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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४७१ कर्तव्यं क्षौरनक्षत्रेऽप्यथ वास्योदये शुभम् । नृपविप्राज्ञया यज्ञे मरणे बन्धमोक्षणे ॥३४२॥ उद्वाहेऽखिलवारर्क्षतिथिषु क्षौरमिष्टदम् । कर्तव्यं मङ्गलेष्वादौ मङ्गलाय क्षुरार्पणम् ॥३४३॥ नवमे सप्तमे वापि पञ्चमे दिवसेऽपि वा । तृतीये बीजनक्षत्रे शुभवारे शुभोदये ॥३४४॥ सम्यग्गृहाण्यलंकृत्य वितानध्वजतोरणैः । आशिषो वाचनं कार्यं पुण्यं पुण्यांगनादिभिः ॥३४५॥ सहवादित्रनृत्याद्यैर्गत्वा प्रागुत्तरां दिशम् । तत्र मृदतस्ततीक्ष्णा गृहीत्वा पुनरागतः ॥३४६॥ मृण्मयेऽप्यथ वा वैणवेऽपि पात्रे प्रपूरयेत् । अनेकबीजसंयुक्तं तोयं पुष्पाभिशोभितम् ॥३४७॥ आधानादष्टमे वर्षे जन्मतॊ वाग्रजन्मनाम् । राज्ञामेकादशे मौंजीबंधनं द्वादशे विशाम् ॥३४८॥ जन्मतः पंचमे वर्षे वेदशास्त्रविशारदः । उपवीती यतः श्रीमान्कार्यं तत्रोपनयनम् ॥३४९॥ बालस्य बालहीनोऽपि सितो जीवः शुभप्रदः । यथोक्तवत्सरे कार्यमनुक्ते नोपनयनम् ॥३५०॥ दृश्यमानगुरौ शुक्रे शाखेशे चोत्तरायणे । वेदानामधिपा जीवशुक्रमौमबुधाः क्रमात् ॥३५१॥ शरद्ग्रीष्मवसंतेषु व्युत्क्रमात्तु द्विजन्मनाम् । मुख्यं साधारणं तेषां तपोमासादिपंचसु ॥३५२॥ स्वकुलाचारधर्मज्ञो माघमासे तु फाल्गुने । विधिज्ञश्चार्थवांश्चैते वेदवेदांगपारगः ॥३५३॥ क्षौर कर्म में विशेष—राजा अथवा ब्राह्मणों की आज्ञा से यज्ञ में, माता-पिता के मरण में, जेल से छूटने पर तथा विवाह के अवसर पर निषिद्ध नक्षत्र, वार एवं तिथि आदि में भी क्षौर कराना शुभप्रद कहा गया है । समस्त मंगल-कार्यों में, मंगलार्थ इष्ट देवता के समीप क्षुरों को अर्पण करना चाहिए ॥३४२-३४३॥ उपनयन—जिस दिन उपनयन का मुहूर्त स्थिर हो, उससे पूर्व ९वें, ७वें, ५वें या तीसरे दिन उपनयन के लिए विहित नक्षत्र (या उस नक्षत्र के मुहूर्त) में शुभवार और शुभ लग्न में अपने घरों को चंदोवा, पताका और तोरण आदि से अच्छी तरह अलंकृत करके, ब्राह्मणों द्वारा आशीर्वचन, पुण्याहवाचन आदि पुण्य कार्य कराकर सौभाग्यवती स्त्रियों के साथ, मांगलिक वाद्यों के सहित और मंगल-गान कराते हुए घर से पूर्वोत्तर-दिशा (ईशानकोण) में जाकर पवित्र स्थान से चिकनी मिट्टी खोदकर ले ले और पुनः उसी प्रकार गीत-वाद्य के साथ घर लौट आये । वहीं मिट्टी या बाँस के बर्तन में उस मिट्टी को रखकर उसमें अनेक वस्तुओं से युक्त और विविध पुष्पों से सुशोभित पवित्र जल डाले । (इसी प्रकार और भी अपने कुल के अनुरूप आचार का पालन करे) ॥३४४-३४७॥ गर्भाधान अथवा जन्म से आठवें वर्ष में ब्राह्मण बालकों का, ग्यारहवें वर्ष में क्षत्रिय-बालकों का और बारहवें वर्ष में वैश्य-बालकों का मौञ्जीबन्धन करना चाहिए ॥३४८॥ जन्म से पाँचवें वर्ष में यज्ञोपवीत-संस्कार करने पर बालक वेद-शास्त्र-विशारद तथा श्रीसम्पन्न होता है । इसलिए उसमें ब्राह्मण-बालक का उपनयन-संस्कार करना चाहिए ॥३४९॥ शुक्र और बृहस्पति निर्बल हों तब भी बालक के लिए शुभदायक होते हैं । अतः शास्त्रोक्त वर्ष में उपनयन-संस्कार करना चाहिए; अनुक्त वर्ष में नहीं ॥३५०॥ गुरु, शुक्र तथा अपने वेद की शाखा के स्वामी--ये दृश्य हों--अस्त न हुए हों, तब उत्तरायण में उपनयन-संस्कार करना उचित है। बृहस्पति, शुक्र, मंगल और बुध--ये क्रमशः ऋक्, यजुः, साम और अथर्ववेद के अधिपति हैं ॥३५१॥ शरद्, ग्रीष्म और वसन्त--ये व्युत्क्रम से द्विजातियों के उपनयन का मुख्य काल हैं अर्थात् शरद् ऋतु वैश्यों के, ग्रीष्म क्षत्रियों के और वसन्त ब्राह्मणों के उपनयन का मुख्य काल है। माघ आदि पांच मासों में उन सब के लिए उपनयन का साधारणकाल है ॥३५२॥ माघ मास में जिसका उपनयन हो वह अपने कुलोचित आचार तथा धर्म का ज्ञाता होता है । फाल्गुन में यज्ञोपवीत धारण करने वाला पुरुष विधिज्ञ तथा धनवान् होता है । चैत्र में उपनयन होने

