठा) हों तो 'द्विपुष्कर' योग होता है। त्रिपुष्करयोग त्रिगुणित (तीन गुने) और द्विपुष्करयोग द्विगुणित लाभ और हानि को देने वाले होते हैं। अतः इनमें किसी वस्तु की हानि हो तो उस दोष की शान्ति के लिए तीन गोदान या तीन गौओं का मूल्य तथा द्विपुष्कर दोष की शान्ति के लिए दो गोदान या दो गौओं का मूल्य ब्राह्मणों को देना चाहिए। इससे उक्त (तिथि, वार और) नक्षत्र सम्बन्धी दोष का निवारण हो जाता है ॥१९८-१९९१/२॥

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४५६ द्विपुष्करे द्वयं दद्यान्न दोषस्त्वृक्षभोऽपि वा । क्रूरविद्धो युतो वापि पुष्यो यदि बलान्वितः ॥२००॥ विना पाणिग्रहं सर्वमंगलेष्विष्टदः सदा । रामाग्निऋतुबाणाग्निरूवेदाग्निशरेषु च ॥२०१॥ नेत्रबाहुशरैर्द्विदुबाहुवेदाग्निसंकुराः । वेदनेत्राब्ध्यग्निशतबाहुनेत्ररदाः क्रमात् ॥२०२॥ तारासंख्याश्च विज्ञेया दस्रादीनां पृथक् पृथक् । या दृश्यंते दीप्तताराः स्वगणे योगतारकाः ॥२०३॥ वृषो वृक्षोश्चथायाम्यधिष्ण्येयमकरस्तमः । उडुंबरश्चाग्निधिष्ण्ये रोहिण्यां जंबुकस्तरः ॥२०४॥ इन्दुभात्खदिरो जातः कृष्णप्लक्षकश्च रौद्रभात् । संभूतोऽदितिभाद्वंशः पिप्पलः पुष्यसंभवः ॥२०५॥ सर्पधिष्ण्यान्नागवृक्षो वटः पितृसंभवः । पालाशो भाग्यभाज्जातः अक्षश्चार्यमसंभवः ॥२०६॥ अरिष्टवृक्षो रविमाच्छ्रीवृक्षस्त्वाष्ट्रसंभवः । स्वात्यृक्षजोऽर्जुनो वृक्षो द्विदैवत्याद्विकंकतः ॥२०७॥ मित्रभाद्वकुलो जातो विष्टिः पौरंदरर्क्षजः । सर्ज्जवृक्षो मूलभाच्च वंजुलो वारिधिष्ण्यजः ॥२०८॥ पनसो वैश्वभाज्जातश्चार्कवृक्षश्च विष्णुभात् । वसुधिष्ण्याच्छमीवृक्षः कदंबो वारुणर्क्षजः ॥२०९॥ अजाहेर्घूतवृक्षोभूद् बुद्ध्यजः पिचुमन्दकः । मधूवृक्षः पौष्णधिष्ण्याद्धिष्ण्यवृक्षः प्रकीर्तितः ॥२१०॥ यस्मिन्ऋक्षैश्चरो धिष्ण्ये तद्वृक्षोऽर्च्यः प्रयत्नतः । योगेशा यमविश्वेंदुधातुजीव निशाकराः ॥२११॥ इंद्रतोयाहिवह्न्वर्क भूमिरुद्रकतोयपाः । गणेशरुद्रधनदत्वष्टृमित्रषडाननाः ॥२१२॥

**पुष्य नक्षत्र की प्रशंसा—**पाप ग्रह से विद्ध या युक्त होने पर भी पुष्य नक्षत्र बलवान् होता है और विवाह छोड़कर वह सब शुभ कर्मों में अभीष्ट फल देने वाला है ॥२००॥ **नक्षत्रों में योग-ताराओं की संख्या—**अश्विनी आदि (अभिजित्सहित) अट्ठाईस नक्षत्रों में क्रमशः ३, ३, ६, ५, ३, १, ४, ३, ५, ५, २, २, ५, १, १, ४, ४, ३, ११, २, २, ३, ३, ४, १००, २, २ और ३२ योगतारामें होती हैं। अपने-अपने आकाशीय विभाग में जो अनेक ताराओं का पुञ्ज देता हैं, उसमें जो अत्यन्त उद्दीप्त तारायें दीख पड़ती हैं, वे योगतारायें कहलाती हैं ॥ २०१-२०३॥ **नक्षत्रों से वृक्षों की उत्पत्ति—**जितने भी वृष अर्थात् श्रेष्ठ वृक्ष हैं, उनकी उत्पत्ति अश्विनी से हुई है। भरणी से यमक (जुड़े हुए दो) वृक्ष, कृत्तिका से उदुम्बर (गूलर), रोहिणी से जामुन, मृगशिरा से खैर, आर्द्रा से काली पाकर, पुनर्वसु से बाँस, पुष्य से पीपल, अश्लेषा से नागकेसर, मघा से बरगद, पूर्वा फाल्गुनी से पलाश, उत्तरा फाल्गुनी से रुद्राक्ष का वृक्ष, हस्त से अरिष्ट (रीठो का वृक्ष), चित्रा से श्रीवृक्ष (बेल), स्वाती से अर्जुन वृक्ष, विशाखा से विकंकत (जिसकी लकड़ी से कलछियां बनती हैं), अनुराधा से बकुल (मौलसिरी), ज्येष्ठा से विष्टिवृक्ष, मूल से सर्ज (शाल का वृक्ष) पूर्वाषाढ़ से वंजुल (अशोक), उत्तराषाढ़ से कटहल, श्रवण आक से धनिष्ठा से शमी वृक्ष शतभिषा से कदम्ब पूर्व भाद्रपद से हैं। आम्रवृक्ष, उत्तरभाद्रपद से निम्बवृक्ष तथा रेवती से महुए की उत्पत्ति हुई इस प्रकार ये नक्षत्र सम्बन्धी वृक्ष कहे गये हैं ॥२०४-२१०॥ जब जिस नक्षत्र में शनैश्चर विद्यमान हो, उस समय उस नक्षत्रसम्बन्धी वृक्ष का यत्नपूर्वक पूजन करना चाहिए ॥२११॥ **योगों के स्वामी—**यम, विश्वेदेव, चन्द्र, ब्रह्मा, गुरु, चन्द्र, इन्द्र, जल, सर्प अग्नि सूर्य, भूमि, रुद्र, बह्मा, वरुण, गणेश, रुद्र, कुबेर, विश्वकर्मा, मित्र, कार्तिकेय, सावित्रो, कमला, गौरी, अश्विनोकुमार, पितर और अदिति—ये क्रमशः विष्कम्भ आदि सत्ताईस योगों के स्वामी हैं ॥२१२॥ **निन्द्य योग—**वैधृति और व्यतीपात—ये दोनों महापात हैं, इन दोनों को शुभ कार्यों में सदा त्याग

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ्य रूपान्तरण दिया गया है:

४६० नारदीयपुराणम् सावित्री कमला गौरी नासत्यौ पितरोऽदितिः । वैधृतिश्च व्यतीपातो महापातावुभौ सदा ॥२१३॥ परिघस्य च पूर्वार्द्धं सर्वकार्येषु गर्हितम् । विष्कंभं भवञ्जयोस्तिस्रः षड्वा गंड़ातिगंडयोः ॥२१४॥ व्याघाते नव शूले तु पंच नाड्यो हि गर्हिताः । अदितींदुमघाह्यश्वमूलमैत्रेज्यभानि च ॥२१५॥ ज्ञेयानि सहचित्राणि मूर्द्धभानि यथाक्रमम् । लिखेदूर्ध्वगतामेकां तिर्यग्रेखास्तत्रयोदश ॥२१६॥ तत्र खार्जूरिकं चक्रं कथितं मूर्ध्नि भे न्यसेत् । भाज्यैकरेखागतयोः सूर्याचंद्रमसोमिथः ॥२१७॥ एकार्गलो दृष्टिपातश्चाभिजिव्र्जौर्जितानि वै । विनाडीभिर्द्वादशभी रहितं घटिकाद्वयम् ॥२१८॥ योगं प्रकरणं योगाः क्रमात्तु सप्तविंशतिः । इन्द्रः प्रजापतिर्मित्रस्त्वष्टाभूह्रितप्रिया ॥२१९॥ कोनाशः कलिरुद्राख्यो तिष्यर्द्धशास्त्रवाहिमंरुत् । बवादिवाणिजांतानि शुभानि करणानि षट् ॥२२०॥ परीता विपरीता वा विष्टिर्नेष्टा तु मंगले । मुखे पंच गले चैका वक्षस्येकादश स्मृतः ॥२२१॥ नाभौ चतस्रः षट् कट्यां तिस्रः पुच्छाख्यनाडिकाः । कार्यहानिर्मुखे मृत्युर्गले वक्षसि निःस्वता ॥२२२॥ कट्यामुन्मत्तता नाभौ च्युतिः पुच्छे ध्रुवं जयः । स्थिराणि मध्यमान्येषां मध्यनागचतुष्पदौ ॥२२३॥ दिवामुहूर्ता रुद्राहीमित्रपितृवसुदकम् । विश्वेविधातृब्रह्माेंद्रद्रग्निवसुतोयपाः ॥२२४॥


देना चाहिए। परिघ योग का पूर्वार्ध और वज्र योग के आरम्भ की तीन घड़ियाँ, गण्ड और अतिगण्ड की छह घड़ो, व्याघात योग की ९ घड़ी और शूल योग की ५ घड़ी सब शुभ कार्यों में निन्दित हैं ॥ खार्जूर चक्र--इन नो निन्द्य योगों (वैधृति, व्यतीपात, परिघ, विष्कम्भ, वज्र, गण्ड, अतिगण्ड, व्याघात और शूल) में क्रमशः पुनर्वसु, मृगशिरा, मघा, अश्लेषा, अश्विनी, मूल, अनुराधा, पुष्य और चित्रा--ये नो मूर्धा (मस्तक) के नक्षत्र कहे गये हैं। एक ऊर्ध्वरेखा लिखे, फिर उसके ऊपर तेरह तिरछी रेखाएं अंकित करे। यह खार्जूर चक्र कहलाता है। इस चक्र में ऊपर कहे हुए निन्द्य योगों में उनके मूर्धंगत नक्षत्र को रेखा के मस्तक के ऊपर लिखकर क्रमशः २८ नक्षत्रों को लिखे। इसमें यदि सूर्य और चन्द्रमा एक रेखा में विभिन्न भाग में पड़े तो उन दोनों का परस्पर का दृष्टिपात 'एकार्गल' दोष कहलाता है। यह शुभ कार्य में त्याज्य है, परन्तु यदि सूर्य और चन्द्रमा में कोई एक अभिजित् में हो तो वेध-दोष नहीं होता है ॥२१३-२१७३॥ प्रत्येक योग में अन्तर्भाग--१२ पल रहित २ घड़ी के मान से एक-एक योग में सत्ताईस योग बीतते हैं ॥२१८३॥ करण के स्वामी और शुभाशुभ विभाग--'इन्द्र, ब्रह्मा, मित्र, विश्वकर्मा, पृथ्वी, हरितप्रिया (लक्ष्मी), कोनाश (यम), कलि, रुद्र, सर्प तथा मरुत्--ये ग्यारह देवता क्रमशः बव आदि (बव, बालव, कौलव, तैतिल गर, वणिज, विष्टि, शकुनि, चतुष्पद, नाग और किस्तुघ्न--इन) ग्यारह करणों के स्वामी हैं। इनमें बव से लेकर छह करण शुभ होते हैं। किन्तु 'विष्टि' नामक करण क्रम से आया हो या विपरीत क्रम से, किसी भी दशा में वह मंगलकार्य में शुभ नहीं है ॥२१९-२२०३॥ विष्टि के अंगों में घटी और फल--विष्टि के मुख पाँच घटी, गले में एक, हृदय में ग्यारह, नाभि में चार, कटि में छह और पुच्छ में तीन घड़ियां होती हैं। मुख की घड़ियों में कार्य आरम्भ करने से कार्य की हानि होती है। गले की घड़ी में मृत्यु, हृदय की घड़ी में निर्धनता, कटि की घड़ो में उन्मत्तता, नाभि की घड़ी में पतन तथा पुच्छ की घड़ी में कार्य करने से निश्चय ही विजय प्राप्त होती है। भद्रा के बाद जो चार स्थिर करण हैं, वे मध्यम हैं, विशेषतः नाग और चतुष्पद ॥२२१-२२३॥ मुहूर्त कथन--दिन में क्रमशः रुद्र, सर्प, मित्र, पितर, वसु, विश्वेदेव, विधि (अभिजित), ब्रह्मा, इन्द्र,

