बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४७४ नारदीयपुराणम् विनावसंतऋतुना कृष्णपक्षे गलग्रहे । अनध्याये विष्टिषष्ठ्योर्न तु संस्कारमर्हति ॥३७८॥ त्रयोदश्यादिचत्वारि सप्तम्यादिदिनत्रयम् । चतुर्थी वा शभाः प्रोक्ता अष्टाविते गलग्रहाः ॥३७९॥ क्षुरिकाबंधनं वक्ष्ये नृपाणां प्राक्शरग्रहात् । विवाहोक्तेषु मासेषु शुक्लपक्षेऽप्यनस्तगे ॥३८०॥ जीवे शुक्रे च भूसूनौ चंद्रताराबलान्विते । मौजीबंधोक्ततिथिषु कुजवर्जितवासरे ॥३८१॥ नचेन्नवांशके कर्तुरष्टमोदयवर्जिते । शुद्धेऽष्टमे विधौ लग्ने षष्ठाष्टांत्यविवर्जिते ॥३८२॥ धनत्रिकोणकेंद्रस्थैः शुभैस्त्र्यायारिगैः परैः । क्षुरिकाबंधनं कार्यमर्चयित्वामरान्नितॄन् ॥३८३॥ अर्चयेत्क्षुरिकां सम्यग्देवतानां च सन्निधौ । ततः सुलग्ने बध्नीयात्कट्यां लक्षणसंयुताम् ॥३८४॥ आयामार्द्धाप्रविस्तारप्रमाणेनैवच्छेदयेत् । तच्छेदखंडाश्चायाः स्युर्ध्वजाये रिपुनाशनम् ॥३८५॥ धूम्राये मरणं सिंहे जयः शुनि च रोगिता । धनलाभो वृषेऽत्यंतं दुःखी भवति गर्दभे ॥३८६॥ गजायेऽत्यंत संप्रीतिर्ध्वांक्षे वित्तविनाशनम् । खड्गपुत्रिकयोर्मानं गणयेत्स्वांगुलेन तु ॥३८७॥ मानांगुलेषु पर्यायामेकादशमितां त्यजेत् । शेषाणामंगुलीनां च फलानि स्युर्यथाक्रमम् ॥३८८॥ पुत्रलाभः शत्रुवधः स्त्रीलाभो गमनं शुभम् । अर्थहानिश्चार्थवृद्धिः प्रीतिसिद्धिर्जयः स्तुतिः ॥३८९॥
शुभदायक होता है ॥३७७॥ वसन्त ऋतु के सिवा और सभी कृष्णपक्ष में, गलग्रह में, अनध्याय के दिन, भद्रा में तथा षष्ठी को बालक का उपनयन-संस्कार नहीं होना चाहिए ॥३७८॥ त्रयोदशी से लेकर चार, सप्तमी से लेकर तीन दिन और चतुर्थी से आठ गलग्रह अशुभ कहे गये हैं ॥३७९॥ क्षुरिका-बन्धनकर्म--अब मैं क्षत्रियों के लिए क्षुरिकाबन्धन कर्म का वर्णन करूँगा जो विवाह के पहले सम्पन्न होता है। विवाह के लिए कहे हुए मासों में, शुक्लपक्ष में, जब कि बृहस्पति, शुक्र और मंगल अस्त न हों, चन्द्रमा और तारा का बल प्राप्त हो, उस समय मौञ्जी बन्धन के लिए कही गयी तिथियों में, मंगलवार के अतिरिक्त शेष सभी दिनों में यह कर्म किया जाता है। कर्ता का लग्नगत नवांश यदि अष्टमोदय से रहित न हो, अष्टम शुद्ध हो; चन्द्रमा छठे, आठवें और बारहवें में न होकर लग्न में स्थित हों; शुभग्रह दूसरे, पाँचवें, नवें, लग्न, चतुर्थ, सप्तम और दशम स्थानों में हो; पापग्रह तीसरे, ग्यारहवें और छठे स्थान में हों तो देवताओं और पितरों की पूजा करके क्षुरिकाबन्धन करना चाहिए ॥३८०-३८३॥ पहले देवताओं के समीप क्षुरिका (कटार) की भली भाँति पूजा करे। तत्पश्चात् शुभलक्षणों से युक्त उस क्षुरिका को उत्तम लग्न में अपनी कटि में बाँधे ॥३८४॥ क्षुरिका की लम्बाई के आधे (मध्यभाग) पर जो विस्तारमान हो उससे क्षुरिका के विभाग करे। वे छेदखण्ड (विभाग) क्रम से ध्वज आदि आय कहलाते हैं। उनकी आठ संज्ञायें हैं--ध्वज, धूम्र, सिंह, श्वा, वृष, गर्दभ, गज और ध्वांक्ष। ध्वज नामक आय में शत्रु का नाश होता है ॥३८५॥ धूम्र आय में घात, सिंह नामक आय में जय, श्वा नामक आय में रोग, वृष आय में धनलाभ, गर्दभ आय में अत्यन्त दुःख की प्राप्ति, गज आय में अत्यन्त प्रसन्नता और ध्वांक्ष नामक आय में धन का नाश होता है। खड्ग और छुरी के माप को अपने अंगुल से गिने ॥३८६-३८७॥ माप के अंगुलों में से ग्यारह से अधिक हो तो ग्यारह घटा दें। फिर शेष अंगुलों के क्रमशः फल इस प्रकार हैं--॥३८८॥ पुत्रलाभ, शत्रुवध, स्त्रीलाभ, शुभगमन, अर्थहानि, अर्थवृद्धि, प्रीति, सिद्धि, जय और स्तुति ॥३८९॥