४७२ नारदीयपुराणम् वैशाखे धनवान्वेदशास्त्रविद्याविशारदः । उपनीतो बलाढ्यश्च ज्येष्ठे विधिविदां वरः ॥३५४॥ शुक्लपक्षे द्वितीया च तृतीया पंचमी तथा । त्रयोदशी च दशमी सप्तमी व्रतबंधने ॥३५५॥ श्रेष्ठा त्वेकादशी षष्ठी द्वादश्यन्यास्तु मध्यमाः । कृष्णे द्वित्रिपुंसंख्याश्च मिथोऽन्या ह्यतिनिंदिताः ॥३५६॥ धिष्ण्यान्यर्कत्रयांतैज्यरुद्रादित्योत्तराणि च । विष्णूत्रयाश्विमित्राब्जयोनिभान्युपनायने ॥३५७॥ जन्मभाद्दशमं कर्म संघातक्षं तु षोडशम् । अष्टादशं समुदयं त्रयोविंशं विनाशनम् ॥३५८॥ मानसं पंचविंशक्षं नावरेच्छुभमेषु तु । आचार्यसौम्यकाव्यानां वाराः शस्ताः शशीनयोः ॥३५९॥ वारौ तु मध्यमौ चैव व्रतेऽन्यौ निंदितौ स्मृतौ । त्रिधा विभज्य दिवसं तत्रादौ कर्म दैविकम् ॥३६०॥ द्वितीये मानुषं कार्यं तृतीयेंशे च पैतृकम् । स्वनीचगे तदंशे वा स्वारिभे वा तदंशके ॥३६१॥ गुरुशिखिनोश्च शाखेशे कलाशीलविवर्जितः । स्वाधिशत्रुगृहस्थे वा तदंशस्थेऽथ वा व्रती ॥३६२॥ शाखेशे वा गुरौ शुक्रे महापातककृद्भवेत् । स्वोच्चसंस्थे तदंशे वा स्वराशौ राशिगे गणे ॥३६३॥ शाखेशे वा गुरौ शुक्रे केंद्रगे वा त्रिकोणगे । अतीव धनवांश्चैव वेदवेदांगपारगः ॥३६४॥

पर ब्रह्मचारी वेद-वेदांगों का पारगामी विद्वान् होता है ॥३५३॥ वैशाख मास में जिसका उपनयन हो, वह धनवान् तथा वेद, शास्त्र एवं विविध विद्याओं में निपुण होता है और ज्येष्ठ में यज्ञोपवीत लेने वाला द्विज विधिज्ञों में श्रेष्ठ और बलवान् होता है ॥३५४॥ शुक्ल पक्ष में द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी, त्रयोदशी, दशमी और सप्तमी तिथियां यज्ञोपवीत संस्कार के लिए ग्राह्य हैं। एकादशी, षष्ठी और द्वादशी--ये तिथियां श्रेष्ठ हैं। शेष तिथियां मध्यम हैं। कृष्ण पक्ष में द्वितीया, तृतीया और पञ्चमी ग्राह्य हैं। अन्य तिथियां अत्यन्त निन्दित हैं ॥३५५-४५६॥ हस्त, चित्रा, स्वाती, रेवती, पुष्य, आर्द्रा, पुनर्वसु, तीनों उत्तरा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, अश्विनी, अनुराधा तथा रोहिणी-ये नक्षत्र, उपनयन-संस्कार के लिए उत्तम हैं ॥३५७॥ जन्मनाक्षत्र, से दसवाँ 'कर्म' संज्ञक है, तेईसवाँ 'विनाश' कारक है और पचीसवां 'मानस' है। इनमें शुभ कर्म का आरम्भ नहीं करना चाहिए। गुरु, बुध और शुक्र--इन तीनों के वार उपनयन में प्रशस्त हैं । सोमवार और रविवार ये मध्यम माने गये हैं। शेष दो वार मंगल और शनैश्चर निन्दित हैं। दिन के तीन भाग करके उसके आदि भाग में देवसम्बन्धी कर्म (यज्ञ-पूजनादि) करने चाहिए ॥३५८- ३६०॥ द्वितीय भाग में मनुष्य-सम्बन्धी कार्य (अतिथि-सत्कार आदि) करने का विधान है और तृतीय भाग में पैतृक कर्म (श्राद्धतर्पणादि) का अनुष्ठान करना चाहिए। गुरु, शुक्र और अपनी वैदिक शाखा के अधिपति अपनी नीच राशि में या उसके किसी अंश में स्थित हों अथवा अपने शत्रु की राशि में या उसके किसी अंश में स्थित हों उस समय यज्ञोपवीत लेने वाला द्विज कला और शील से हीन होता है। इसी प्रकार अपनी शाखा के अधिपति, गुरु एवं शुक्र यदि अपने अधिशत्रुगृह में या उसके किसी अंश में स्थित हों तो ब्रह्मचर्यव्रत (यज्ञोपवीत) ग्रहण करने वाला द्विज महापातकी होता है । गुरु, शुक्र एवं अपनी शाखा के अधिपति ग्रह यदि अपनी उच्च राशि या उसके किसी अंश में हों, अथवा केन्द्र (१, ४, ७, १०) या त्रिकोण (५, ९) में स्थित हों तो उस समय यज्ञोपवीत लेने वाला ब्रह्मचारी अत्यन्त धनवान् तथा वेद-वेदांगों में पारंगत विद्वान् होता है ॥३६१-३६४॥

परमोच्चगते जीवे शाखेशो वाथ वा सिते । व्रती विशुद्धे निधने वेदशास्त्रविशारदः ॥३६५॥ स्वाधिमित्रगृहस्थे वा तस्योच्चस्थे तदंशगे । गुरौ भृगौ वा शाखेशे विद्याधनसमन्वितः ॥३६६॥ शाखाधिपतिवारश्च शाखाधिपबलं शिशोः । शाखाधिपतिलग्नं च दुर्लभं त्रितयं व्रते ॥३६७॥ तस्माद्वेद्धांशगे चंद्रे व्रती विद्याविशारदः । पापांशगे स्वांशगे वा दरिद्रो नित्यदुःखितः ॥३६८॥ श्रवणादिनि नक्षत्रे कर्कांशस्थे निशाकरे । तदा व्रती वेदशास्त्रधनधान्यसमृद्धिमान् ॥३६६॥ शुभलग्ने शुभांशे च नैधने शुद्धिसंयुते । लग्ने तु निधने सौम्यैः संयुते वा निरीक्षिते ॥३७०॥ इष्टैर्जीवार्कचंद्राद्यैः पंचभिर्बलिसंग्रहैः । स्थानादिबलसम्पूर्णैश्चतुर्भिर्वा शुभान्वितैः ॥३७१॥ ईक्षनैवालैकविंशमहादोषविवर्जिते । राशयः सकलाः श्रेष्ठाः शुभग्रहयुतेक्षिताः ॥३७२॥ शुभनवांशकगता ग्राह्यास्ते शुभराशयः । न कदाचित्कर्कटांशशुभेक्षितयुतोऽपि वा ॥३७३॥ तस्माद्गोमिथुनांशाश्च तुलाकन्यांशकाः शुभाः । एवंविधे लग्नगते नवांशे व्रतमोरितम् ॥३७४॥ त्रिषडायगतैः पापैः षडष्टांत्यविवर्जितैः । शुभैः षष्ठाष्टलग्नांत्यवर्जितेन हिमांशुना ॥३७५॥ स्वोच्चसंस्थोऽपि शीतांशु र्व्रतिनो यदि लग्नाः । स करोति शिशुं निःस्वं सर्वतः क्षयरोगिणम् ॥३७६॥ स्फूर्जिते केंद्रगे भानौ व्रतिनां पितृनाशनम् । पंचदोषोनितं लग्नं शुभदं चोपनायने ॥३७७॥