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६१ अर्यमा भगसंज्ञश्च विज्ञेया दश पंच च । ईशाजपादहिर्बुध्न्यपूषाश्वियमवह्नवः ॥२२५॥ धातृन्द्रादितोज्याख्या विश्वत्वंष्टृत्ववायवः । अह्नः पंचदशोभागस्तथा रात्रिप्रमाणतः ॥२२६॥ मुहूर्तमानं द्वरावक्षणक्षणि समेश्वरम् । अर्यमा राक्षसब्राह्मौ पित्र्याग्नेयौ तथाभिजित् ॥२२७॥ राक्षसाख्यौ ब्राह्मपित्र्यौ भार्गाजांशाविनादिषु । वारेषु वर्जनीयास्ते मुहूर्ताः शुभकर्मसु ॥२२८॥ येषु ऋक्षेषु यत्कर्म कथितं निखिलं च तत् । तद्देवत्ये मुहूर्तेऽपि कार्यं यात्रादिकं सदा ॥२२८॥ भूकम्पं सूर्यभात्सप्तमर्क्षे विद्युच्च पंचमे । शूलोऽष्टमे च दशमे शनिरष्टादशे ततः ॥२३०॥ केतुः पंचदशे दंड उल्का एकोनविंशतौ । निर्घातपातसंज्ञश्च ज्ञेयः स नवपंचमे ॥२३१॥ मोहनिर्घातकंपाश्च कुलिशं परिवेषणम् । विज्ञेया एकविंशादांरभ्य च यथाक्रमम् ॥२३२॥ चन्द्रयुतेषु भेष्वेबु शुभकर्म न कारयेत् । सूर्यभात्सप्तपित्यक्षं त्वाष्ट्रमित्राप्तभेषु च ॥२३३॥ सविष्णुभेषु क्रमश्रो हस्तभाच्चंद्रसंयुतः । धिष्ण्ये तातेति सत्यत्र दुष्टयोगः पतत्यसौ ॥२३४॥ चंडीशचंडायुधाख्यस्तस्मिन्नेवावचरेच्छुभम । वायोदश स्युर्मिलनसंख्यया तिथिवारयोः ॥२३५॥ क्रकचो नाम योगोऽयं मंगलेष्वतिगर्हितः । सप्तम्यामर्कवारश्चेत्प्रतिपत्सौम्यवासरे ॥२३६॥ संवर्तयोगो विज्ञेयः शुभकर्मविनाशकृत् । आनन्दः कालदंडाख्यो धूम्रधातुसुधाकराः ॥२३७॥

इन्द्राग्नि, राक्षस, वरुण, अर्यमा और भग-ये पन्द्रह मुहूर्त जानने चाहिए। रात्रि में शिव, अजपाद, अहि- र्बुध्न्य, पूषा, अश्विनीकुमार, यम, अग्नि, ब्रह्मा, चन्द्रमा, अदिति, बृहस्पति, विष्णु, सूर्य, विश्वकर्मा और वायु-ये क्रमशः पन्द्रह मुहूर्त व्यतीत होते हैं। दिनमान का पन्द्रहवां भाग रात्रि के मुहूर्त का मान समझना चाहिए। इनसे दिन तथा रात्रि में क्षण-नक्षत्र का विचार करे ॥२२४-२२६॥

वारों में निन्द्य मुहूर्त-रविवार को अर्यमा, सोमवार को ब्राह्म तथा राक्षस, मंगलवार को पितर और अग्नि, बुधवार को अभिजित्, गुरुवार को राक्षस और जल, शुक्रवार को ब्राह्म और पितर तथा शनिवार को शिव और सर्प मुहूर्त निन्द्य माने गये हैं; इसलिए शुभ कार्यों में इनका त्याग कर देना चाहिए ॥२२९॥

भूकम्पादि संज्ञाओं से युक्त नक्षत्र- सूर्य जिस नक्षत्र में हो उससे सातवें नक्षत्र की भूकम्प, पाँचवें की विद्युत, आठवें की शूल, दसवें की अशनि, अठारहवें की केतु, पन्द्रहवें की दण्ड, उन्नीसवें की उल्का, चौदहवें की निर्घातपात, इक्कीसवें की मोह, बाईसवें की निर्धात, तेईसवें को कम्प, चौबीसवें की कुलिश तथा पचीसवें की परिवेष संज्ञा समझनी चाहिए; इन संज्ञाओं से युक्त चन्द्र-नक्षत्रों में शुभ कर्म नहीं करने चाहिए ॥२३०-२३२॥

सूर्य के नक्षत्र से अश्लेषा, मघा, चित्रा, अनुराधा, रेवती तथा श्रवण तक की जितनी संख्या हो, उतनी ही यदि अश्विनी से चन्द्र-नक्षत्र तक की संख्या हो तो उस पर दुष्टयोग का सम्पात अर्थात् रुद्र के प्रचण्ड अस्त्र का प्रहार होता है। अतः उसका नाम 'चण्डीश चण्डायुध' योग है। उसमें शुभ कर्म नहीं करना चाहिए ॥२३३-२३४॥

क्रकचयोग-प्रतिपदादि तिथि की तथा रवि आदि वार की संख्या मिलाने से यदि १३ हो तो 'क्रकच- योग' होता है। यह शुभ कार्य में अत्यन्त निन्दित है ॥२३५॥

संवर्तयोग-रविवार को सप्तमो और बुधवार को प्रतिपदा हो तो संवर्तयोग होता है। यह शुभ कार्य विनाशक होता है ॥२३६॥

आनन्दादि योग-१ आनन्द, २ कालदण्ड, ३ धूम्र, ४ धाता, ५ सुधाकर (सौम्य), ६ध्वांक्ष, ७ केतु,

४६२ नारदीयपुराणम् ध्वांक्षध्वजाख्यश्रीवत्सबज्रमुद्गरछत्रकाः । मित्रमानसपद्माख्यलुम्बोत्पातमृतयः ॥२३८॥ काणसिद्धिशुभा मृत्युर्मुशलांतककुंजराः । राक्षसाद्यवरस्थैर्यवर्द्धमानः क्रमादमी ॥२३६॥ योगाः स्वसंज्ञाफलदा अष्टाविंशतिरीरिताः । रविवारे क्रमादेव दस्रभादिन्दुभाद्विधौ ॥२४०॥ सार्पाद्सौमे बुधे हस्तान्मैत्रभात्सुरमंत्रिणि । वैश्वदेवाद्शुलुसले वारुणाद्भास्करात्मजे ॥२४१॥ हस्तक्षं च रवाविन्दौ चंद्रभं दस्रभं कुजे । सौम्ये मित्रभमाचार्य तिष्यः पौष्णं भृगोः सुते ॥२४२॥ रोहिणी मंदवारे च सिद्धियोगाह्वया अमी । आदित्यभौमयोर्नंदा भद्रा शुक्रशशांकयोः ॥२४३॥ जयासौम्ये गुरौ रिक्ता शनौपूर्णेति नो शुभाः । नन्दा तिथिः शुक्रवारे सौम्ये भद्रा कुजे जया ॥२४४॥ रिक्ता मंदे गुरोर्वारे पूर्णा सिद्धाह्वया अमी । एकादश्यामिंदुवारो द्वादश्यामर्कवासरः । ॥२४५॥ षष्ठी गुरौ तृतीया ज्ञेऽष्टमी शुक्रे शनैश्चरे । नवमी पञ्चमी भौमे दग्धयोगाः प्रकीर्तिताः ॥२४६॥ भरण्यर्कदिने चंद्रे चित्रा भोमे तु विश्वभम् । बुधे श्रविष्ठार्यभभे गुरौ ज्येष्ठा भृगोर्दिने ॥२४७॥ रेवती मंदवारे तु ग्रहजन्मर्क्षनाशनम् । विशाखादिचतुर्वर्गमर्कवारादिषु क्रमात् ॥२४८॥ ८ श्रीवत्स, ९ वज्र, १० मुद्गर, ११ छत्र, १२ मित्र, १३ मानस, १४, पद्म, १५ लुम्ब, १६ उत्पात, १७ मृत्यु, १८ काण, १६ सिद्धि, २० शुभ, २१ अमृत, २२ मुसल, २३ अन्तक (यम), २४ कुञ्जर (हाथी), २५ राक्षस, २६ चर, २७ सुस्थिर और २८ वर्धमान—ये क्रमशः पठित २८ योग अपने-अपने नाम के समान ही फल देने वाले कहे गये हैं । इन योगों को जानने की रीति—रविवार को अश्विनी नक्षत्र से, सोमवार को मृगशिरा से, मंगल- वार को आश्लेषा से, बुधवार को हस्त से, गुरुवार को अनुराधा से, शुक्रवार को उत्तराषाढ़ से और शनिवार को शतभिषा से आरम्भ करके उस दिन के नक्षत्र तक गणना करने पर जो संख्या हो, उसी संख्या वाला योग उस दिन होगा ।।२३७-२४१॥ सिद्धियोग—रविवार को हस्त, सोमवार को मृगशिरा, मंगलवार को अश्विनी, बुधवार को अनुराधा, बृहस्पतिवार को पुष्य, शुक्रवार को रेवती और शनिवार को रोहिणी हो तो सिद्धियोग होता है ।।२४२॥ रवि और मंगलवार को नन्दा (१, ६, ११), शुक्र और सोमवार को भद्रा (२, ७, १२), बुधवार को जया (३, ८, १३), गुरुवार को रिक्ता (४, ९, १४) और शनिवार को पूर्णा (५, १०, १५) हो तो मृत्युयोग होता है । अतः इसमें शुभ कर्म न करे ॥२४३॥ सिद्धयोग—शुक्रवार को नन्दा, बुधवार को भद्रा, मंगलवार को जया, शनिवार को रिक्ता और गुरुवार को पूर्ण तिथि हो तो सिद्धयोग होता है ।।२४४॥ दग्धयोग—सोमवार को एकादशी, गुरुवार को षष्ठी, बुधवार को तृतीया, शुक्रवार को अष्टमी, शनिवार को नवमी तथा मंगलवार को पञ्चमी तिथि हो तो दग्धयोग होता है ।।२४५-२४६।। ग्रहों के जन्म नक्षत्र—रविवार को भरणी, सोमवार को चित्रा, मंगलवार को उत्तराषाढ़, बुधवार को धनिष्ठा, गुरुवार को उत्तरा फाल्गुनी, शुक्रवार को ज्येष्ठा और शनिवार को रेवती क्रमशः सूर्यादि ग्रहों के जन्म नक्षत्र होने के कारण शुभ कार्य के विनाशक होते हैं ।।२४७॥ यदि रवि आदि वारों में विशाखा आदि चार-चार नक्षत्र हों अर्थात् रविवार को विशाखा से सोम को पूर्वाषाढ़ से, मंगल को धनिष्ठा से, बुध को रेवती से, गुरुवार को रोहिणी से, शुक्र को पुष्य से और शनि को उत्तरा फाल्गुनी से चार-चार नक्षत्र हों तो क्रमशः उत्पात, मृत्यु, काण तथा सिद्ध नामक योग होते हैं ।।२४८॥

