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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 492, कुल 1008 में से

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परमोच्चगते जीवे शाखेशो वाथ वा सिते । व्रती विशुद्धे निधने वेदशास्त्रविशारदः ॥३६५॥ स्वाधिमित्रगृहस्थे वा तस्योच्चस्थे तदंशगे । गुरौ भृगौ वा शाखेशे विद्याधनसमन्वितः ॥३६६॥ शाखाधिपतिवारश्च शाखाधिपबलं शिशोः । शाखाधिपतिलग्नं च दुर्लभं त्रितयं व्रते ॥३६७॥ तस्माद्वेद्धांशगे चंद्रे व्रती विद्याविशारदः । पापांशगे स्वांशगे वा दरिद्रो नित्यदुःखितः ॥३६८॥ श्रवणादिनि नक्षत्रे कर्कांशस्थे निशाकरे । तदा व्रती वेदशास्त्रधनधान्यसमृद्धिमान् ॥३६६॥ शुभलग्ने शुभांशे च नैधने शुद्धिसंयुते । लग्ने तु निधने सौम्यैः संयुते वा निरीक्षिते ॥३७०॥ इष्टैर्जीवार्कचंद्राद्यैः पंचभिर्बलिसंग्रहैः । स्थानादिबलसम्पूर्णैश्चतुर्भिर्वा शुभान्वितैः ॥३७१॥ ईक्षनैवालैकविंशमहादोषविवर्जिते । राशयः सकलाः श्रेष्ठाः शुभग्रहयुतेक्षिताः ॥३७२॥ शुभनवांशकगता ग्राह्यास्ते शुभराशयः । न कदाचित्कर्कटांशशुभेक्षितयुतोऽपि वा ॥३७३॥ तस्माद्गोमिथुनांशाश्च तुलाकन्यांशकाः शुभाः । एवंविधे लग्नगते नवांशे व्रतमोरितम् ॥३७४॥ त्रिषडायगतैः पापैः षडष्टांत्यविवर्जितैः । शुभैः षष्ठाष्टलग्नांत्यवर्जितेन हिमांशुना ॥३७५॥ स्वोच्चसंस्थोऽपि शीतांशु र्व्रतिनो यदि लग्नाः । स करोति शिशुं निःस्वं सर्वतः क्षयरोगिणम् ॥३७६॥ स्फूर्जिते केंद्रगे भानौ व्रतिनां पितृनाशनम् । पंचदोषोनितं लग्नं शुभदं चोपनायने ॥३७७॥

यदि गुरु, शुक्र अथवा शाखाधिपति परमोच्च स्थान में हों और मृत्यु (आठवां) स्थान शुद्ध हो तो उस समय ब्रह्मचर्यव्रत ग्रहण करने वाला द्विज वेद-शास्त्र में निष्णात होता है ॥३६५॥ गुरु, शुक्र अथवा शाखा- धिपति यदि अपने अधिमित्रगृह में या उसके उच्च गृह में अथवा उसके अंश में स्थित हों तो यज्ञोपवीत लेने वाला ब्रह्मचारी विद्या तथा धन से सम्पन्न होता है ॥३६६॥ शाखाधिपति का दिन हो, बालक को शाखाधिपति का बल प्राप्त हो तथा शाखाधिपति का लग्न हो—ये तीन बातें उपनयन संस्कार में दुर्लभ हैं ॥३६७॥ उससे चतुष्र्थांश में चन्द्रमा हो तो यज्ञोपवीत लेने वाला बालक विद्या में निपुण होता है; किन्तु यदि वह पापग्रह के अंश में अथवा अपने अंश में हो तो यज्ञोपवीती द्विज सदा दरिद्र और दुःखो रहता है ॥३६८॥ जब श्रवणादि नक्षत्र में विद्यमान चन्द्रमा कर्क के अंश-विशेष में स्थित हो तो ब्रह्मचर्यव्रत ग्रहण करने वाला द्विज वेद, शास्त्र तथा धनधान्य से सम्पन्न होता है ॥३६९॥ शुभ लग्न हो, शुभ ग्रह का अंश हो, मृत्युस्थान शुद्ध हो तथा लग्न और मृत्युस्थान शुभग्रहों से युक्त हो अथवा उन पर शुभग्रहों की दृष्टि हो, लग्न अभीष्ट स्थान में स्थित बृहस्पति, सूर्य और चन्द्रमा आदि पाँच बलवान् ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो अथवा स्थान आदि के बल से पूर्ण चार ही शुभग्रहयुक्त ग्रहों द्वारा लग्नस्थान देखा जाता हो, ओर वह इक्कीस महादोषों से रहित हो तो यज्ञोपवीत लेना शुभ है। शुभग्रहों से संयुक्त या दृष्ट सभी राशियाँ शुभ हैं ॥३७०-३७२॥ वे शुभ राशियां शुभ ग्रह के नवमांश हों तो व्रतबंध में ग्राह्य हैं; किन्तु कर्क राशि का अंश शुभग्रह से युक्त तथा दृष्ट हो तो भी कभी ग्रहण करने योग्य नहीं है ॥३७३। इसलिए वृष और मिथुन के अंश तथा तुला और कन्या के अंश शुभ हैं। इस प्रकार लग्नगत नवांश होने पर व्रतबन्ध उत्तम बताया गया है ॥३७४॥ तीसरे, छठे और ग्यारहवें स्थान में पापग्रह हों, छठा, आठवाँ और बारहवां स्थान शुभग्रह रहित और चन्द्रमा छठे, आठवें, लग्न तथा बारहवें स्थान में न हों तो उपनयन शुभ होता है ॥३७५॥ चन्द्रमा अपने उच्च स्थान में होकर भी यदि व्रतबन्ध-मुहूर्त्त-सम्बन्धी लग्न में स्थित हो तो वह उस बालक को निर्धन और क्षय का रोगी बना देता है ॥३७६॥ यदि सूर्य केन्द्र-स्थान में प्रकाशित हों तो यज्ञोपवीत लेने वाले के पिता का नाश हो जाता है। पांच दोषों से रहित लग्न उपनयन में

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