यदि गुरु, शुक्र अथवा शाखाधिपति परमोच्च स्थान में हों और मृत्यु (आठवां) स्थान शुद्ध हो तो उस समय ब्रह्मचर्यव्रत ग्रहण करने वाला द्विज वेद-शास्त्र में निष्णात होता है ॥३६५॥ गुरु, शुक्र अथवा शाखा- धिपति यदि अपने अधिमित्रगृह में या उसके उच्च गृह में अथवा उसके अंश में स्थित हों तो यज्ञोपवीत लेने वाला ब्रह्मचारी विद्या तथा धन से सम्पन्न होता है ॥३६६॥ शाखाधिपति का दिन हो, बालक को शाखाधिपति का बल प्राप्त हो तथा शाखाधिपति का लग्न हो—ये तीन बातें उपनयन संस्कार में दुर्लभ हैं ॥३६७॥ उससे चतुष्र्थांश में चन्द्रमा हो तो यज्ञोपवीत लेने वाला बालक विद्या में निपुण होता है; किन्तु यदि वह पापग्रह के अंश में अथवा अपने अंश में हो तो यज्ञोपवीती द्विज सदा दरिद्र और दुःखो रहता है ॥३६८॥ जब श्रवणादि नक्षत्र में विद्यमान चन्द्रमा कर्क के अंश-विशेष में स्थित हो तो ब्रह्मचर्यव्रत ग्रहण करने वाला द्विज वेद, शास्त्र तथा धनधान्य से सम्पन्न होता है ॥३६९॥ शुभ लग्न हो, शुभ ग्रह का अंश हो, मृत्युस्थान शुद्ध हो तथा लग्न और मृत्युस्थान शुभग्रहों से युक्त हो अथवा उन पर शुभग्रहों की दृष्टि हो, लग्न अभीष्ट स्थान में स्थित बृहस्पति, सूर्य और चन्द्रमा आदि पाँच बलवान् ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो अथवा स्थान आदि के बल से पूर्ण चार ही शुभग्रहयुक्त ग्रहों द्वारा लग्नस्थान देखा जाता हो, ओर वह इक्कीस महादोषों से रहित हो तो यज्ञोपवीत लेना शुभ है। शुभग्रहों से संयुक्त या दृष्ट सभी राशियाँ शुभ हैं ॥३७०-३७२॥ वे शुभ राशियां शुभ ग्रह के नवमांश हों तो व्रतबंध में ग्राह्य हैं; किन्तु कर्क राशि का अंश शुभग्रह से युक्त तथा दृष्ट हो तो भी कभी ग्रहण करने योग्य नहीं है ॥३७३। इसलिए वृष और मिथुन के अंश तथा तुला और कन्या के अंश शुभ हैं। इस प्रकार लग्नगत नवांश होने पर व्रतबन्ध उत्तम बताया गया है ॥३७४॥ तीसरे, छठे और ग्यारहवें स्थान में पापग्रह हों, छठा, आठवाँ और बारहवां स्थान शुभग्रह रहित और चन्द्रमा छठे, आठवें, लग्न तथा बारहवें स्थान में न हों तो उपनयन शुभ होता है ॥३७५॥ चन्द्रमा अपने उच्च स्थान में होकर भी यदि व्रतबन्ध-मुहूर्त्त-सम्बन्धी लग्न में स्थित हो तो वह उस बालक को निर्धन और क्षय का रोगी बना देता है ॥३७६॥ यदि सूर्य केन्द्र-स्थान में प्रकाशित हों तो यज्ञोपवीत लेने वाले के पिता का नाश हो जाता है। पांच दोषों से रहित लग्न उपनयन में

६० ना० पृ०

४७४ नारदीयपुराणम् विनावसंतऋतुना कृष्णपक्षे गलग्रहे । अनध्याये विष्टिषष्ठ्योर्न तु संस्कारमर्हति ॥३७८॥ त्रयोदश्यादिचत्वारि सप्तम्यादिदिनत्रयम् । चतुर्थी वा शभाः प्रोक्ता अष्टाविते गलग्रहाः ॥३७९॥ क्षुरिकाबंधनं वक्ष्ये नृपाणां प्राक्शरग्रहात् । विवाहोक्तेषु मासेषु शुक्लपक्षेऽप्यनस्तगे ॥३८०॥ जीवे शुक्रे च भूसूनौ चंद्रताराबलान्विते । मौजीबंधोक्ततिथिषु कुजवर्जितवासरे ॥३८१॥ नचेन्नवांशके कर्तुरष्टमोदयवर्जिते । शुद्धेऽष्टमे विधौ लग्ने षष्ठाष्टांत्यविवर्जिते ॥३८२॥ धनत्रिकोणकेंद्रस्थैः शुभैस्त्र्यायारिगैः परैः । क्षुरिकाबंधनं कार्यमर्चयित्वामरान्नितॄन् ॥३८३॥ अर्चयेत्क्षुरिकां सम्यग्देवतानां च सन्निधौ । ततः सुलग्ने बध्नीयात्कट्यां लक्षणसंयुताम् ॥३८४॥ आयामार्द्धाप्रविस्तारप्रमाणेनैवच्छेदयेत् । तच्छेदखंडाश्चायाः स्युर्ध्वजाये रिपुनाशनम् ॥३८५॥ धूम्राये मरणं सिंहे जयः शुनि च रोगिता । धनलाभो वृषेऽत्यंतं दुःखी भवति गर्दभे ॥३८६॥ गजायेऽत्यंत संप्रीतिर्ध्वांक्षे वित्तविनाशनम् । खड्गपुत्रिकयोर्मानं गणयेत्स्वांगुलेन तु ॥३८७॥ मानांगुलेषु पर्यायामेकादशमितां त्यजेत् । शेषाणामंगुलीनां च फलानि स्युर्यथाक्रमम् ॥३८८॥ पुत्रलाभः शत्रुवधः स्त्रीलाभो गमनं शुभम् । अर्थहानिश्चार्थवृद्धिः प्रीतिसिद्धिर्जयः स्तुतिः ॥३८९॥