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६३ उत्पातमृत्युकाणाख्यसिद्धियोगाः प्रकीर्तिता । तिथिवारोद्भवा नेष्टा योगा वारर्क्षसंभवाः ॥२४६॥ हूणवंगखसेष्वन्यदेशेष्वतिशुभप्रदाः । घोराष्टाक्षीमहोदर्यो मन्दा मंदाकिनी तथा ॥२५०॥ मिश्रा राक्षसिका सूर्यवारादिषु यथाक्रमम् । शूद्रतस्करवेश्यक्ष्मादेवभूपगवां क्रमात् ॥२५१॥ अनुक्तानां च सर्वेषां घोराद्याः सुखदाः स्मृताः । पूर्वाह्णे नृपतीन्हन्ति विप्रान्मध्यांदिने विशः ॥२५२॥ अपराह्णेऽस्तगे शूद्रान्प्रदोषे च पिशाचकान् । निशि रात्रिचरान्नाट्यकारानपररात्रिके ॥२५३॥ गोपानुषसि संध्यायां लिंगिनो रविसंक्रमः । दिवा चेन्मेषसंक्रांतिरनर्थकलहप्रदा ॥२५४॥ रात्रौ सुभिक्षमतुलं संध्ययोर्वृष्टिनाशनम् । हरिशार्दूलवाराहखरकुंजरमाहिषाः । अश्वश्वाजबृषाः पादायुधाः करणवाहनाः ॥२५५॥ भुशुंडी च गदा खड्गौ दंड इष्वासतोमरौ ॥२५६॥ कुन्तपाशांकुशास्त्रेषून्बिभ्रति करयोस्त्रिवनः । अन्नं च पायसं भैक्ष्यं सपक्षं च पयो दधि ॥२५७॥ मिष्टान्नं गुडमध्वाज्यशर्करा बवतो हविः । ववोवीवणिजेविश्यां बालवे गोचरस्थितौ ॥२५८॥ कौलवे शकुनौ भानुः किस्तुघ्ने चोर्द्धसंस्थितः । चतुष्पादे तिले नागे सुप्तः क्रांति करोति हि ॥२५६॥ परिहार--ये जो ऊपर तिथि और वार के संयोग से तथा वार और नक्षत्र के संयोग से अनिष्टकारक योग बताये गये हैं, वे सब हूणों के देश--भारत के पश्चिमोत्तरभाग में, बंगाल में और नेपाल देश में ही त्याज्य हैं। अन्य देशों में ये अत्यन्त शुभप्रद होते हैं।। २४९३ ।। सूर्यसंक्रान्तिकथन--रवि आदि वारों में सूर्य की संक्रान्ति होने पर क्रमशः घोरा, ध्वांक्षी, महोदरी, मन्दा, मन्दाकिनी, मिश्रा तथा राक्षसी--ये संक्रान्ति के नाम होते हैं। उक्त घोरा आदि संक्रान्तियाँ क्रमशः शूद्र, चोर, वैश्य, ब्राह्मण, क्षत्रिय, गो आदि पशु तथा चारों वर्गों से अतिरिक्त मनुष्यों को सुख देने वाली होती हैं। यदि सूर्य की संक्रान्ति पूर्वाह्न में हो तो वह क्षत्रियों को हानि पहुँचाती है। मध्याह्न में हो तो ब्राह्मणों को, अपराह्न में हो तो वैश्यों को, सूर्यास्त-समय में हो तो शूद्रों को, रात्रि के प्रथम प्रहर में हो तो पिशाचों को, द्वितीय प्रहर में हो तो निशाचरों को, तृतीय प्रहर में हो तो नाट्यकारों को, चतुर्थ प्रहर में हो तो गोपालकों को और सूर्योदय समय में हो तो लिंगधारियों (बहुरूपियों, पाखण्डियों अया आश्रम-सम्प्रदाय के चिह्न धारण करने वालों) को हानि पहुँचाती है ॥२५०-२५३३॥ यदि सूर्य की मेषसंक्रान्ति दिन में हो तो संसार में अनर्थ और कलह पैदा करने वाली होती है। रात्रि में मेष संक्रान्ति हो तो अनुपमसुख और तथा दोनों संध्याओं के समय हो तो वह वृष्टि का नाश करती है ॥२५४३॥ करणसंक्रान्तिवश सूर्य के वाहनभोजनादि--बव आदि ग्यारह करणों में संक्रान्ति होने पर क्रमशः १ सिंह, २ बाघ, ३ सूअर, ४ गदहा, ५ हाथी, ६ भैंसा, ७ घोड़ा, ८ कुत्ता, ६ बकरा, १० बैल और ११ मुर्गा- ये सूर्य के वाहन होते हैं तथा १ भुशुण्डी, २ गदा, ३ तलवार, ४ लाठी, ५ धनुष, ६ बरछी, ७ कुन्त (भाला), ८ पाश, ६ अंकुश, १० अस्त्र और ११ बाण--इन्हें क्रमशः सूर्यदेव अपने हाथों में धारण करते हैं। १ अन्न, २ खीर, ३ भिक्षान्न, ४ पकवान, ५ दूध, ६ दही, ७ मिठाई, ८ गुड़, ९ मधु, १० घृत और ११ चीनो-ये वव आदि की संक्रान्ति में क्रमशः भगवान् सूर्य के हविष्य (भोजन) होते हैं ॥२५५-२५७३॥ सूर्य की स्थिति--बव, वणिज, विष्टि, बालव और गर--इन करणों में सूर्य बैठे हुए, कौलव, शकुनि और किस्तुघ्न--इन करणों में खड़े हुए तथा चतुष्पद, तैतिल और नाग--इन करणों में सोते हुए, संक्रान्ति करते (एक राशि से दूसरी राशि में जाते) हों तो इन तीनों अवस्थाओं की संक्रान्ति में प्रजा को क्रमशः धर्म, आयु और वर्षा के विषय में समान, श्रेष्ठ और अनिष्ट फल प्राप्त होते हैं तथा ऊपर कहे हुए अस्त्र, वाहन और

४६४ नारदीयपुराणम् धर्मायुवृष्टिष्व समं श्रेष्ठं नष्टं फलं क्रमात् । आयुधं वाहनाहारौ यज्जातीयं जनस्य च ॥२६०॥ स्वापोपविष्टास्तिष्ठन्तस्ते लोकाः क्षेममाप्नुयुः । अंधकं मंदसंज्ञं च मध्यसंज्ञं सुलोचनम् ॥२६१॥ पपौयाद्गणयेद्‌भानि रोहिण्यादिचतुर्विधम् । स्थिरभेष्‌वर्कसंक्रांतिर्ज्ञेया विष्णुपदाह्वया ॥२६२॥ षडशीतिमुखा ज्ञेया द्विस्वभावेषु राशिषु । तुलाघटाजयोर्ज्ञेयो विषुवत्सूर्यसंमः ॥२६३॥ याम्यायने स्थिरे त्वाद्याः पराः सौम्येन्दुमूर्तिभे । मेध्या विषुवति प्रोक्ताः पुण्यनाड्यस्तु षोडश ॥२६४॥ संध्या त्रिनाडी प्रमितार्कविवोर्दोदयास्ततः । प्राक्पश्चाद्याम्यसौम्ये चेत्पुण्यं पूर्वापरेहनि ॥२६५॥ यादृशेने॑न्दुना भानोः संक्रांतिस्तादृशं फलम् । नरः प्राप्नोति तद्राशौ शीतांशोः साध्वसाधु च ॥२६६॥ संक्रांतेः परतो भानुर्भुक्त्वा यावद्भिभिरंशकैः । रवेरयनसंक्रांतिस्तदा तद्राशिसंक्रमात् ॥२६७॥ संक्रांतिग्रहगर्भांक्षा जन्मन्युभयपार्श्वयोः । व्रतोद्वाहादिकेष्वेव द्वयं नेष्टं तु तत्क्रमात् ॥२६८॥ तिलोपरिलिखेच्चक्रं त्रित्रिशूलं त्रिकोणकम् । तत्र हेम विनिक्षिप्य दद्याद्दोषापवृत्तये ॥२६६॥ ताराबलेन शीतांशुर्बलवांस्तद्वशाद्रविः । बली संक्रममाणस्तु तद्गतखेटा बलाधिकाः ॥२७०॥ भोजन तथा उससे आजीविका या व्यवहार करने वाले मनुष्यादि प्राणियों का अनिष्ट होता है एवं जिस प्रकार सोये, बैठे और खड़े हुए संक्रान्ति होती है, उसी प्रकार सोये, बैठे और खड़े हुए प्राणियों का अनिष्ट होता है ॥२५८-२६०३॥ नक्षत्रों की अन्धाक्षादि संज्ञाएँ--रोहिणी नक्षत्र से आरंभ करके चार-चार नक्षत्रों को क्रमशः अन्ध, मन्दनेत्र, मध्यनेत्र और सुलोचन माने और पुनः आगे इसी क्रमसे सूर्य के नक्षत्र तक गिनकर नक्षत्रों की अन्ध आदि चार संज्ञायें समझना चाहिए। संक्रान्ति की विशेष संज्ञा-स्थिर राशियों (वृष, सिंह, वृश्चिक और कुम्भ) में सूर्य की संक्रान्ति का नाम 'विष्णुपदी', द्विस्वभाव राशियों मिथुन, कन्या, धनु और मीन) में 'षडशीतिमुख', तुला और मेष में, 'विषुव' मकर में 'सौम्यायन' और कर्क में 'याम्यायन' संज्ञा होता है ॥२६१-२६३३॥ (पुण्यकाल--) याम्यायन और स्थिरराशियों को (विष्णुपद) संक्रान्तिकाल से पूर्व १६ घड़ी, द्विस्वभाव राशियों की षडशीतिमुख और सौम्यायन-संक्रान्ति में संक्रान्ति-काल के पश्चात् १६ घड़ी तथा विषुव (मेष-तुला) संक्रांति के मध्य (संक्रान्तिकाल से ८ पूर्व और ८ पश्चात) की १६ घड़ी का समय पुण्यदायक होता है ॥२६४॥ सूर्योदय से पूर्व की तीन घड़ी प्रातःसंध्या तथा सूर्यास्त के बाद, की तीन घड़ी सायं संध्या कहलाती है। यदि सायं संध्या में याम्यायन या सौम्यायन कोई संक्रान्ति हो तो पूर्व दिन में और प्रातः संध्या में संक्रान्ति हो तो पर दिन में सूर्योदय के बाद पुण्यकाल होता हैं ॥२६५॥ जब सूर्य को संक्रान्ति होती है, उस समय प्रत्येक मनुष्य के लिए जैसा शुभ या अशुभ चन्द्रमा होता है, उसी के अनुसार इस महीने में मनुष्यों को चन्द्रमा का शुभ या अशुभ फल प्राप्त होता ॥२६६॥ किसी संक्रान्ति के बाद सूर्य जितने अंश भोग कर उस संक्रान्ति करे, आगे अयन संक्रान्ति को उतने समय संक्रान्ति या ग्रहण का जो नक्षत्र हो, वह तथा उसके आगे-पीछे वाले दोनों नक्षत्र उपनयन और विवाहादि शुभ कार्यों में अशुभ होते हैं। संक्रान्ति या ग्रहणजनित अनिष्ट फलों की शान्ति के लिए तिलों को ढेरी पर तीन त्रिशूल वाला त्रिष्ठकोण-चक्र लिखे और उस पर यथाशक्ति सुवर्ण रखकर ब्राह्मणों को दान दे ॥२६७-२६६॥ ग्रहगोचर-तारा के बल से चन्द्रमा बली होता है और चन्द्रमा के बली होने पर सूर्य बली हो जाता है तथा संक्रमणकारी सूर्य के बली होने से अन्य सब ग्रह भी बली समझे जाते हैं ॥२७०॥

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६५ शुभोऽर्को जन्मतस्तृणायदशषट्सु मुनीश्वर । नवपञ्चांबुरिष्फस्थैर्य्यर्किमविध्यते न चेत् ॥२७१॥ शुभो जन्मर्क्षतश्चन्द्रो द्यूनांगायारिसप्तत्रिषु । यष्टेष्टांत्यां बुधर्मस्थैर्विबुधैर्विध्यते न चेत् ॥२७२॥ व्यायारिषु कुजः श्रेष्ठो जन्मतो चेन्न विध्यते । व्ययेष्वंकस्थितैः सौरिसौम्यसूर्यैः शुभौषधात् ॥२७३॥ ज्ञः स्वायार्य्यष्टाष्टखायेषु जन्मतश्चेन्न विध्यते । धीत्र्यकादिगजांतस्थैः शशांकरहितैः शुभैः ॥२७४॥ जन्मराशेर्गुरुः श्रेष्ठः स्वायगोऽध्यस्तगो न चेत् । विध्यतैंत्याष्टखांबुत्रिगतैः खेटैर्मुनीश्वर ॥२७५॥ जन्ममादासृताष्टांतांत्यापष्विष्टो भृगोःसुतः । चेन्न विद्धोऽष्टसप्तांगम् खांकाद्यायारिरामगैः ॥२७६॥ न ददाति शुभं किंचिद्गोचरे वेधसंयुते । तस्माद्वेधं विचार्याय कथनीयं शुभाशुभम् ॥२७७॥ वामभेदविधानेन दुष्टोऽपि स्याच्छुभङ्करः । सौम्येक्षितोऽनिष्टफलः शुभदः पापवीक्षितः ॥२७८॥ निष्फलौ तौ ग्रहौ स्वेन शत्रुणां च विलोकितौ । नीचराशिगतः स्वस्य शत्रोः क्षेत्रगतोऽपि ॥२७९॥ शुभाशुभफलं नैव दद्यादस्तमितोऽपि वा । ग्रहेषु विषमस्थेषु शांतिं कुर्यात्प्रयत्नतः ॥२८०॥ हानिवृद्धिर्ग्रहाधीना तस्मात्पूज्यतमा ग्रहा । मणिमुक्ताफलं विद्रुमाख्यं मरकतं तथा ॥२८१॥ पुष्परागं तथा वज्र नीलं गोमेदसंज्ञितम् । वैदूर्यं भास्करादीनां तुष्ट्य धार्यं यथाक्रमम् ॥२८२॥

