बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४७२ नारदीयपुराणम् वैशाखे धनवान्वेदशास्त्रविद्याविशारदः । उपनीतो बलाढ्यश्च ज्येष्ठे विधिविदां वरः ॥३५४॥ शुक्लपक्षे द्वितीया च तृतीया पंचमी तथा । त्रयोदशी च दशमी सप्तमी व्रतबंधने ॥३५५॥ श्रेष्ठा त्वेकादशी षष्ठी द्वादश्यन्यास्तु मध्यमाः । कृष्णे द्वित्रिपुंसंख्याश्च मिथोऽन्या ह्यतिनिंदिताः ॥३५६॥ धिष्ण्यान्यर्कत्रयांतैज्यरुद्रादित्योत्तराणि च । विष्णूत्रयाश्विमित्राब्जयोनिभान्युपनायने ॥३५७॥ जन्मभाद्दशमं कर्म संघातक्षं तु षोडशम् । अष्टादशं समुदयं त्रयोविंशं विनाशनम् ॥३५८॥ मानसं पंचविंशक्षं नावरेच्छुभमेषु तु । आचार्यसौम्यकाव्यानां वाराः शस्ताः शशीनयोः ॥३५९॥ वारौ तु मध्यमौ चैव व्रतेऽन्यौ निंदितौ स्मृतौ । त्रिधा विभज्य दिवसं तत्रादौ कर्म दैविकम् ॥३६०॥ द्वितीये मानुषं कार्यं तृतीयेंशे च पैतृकम् । स्वनीचगे तदंशे वा स्वारिभे वा तदंशके ॥३६१॥ गुरुशिखिनोश्च शाखेशे कलाशीलविवर्जितः । स्वाधिशत्रुगृहस्थे वा तदंशस्थेऽथ वा व्रती ॥३६२॥ शाखेशे वा गुरौ शुक्रे महापातककृद्भवेत् । स्वोच्चसंस्थे तदंशे वा स्वराशौ राशिगे गणे ॥३६३॥ शाखेशे वा गुरौ शुक्रे केंद्रगे वा त्रिकोणगे । अतीव धनवांश्चैव वेदवेदांगपारगः ॥३६४॥
पर ब्रह्मचारी वेद-वेदांगों का पारगामी विद्वान् होता है ॥३५३॥ वैशाख मास में जिसका उपनयन हो, वह धनवान् तथा वेद, शास्त्र एवं विविध विद्याओं में निपुण होता है और ज्येष्ठ में यज्ञोपवीत लेने वाला द्विज विधिज्ञों में श्रेष्ठ और बलवान् होता है ॥३५४॥ शुक्ल पक्ष में द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी, त्रयोदशी, दशमी और सप्तमी तिथियां यज्ञोपवीत संस्कार के लिए ग्राह्य हैं। एकादशी, षष्ठी और द्वादशी--ये तिथियां श्रेष्ठ हैं। शेष तिथियां मध्यम हैं। कृष्ण पक्ष में द्वितीया, तृतीया और पञ्चमी ग्राह्य हैं। अन्य तिथियां अत्यन्त निन्दित हैं ॥३५५-४५६॥ हस्त, चित्रा, स्वाती, रेवती, पुष्य, आर्द्रा, पुनर्वसु, तीनों उत्तरा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, अश्विनी, अनुराधा तथा रोहिणी-ये नक्षत्र, उपनयन-संस्कार के लिए उत्तम हैं ॥३५७॥ जन्मनाक्षत्र, से दसवाँ 'कर्म' संज्ञक है, तेईसवाँ 'विनाश' कारक है और पचीसवां 'मानस' है। इनमें शुभ कर्म का आरम्भ नहीं करना चाहिए। गुरु, बुध और शुक्र--इन तीनों के वार उपनयन में प्रशस्त हैं । सोमवार और रविवार ये मध्यम माने गये हैं। शेष दो वार मंगल और शनैश्चर निन्दित हैं। दिन के तीन भाग करके उसके आदि भाग में देवसम्बन्धी कर्म (यज्ञ-पूजनादि) करने चाहिए ॥३५८- ३६०॥ द्वितीय भाग में मनुष्य-सम्बन्धी कार्य (अतिथि-सत्कार आदि) करने का विधान है और तृतीय भाग में पैतृक कर्म (श्राद्धतर्पणादि) का अनुष्ठान करना चाहिए। गुरु, शुक्र और अपनी वैदिक शाखा के अधिपति अपनी नीच राशि में या उसके किसी अंश में स्थित हों अथवा अपने शत्रु की राशि में या उसके किसी अंश में स्थित हों उस समय यज्ञोपवीत लेने वाला द्विज कला और शील से हीन होता है। इसी प्रकार अपनी शाखा के अधिपति, गुरु एवं शुक्र यदि अपने अधिशत्रुगृह में या उसके किसी अंश में स्थित हों तो ब्रह्मचर्यव्रत (यज्ञोपवीत) ग्रहण करने वाला द्विज महापातकी होता है । गुरु, शुक्र एवं अपनी शाखा के अधिपति ग्रह यदि अपनी उच्च राशि या उसके किसी अंश में हों, अथवा केन्द्र (१, ४, ७, १०) या त्रिकोण (५, ९) में स्थित हों तो उस समय यज्ञोपवीत लेने वाला ब्रह्मचारी अत्यन्त धनवान् तथा वेद-वेदांगों में पारंगत विद्वान् होता है ॥३६१-३६४॥