भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 494, कुल 1008 में से

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षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४७५ स्थितो ध्वजे वृषाद्ये वा नष्टाचेत्पूर्वतो व्रणम् । सिंहे गजे मध्यभागे त्वंतभागे श्वकोकयोः ॥३९०॥ धूम्रगर्दभयोर्नैव व्रणं श्रेयोऽथभागम् । अथोत्तरायणे शुक्रजीवयोर्दृश्यमानयोः ॥३९१॥ द्विजातीनां गुरोर्गेहान्निवृत्तानां यतात्मनाम् । चित्रोत्तरादितीज्यांत्यहरिमित्रविधातृषु ॥३९२॥ मेष्वर्कबुद्धेज्याशुकवारलग्नांशकेषु च । प्रतिपत्पर्वरिक्ताभा चाष्टमी च दिनत्रयम् ॥३९३॥ हित्वाऽन्यदिवसे कार्यं समावर्तनमुंडनम् । सर्वाश्रमाणां विप्रेन्द्र ह्युत्तमोऽयं गृहाश्रमः ॥३९४॥ सुखं तत्रापि भामिन्यां शीलवत्यां स्थितं ततः । तस्याः सच्छीललब्धिस्तु सुलग्नवशतः खलु ॥३९५॥ पितामहोक्तं संवीक्ष्य लग्नशुद्धिं प्रवक्ष्यहम् । पुण्येऽह्नि लक्षणोपेतं सुखासीनं सुचेतसम् ॥३९६॥ प्रणम्य दैवज्ञेट्वृच्छेद् दैवं भक्तिपूर्वकम् । तांबूलफलपुष्पाद्यैः पूर्णांजलिशिवागतः ॥३९७॥ तत्र चेल्लग्नगः क्रूरस्तस्मात्सप्तमगः कुजः । दंपत्योर्मरणं वाच्यं वर्षाणामष्टकात्पुरा ॥३९८॥ यदि लग्नगतश्चंद्रस्तस्मात्सप्तमगः कुजः । विज्ञेयं भर्तृमरणमष्टवर्षांतरे बुधैः ॥३९९॥ लग्नात्पंचमगः पापः शत्रुदृष्टश्च नीचगः । मृतपुत्राथ वा कन्या कुलटा वा न संशयः ॥४००॥ छुरी या तलवार में यदि ध्वज अथवा वृष आयविभाग के पूर्वभाग में नष्ट हो, तथा सिंह और गज-आय के मध्यभाग में तथा श्वान और काक-आय के अन्तिम भाग में एवं धूम्र और गर्दभ आय के अन्तिम भाग में नष्ट हो जाय तो अशुभ होता है । (अतः ऐसी छुरी या तलवार का परित्याग कर देना चाहिए; यह बात अर्थतः सिद्ध हो जाती है) ॥३९०३॥ समावर्तन -- उत्तरायण में जब गुरु और शुक्र दोनों उदित हों, चित्रा, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तर भाद्रपद, पुनर्वसु, पुष्य, रेवती, श्रवण, अनुराधा, रोहिणी--ये नक्षत्र हों तथा रवि, सोम, बुध, गुरु और शुक्रवार में से कोई वार हो तो इन्हीं रवि आदि पांच ग्रहों की राशि, लग्न और नवमांश में, प्रतिपदा, पर्व, रिक्ता, अमावास्या तथा सप्तमी से तीन तिथि - इन सब तिथियों को छोड़कर अन्य तिथियों में गुरुकुल से अध्ययन समाप्त करके घर को लौटने वाले जितेन्द्रिय द्विजकुमार का समावर्तन-संस्कार (मुण्डन, हवन आदि) करना चाहिए ॥३९१-३९३३॥ विवाह कथन--विप्रवर; सब आश्रमों में यह गृहस्थाश्रम ही श्रेष्ठ है। उसमें भी जब सुशीला धर्मपत्नी हो तभी सुख होता है। स्त्री को सुशीलता की प्राप्ति तभी होती है जब विवाह कालिक लग्न शुभ हो । इसलिए मैं ब्रह्मा द्वारा कथित लग्न-शुद्ध को विचार करके कहता हूँ ॥३९४-३९५३॥ कन्यादान करने वालों को किसी शुभ दिन को अपनी अंजलि में पान, फूल, फल और द्रव्य आदि लेकर ज्योतिष शास्त्र के ज्ञाता, समस्त शुभ लक्षणों से सम्पन्न, प्रसन्नचित तथा सुखपूर्वक बैठे हुए विद्वान् ब्राह्मण के समीप जाकर और उन्हें देवता के समान मानकर भक्तिपूर्वक प्रणाम करके अपनी कन्या के विवाह-लग्न के विषय में पूछना चाहिए ॥३९६-३९७॥ ज्योतिषी को उस समय लग्न और ग्रह स्पष्ट करके देखना चाहिए । यदि प्रश्न-लग्न में पापग्रह हो या लग्न से सप्तम भाव में मंगल हो तो जिसके लिए प्रश्न किया गया है, उस कन्या और वर को ८ वर्ष के भीतर ही घातक अरिष्ट प्राप्त होगा, ऐसा समझना चाहिए। यदि लग्न में चन्द्रमा और उससे सप्तम भाव में मंगल हो तो ८ वर्ष के भीतर ही उस कन्या के पति को घातक कष्ट प्राप्त होगा, ऐसा समझना चाहिए। यदि लग्न से पंचम भाव में पापग्रह हो और वह नीचराशि में पापग्रह से देखा जाता हो तो वह कन्या कुलटा स्वभाववाली अथवा मृतवत्सा होती है, इसमें संशय नहीं ॥३९८-४००॥ यदि प्रश्नलग्न से ३, ५, ७, ११ और १०वें भाव

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