मुनीश्वर ! अपनी जन्म राशि से ३,११,१०,६ स्थान में सूर्य शुभ होता है; परन्तु यदि क्रमशः जन्मराशि से हो ९,५,४ तथा १२ वें स्थान में स्थित शनि के अतिरिक्त अन्य ग्रहों से वह विद्ध न हो, तभी शुभ होता है । इसी प्रकार चन्द्रमा जन्मराशि से ७,६,११,१,१० तथा ३ मैं शुभ होते हैं; यदि क्रमशः २,१२,८,५,४ और ९ वें में स्थित बुध से भिन्न ग्रहों से विद्ध न हों । मंगल जन्मराशि से ३,११,६ में शुभ हैं; यदि क्रमशः १२,५ तथा ९वें स्थान में स्थित अन्य ग्रह से विद्ध न हों । शनि भी अपनी जन्मराशि से इन्हीं ३, ११, ६ स्थानों में शुभ हैं; यदि क्रमशः १२, ५, ९ स्थानों में स्थित सूर्य के सिवा अन्य ग्रहों से विद्धन हों । बुध अपनी जन्मराशि से २, ४, ६, ८, १० और ११ स्थानों में शुभ हैं, यदि क्रमशः ५, ३, ९, १, ८, और १२ स्थानों में स्थित चन्द्रमा के सिवा अन्य किसी ग्रह से विद्ध न हों । मुनीश्वर ! गुरु जन्मराशि से २, ११, ९, ५ और ७ इन स्थानों में शुभ होते हैं; यदि क्रमशः १२, ८, १०, ४ और ३ स्थानों में स्थित अन्य किसी ग्रह से विद्ध न हों । इसी प्रकार शुक्र भी जन्मराशि से १, २, ३, ४, ५, ८, ९, १२ तथा ११ स्थानों में शुभ होते हैं; यदि क्रमशः ८, ७, १, १०, ९, ५, ११, ६, ३ स्थानों में स्थित अन्य ग्रह से विद्ध न हों ॥२७१-२७६॥ जो ग्रह गोचर में वेधयुक्त हो जाता है, वह शुभ या अशुभ फल को नहीं देता; इसलिए वेध का विचार कर के ही शुभ या अशुभ फल समझना चाहिए ॥२७७॥ वामवेध होने (वेध स्थान में ग्रह और शुभ स्थान में अन्य ग्रह के होने) से दुष्ट (अशुभ) ग्रह भी शुभकारक हो जाता है तथा शुभप्रद ग्रह भी पाप ग्रह से दृष्ट हो तो अनिष्ट फल देता है। शुभ और पाप दोनों ग्रह यदि अपने शत्रु से देखे जाते हों अथवा नीच राशि में या अपने शत्रु की राशि में हों तो निष्फल हो जाते हैं। इसी प्रकार जो ग्रह अस्त हो, वह भी अपने शुभ या अशुभ फल को नहीं देता है। ग्रह यदि दुष्ट स्थान में हो तो यत्नपूर्वक उसकी शान्ति कर लेनी चाहिए । हानि और लाभ ग्रहों के ही अधीन हैं, इसलिए ग्रहों की यत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिए ॥२७८-२८०३॥ सूर्य आदि नवग्रहों की तुष्टि के लिए क्रमशः मणि (पद्मराग-लाल), मुक्ता (मोती), विद्रुम (मूंगा), मरकत (पन्ना), पुष्पराग (पुखराज), वज्र (हीरा), नीलम, गोमेदरत्न एवं वैदूर्य (लहसनिया) धारण करना चाहिए ॥२८१-२८२॥ ५९ ना० पृ०

४५६ नारदीयपुराणम् शुक्लपक्षादिवसे चंद्रो यस्य शुभप्रदः । स पक्षस्तस्यशुभदः कृष्णपक्षोन्यथाऽशुभः ॥२८३॥ शुक्लपक्षे शुभश्चंद्रो द्वितीयोनवपंचमे । रिःफरंध्रांबुसंस्थैश्चेन्न विद्धो गगने चरैः ॥२८४॥ जन्म संपद्विपत् क्षेम प्रत्यरिः साधको वधः । मित्रं परममित्रं च जन्मभात्तु पुनः पुनः ॥२८५॥ जन्मात्रपञ्चसप्ताख्यास्तारा नेष्ट फलप्रदाः । शाकं गुडं च लवणं सतिलं कांचनं क्रमात् ॥२८६॥ अनिष्टफलनाशाय दद्यादेतद्द्विजातये । कृष्णे बलवती तारा शुक्लपक्षे बली शशी ॥२८७॥ यात्रोद्वाहादिकार्येषु नामतुल्यफलप्रदाः । षष्टिघ्नं गतचन्द्रक्षं तत्कालघटिकान्वितम् । वेदघ्नमिषुवेदांत्यमवस्था भानुभागताः ॥२८८॥ प्रवासनष्टाख्यमृता जयो हास्यं रतिर्मुदा । शनिभुक्तिर्ज्वरः कंपः सुस्थितिर्नामसन्निभाः ॥२८९॥ पट्टबंधनयाजोग्रसंधिविग्रहभूषणम् । धातवाकरं युद्धकर्म मेषलग्ने प्रसिद्ध्यति ॥२९०॥ मंगलाने स्थिराण्यंबुवेश्मकर्मप्रवर्तनम् । कृषिवणिज्यपश्वादिदृष्टलग्ने प्रसिद्ध्यति ॥२९१॥ कलाविज्ञानशिल्पानि भूषणावहसंश्रवम् । गजोद्वाहाभिषेकार्यं कर्त्तव्यं मिथुनोदये ॥२९२॥ चन्द्र-शुद्धि में विशेषता-शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन प्रतिपदा में जिस व्यक्ति के चन्द्रमा शुभ होते हैं उसके लिए शुक्ल-पक्ष और कृष्णपक्ष दोनों ही शुभ होते हैं। अन्यथा (यदि शुक्ल-प्रतिपदा में चन्द्रमा अशुभ हो तो) दोनों पक्ष अशुभ हो होते हैं। (पहले जो जन्मराशि से २, ९, ५ वें चन्द्रमा को अशुभ कहा गया है।) शुक्लपक्ष में २,९, तथा ५ वें स्थान में स्थित चन्द्रमा भी शुभप्रद ही होता है, यदि वह ६,८,१२ वें स्थानों में स्थित अन्य ग्रहों से विद्ध न हो ॥२८३-२८४॥ तारा विचार - अपने-अपने जन्म-नक्षत्र से नौ नक्षत्रों तक गिने तो क्रमशः १ जन्म, २ सम्पत्, ३ विपत्, ४ क्षेम, ५ प्रत्यरि, ६ साधक, ७, वध, ८ मित्र तथा ९ परम मित्र इस प्रकार ९ तारायें होती हैं। फिर इसी प्रकार आगे गिनने पर १० से १८ तक तथा १९ से २७ तक क्रमशः वे ही तारायें होंगी। इनमें १,३,५ और ७वीं तारा अपने नाम के अनुसार अनिष्ट फल देने वाली होती हैं। इन चारों ताराओं में इनके दोष की शान्ति के लिए ब्राह्मणों को क्रमशः शाक, गुड, लवण और तिल सहित सुवर्ण का दान देना चाहिए। कृष्णपक्ष में तारा बलवती होती है और शुक्लपक्ष में चन्द्रमा बलवान् होता है ॥२८५-२८७॥ चन्द्रमा की अवस्था - प्रत्येक राशि में चन्द्रमा की बारह-बारह अवस्थायें होती हैं, जो यात्रा तथा विवाह आदि शुभ कार्यों में अपने नाम के सदृश ही फल देती हैं। अवस्था का ज्ञान - अभीष्ट दिन में गत नक्षत्र-संख्या को ६० से गुणा कर के उसमें वर्तमान नक्षत्र की भुक्त (भयात) घड़ी को जोड़ दे, योगफल को चार से गुणा कर के गुणनफल में ४५ का भाग दे। जो लब्धि आये, उसमें पुनः १२ से भाग देने पर १ आदि शेष के अनुसार मेषादि राशियों में क्रमशः प्रवास, नष्ट, मृत, जय, हास्य, रति, मुदा, भुक्ति, ज्वर, कम्प और सुस्थिति-ये बारह गत अवस्थायें होती हैं। ये अपने-अपने नाम के समान फल देने वाली होती हैं ॥२८८-२८९॥ मेषादि लग्नों में कर्त्तव्य - पट्टबन्धन ( राजसिंहासन, राजमुकुट आदि धारण), यात्रा, उग्र कर्म, संधि, विग्रह, आभूषण-धारण, धातु, खान सम्बन्धी कार्य और युद्धकर्म-ये सब मेषलग्न में आरंभ करने से सिद्ध होते हैं ॥२९०॥ वृषलग्न में विवाह आदि मंगलकर्म, गृहारम्भ आदि स्थिरकर्म, जलाशय, गृह-प्रवेश, कृषि, वाणिज्य तथा पशुपालन आदि कार्य सिद्ध होते हैं ॥२९१॥ मिथुन लग्न में कला, विज्ञान, शिल्प, आभूषण, युद्ध, संश्रव (कीर्तिसाधक कर्म), राजकार्य, विवाह, राज्याभिषेक आदि कार्य करने चाहिए ॥२९२॥ कर्क लग्न में वापी,

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६७ वापोकूपतडागादि वारिबंधनमोक्षणम् । पौष्टिकं लिपिलेखादि कर्तव्यं कर्कटोदये ॥२६३॥ इक्षुधान्यवणिक्पण्यकृषिसेवादयस्थिरे । साहसाहवभूषाद्यं सिंहलग्ने प्रसिद्ध्यति ॥२६४॥ विद्याशिल्पौषधं कृत्यं भूषणं च चरस्थिरम्। कन्या लग्नं विधेयं च पौष्टिकाखिलमंगलम् ॥२६५॥ कृषिवाणिज्ययानं च पशुद्वाहव्रतादिकम् । तुलायामखिलं कर्म तुलाभाराश्रिते च यत् ॥२६६॥ स्थिरकर्माखिलं कार्यं राजसेवाभिषेचनम् । चौर्यकर्मस्थिरारंभाः कर्तव्याः वृश्चिकोदये ॥२६७॥ व्रतोद्वाहप्रयाणाश्वगजशिल्पकलादिकम् । चरस्थिरविमिश्रं च कर्तव्यं कार्मुकोदये ॥२६८॥ चापबंधनमोक्षास्त्रकृषिगोश्वादिकम् च यत् । प्रस्थानं पशुदासादि कर्तव्यं मकरोदये ॥२६६॥ कृषिवाणिज्यपशूवंशिल्पकर्मकलादिकम् । जलपात्रास्त्रशस्त्रादि कर्तव्यं कलशोदये ॥३००॥ व्रतोद्वाहाभिषेकांवुस्थापनं सन्निवेशनम् । भूषणं जलपात्राश्वकर्म मीनोदये शुभम् ॥३०१॥ मेषादिषु विलग्नेषु शुद्धेष्वेवं प्रसिद्ध्यति । क्रूरग्रहेक्षितेष्वप्रसंयुतेष्वप्रमेव हि ॥३०२॥ गोयुग्मकर्ककन्यांत्यतुलाचापधराः शुभाः । शुभर्क्षत्वाशुभास्त्य इतरा पापराशयः ॥३०३॥ ग्रहयोगावलोकाभ्यां राशिर्धत्ते ग्रहोद्भवम् । फलं ताभ्यां विहीनोऽसौ स्वभावमुपसर्पति ॥३०४॥ कूप, तड़ाग, जल रोकने के लिए बांध, जल निकालने के लिए नाली बनाना, पौष्टिक कर्म, चित्रकारी तथा लेखन आदि कार्य करने चाहिए ॥२६३॥ सिंह लग्न में ईख तथा धान्यसम्बन्धी सब कार्य, वाणिज्य, हाट, कृषिकर्म तथा सेवा आदि कर्म, स्थिर कार्य साहस, युद्ध तथा आभूषण बनाना आदि कार्य सिद्ध होते हैं ॥२९४॥ कन्या लग्न में विद्यारंभ, शिल्पकर्म, औषधि निर्माण और उसका धारण, समस्त चर और स्थिर कार्य, पौष्टिक कर्म तथा विवाहादि समस्त शुभ कार्य करने चाहिए ॥२९५॥ तुला लग्न में कृषिकर्म, व्यापार, यात्रा, पशुपालन, विवाह- उपनयनादि संस्कार तथा तोल सम्बन्धी जितने कार्य हैं, वे सब सिद्ध होते हैं ॥२९६॥ वृश्चिक लग्न में गुह्यारम्भादि समस्त स्थिर कार्य, राजसेवा, राज्याभिषेक, गोपनीय और स्थिर कर्मों का आरंभ करना चाहिए ॥२९७॥ धनु लग्न में उपनयन, विवाह, यात्रा, अश्वकृत्य, गजकृत्य, शिल्पकला तथा चर, स्थिर और मिश्रित कर्मों को करना चाहिए ॥२९८॥ मकर लग्न में धनुष बनाना, उसमें प्रत्यंचा बांधना, बाण छोड़ना, अस्त्र बनाना और चलाना, कृषि, गो पालन, अश्वकृत्य, गजकृत्य तथा पशुओं का क्रय-विक्रय और दास आदि की नियुक्ति-ये सब कार्य करने चाहिए ॥२९९॥ कुम्भ लग्न में कृषि, वाणिज्य, पशुपालन, जलाशय, शिल्पकर्म, कला आदि, जलपात्र (कलश आदि) तथा अस्त्र-शस्त्र का निर्माण आदि कार्य करना चाहिए ॥३००॥ मीन लग्न में उपनयन, विवाह, राज्या- भिषेक, जलाशय की प्रतिष्ठा, गृहप्रवेश, भूषण, जलपात्रनिर्माण तथा अश्व सम्बन्धी कृत्य शुभ होते हैं ॥३०१॥ इस प्रकार मेषादि लग्नों के शुद्ध (शुभ स्वामी से युक्त या दृष्ट) रहने से शुभ कार्य सिद्ध होते हैं (पापग्रह से युक्त या दृष्ट लग्न हो तो उसमें केवल क्रूर कर्म ही सिद्ध होते हैं ॥३०२॥ वृष, मिथुन, कर्क, कन्या, मीन, तुला ओर धनु ये शुभग्रह की राशि होने के कारण शुभ हैं तथा अन्य (मेष, सिंह, वृश्चिक, मकर और कुम्भ-ये) पापराशियाँ हैं ॥३०३॥ लग्न पर जैसे (शुभ या अशुभ) ग्रहों का योग या दृष्टि हो उसके अनुसार ही लग्न अपना फल देता है । यदि लग्न में ग्रह के योग या दृष्टि का अभाव हो तो लग्न अपने स्वभाव के अनुकूल फल देता है ॥३०४॥ किसी लग्न के आरंभ में कार्य का आरम्भ होने पर उसका पूर्ण फल मिलता है । लग्न के मध्य में मध्यम और अन्त में अल्प फल प्राप्त होता है। यह बात सब लग्नों में समझनी चाहिए ॥३०५॥ कार्यकर्ता के लिए सर्वत्र पहले लग्नबल, उसके बाद चन्द्रबल देखना चाहिए । चन्द्रमा यदि बली हो ओर सप्तम भाव में स्थित हो तो सब ग्रह बलवान् समझे जाते हैं ॥३०६॥ चन्द्रमा का बल आधार और अन्य ग्रहों के बल आधेय हैं । आधार के बल पर ही आधेय स्थिर रहता है ॥३०७॥ यदि