शुभदायक होता है ॥३७७॥ वसन्त ऋतु के सिवा और सभी कृष्णपक्ष में, गलग्रह में, अनध्याय के दिन, भद्रा में तथा षष्ठी को बालक का उपनयन-संस्कार नहीं होना चाहिए ॥३७८॥ त्रयोदशी से लेकर चार, सप्तमी से लेकर तीन दिन और चतुर्थी से आठ गलग्रह अशुभ कहे गये हैं ॥३७९॥ क्षुरिका-बन्धनकर्म--अब मैं क्षत्रियों के लिए क्षुरिकाबन्धन कर्म का वर्णन करूँगा जो विवाह के पहले सम्पन्न होता है। विवाह के लिए कहे हुए मासों में, शुक्लपक्ष में, जब कि बृहस्पति, शुक्र और मंगल अस्त न हों, चन्द्रमा और तारा का बल प्राप्त हो, उस समय मौञ्जी बन्धन के लिए कही गयी तिथियों में, मंगलवार के अतिरिक्त शेष सभी दिनों में यह कर्म किया जाता है। कर्ता का लग्नगत नवांश यदि अष्टमोदय से रहित न हो, अष्टम शुद्ध हो; चन्द्रमा छठे, आठवें और बारहवें में न होकर लग्न में स्थित हों; शुभग्रह दूसरे, पाँचवें, नवें, लग्न, चतुर्थ, सप्तम और दशम स्थानों में हो; पापग्रह तीसरे, ग्यारहवें और छठे स्थान में हों तो देवताओं और पितरों की पूजा करके क्षुरिकाबन्धन करना चाहिए ॥३८०-३८३॥ पहले देवताओं के समीप क्षुरिका (कटार) की भली भाँति पूजा करे। तत्पश्चात् शुभलक्षणों से युक्त उस क्षुरिका को उत्तम लग्न में अपनी कटि में बाँधे ॥३८४॥ क्षुरिका की लम्बाई के आधे (मध्यभाग) पर जो विस्तारमान हो उससे क्षुरिका के विभाग करे। वे छेदखण्ड (विभाग) क्रम से ध्वज आदि आय कहलाते हैं। उनकी आठ संज्ञायें हैं--ध्वज, धूम्र, सिंह, श्वा, वृष, गर्दभ, गज और ध्वांक्ष। ध्वज नामक आय में शत्रु का नाश होता है ॥३८५॥ धूम्र आय में घात, सिंह नामक आय में जय, श्वा नामक आय में रोग, वृष आय में धनलाभ, गर्दभ आय में अत्यन्त दुःख की प्राप्ति, गज आय में अत्यन्त प्रसन्नता और ध्वांक्ष नामक आय में धन का नाश होता है। खड्ग और छुरी के माप को अपने अंगुल से गिने ॥३८६-३८७॥ माप के अंगुलों में से ग्यारह से अधिक हो तो ग्यारह घटा दें। फिर शेष अंगुलों के क्रमशः फल इस प्रकार हैं--॥३८८॥ पुत्रलाभ, शत्रुवध, स्त्रीलाभ, शुभगमन, अर्थहानि, अर्थवृद्धि, प्रीति, सिद्धि, जय और स्तुति ॥३८९॥

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४७५ स्थितो ध्वजे वृषाद्ये वा नष्टाचेत्पूर्वतो व्रणम् । सिंहे गजे मध्यभागे त्वंतभागे श्वकोकयोः ॥३९०॥ धूम्रगर्दभयोर्नैव व्रणं श्रेयोऽथभागम् । अथोत्तरायणे शुक्रजीवयोर्दृश्यमानयोः ॥३९१॥ द्विजातीनां गुरोर्गेहान्निवृत्तानां यतात्मनाम् । चित्रोत्तरादितीज्यांत्यहरिमित्रविधातृषु ॥३९२॥ मेष्वर्कबुद्धेज्याशुकवारलग्नांशकेषु च । प्रतिपत्पर्वरिक्ताभा चाष्टमी च दिनत्रयम् ॥३९३॥ हित्वाऽन्यदिवसे कार्यं समावर्तनमुंडनम् । सर्वाश्रमाणां विप्रेन्द्र ह्युत्तमोऽयं गृहाश्रमः ॥३९४॥ सुखं तत्रापि भामिन्यां शीलवत्यां स्थितं ततः । तस्याः सच्छीललब्धिस्तु सुलग्नवशतः खलु ॥३९५॥ पितामहोक्तं संवीक्ष्य लग्नशुद्धिं प्रवक्ष्यहम् । पुण्येऽह्नि लक्षणोपेतं सुखासीनं सुचेतसम् ॥३९६॥ प्रणम्य दैवज्ञेट्वृच्छेद् दैवं भक्तिपूर्वकम् । तांबूलफलपुष्पाद्यैः पूर्णांजलिशिवागतः ॥३९७॥ तत्र चेल्लग्नगः क्रूरस्तस्मात्सप्तमगः कुजः । दंपत्योर्मरणं वाच्यं वर्षाणामष्टकात्पुरा ॥३९८॥ यदि लग्नगतश्चंद्रस्तस्मात्सप्तमगः कुजः । विज्ञेयं भर्तृमरणमष्टवर्षांतरे बुधैः ॥३९९॥ लग्नात्पंचमगः पापः शत्रुदृष्टश्च नीचगः । मृतपुत्राथ वा कन्या कुलटा वा न संशयः ॥४००॥ छुरी या तलवार में यदि ध्वज अथवा वृष आयविभाग के पूर्वभाग में नष्ट हो, तथा सिंह और गज-आय के मध्यभाग में तथा श्वान और काक-आय के अन्तिम भाग में एवं धूम्र और गर्दभ आय के अन्तिम भाग में नष्ट हो जाय तो अशुभ होता है । (अतः ऐसी छुरी या तलवार का परित्याग कर देना चाहिए; यह बात अर्थतः सिद्ध हो जाती है) ॥३९०३॥ समावर्तन -- उत्तरायण में जब गुरु और शुक्र दोनों उदित हों, चित्रा, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तर भाद्रपद, पुनर्वसु, पुष्य, रेवती, श्रवण, अनुराधा, रोहिणी--ये नक्षत्र हों तथा रवि, सोम, बुध, गुरु और शुक्रवार में से कोई वार हो तो इन्हीं रवि आदि पांच ग्रहों की राशि, लग्न और नवमांश में, प्रतिपदा, पर्व, रिक्ता, अमावास्या तथा सप्तमी से तीन तिथि - इन सब तिथियों को छोड़कर अन्य तिथियों में गुरुकुल से अध्ययन समाप्त करके घर को लौटने वाले जितेन्द्रिय द्विजकुमार का समावर्तन-संस्कार (मुण्डन, हवन आदि) करना चाहिए ॥३९१-३९३३॥ विवाह कथन--विप्रवर; सब आश्रमों में यह गृहस्थाश्रम ही श्रेष्ठ है। उसमें भी जब सुशीला धर्मपत्नी हो तभी सुख होता है। स्त्री को सुशीलता की प्राप्ति तभी होती है जब विवाह कालिक लग्न शुभ हो । इसलिए मैं ब्रह्मा द्वारा कथित लग्न-शुद्ध को विचार करके कहता हूँ ॥३९४-३९५३॥ कन्यादान करने वालों को किसी शुभ दिन को अपनी अंजलि में पान, फूल, फल और द्रव्य आदि लेकर ज्योतिष शास्त्र के ज्ञाता, समस्त शुभ लक्षणों से सम्पन्न, प्रसन्नचित तथा सुखपूर्वक बैठे हुए विद्वान् ब्राह्मण के समीप जाकर और उन्हें देवता के समान मानकर भक्तिपूर्वक प्रणाम करके अपनी कन्या के विवाह-लग्न के विषय में पूछना चाहिए ॥३९६-३९७॥ ज्योतिषी को उस समय लग्न और ग्रह स्पष्ट करके देखना चाहिए । यदि प्रश्न-लग्न में पापग्रह हो या लग्न से सप्तम भाव में मंगल हो तो जिसके लिए प्रश्न किया गया है, उस कन्या और वर को ८ वर्ष के भीतर ही घातक अरिष्ट प्राप्त होगा, ऐसा समझना चाहिए। यदि लग्न में चन्द्रमा और उससे सप्तम भाव में मंगल हो तो ८ वर्ष के भीतर ही उस कन्या के पति को घातक कष्ट प्राप्त होगा, ऐसा समझना चाहिए। यदि लग्न से पंचम भाव में पापग्रह हो और वह नीचराशि में पापग्रह से देखा जाता हो तो वह कन्या कुलटा स्वभाववाली अथवा मृतवत्सा होती है, इसमें संशय नहीं ॥३९८-४००॥ यदि प्रश्नलग्न से ३, ५, ७, ११ और १०वें भाव

४७६ नारदीयपुराणम् तृतीयपंचसप्ताष्टकर्मगो वा निशाकरः । लग्नात्करोति संबंधं दंपत्योर्गु रुवीक्षितः ॥४०१॥ तुलागोकर्कटा लग्नसंस्थाः शुक्रेन्दुसंयुताः । वीक्षिताः पृच्छतां नृणां कन्यालाभो भवेत्तदा ॥४०२॥ स्त्रीद्रेष्काणः स्त्रीनवांशो युग्मलग्नं समागतम् । वीक्षितं चंद्रशुक्राभ्यां कन्यालाभो भवेत्तदा ॥४०३॥ एवं स्त्रीणां भर्तृ लब्धिः पुंलग्ने पुंनवांशके । पृच्छकस्य भवेल्लग्नं पुंग्रहैरवलोकितम् ॥४०४॥ कृष्णपक्षे प्रश्नलग्नाद्यस्यराशी शशी यदा । पापद्दष्टोऽथ वा रंध्रे न संबंधो भवेत्तदा ॥४०५॥ पुण्यैर्निमित्तशकुनैः प्रश्नकाले तु मंगलम् । दंपत्योरशुभैरेतैरशुभं सर्वतो भवेत् ॥४०६॥ पंचांगशुद्धिदिवसे चंद्रताराबलान्विते । विवाहभक्ष्योदये वा कन्यावरणमन्वयैः ॥४०७॥ भूषणैः पुष्पतांबूलफलैर्गंधाक्षतादिभिः । शुक्लांबरैर्गीतवाद्यैर्विप्रनाशीर्वचनैः सह ॥४०८॥ कारयेत्कन्यकागेहे वरः प्रणवपूर्वकम् । तदा कुर्यात्पिता तस्याः प्रदानं प्रीतिपूर्वकम् ॥४०९॥ कुलशीलवयोरूपवित्तविद्यायुताय च । वराय च रूपवतीं कन्यां दद्याद्यवीयसीम् ॥४१०॥ संपुज्य प्रार्थयित्वा च शचीं देवीं गुणाश्रयाम् । त्रैलोक्यसुन्दरीं दिव्यगंधमाल्यांबरावृताम् ॥४११॥ सर्वरक्षणसंयुक्तां सर्वाभरणभूषिताम् । अनर्घमणिमालाभिर्भासयंतीं दिगंतरान् ॥४१२॥ में चन्द्रमा हो तथा उस पर गुरु की दृष्टि हो तो समझना चाहिए कि उस कन्या को शीघ्र ही पति प्राप्त होगा ॥४०१॥ यदि प्रश्नलग्न में तुला, वृष या कर्क राशि हो तथा वह शुक्र और चन्द्रमा से युक्त हो तो वर के लिए कन्या (पत्नी) लाभ होता है। अथवा सम राशि लग्न हो, उसमें समराशिका ही द्रेष्काण हो और समराशि का नवमांश तथा उस पर चन्द्रमा और शुक्र की दृष्टि हो तो वर को पत्नी की प्राप्ति होती है ॥४०२-४०३॥ इसी प्रकार यदि प्रश्नलग्न में पुरुषराशि और पुरुषराशि का नवमांश हो तथा उस पर पुरुषग्रह (रवि, मंगल और गुरु) की दृष्टि हो तो जिसके लिये प्रश्न किया गया है, उस कन्या को पति की प्राप्ति होती है ॥४०४॥ यदि प्रश्नसमय में कृष्णपक्ष हो और चन्द्रमा समराशि में होकर लग्न से छठे या आठवें भाव में पापग्रह से देखा जाता हो तो (निकट भविष्य में) विवाह-सम्बन्ध नहीं हो पाता है ॥४०५॥ यदि प्रश्नकाल में शुभ निमित्त और शुभ शकुन देखने सुनने में आयें तो वर-कन्या के लिए शुभ होता है तथा यदि निमित्त एवं शकुन आदि अशुभ हों तो अशुभ फल होता है ॥