भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४७१ कर्तव्यं क्षौरनक्षत्रेऽप्यथ वास्योदये शुभम् । नृपविप्राज्ञया यज्ञे मरणे बन्धमोक्षणे ॥३४२॥ उद्वाहेऽखिलवारर्क्षतिथिषु क्षौरमिष्टदम् । कर्तव्यं मङ्गलेष्वादौ मङ्गलाय क्षुरार्पणम् ॥३४३॥ नवमे सप्तमे वापि पञ्चमे दिवसेऽपि वा । तृतीये बीजनक्षत्रे शुभवारे शुभोदये ॥३४४॥ सम्यग्गृहाण्यलंकृत्य वितानध्वजतोरणैः । आशिषो वाचनं कार्यं पुण्यं पुण्यांगनादिभिः ॥३४५॥ सहवादित्रनृत्याद्यैर्गत्वा प्रागुत्तरां दिशम् । तत्र मृदतस्ततीक्ष्णा गृहीत्वा पुनरागतः ॥३४६॥ मृण्मयेऽप्यथ वा वैणवेऽपि पात्रे प्रपूरयेत् । अनेकबीजसंयुक्तं तोयं पुष्पाभिशोभितम् ॥३४७॥ आधानादष्टमे वर्षे जन्मतॊ वाग्रजन्मनाम् । राज्ञामेकादशे मौंजीबंधनं द्वादशे विशाम् ॥३४८॥ जन्मतः पंचमे वर्षे वेदशास्त्रविशारदः । उपवीती यतः श्रीमान्कार्यं तत्रोपनयनम् ॥३४९॥ बालस्य बालहीनोऽपि सितो जीवः शुभप्रदः । यथोक्तवत्सरे कार्यमनुक्ते नोपनयनम् ॥३५०॥ दृश्यमानगुरौ शुक्रे शाखेशे चोत्तरायणे । वेदानामधिपा जीवशुक्रमौमबुधाः क्रमात् ॥३५१॥ शरद्ग्रीष्मवसंतेषु व्युत्क्रमात्तु द्विजन्मनाम् । मुख्यं साधारणं तेषां तपोमासादिपंचसु ॥३५२॥ स्वकुलाचारधर्मज्ञो माघमासे तु फाल्गुने । विधिज्ञश्चार्थवांश्चैते वेदवेदांगपारगः ॥३५३॥ क्षौर कर्म में विशेष—राजा अथवा ब्राह्मणों की आज्ञा से यज्ञ में, माता-पिता के मरण में, जेल से छूटने पर तथा विवाह के अवसर पर निषिद्ध नक्षत्र, वार एवं तिथि आदि में भी क्षौर कराना शुभप्रद कहा गया है । समस्त मंगल-कार्यों में, मंगलार्थ इष्ट देवता के समीप क्षुरों को अर्पण करना चाहिए ॥३४२-३४३॥ उपनयन—जिस दिन उपनयन का मुहूर्त स्थिर हो, उससे पूर्व ९वें, ७वें, ५वें या तीसरे दिन उपनयन के लिए विहित नक्षत्र (या उस नक्षत्र के मुहूर्त) में शुभवार और शुभ लग्न में अपने घरों को चंदोवा, पताका और तोरण आदि से अच्छी तरह अलंकृत करके, ब्राह्मणों द्वारा आशीर्वचन, पुण्याहवाचन आदि पुण्य कार्य कराकर सौभाग्यवती स्त्रियों के साथ, मांगलिक वाद्यों के सहित और मंगल-गान कराते हुए घर से पूर्वोत्तर-दिशा (ईशानकोण) में जाकर पवित्र स्थान से चिकनी मिट्टी खोदकर ले ले और पुनः उसी प्रकार गीत-वाद्य के साथ घर लौट आये । वहीं मिट्टी या बाँस के बर्तन में उस मिट्टी को रखकर उसमें अनेक वस्तुओं से युक्त और विविध पुष्पों से सुशोभित पवित्र जल डाले । (इसी प्रकार और भी अपने कुल के अनुरूप आचार का पालन करे) ॥३४४-३४७॥ गर्भाधान अथवा जन्म से आठवें वर्ष में ब्राह्मण बालकों का, ग्यारहवें वर्ष में क्षत्रिय-बालकों का और बारहवें वर्ष में वैश्य-बालकों का मौञ्जीबन्धन करना चाहिए ॥३४८॥ जन्म से पाँचवें वर्ष में यज्ञोपवीत-संस्कार करने पर बालक वेद-शास्त्र-विशारद तथा श्रीसम्पन्न होता है । इसलिए उसमें ब्राह्मण-बालक का उपनयन-संस्कार करना चाहिए ॥३४९॥ शुक्र और बृहस्पति निर्बल हों तब भी बालक के लिए शुभदायक होते हैं । अतः शास्त्रोक्त वर्ष में उपनयन-संस्कार करना चाहिए; अनुक्त वर्ष में नहीं ॥३५०॥ गुरु, शुक्र तथा अपने वेद की शाखा के स्वामी--ये दृश्य हों--अस्त न हुए हों, तब उत्तरायण में उपनयन-संस्कार करना उचित है। बृहस्पति, शुक्र, मंगल और बुध--ये क्रमशः ऋक्, यजुः, साम और अथर्ववेद के अधिपति हैं ॥३५१॥ शरद्, ग्रीष्म और वसन्त--ये व्युत्क्रम से द्विजातियों के उपनयन का मुख्य काल हैं अर्थात् शरद् ऋतु वैश्यों के, ग्रीष्म क्षत्रियों के और वसन्त ब्राह्मणों के उपनयन का मुख्य काल है। माघ आदि पांच मासों में उन सब के लिए उपनयन का साधारणकाल है ॥३५२॥ माघ मास में जिसका उपनयन हो वह अपने कुलोचित आचार तथा धर्म का ज्ञाता होता है । फाल्गुन में यज्ञोपवीत धारण करने वाला पुरुष विधिज्ञ तथा धनवान् होता है । चैत्र में उपनयन होने