४६८ नारदीयपुराणम् आदौ सम्पूर्णफलदं मध्ये मध्यफलप्रदम् । अन्ते तुच्छफले लग्ने सर्वस्मिन्नेवमेव हि ॥३०५॥ सर्वत्र प्रथमं लग्नं कर्त्तव्यंचंद्रबलं ततः । कल्प्यार्माददौ बलिनि सप्तमे बलिनो ग्रहाः ॥ ३०६॥ चंद्रस्य बलिमाधारमाधेयं चान्यखेटकम् । आधारभूतेनाधेयं धीयते परिधिष्ठितम् ॥३०७॥ चेदिन्दुः शुभदः सर्वे ग्रहाः शुभफलप्रदाः । अशुभश्चेदशुभादा वर्जयित्वा धनाधिपम् ॥३०८॥ लग्नस्याभ्युदिता येंशास्तेष्वंशेषु स्थितो ग्रहः । लग्नोद्भवं फलं धत्ते धनातीतो द्वितीयकम् ॥३०९॥ एवं स्थानेषु शेषेषु चैवमेवं प्रकल्पयेत् । लग्नं सर्वगुणोपेतं लभ्यतेऽल्पैर्दिनैर्नहि ॥३१०॥ दोषाल्पत्वं गुणाधिक्यं बहु संततमित्यते । दोषाद् दृष्टो हि कालस्तमपि माष्टुं पितामहः ॥३११॥ अप्यशौचगुणाधिक्यं दोषान्यत्ते ततो हि ते । अमारिक्ताष्टमीषष्ठीद्वादशीप्रतिपत्स्वपि ॥३१२॥ परिघस्य च पूर्वार्द्ध व्यतीपाते सवैधृतौ । संध्यासूपप्लवे विष्ट्यामशुभं प्रथमार्त्तवम् ॥३१३॥ रुग्णा पतिप्रिया दुःखा पुत्रिणी भोगनी तथा । पतिव्रता क्लेशयुक्ता सूर्यवारादिषु क्रमात् ॥३१४॥ याम्याग्निरौद्रभाग्याहिद्विशेंद्राद्विह्य पहिद्भाः । तारका न हिता मासा मधुर्जशुचिपौषकाः ॥३१५॥ भद्रा च संक्रमो निद्रा रात्रिश्चंद्रार्कयोर्ग्रहः । कुलटा पापभोगेषु निन्द्यर्क्षे निन्द्यवासरे ॥३१६॥ तिलाज्यदूर्वा जुहुयाद्गायत्र्याष्टशतं बुधः । सुवर्णगोतिलान्दद्यात्सर्वदोषानुपत्तये ॥३१७॥ चन्द्रमा शुभदायक हो तो सब ग्रह शुभ फल देने वाले होते हैं। यदि चन्द्रमा अशुभ हो तो अन्य सब ग्रह भी अशुभ फल देने वाले हो जाते हैं। लेकिन धनस्थान स्वामी को छोड़कर ही यह नियम लागू होता है; क्योंकि यदि धनेश शुभ हो तो वह चन्द्रमा के अशुभ होने पर भी अपना शुभ फल ही देता है ॥३०८॥ लग्न के जितने अंश उदित हो गये (क्षितिज से ऊपर आ गये) हों, उनमें जो ग्रह हो वह लग्न के फल को देता है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि लग्न के जितने भावांश हों, उनके भीतर रहने वाला ग्रह लग्नभाव का फल देता है तथा उससे आगे-पीछे हो तो लग्नराशि में रहता हुआ भी आगे-पीछे के भाव का फल देता है। लग्न के कथित अंश से जो ग्रह आगे बढ़ जाता है, वह द्वितीय भाव का फल देता है। इस प्रकार सब भावों में ग्रहों की स्थिति और फल की कल्पना करनी चाहिए। सब गुणों से युक्त लग्न तो थोड़े दिनों में नहीं मिल सकता; अतः स्वल्प दोष और अधिक गुणों से युक्त लग्न को ही सब कार्यों में सर्वदा ग्रहण करना चाहिए; क्योंकि अधिक दोषों से युक्त काल को ब्रह्मा भी शुद्ध नहीं कर सकते; इसलिए थोड़े दोष से युक्त होने पर भी अधिक गुण वाला लग्न-काल हितकर होता है ॥३०९-३११ १/२॥ स्त्रियों के प्रथम रजोदर्शन-अमावास्या, रिक्ता (४, ९, १४), ८, ६, १२ और प्रतिपदा- इन तिथियों में परिघ योग के पूर्वार्ध में, व्यतीपात और वैधृति में, संध्या के समय, सूर्य और चन्द्र के ग्रहणकाल में तथा विष्टि (भद्रा) में स्त्री का प्रथम मासिक धर्म अशुभ होता है। रवि आदि वारों में प्रथम रजोदर्शन हो तो वह स्त्री क्रमशः रोगयुक्ता, पति की प्रिया, दुःखयुक्ता, पुत्रवती, भोगवती, पतिव्रता एवं क्लेशयुक्त होती है ॥३१२-३१४॥ भरणी, कृत्तिका, आर्द्रा, पूर्वा फाल्गुनी, अश्लेषा, विशाखा, ज्येष्ठा, पूर्वाषाढ़ और पूर्व भाद्रपद-ये नक्षत्र तथा चैत्र, कार्तिक, आषाढ़ और पौष-ये मास प्रथम मासिक धर्म में अनिष्टकारक होते हैं। भद्रा सूर्य की संक्रान्ति, निद्रा अवस्था-रात्रिकाल, सूर्यग्रहण तथा चन्द्रग्रहण-ये सब प्रथम मासिक धर्म में शुभ नहीं हैं। अशुभ योग, निन्द्य नक्षत्र तथा निन्दित दिन में प्रथम मासिक धर्म हो तो वह स्त्री कुलटा स्वभाव वाली होती है ॥३१५-३१६॥ इसलिए इन सब दोषों की शान्ति के लिए विज्ञ पुरुष को तिल, घृत और दूर्वा से गायत्री मंत्र द्वारा १०८ बार आहुति तथा सुवर्णदान, गोदान एवं तिलदान करना चाहिए ॥३१७॥

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६६ आद्या निशाश्चतस्रस्तु याज्या ह्यपि समा परैः । ओजराश्यंशगे चंद्रे लग्ने पुंग्रहवोक्षिते ॥३१८॥ उपवीती युग्मतिथावनग्नः कामयेत्स्त्रियम् । पुत्रार्थी पुरुषस्त्यक्त्वा पौष्णमूलाहिपित्र्यभम् ॥३१९॥ प्रसिद्धे प्रथमे गर्भे तृतीये वा द्वितीयेके । मासे पुंसवनं कार्यं सीमंतं च यथा तथा ॥३२०॥ चतुर्थे मासिषष्ठे वाप्यष्टमे वा तदीश्वरे । बलोपपन्ने दंपत्योश्चंद्रताराबलान्विते ॥३२१॥ अरिक्तापर्वदिवसे कुजजीवाकँवासरे । तीक्ष्णमिश्रार्कवर्ज्येषु पुंभांशेराविनायके ॥३२२॥ शुद्धेऽष्टमे जन्मलग्नात्तद्योर्लग्ने न नैधने । शुभग्रहयुते दृष्टे पापद्दष्टिविवर्जिते ॥३२३॥ शुभग्रहेषु धीधर्मकेंद्रेष्वरिरिभ्रवे त्रिषु । पापेषु सत्सु चंद्रेशनिधनाद्यविवर्जिते ॥३२४॥ क्रूरग्रहाणामेकोपि लग्नादंत्यात्मजाष्टगः । सीमंतिनी वा तद्गर्भं बली हंति न संशयः ॥३२५॥ तस्मिञ्जन्ममुहूर्तेऽपि सूतकांतेऽपि वा शिशोः । जातकर्म प्रकर्तव्यं पितृपूजनपूर्वकम् ॥३२६॥ सूतकांते नामकर्म विधेयं तत्कुलोचितम् । नामपूर्वं प्रशस्तं स्यान्मंगलैः सुसमीक्षितैः ॥३२७॥ देशकालोपघाताद्यैः कालातिक्रमणं यदा । अनस्तगे भृगावीज्ये तत्कार्यं चोत्तरायणे ॥३२८॥ चरस्थिरमृदुक्षिप्रेनक्षत्रे शुभवासरे । चन्द्रताराबलोपेते दिवसे च शिशोः पितुः ॥३२६॥ गर्भाधान-संस्कार-मासिक धर्म के आरंभ से चार रात्रियां गर्भाधान में त्याज्य हैं । सम रात्रियों में जब चन्द्रमा विषमराशि और विषम नवमांश में हो, लग्न पर पुरुषग्रह (रवि, मंगल तथा वृहस्पति) की दृष्टि हो तो पुत्रार्थी पुरुष सम (२, ४, ६, ८, १०, १२) तिथियों में; रेवती, मूल, अश्लेषा और मघा इन नक्षत्रों को छोड़ कर अन्य नक्षत्रों में उपवीती और अनग्न (सवस्त्र) होकर स्त्री का संग करे ॥३१८-३१९॥ पुंसवन और सीमन्तोन्नयन - प्रथम गर्भ स्थिर हो जाने पर तृतीय या द्वितीय मास में पुंसवन कर्म करे । उसी प्रकार ४, ६ या ८वें मास में उस मास के स्वामी जब बली हों तथा स्त्री-पुरुष दोनों को चन्द्रमा और तारा का बल प्राप्त हो तो सीमन्त-कर्म करना चाहिए। रिक्ता तिथि और पर्व को छोड़कर अन्य तिथियों में, मंगल, बृहस्पति तथा रविवार में, तीक्ष्ण और मिश्र संज्ञक नक्षत्रों को छोड़कर अन्य नक्षत्रों में, जब चन्द्रमा विषमराशि और विषम राशि के नवमांश में हो, लग्न से अष्टम स्थान शुद्ध (ग्रहवर्जित) हो, स्त्री-पुरुष के जन्म-लग्न से अष्टम राशिलग्न न हो एवं शुभग्रह लग्न से ५, १, ४, ७, ९, १० में और पापग्रह ६, ११ तथा ३ में हों एवं चन्द्रमा १२, ८ तथा लग्न से अन्य स्थानों में हो तो पुंसवन और सीमन्तोन्नयन करने चाहिए ॥३२०-३२४॥ यदि एक भी बलवान् पापग्रह लग्न से १२, ५ और ८ भावों में हो तो वह सीमन्तिनी स्त्री अथवा उसके गर्भ का नाश कर देता है ॥३२५॥ जातकर्म और नामकर्म-जन्म के समय में ही जातकर्म कर लेना चाहिए । किसी प्रतिबन्धकवश उस समय न कर सके तो सूतक बीतने पर भी उक्त लग्न में पितरों का पूजन (नान्दीमुख श्राद्ध कर्म) करके बालक का जातकर्म-संस्कार अवश्य करना चाहिए एवं सूतक बीतने पर अपने कुल की रीति के अनुसार बालक का नामकरण-संस्कार भी करना चाहिए। भलीभांति विचार पूर्वक देवता आदि का वाचक, मंगलदायक एवं उत्तम नाम रखना चाहिए। यदि देशकालादि जन्म किसी प्रतिबन्ध से समय पर कर्म न हो सके तो समय के बाद जब गुरु और शुक्र का उदय हो, तब उत्तरायण में चर, स्थिर, मृदु और और क्षिप्र संज्ञक नक्षत्रों में शुभ- ग्रह के वार (सोम बुध, गुरु और शुक्र) में पिता और बालक के चन्द्रबल और ताराबल प्राप्त होने पर शुभ लग्न और शुभ नवांश में, लग्न से अष्टमभाव में कोई ग्रह न हो तब बालक का जातकर्म और नामकरण संस्कार करने चाहिए ॥३२६-३२९॥