४०६॥ कन्या वरण- पंचांग (तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण) से शुद्ध दिन में यदि वर और कन्या के चन्द्रबल तथा ताराबल प्राप्त हों तो विवाह के लिए विहित नक्षत्र या उसके मुहूर्त में वर को चाहिए कि अपने कुल के श्रेष्ठ जनों के साथ गीत, वाद्य की ध्वनि और ब्राह्मणों के आशीर्वाद (शान्तिमन्त्रपाठ) आदि से युक्त होकर विविध आभूषण, शुभ वस्त्र, फूल, फल, पान, अक्षत, चन्दन और सुगन्धादि लेकर कन्या के घर में जाय और विनीत भाव से कन्या का वरण करे । (कन्या का वरण वर के बड़े भाई अथवा गुरुजन को करना चाहिए) उसके बाद कन्या का पिता प्रसन्नचित्त होकर अभीष्ट वर को कन्या दान करे ॥४०७-४०९॥ कन्या के पिता को चाहिए कि अपनी कन्या से श्रेष्ठ, कुल, शील, वयस्, रूप, धन और विद्या से युक्त वर को वर की अवस्था में छोटी, रूपवती अपनी कन्या प्रदान करे । कन्यादान से पूर्व सब गुणों की आश्रयभूता, तीनों लोकों में सबसे अधिक सुन्दरी, दिव्य गन्ध, माला और वस्त्र से सुशोभित, सम्पूर्ण शुभ लक्षणों से युक्त तथा सब आभूषणों से मण्डित, अमूल्य मणिमालाओं से दसों दिशाओं को प्रकाशित करती हुई, सहल दिव्य

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४७७ विलासिनीसहस्राद्यैः सेवमानामर्हनिशम्। एवंविधां कुमारीं तां पूजांते प्रार्थयेदिति ॥४१३॥ देवींद्राणि नमस्तुभ्यं देवेंद्रप्रियभामिनि । विवाहे भाग्यमारोग्यं पुत्रलाभं च देहि मे ॥४१४॥ युग्मेऽब्दे जन्मतः स्त्रीणां प्रीतिदं पाणिपीडनम् । एतत्पुंसामयुग्मेऽब्दे व्यत्ययेनाशनम् तयोः ॥४१५॥ माघफाल्गुनवैशाखज्येष्ठमासाः शुभप्रदाः । मध्यमा कार्तिको मार्गशीर्षो वै निंदिताः परे ॥४१६॥ न कदाचिद्दिशर्क्षेषु भानोरार्द्राप्रवेशनात् । विवाहो देवतानां च प्रतिष्ठां चोपनयनम् ॥४१७॥ नास्तंगते सिते जीवे न तयोर्बालवृद्धयोः । न गुरौ सिंहराशिस्ये सिंहांशकगतेऽपि वा ॥४१८॥ पश्चात्प्रागुदितः शुक्नो दशत्रिदिवसं शिशुः । वृद्धः पंचदिनं पक्षं गुरुः पक्षं च सर्वतः ॥४१९॥ अप्रबुद्धो हृषीकेशो यावत्तावन्न मंगलम् । उत्सवे वासुदेवस्य दिवसे नान्यमंगलम् ॥४२०॥ न जन्ममासे जन्मर्भे न जन्मदिवसेऽपि च । आद्य गर्भसुतस्याथ दुहितुर्वा करग्रहः ॥४२१॥ नैवोद्वाहो ज्येष्ठ पुत्रीपुत्रयोश्च परस्परम् । ज्येष्ठमासे तयोरेकज्येष्ठे श्रेष्ठश्च नान्यथा ॥४२२॥ सहेलियों से सुसेविता सर्वगुणसम्पन्ना इन्द्राणी देवी की पूजा करके उनसे प्रार्थना करे—'हे देवि ! हे इन्द्राणि ! हे देवेन्द्रप्रियभामिनि ! आपको मेरा नमस्कार है। देवि ! इस विवाह में आप सौभाग्य, आरोग्य और पुत्र प्रदान करें।' इस प्रकार प्रार्थना करके पूजा के वाद विधानपूर्वक गुणयुक्त वर को अपनी कुमारी कन्या का दान करे ॥४१०-४१४॥ कन्या-वर को वर्षशुद्धि--कन्या के जन्म-समय से सम वर्षों में और वर के जन्मसमय से विषम वर्षों में होने वाला विवाह उन दोनों के प्रेम और प्रसन्नता को बढ़ाने वाला होता है। इससे विपरीत (कन्या के विषम और वर के सम वर्ष में) विवाह वर-कन्या दोनों के लिए घातक होता है ॥४१५॥ विवाहविहित मास—माघ, फाल्गुन, वैशाख और ज्येष्ठ--ये चार मास विवाह में श्रेष्ठ तथा कार्तिक और मार्गशीर्ष ये दो मास मध्यम हैं। अन्य मास निन्दित हैं ॥४१६॥ सूर्य जब आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश करे तब से दस नक्षत्र तक (अर्थात् आर्द्रा से स्वाती तक के नक्षत्रों में जब तक सूर्य रहें तब तक) विवाह, देवता की प्रतिष्ठा और उपनयन नहीं करने चाहिए। बृहस्पति और शुक्र जब अस्त हों, बाल अथवा वृद्ध हों तथा केवल बृहस्पति सिंह राशि या उसके नवमांश में हों, उस समय भी ऊपर कहे हुए शुभ कार्य नहीं करने चाहिए ॥४१७-४१८॥ गुरु तथा शुक्र के बाल्य और वृद्धत्व--शुक्र जब पश्चिम में उदय होता है तो दस दिन और पूर्व में उदय होता है तो तीन दिन तक बालक रहता है तथा जब पश्चिम में अस्त होने को रहता है तो अस्त से पाँच दिन पहले और पूर्व में अस्त होने से पन्द्रह दिन पहले वृद्ध हो जाता है। गुरु उदय के बाद पन्द्रह दिन बालक और अस्त से पहले पन्द्रह दिन वृद्ध रहता है ॥