४७० नारदीयपुराणम् शुभलग्ने शुभांशे च निधने शुद्धिसंयुते । षष्ठे मास्यष्टमे वापि पुंसां स्त्रीणां तु पञ्चमे ॥३३०॥ सप्तमे मासि वा कार्यं नवान्नप्राशनं शुभम् । रिक्तां दिनक्षयं नन्दां द्वादशीमष्टमीमथ ॥३३१॥ त्यक्त्वान्यतिथिषु प्रोक्तं प्राशनं शुभवासरे । चरस्थिरमृदुक्षिप्रनक्षत्रे शुभनेधने ॥३३२॥ दशमे शुद्धिसंयुक्ते शुभलग्ने शुभांशके । पूर्वाह्णे सौम्यखेटेन संयुक्तर्वीक्षितेऽपि वा ॥३३३॥ त्रिषष्टलाभगेः क्रूरैः केंद्रधीधर्मगैः शुभैः । व्ययारिनिधनस्थे च चन्द्रेऽन्नप्राशनंशुभम् ॥३३४॥ तृतीये पञ्चमे चाब्दे स्वकुलाचारतोऽपि वा । बालानां जन्मतश्चौल स्वगृह्योक्तविधानतः ॥३३५॥ सौम्यायने नास्तगयोः सुरारिसुरमन्त्रिणोः । अपूर्वरिक्तातिथेषु शुक्रज्येन्दुवासरे ॥३३६॥ दसादितीयज्वेंद्रेन्द्रयूपभानि शुभानि च । चौलकर्मणि हस्तर्क्षार्त्रीणित्रीणि च विष्णुभात् ॥३३७॥ पट्टबंधनचोलान्नप्राशने चोपनायने । शुभदं जन्मऋक्षमशुभं त्वन्यकर्मणि ॥३३८॥ अष्टमे शुद्धिसंयुक्ते शुभलग्ने शुभांशके । जन्माष्टमं शीतांशौ षष्ठाष्टांत्यविवर्जिते ॥३३८॥ धनत्रिकोणकेंद्रस्थैः शुभैह्यायारिगैः परैः । अभ्यक्ते सन्ध्ययोर्वारि निशि भुक्त्वा न वाहवे ॥३४०॥ नोत्कटे भूषिते नैव याने न नवमेऽह्नि च । क्षौरकर्म महीपानां पञ्चमेपञ्चमेऽहनि ॥३४१॥

अन्न-प्राशन--बालकों का जन्म से ६वें या ८वें मास में और बालिकाओं का जन्म से ५वें या ७वें मास में अन्नप्राशनकर्म शुभ होता है । परन्तु रिक्ता (४, ९, १४), तिथिक्षय, नन्दा (१, ६, ११), १२, ८--इन तिथियों को छोड़कर (अन्य तिथियों में) शुभ दिन में चर, स्थिर, मृदु और क्षिप्रसंज्ञक नक्षत्र में लग्न से अष्टम और दशम स्थान शुद्ध (ग्रहरहित) होने पर शुभ नवांशयुक्त शुभ राशिलग्न में, लग्न पर शुभग्रह का योग या दृष्टि होने पर जब पापग्रह लग्न से ३, ६, ११ भाव में और शुभग्रह १, ४, ७, १०, ५, ९, भाव में हों तथा चन्द्रमा १२, ६, ८ स्थान से भिन्न स्थान में हो तो पूर्वाह्न-समय में बालकों का अन्नप्राशन शुभ होता है ॥३३०-३३४॥ चूड़ाकरण--बालकों के जन्म समय से तीसरे या पाँचवें वर्ष में अथवा अपने कुल के आचार-व्यवहार के अनुसार अन्य वर्षमास में भी उत्तरायण में, जब गुरु और शुक्र उदित हों (अस्त न हों), पर्व तथा रिक्ता को छोड़कर अन्य तिथियों में, शुक्र, गुरु, सोमवार में, अश्विनी, पुनर्वसु, पुष्य, मृगशिरा, ज्येष्ठा, रेवती, हस्त, चित्रा, स्वाती, श्रवण, धनिष्ठा और शतभिषा--इन नक्षत्रों में अपने-अपने गृह्यसूत्र में बतायी गई विधि के अनुसार चूडा- करणकर्म करना चाहिए । राजाओं के पट्टबन्धन, बालकों के चूडाकरण, अन्नप्राशन और उपनयन में जन्म- नक्षत्र प्रशस्त होता है । अन्य कर्मों में जन्म-नक्षत्र अशुभ कहा गया है । लग्न से अष्टम स्थान शुद्ध हो, शुभ राशि लग्न हो, उसमें शुभग्रह का नवमांश हो तथा जन्मराशि या जन्मलग्न से अष्टम राशिलग्न न हो, चन्द्रमा लग्न से ६, ८, १२ स्थानों से भिन्न स्थानों में हो, शुभग्रह २, ५, ९, १, ४, ७, १० भाव में हों तथा पापग्रह ३, ६, ११ भाव में हों तो चूडाकरण कर्म प्रशस्त होता है ॥३३५-३३९॥

सामान्य क्षौरकर्म--तेल लगाकर तथा प्रातः और सायं संध्या के समय क्षौर नहीं कराना चाहिए । इसी प्रकार मंगलवार को तथा रात्रि में क्षौर का निषेध है । दिन में भी भोजन के बाद क्षौर नहीं करना चाहिए । युद्धयात्रा में भी क्षौर कराना वर्जित है । शय्या पर बैठकर या चन्दनादि लगाकर क्षौर नहीं कराना चाहिए । जिस दिन कहीं यात्रा करनी हो उस दिन भी क्षौर न कराये । राजाओं के लिए क्षौर कराने के बाद उसके ५वें ५वें दिन क्षौर कराने का विधान है । चूडाकरण में जो नक्षत्र-वार आदि कहे गये हैं, उन्हीं नक्षत्रों और वार आदि में अथवा कभी भी क्षौर में विहित नक्षत्र और वार के उदय (मुहूर्त एवं क्षण) में क्षौर कराना शुभ होता है ॥३४०-३४१॥

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४७१ कर्तव्यं क्षौरनक्षत्रेऽप्यथ वास्योदये शुभम् । नृपविप्राज्ञया यज्ञे मरणे बन्धमोक्षणे ॥३४२॥ उद्वाहेऽखिलवारर्क्षतिथिषु क्षौरमिष्टदम् । कर्तव्यं मङ्गलेष्वादौ मङ्गलाय क्षुरार्पणम् ॥३४३॥ नवमे सप्तमे वापि पञ्चमे दिवसेऽपि वा । तृतीये बीजनक्षत्रे शुभवारे शुभोदये ॥३४४॥ सम्यग्गृहाण्यलंकृत्य वितानध्वजतोरणैः । आशिषो वाचनं कार्यं पुण्यं पुण्यांगनादिभिः ॥३४५॥ सहवादित्रनृत्याद्यैर्गत्वा प्रागुत्तरां दिशम् । तत्र मृदतस्ततीक्ष्णा गृहीत्वा पुनरागतः ॥३४६॥ मृण्मयेऽप्यथ वा वैणवेऽपि पात्रे प्रपूरयेत् । अनेकबीजसंयुक्तं तोयं पुष्पाभिशोभितम् ॥३४७॥ आधानादष्टमे वर्षे जन्मतॊ वाग्रजन्मनाम् । राज्ञामेकादशे मौंजीबंधनं द्वादशे विशाम् ॥३४८॥ जन्मतः पंचमे वर्षे वेदशास्त्रविशारदः । उपवीती यतः श्रीमान्कार्यं तत्रोपनयनम् ॥३४९॥ बालस्य बालहीनोऽपि सितो जीवः शुभप्रदः । यथोक्तवत्सरे कार्यमनुक्ते नोपनयनम् ॥३५०॥ दृश्यमानगुरौ शुक्रे शाखेशे चोत्तरायणे । वेदानामधिपा जीवशुक्रमौमबुधाः क्रमात् ॥३५१॥ शरद्ग्रीष्मवसंतेषु व्युत्क्रमात्तु द्विजन्मनाम् । मुख्यं साधारणं तेषां तपोमासादिपंचसु ॥३५२॥ स्वकुलाचारधर्मज्ञो माघमासे तु फाल्गुने । विधिज्ञश्चार्थवांश्चैते वेदवेदांगपारगः ॥३५३॥ क्षौर कर्म में विशेष—राजा अथवा ब्राह्मणों की आज्ञा से यज्ञ में, माता-पिता के मरण में, जेल से छूटने पर तथा विवाह के अवसर पर निषिद्ध नक्षत्र, वार एवं तिथि आदि में भी क्षौर कराना शुभप्रद कहा गया है । समस्त मंगल-कार्यों में, मंगलार्थ इष्ट देवता के समीप क्षुरों को अर्पण करना चाहिए ॥३४२-३४३॥ उपनयन—जिस दिन उपनयन का मुहूर्त स्थिर हो, उससे पूर्व ९वें, ७वें, ५वें या तीसरे दिन उपनयन के लिए विहित नक्षत्र (या उस नक्षत्र के मुहूर्त) में शुभवार और शुभ लग्न में अपने घरों को चंदोवा, पताका और तोरण आदि से अच्छी तरह अलंकृत करके, ब्राह्मणों द्वारा आशीर्वचन, पुण्याहवाचन आदि पुण्य कार्य कराकर सौभाग्यवती स्त्रियों के साथ, मांगलिक वाद्यों के सहित और मंगल-गान कराते हुए घर से पूर्वोत्तर-दिशा (ईशानकोण) में जाकर पवित्र स्थान से चिकनी मिट्टी खोदकर ले ले और पुनः उसी प्रकार गीत-वाद्य के साथ घर लौट आये । वहीं मिट्टी या बाँस के बर्तन में उस मिट्टी को रखकर उसमें अनेक वस्तुओं से युक्त और विविध पुष्पों से सुशोभित पवित्र जल डाले । (इसी प्रकार और भी अपने कुल के अनुरूप आचार का पालन करे) ॥३४४-३४७॥ गर्भाधान अथवा जन्म से आठवें वर्ष में ब्राह्मण बालकों का, ग्यारहवें वर्ष में क्षत्रिय-बालकों का और बारहवें वर्ष में वैश्य-बालकों का मौञ्जीबन्धन करना चाहिए ॥३४८॥ जन्म से पाँचवें वर्ष में यज्ञोपवीत-संस्कार करने पर बालक वेद-शास्त्र-विशारद तथा श्रीसम्पन्न होता है । इसलिए उसमें ब्राह्मण-बालक का उपनयन-संस्कार करना चाहिए ॥३४९॥ शुक्र और बृहस्पति निर्बल हों तब भी बालक के लिए शुभदायक होते हैं । अतः शास्त्रोक्त वर्ष में उपनयन-संस्कार करना चाहिए; अनुक्त वर्ष में नहीं ॥३५०॥ गुरु, शुक्र तथा अपने वेद की शाखा के स्वामी--ये दृश्य हों--अस्त न हुए हों, तब उत्तरायण में उपनयन-संस्कार करना उचित है। बृहस्पति, शुक्र, मंगल और बुध--ये क्रमशः ऋक्, यजुः, साम और अथर्ववेद के अधिपति हैं ॥३५१॥ शरद्, ग्रीष्म और वसन्त--ये व्युत्क्रम से द्विजातियों के उपनयन का मुख्य काल हैं अर्थात् शरद् ऋतु वैश्यों के, ग्रीष्म क्षत्रियों के और वसन्त ब्राह्मणों के उपनयन का मुख्य काल है। माघ आदि पांच मासों में उन सब के लिए उपनयन का साधारणकाल है ॥३५२॥ माघ मास में जिसका उपनयन हो वह अपने कुलोचित आचार तथा धर्म का ज्ञाता होता है । फाल्गुन में यज्ञोपवीत धारण करने वाला पुरुष विधिज्ञ तथा धनवान् होता है । चैत्र में उपनयन होने

४७२ नारदीयपुराणम् वैशाखे धनवान्वेदशास्त्रविद्याविशारदः । उपनीतो बलाढ्यश्च ज्येष्ठे विधिविदां वरः ॥३५४॥ शुक्लपक्षे द्वितीया च तृतीया पंचमी तथा । त्रयोदशी च दशमी सप्तमी व्रतबंधने ॥३५५॥ श्रेष्ठा त्वेकादशी षष्ठी द्वादश्यन्यास्तु मध्यमाः । कृष्णे द्वित्रिपुंसंख्याश्च मिथोऽन्या ह्यतिनिंदिताः ॥३५६॥ धिष्ण्यान्यर्कत्रयांतैज्यरुद्रादित्योत्तराणि च । विष्णूत्रयाश्विमित्राब्जयोनिभान्युपनायने ॥३५७॥ जन्मभाद्दशमं कर्म संघातक्षं तु षोडशम् । अष्टादशं समुदयं त्रयोविंशं विनाशनम् ॥३५८॥ मानसं पंचविंशक्षं नावरेच्छुभमेषु तु । आचार्यसौम्यकाव्यानां वाराः शस्ताः शशीनयोः ॥३५९॥ वारौ तु मध्यमौ चैव व्रतेऽन्यौ निंदितौ स्मृतौ । त्रिधा विभज्य दिवसं तत्रादौ कर्म दैविकम् ॥३६०॥ द्वितीये मानुषं कार्यं तृतीयेंशे च पैतृकम् । स्वनीचगे तदंशे वा स्वारिभे वा तदंशके ॥३६१॥ गुरुशिखिनोश्च शाखेशे कलाशीलविवर्जितः । स्वाधिशत्रुगृहस्थे वा तदंशस्थेऽथ वा व्रती ॥३६२॥ शाखेशे वा गुरौ शुक्रे महापातककृद्भवेत् । स्वोच्चसंस्थे तदंशे वा स्वराशौ राशिगे गणे ॥३६३॥ शाखेशे वा गुरौ शुक्रे केंद्रगे वा त्रिकोणगे । अतीव धनवांश्चैव वेदवेदांगपारगः ॥३६४॥