४१९॥ जब तक भगवान् हृषीकेश शयनावस्था में हों तब तक (अर्थात् आषाढ़-शुक्ला एकादशी से कार्तिक- शुक्ला-एकादशी तक) तथा भगवान् के उत्सव (उत्थान या जन्मदिन) में भी अन्य मंगलकार्य नहीं करने चाहिए ॥४२०॥ पहले गर्भ के पुत्र और कन्या के जन्ममास, जन्मनक्षत्र और जन्मतियिवार में भी विवाह नहीं करना चाहिए। आद्य गर्भ की कन्या और आद्य गर्भ के वर का परस्पर विवाह नहीं करना चाहिए। वर-कन्या में कोई एक ही ज्येष्ठ (आद्य गर्भ का) हो तो ज्येष्ठ मास में विवाह श्रेष्ठ है। यदि दोनों ज्येष्ठ हों तो ज्येष्ठ मास में विवाह अनिष्टकारक कहा गया है ॥४२१-४२२॥

४७८ नारदीयपुराणम् उत्पातग्रहणादूर्ध्वं सप्ताहमाखिलग्रहे । नाखिले त्रिदिनं नेष्टं त्रिद्युस्पृक् च क्षयं तथा ॥४२३॥ ग्रस्तास्ते त्रिदिनं पूर्वं पश्चाद्ग्रस्तोदयेऽथवा । संध्यायां त्रिदिनं तद्वन्निशीथे सप्त एव च ॥४२४॥ मासान्ते पंच दिवसांस्त्यजेद्रिक्तां तथाष्टमीम् । व्यतीपातं वैधृतिं च संपूर्णं परिघार्द्धकम् ॥४२५॥ पौष्णभदृगुत्तरामैत्रमरुच्चंद्राकं पित्र्यभैः । समूलभैरविद्धैस्तैः स्वीकरग्रह इष्यते ॥४२६॥ विवाहे बलमावश्यं दंपत्योर्गुरुसूर्ययोः । चेत्पूजा यत्नतः कार्या दुर्बलग्रहयोस्तयोः ॥४२७॥ गोचरं वेधजं चाष्टवर्गजंरूपजं बलम् । यथोत्तरं बलाधिक्यं स्थूलं गोचरमार्गजम् ॥४२८॥ चंद्राताराबलं वीक्ष्य ततः पंचांगजं बलम् । तिथिरेकगुणा वारो द्विगुणस्त्रिगुणं च भम् ॥४२९॥ योगश्चतुगु णः पञ्चगुणः तिथ्यर्द्धसंज्ञितम् । ततो मुहूर्तो बलवांस्ततो लग्नंबलाधिकम् ॥४३०॥ ततो बलवती होरा द्रेष्काणो बलवांस्ततः । ततो नवांशो बलवान्द्वादशांशो बली ततः ॥४३१॥ त्रिंशांशो बलवांस्तस्माद्वीक्ष्यमेतद्बलाबलम् । शुभेक्षितयुताः शस्ता उद्वाहेऽखिलराशयः ॥४३२॥ चंद्राकॅज्यादयः पंच यस्य राशेस्तु खेचराः । इष्टस्तच्छुभदं लग्नं चत्वारोऽपि बलान्विताः ॥४३३॥

**विवाह में वर्ज्य--**भूकम्पादि उत्पात तथा सर्वग्रास सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण हो तो उसके बाद सात दिन तक का समय शुभ नहीं है। यदि खण्डग्रहण हो तो उसके बाद तीन दिन अशुभ होते हैं। तीन दिन का स्पर्श करने वाली (वृद्धि) तिथि, क्षयतिथि तथा ग्रस्तास्त (ग्रहण लगे चन्द्र, सूर्य का अस्त) हो तो पूर्व के तीन दिन अच्छे नहीं माने जाते। यदि ग्रहण लगे हुए सूर्य, चन्द्र का उदय हो तो बाद के तीन दिन अशुभ होते हैं । संध्या समय में ग्रहण हो तो पहले और बाद के भी तीन दिन अनिष्टकारक हैं तथा मध्यरात्रि में ग्रहण हो तो सात दिन (तीन पहले के और तीन बाद के तथा एक ग्रहण वाला दिन) अशुभ होते हैं ॥४२३-४२४॥ मास के अन्तिम दिन, रिक्ता, अष्टमी, व्यतीपात ओर वैधृतियोग सम्पूर्ण तथा परिघ योग का पूर्वार्ध--ये विवाह में वर्जित हैं ॥४२५॥ **विहित नक्षत्र--**रेवती, रोहिणी, तीनों उत्तरा, अनुराधा, स्वाती, मृगशिरा, हस्त, मघा और मूल-- ये ग्यारह नक्षत्र वेधरहित हों तो इन्हीं में स्त्री का विवाह शुभ कहा गया है ॥४२६॥ विवाह में वर को सूर्य का और कन्या को बृहस्पति का बल अवश्य प्राप्त होना चाहिए। यदि ये दोनों अनिष्टकारक हों तो यत्नपूर्वक इनकी पूजा करनी चाहिए ।॥४२७॥ गोचर, वेध और अष्टकवर्गसम्बन्धी बल उत्तरोत्तर अधिक है। इसलिए गोचरबल स्थूल (साधारण) माना जाता है। अर्थात् ग्रहों का अष्टकवर्ग-बल ग्रहण करना चाहिए । प्रथम तो वर-कन्या के चन्द्रबल और ताराबल देखने चाहिए। उसके बाद पंचांग (तिथि, वार आदि) के बल देखे । तिथि में एक, वार में दो, नक्षत्र में तीन, योग में चार और करण में पांच गुने बल होते हैं। इन सब की अपेक्षा मुहूर्त बली होता है। मुहूर्त से भी लग्न, लग्न से भी होरा (राश्यर्ध), होरा से द्रेष्काण, द्रेष्काण से नवमांश, नवमांश से भी द्वादशांश तथा उससे भी विंशांश बली होता है । इसलिए इन सबके बल देखने चाहिए ॥४२८-४३१॥ विवाह में शुभग्रह से युक्त या दृष्ट होने पर सभी राशियां प्रशस्त हैं। चन्द्रमा, सूर्य, बुध, बृहस्पति तथा शुक्र आदि पाँच ग्रह जिस राशि के इष्ट हों, वह लग्न शुभप्रद होता है। यदि चार ग्रह भी बली हों तो भी उन्हें शुभप्रद ही समझना चाहिए ॥४३२-४३३॥