पर ब्रह्मचारी वेद-वेदांगों का पारगामी विद्वान् होता है ॥३५३॥ वैशाख मास में जिसका उपनयन हो, वह धनवान् तथा वेद, शास्त्र एवं विविध विद्याओं में निपुण होता है और ज्येष्ठ में यज्ञोपवीत लेने वाला द्विज विधिज्ञों में श्रेष्ठ और बलवान् होता है ॥३५४॥ शुक्ल पक्ष में द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी, त्रयोदशी, दशमी और सप्तमी तिथियां यज्ञोपवीत संस्कार के लिए ग्राह्य हैं। एकादशी, षष्ठी और द्वादशी--ये तिथियां श्रेष्ठ हैं। शेष तिथियां मध्यम हैं। कृष्ण पक्ष में द्वितीया, तृतीया और पञ्चमी ग्राह्य हैं। अन्य तिथियां अत्यन्त निन्दित हैं ॥३५५-४५६॥ हस्त, चित्रा, स्वाती, रेवती, पुष्य, आर्द्रा, पुनर्वसु, तीनों उत्तरा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, अश्विनी, अनुराधा तथा रोहिणी-ये नक्षत्र, उपनयन-संस्कार के लिए उत्तम हैं ॥३५७॥ जन्मनाक्षत्र, से दसवाँ 'कर्म' संज्ञक है, तेईसवाँ 'विनाश' कारक है और पचीसवां 'मानस' है। इनमें शुभ कर्म का आरम्भ नहीं करना चाहिए। गुरु, बुध और शुक्र--इन तीनों के वार उपनयन में प्रशस्त हैं । सोमवार और रविवार ये मध्यम माने गये हैं। शेष दो वार मंगल और शनैश्चर निन्दित हैं। दिन के तीन भाग करके उसके आदि भाग में देवसम्बन्धी कर्म (यज्ञ-पूजनादि) करने चाहिए ॥३५८- ३६०॥ द्वितीय भाग में मनुष्य-सम्बन्धी कार्य (अतिथि-सत्कार आदि) करने का विधान है और तृतीय भाग में पैतृक कर्म (श्राद्धतर्पणादि) का अनुष्ठान करना चाहिए। गुरु, शुक्र और अपनी वैदिक शाखा के अधिपति अपनी नीच राशि में या उसके किसी अंश में स्थित हों अथवा अपने शत्रु की राशि में या उसके किसी अंश में स्थित हों उस समय यज्ञोपवीत लेने वाला द्विज कला और शील से हीन होता है। इसी प्रकार अपनी शाखा के अधिपति, गुरु एवं शुक्र यदि अपने अधिशत्रुगृह में या उसके किसी अंश में स्थित हों तो ब्रह्मचर्यव्रत (यज्ञोपवीत) ग्रहण करने वाला द्विज महापातकी होता है । गुरु, शुक्र एवं अपनी शाखा के अधिपति ग्रह यदि अपनी उच्च राशि या उसके किसी अंश में हों, अथवा केन्द्र (१, ४, ७, १०) या त्रिकोण (५, ९) में स्थित हों तो उस समय यज्ञोपवीत लेने वाला ब्रह्मचारी अत्यन्त धनवान् तथा वेद-वेदांगों में पारंगत विद्वान् होता है ॥३६१-३६४॥

परमोच्चगते जीवे शाखेशो वाथ वा सिते । व्रती विशुद्धे निधने वेदशास्त्रविशारदः ॥३६५॥ स्वाधिमित्रगृहस्थे वा तस्योच्चस्थे तदंशगे । गुरौ भृगौ वा शाखेशे विद्याधनसमन्वितः ॥३६६॥ शाखाधिपतिवारश्च शाखाधिपबलं शिशोः । शाखाधिपतिलग्नं च दुर्लभं त्रितयं व्रते ॥३६७॥ तस्माद्वेद्धांशगे चंद्रे व्रती विद्याविशारदः । पापांशगे स्वांशगे वा दरिद्रो नित्यदुःखितः ॥३६८॥ श्रवणादिनि नक्षत्रे कर्कांशस्थे निशाकरे । तदा व्रती वेदशास्त्रधनधान्यसमृद्धिमान् ॥३६६॥ शुभलग्ने शुभांशे च नैधने शुद्धिसंयुते । लग्ने तु निधने सौम्यैः संयुते वा निरीक्षिते ॥३७०॥ इष्टैर्जीवार्कचंद्राद्यैः पंचभिर्बलिसंग्रहैः । स्थानादिबलसम्पूर्णैश्चतुर्भिर्वा शुभान्वितैः ॥३७१॥ ईक्षनैवालैकविंशमहादोषविवर्जिते । राशयः सकलाः श्रेष्ठाः शुभग्रहयुतेक्षिताः ॥३७२॥ शुभनवांशकगता ग्राह्यास्ते शुभराशयः । न कदाचित्कर्कटांशशुभेक्षितयुतोऽपि वा ॥३७३॥ तस्माद्गोमिथुनांशाश्च तुलाकन्यांशकाः शुभाः । एवंविधे लग्नगते नवांशे व्रतमोरितम् ॥३७४॥ त्रिषडायगतैः पापैः षडष्टांत्यविवर्जितैः । शुभैः षष्ठाष्टलग्नांत्यवर्जितेन हिमांशुना ॥३७५॥ स्वोच्चसंस्थोऽपि शीतांशु र्व्रतिनो यदि लग्नाः । स करोति शिशुं निःस्वं सर्वतः क्षयरोगिणम् ॥३७६॥ स्फूर्जिते केंद्रगे भानौ व्रतिनां पितृनाशनम् । पंचदोषोनितं लग्नं शुभदं चोपनायने ॥३७७॥

यदि गुरु, शुक्र अथवा शाखाधिपति परमोच्च स्थान में हों और मृत्यु (आठवां) स्थान शुद्ध हो तो उस समय ब्रह्मचर्यव्रत ग्रहण करने वाला द्विज वेद-शास्त्र में निष्णात होता है ॥३६५॥ गुरु, शुक्र अथवा शाखा- धिपति यदि अपने अधिमित्रगृह में या उसके उच्च गृह में अथवा उसके अंश में स्थित हों तो यज्ञोपवीत लेने वाला ब्रह्मचारी विद्या तथा धन से सम्पन्न होता है ॥३६६॥ शाखाधिपति का दिन हो, बालक को शाखाधिपति का बल प्राप्त हो तथा शाखाधिपति का लग्न हो—ये तीन बातें उपनयन संस्कार में दुर्लभ हैं ॥३६७॥ उससे चतुष्र्थांश में चन्द्रमा हो तो यज्ञोपवीत लेने वाला बालक विद्या में निपुण होता है; किन्तु यदि वह पापग्रह के अंश में अथवा अपने अंश में हो तो यज्ञोपवीती द्विज सदा दरिद्र और दुःखो रहता है ॥३६८॥ जब श्रवणादि नक्षत्र में विद्यमान चन्द्रमा कर्क के अंश-विशेष में स्थित हो तो ब्रह्मचर्यव्रत ग्रहण करने वाला द्विज वेद, शास्त्र तथा धनधान्य से सम्पन्न होता है ॥३६९॥ शुभ लग्न हो, शुभ ग्रह का अंश हो, मृत्युस्थान शुद्ध हो तथा लग्न और मृत्युस्थान शुभग्रहों से युक्त हो अथवा उन पर शुभग्रहों की दृष्टि हो, लग्न अभीष्ट स्थान में स्थित बृहस्पति, सूर्य और चन्द्रमा आदि पाँच बलवान् ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो अथवा स्थान आदि के बल से पूर्ण चार ही शुभग्रहयुक्त ग्रहों द्वारा लग्नस्थान देखा जाता हो, ओर वह इक्कीस महादोषों से रहित हो तो यज्ञोपवीत लेना शुभ है। शुभग्रहों से संयुक्त या दृष्ट सभी राशियाँ शुभ हैं ॥३७०-३७२॥ वे शुभ राशियां शुभ ग्रह के नवमांश हों तो व्रतबंध में ग्राह्य हैं; किन्तु कर्क राशि का अंश शुभग्रह से युक्त तथा दृष्ट हो तो भी कभी ग्रहण करने योग्य नहीं है ॥३७३। इसलिए वृष और मिथुन के अंश तथा तुला और कन्या के अंश शुभ हैं। इस प्रकार लग्नगत नवांश होने पर व्रतबन्ध उत्तम बताया गया है ॥३७४॥ तीसरे, छठे और ग्यारहवें स्थान में पापग्रह हों, छठा, आठवाँ और बारहवां स्थान शुभग्रह रहित और चन्द्रमा छठे, आठवें, लग्न तथा बारहवें स्थान में न हों तो उपनयन शुभ होता है ॥३७५॥ चन्द्रमा अपने उच्च स्थान में होकर भी यदि व्रतबन्ध-मुहूर्त्त-सम्बन्धी लग्न में स्थित हो तो वह उस बालक को निर्धन और क्षय का रोगी बना देता है ॥३७६॥ यदि सूर्य केन्द्र-स्थान में प्रकाशित हों तो यज्ञोपवीत लेने वाले के पिता का नाश हो जाता है। पांच दोषों से रहित लग्न उपनयन में

६० ना० पृ०

४७४ नारदीयपुराणम् विनावसंतऋतुना कृष्णपक्षे गलग्रहे । अनध्याये विष्टिषष्ठ्योर्न तु संस्कारमर्हति ॥३७८॥ त्रयोदश्यादिचत्वारि सप्तम्यादिदिनत्रयम् । चतुर्थी वा शभाः प्रोक्ता अष्टाविते गलग्रहाः ॥३७९॥ क्षुरिकाबंधनं वक्ष्ये नृपाणां प्राक्शरग्रहात् । विवाहोक्तेषु मासेषु शुक्लपक्षेऽप्यनस्तगे ॥३८०॥ जीवे शुक्रे च भूसूनौ चंद्रताराबलान्विते । मौजीबंधोक्ततिथिषु कुजवर्जितवासरे ॥३८१॥ नचेन्नवांशके कर्तुरष्टमोदयवर्जिते । शुद्धेऽष्टमे विधौ लग्ने षष्ठाष्टांत्यविवर्जिते ॥३८२॥ धनत्रिकोणकेंद्रस्थैः शुभैस्त्र्यायारिगैः परैः । क्षुरिकाबंधनं कार्यमर्चयित्वामरान्नितॄन् ॥३८३॥ अर्चयेत्क्षुरिकां सम्यग्देवतानां च सन्निधौ । ततः सुलग्ने बध्नीयात्कट्यां लक्षणसंयुताम् ॥३८४॥ आयामार्द्धाप्रविस्तारप्रमाणेनैवच्छेदयेत् । तच्छेदखंडाश्चायाः स्युर्ध्वजाये रिपुनाशनम् ॥३८५॥ धूम्राये मरणं सिंहे जयः शुनि च रोगिता । धनलाभो वृषेऽत्यंतं दुःखी भवति गर्दभे ॥३८६॥ गजायेऽत्यंत संप्रीतिर्ध्वांक्षे वित्तविनाशनम् । खड्गपुत्रिकयोर्मानं गणयेत्स्वांगुलेन तु ॥३८७॥ मानांगुलेषु पर्यायामेकादशमितां त्यजेत् । शेषाणामंगुलीनां च फलानि स्युर्यथाक्रमम् ॥३८८॥ पुत्रलाभः शत्रुवधः स्त्रीलाभो गमनं शुभम् । अर्थहानिश्चार्थवृद्धिः प्रीतिसिद्धिर्जयः स्तुतिः ॥३८९॥

शुभदायक होता है ॥३७७॥ वसन्त ऋतु के सिवा और सभी कृष्णपक्ष में, गलग्रह में, अनध्याय के दिन, भद्रा में तथा षष्ठी को बालक का उपनयन-संस्कार नहीं होना चाहिए ॥३७८॥ त्रयोदशी से लेकर चार, सप्तमी से लेकर तीन दिन और चतुर्थी से आठ गलग्रह अशुभ कहे गये हैं ॥३७९॥ क्षुरिका-बन्धनकर्म--अब मैं क्षत्रियों के लिए क्षुरिकाबन्धन कर्म का वर्णन करूँगा जो विवाह के पहले सम्पन्न होता है। विवाह के लिए कहे हुए मासों में, शुक्लपक्ष में, जब कि बृहस्पति, शुक्र और मंगल अस्त न हों, चन्द्रमा और तारा का बल प्राप्त हो, उस समय मौञ्जी बन्धन के लिए कही गयी तिथियों में, मंगलवार के अतिरिक्त शेष सभी दिनों में यह कर्म किया जाता है। कर्ता का लग्नगत नवांश यदि अष्टमोदय से रहित न हो, अष्टम शुद्ध हो; चन्द्रमा छठे, आठवें और बारहवें में न होकर लग्न में स्थित हों; शुभग्रह दूसरे, पाँचवें, नवें, लग्न, चतुर्थ, सप्तम और दशम स्थानों में हो; पापग्रह तीसरे, ग्यारहवें और छठे स्थान में हों तो देवताओं और पितरों की पूजा करके क्षुरिकाबन्धन करना चाहिए ॥३८०-३८३॥ पहले देवताओं के समीप क्षुरिका (कटार) की भली भाँति पूजा करे। तत्पश्चात् शुभलक्षणों से युक्त उस क्षुरिका को उत्तम लग्न में अपनी कटि में बाँधे ॥३८४॥ क्षुरिका की लम्बाई के आधे (मध्यभाग) पर जो विस्तारमान हो उससे क्षुरिका के विभाग करे। वे छेदखण्ड (विभाग) क्रम से ध्वज आदि आय कहलाते हैं। उनकी आठ संज्ञायें हैं--ध्वज, धूम्र, सिंह, श्वा, वृष, गर्दभ, गज और ध्वांक्ष। ध्वज नामक आय में शत्रु का नाश होता है ॥३८५॥ धूम्र आय में घात, सिंह नामक आय में जय, श्वा नामक आय में रोग, वृष आय में धनलाभ, गर्दभ आय में अत्यन्त दुःख की प्राप्ति, गज आय में अत्यन्त प्रसन्नता और ध्वांक्ष नामक आय में धन का नाश होता है। खड्ग और छुरी के माप को अपने अंगुल से गिने ॥३८६-३८७॥ माप के अंगुलों में से ग्यारह से अधिक हो तो ग्यारह घटा दें। फिर शेष अंगुलों के क्रमशः फल इस प्रकार हैं--॥३८८॥ पुत्रलाभ, शत्रुवध, स्त्रीलाभ, शुभगमन, अर्थहानि, अर्थवृद्धि, प्रीति, सिद्धि, जय और स्तुति ॥३८९॥

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४७५ स्थितो ध्वजे वृषाद्ये वा नष्टाचेत्पूर्वतो व्रणम् । सिंहे गजे मध्यभागे त्वंतभागे श्वकोकयोः ॥३९०॥ धूम्रगर्दभयोर्नैव व्रणं श्रेयोऽथभागम् । अथोत्तरायणे शुक्रजीवयोर्दृश्यमानयोः ॥३९१॥ द्विजातीनां गुरोर्गेहान्निवृत्तानां यतात्मनाम् । चित्रोत्तरादितीज्यांत्यहरिमित्रविधातृषु ॥३९२॥ मेष्वर्कबुद्धेज्याशुकवारलग्नांशकेषु च । प्रतिपत्पर्वरिक्ताभा चाष्टमी च दिनत्रयम् ॥३९३॥ हित्वाऽन्यदिवसे कार्यं समावर्तनमुंडनम् । सर्वाश्रमाणां विप्रेन्द्र ह्युत्तमोऽयं गृहाश्रमः ॥३९४॥ सुखं तत्रापि भामिन्यां शीलवत्यां स्थितं ततः । तस्याः सच्छीललब्धिस्तु सुलग्नवशतः खलु ॥३९५॥ पितामहोक्तं संवीक्ष्य लग्नशुद्धिं प्रवक्ष्यहम् । पुण्येऽह्नि लक्षणोपेतं सुखासीनं सुचेतसम् ॥३९६॥ प्रणम्य दैवज्ञेट्वृच्छेद् दैवं भक्तिपूर्वकम् । तांबूलफलपुष्पाद्यैः पूर्णांजलिशिवागतः ॥३९७॥ तत्र चेल्लग्नगः क्रूरस्तस्मात्सप्तमगः कुजः । दंपत्योर्मरणं वाच्यं वर्षाणामष्टकात्पुरा ॥३९८॥ यदि लग्नगतश्चंद्रस्तस्मात्सप्तमगः कुजः । विज्ञेयं भर्तृमरणमष्टवर्षांतरे बुधैः ॥३९९॥ लग्नात्पंचमगः पापः शत्रुदृष्टश्च नीचगः । मृतपुत्राथ वा कन्या कुलटा वा न संशयः ॥४००॥ छुरी या तलवार में यदि ध्वज अथवा वृष आयविभाग के पूर्वभाग में नष्ट हो, तथा सिंह और गज-आय के मध्यभाग में तथा श्वान और काक-आय के अन्तिम भाग में एवं धूम्र और गर्दभ आय के अन्तिम भाग में नष्ट हो जाय तो अशुभ होता है । (अतः ऐसी छुरी या तलवार का परित्याग कर देना चाहिए; यह बात अर्थतः सिद्ध हो जाती है) ॥३९०३॥ समावर्तन -- उत्तरायण में जब गुरु और शुक्र दोनों उदित हों, चित्रा, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तर भाद्रपद, पुनर्वसु, पुष्य, रेवती, श्रवण, अनुराधा, रोहिणी--ये नक्षत्र हों तथा रवि, सोम, बुध, गुरु और शुक्रवार में से कोई वार हो तो इन्हीं रवि आदि पांच ग्रहों की राशि, लग्न और नवमांश में, प्रतिपदा, पर्व, रिक्ता, अमावास्या तथा सप्तमी से तीन तिथि - इन सब तिथियों को छोड़कर अन्य तिथियों में गुरुकुल से अध्ययन समाप्त करके घर को लौटने वाले जितेन्द्रिय द्विजकुमार का समावर्तन-संस्कार (मुण्डन, हवन आदि) करना चाहिए ॥३९१-३९३३॥ विवाह कथन--विप्रवर; सब आश्रमों में यह गृहस्थाश्रम ही श्रेष्ठ है। उसमें भी जब सुशीला धर्मपत्नी हो तभी सुख होता है। स्त्री को सुशीलता की प्राप्ति तभी होती है जब विवाह कालिक लग्न शुभ हो । इसलिए मैं ब्रह्मा द्वारा कथित लग्न-शुद्ध को विचार करके कहता हूँ ॥३९४-३९५३॥ कन्यादान करने वालों को किसी शुभ दिन को अपनी अंजलि में पान, फूल, फल और द्रव्य आदि लेकर ज्योतिष शास्त्र के ज्ञाता, समस्त शुभ लक्षणों से सम्पन्न, प्रसन्नचित तथा सुखपूर्वक बैठे हुए विद्वान् ब्राह्मण के समीप जाकर और उन्हें देवता के समान मानकर भक्तिपूर्वक प्रणाम करके अपनी कन्या के विवाह-लग्न के विषय में पूछना चाहिए ॥३९६-३९७॥ ज्योतिषी को उस समय लग्न और ग्रह स्पष्ट करके देखना चाहिए । यदि प्रश्न-लग्न में पापग्रह हो या लग्न से सप्तम भाव में मंगल हो तो जिसके लिए प्रश्न किया गया है, उस कन्या और वर को ८ वर्ष के भीतर ही घातक अरिष्ट प्राप्त होगा, ऐसा समझना चाहिए। यदि लग्न में चन्द्रमा और उससे सप्तम भाव में मंगल हो तो ८ वर्ष के भीतर ही उस कन्या के पति को घातक कष्ट प्राप्त होगा, ऐसा समझना चाहिए। यदि लग्न से पंचम भाव में पापग्रह हो और वह नीचराशि में पापग्रह से देखा जाता हो तो वह कन्या कुलटा स्वभाववाली अथवा मृतवत्सा होती है, इसमें संशय नहीं ॥३९८-४००॥ यदि प्रश्नलग्न से ३, ५, ७, ११ और १०वें भाव

४७६ नारदीयपुराणम् तृतीयपंचसप्ताष्टकर्मगो वा निशाकरः । लग्नात्करोति संबंधं दंपत्योर्गु रुवीक्षितः ॥४०१॥ तुलागोकर्कटा लग्नसंस्थाः शुक्रेन्दुसंयुताः । वीक्षिताः पृच्छतां नृणां कन्यालाभो भवेत्तदा ॥४०२॥ स्त्रीद्रेष्काणः स्त्रीनवांशो युग्मलग्नं समागतम् । वीक्षितं चंद्रशुक्राभ्यां कन्यालाभो भवेत्तदा ॥४०३॥ एवं स्त्रीणां भर्तृ लब्धिः पुंलग्ने पुंनवांशके । पृच्छकस्य भवेल्लग्नं पुंग्रहैरवलोकितम् ॥४०४॥ कृष्णपक्षे प्रश्नलग्नाद्यस्यराशी शशी यदा । पापद्दष्टोऽथ वा रंध्रे न संबंधो भवेत्तदा ॥४०५॥ पुण्यैर्निमित्तशकुनैः प्रश्नकाले तु मंगलम् । दंपत्योरशुभैरेतैरशुभं सर्वतो भवेत् ॥४०६॥ पंचांगशुद्धिदिवसे चंद्रताराबलान्विते । विवाहभक्ष्योदये वा कन्यावरणमन्वयैः ॥४०७॥ भूषणैः पुष्पतांबूलफलैर्गंधाक्षतादिभिः । शुक्लांबरैर्गीतवाद्यैर्विप्रनाशीर्वचनैः सह ॥४०८॥ कारयेत्कन्यकागेहे वरः प्रणवपूर्वकम् । तदा कुर्यात्पिता तस्याः प्रदानं प्रीतिपूर्वकम् ॥४०९॥ कुलशीलवयोरूपवित्तविद्यायुताय च । वराय च रूपवतीं कन्यां दद्याद्यवीयसीम् ॥४१०॥ संपुज्य प्रार्थयित्वा च शचीं देवीं गुणाश्रयाम् । त्रैलोक्यसुन्दरीं दिव्यगंधमाल्यांबरावृताम् ॥४११॥ सर्वरक्षणसंयुक्तां सर्वाभरणभूषिताम् । अनर्घमणिमालाभिर्भासयंतीं दिगंतरान् ॥४१२॥ में चन्द्रमा हो तथा उस पर गुरु की दृष्टि हो तो समझना चाहिए कि उस कन्या को शीघ्र ही पति प्राप्त होगा ॥४०१॥ यदि प्रश्नलग्न में तुला, वृष या कर्क राशि हो तथा वह शुक्र और चन्द्रमा से युक्त हो तो वर के लिए कन्या (पत्नी) लाभ होता है। अथवा सम राशि लग्न हो, उसमें समराशिका ही द्रेष्काण हो और समराशि का नवमांश तथा उस पर चन्द्रमा और शुक्र की दृष्टि हो तो वर को पत्नी की प्राप्ति होती है ॥४०२-४०३॥ इसी प्रकार यदि प्रश्नलग्न में पुरुषराशि और पुरुषराशि का नवमांश हो तथा उस पर पुरुषग्रह (रवि, मंगल और गुरु) की दृष्टि हो तो जिसके लिये प्रश्न किया गया है, उस कन्या को पति की प्राप्ति होती है ॥४०४॥ यदि प्रश्नसमय में कृष्णपक्ष हो और चन्द्रमा समराशि में होकर लग्न से छठे या आठवें भाव में पापग्रह से देखा जाता हो तो (निकट भविष्य में) विवाह-सम्बन्ध नहीं हो पाता है ॥४०५॥ यदि प्रश्नकाल में शुभ निमित्त और शुभ शकुन देखने सुनने में आयें तो वर-कन्या के लिए शुभ होता है तथा यदि निमित्त एवं शकुन आदि अशुभ हों तो अशुभ फल होता है ॥४०६॥ कन्या वरण- पंचांग (तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण) से शुद्ध दिन में यदि वर और कन्या के चन्द्रबल तथा ताराबल प्राप्त हों तो विवाह के लिए विहित नक्षत्र या उसके मुहूर्त में वर को चाहिए कि अपने कुल के श्रेष्ठ जनों के साथ गीत, वाद्य की ध्वनि और ब्राह्मणों के आशीर्वाद (शान्तिमन्त्रपाठ) आदि से युक्त होकर विविध आभूषण, शुभ वस्त्र, फूल, फल, पान, अक्षत, चन्दन और सुगन्धादि लेकर कन्या के घर में जाय और विनीत भाव से कन्या का वरण करे । (कन्या का वरण वर के बड़े भाई अथवा गुरुजन को करना चाहिए) उसके बाद कन्या का पिता प्रसन्नचित्त होकर अभीष्ट वर को कन्या दान करे ॥४०७-४०९॥ कन्या के पिता को चाहिए कि अपनी कन्या से श्रेष्ठ, कुल, शील, वयस्, रूप, धन और विद्या से युक्त वर को वर की अवस्था में छोटी, रूपवती अपनी कन्या प्रदान करे । कन्यादान से पूर्व सब गुणों की आश्रयभूता, तीनों लोकों में सबसे अधिक सुन्दरी, दिव्य गन्ध, माला और वस्त्र से सुशोभित, सम्पूर्ण शुभ लक्षणों से युक्त तथा सब आभूषणों से मण्डित, अमूल्य मणिमालाओं से दसों दिशाओं को प्रकाशित करती हुई, सहल दिव्य