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४७६ जामित्रशुद्ध्यैकविंशन्महादोषविवर्जितम् । एकविंशतिदोषाणां नामरूपफलानि च ॥४३४॥ वक्ष्यतेऽत्र समासेन शृणु नारद सांप्रतम् । पञ्चांगशुद्धिराहित्यं दोषस्त्वाद्यः प्रकीर्तितः ॥४३५॥ उदयास्तशुद्धिहीनिद्वितीयः सूर्यसंक्रमः । तृतीयः पापषड्वर्गो भृगुः षष्ठः कुजोऽष्टमः ॥४३६॥ गंडांतं कर्तरी रिष्फषडष्टेष्वनुगतो ग्रहः । दंपत्योरष्टमं लग्नं राशिविषघटी तथा ॥४३७॥ दुर्मुहूर्तो वारदोषः खार्जूरिकसमाङ्घ्रिभम् । ग्रहणोत्पातभं क्रूरविद्धक्षं क्रूरसंयुतम् ॥४३८॥ कुनवांशो महापातो वैधृतिश्चैकविंशतिः । तिथिवारसंयोगानां करणस्य च मेलनम् ॥४३९॥ पंचांगमस्य शुद्धिरिस्तु पंचांगशुद्धिरीरिता । यस्मिन्पंचांगदोषोऽस्ति तस्मिल्लग्ने निरर्थकम् ॥४४०॥ त्यजेत्पंचैष्टिकं चापि विषसंयुक्तदुग्धवत् । लग्नं लग्नांशको स्वस्वपतिना वीक्षितौ युतौ ॥४४१॥ न चेदान्योन्यपतिना शुभमित्रेण वा तथा । वरस्य मृत्युः स्यात्ताभ्यां सप्तसप्तोदयांशकौ ॥४४२॥ एवं तौ न युतौ दृष्टौ मृत्युर्वध्वाः करग्रहे । त्याज्याः सूर्यस्य संक्रांतेः पूर्वतः परतस्तथा ॥४४३॥ विवाहादिषु कार्येषु नाड्यः षोडशषोडश । षड्वर्गः शुभदः श्रेष्ठो विवाहस्थापनादिषु ॥४४४॥ मुने ! लग्न से सप्तम स्थान शुद्ध (ग्रहवर्जित) हो और २१ महा दोषों से रहित हो तो उसे विवाह में ग्रहण करना चाहिए। अब मैं उन इक्कीस दोषों के नाम, स्वरूप और फल का संक्षेप से वर्णन करता हूँ, सुनो ॥४३४॥ विवाह के २१ दोष--'पञ्चांग-शुद्धि का न होना, यह प्रथम दोष कहा गया है। उदयास्त की शुद्धि का न होना २, उस दिन सूर्य की संक्रान्ति का होना ३, पापग्रह का षड्वर्ग में रहना ४, लग्न से छठे भाव में शुक्र की स्थिति ५, अष्टम में मंगल का रहना ६, गण्डान्त होना ७, कर्तरीयोग ८, बारहवें, छठे और आठवें चन्द्रमा का होना तथा चन्द्रमा के साथ किसी अन्य ग्रह का होना ९, वर-कन्या की जन्मराशि से अष्टम राशि लग्न हो या दैनिक चन्द्रराशि हो १०, विषघटो ११, दुर्मुहूर्त १२, वारदोष १३, खर्जूर १४, नक्षत्रैकचरण १५, ग्रहण और उत्पात के नक्षत्र १६, पापग्रह से विद्ध नक्षत्र १७; पाप से युक्त नक्षत्र १८, पापग्रह का नवमांश १६, महापात २० और वैधृति २१--विवाह में ये २१ दोष कहे गये हैं ॥४३५-४३८॥ मुने ! तिथि, वार, नक्षत्र योग और करण-इन पाँचों का मेल पंचांग कहलाता है । उसको शुद्धि पंचांगशुद्धि कहलाती है । जिस दिन पंचांग के दोष हों, उस दिन विवाह लग्न बताना निरर्थक है। इस प्रकार का लग्न यदि पाँच इष्ट ग्रहों से युक्त हो तो भी उसको विषमिश्रित दूध के समान त्याग देना चाहिए ॥४३६- ४४०॥ लग्न या उसके नवमांश अपने-अपने स्वामी से युक्त या दृष्ट न हों अथवा परस्पर (लग्नेश से नवमांश और नवमांशपति से) लग्नेश युक्त या दृष्ट न हों अथवा अपने स्वामी के शुभग्रह मित्र से लग्न से युक्त या दृष्ट न हों तो वर के लिए घातक होते हैं । इसी प्रकार सप्तम और उसके नवमांश में भी ये दोनों यदि अपने-अपने स्वामो से अथवा परस्पर युक्त या दृष्ट नहीं हों या अपने-अपने स्वामी के शुभ मित्र से युक्त या दृष्ट न हों तो वह वधू के लिए घातक है ॥४४१-४४२॥ सूर्य की संक्रान्ति के समय से पूर्व और पश्चात् सोलह-सोलह घड़ी विवाह आदि शुभ कार्यों में त्याज्य है। लग्न का षड्वर्ग (राशि, होरा, द्रेष्काण, नवमांश, द्वादशांश तथा त्रिंशांश) शुभ हो तो विवाह, देवप्रतिष्ठा आदि कार्यों में श्रेष्ठ होता है ॥४४३-४४४॥

भृगुषष्ठाव्हयो दोषो लग्नात्षष्ठगते सिते । उच्चगे शुभसंयुक्ते तल्लग्नं सर्वदा त्यजेत् ॥४४५॥ कुजोऽष्टमो महादोषो लग्नादष्टमगे कुजे । शुभत्रययुतं लग्नं न त्यजेत्तुंगगो यदि ॥४४६॥ पूर्णानन्दाद्वयोस्तिथ्योः संधिर्नाडीद्वयं यदि । गंडांतं मृत्युदं जन्मयात्रोद्वाहव्रतादिषु ॥४४७॥ कुलीरसिंहयोः कीटचापयोर्मीनमेषयोः । गंडांतमंतरालं स्याद्घटिकार्द्धं मृतिप्रदम् ॥४४८॥ सार्पेन्द्रयौष्णभेष्वंत्यषोडशंशा भसन्धयः । तदग्निभेष्व्वाद्यपादा भान्तां गंडांतसंज्ञकाः ॥४४६॥ उग्रं च संधित्रितयं गंडांतं त्रिविधं महत् । लग्नाभिमुखयोः पापग्रहयोरूञ्चुवक्रयोः ॥४५०॥ सा कर्तरीति विज्ञेया दंपत्योगलकंतरी । कर्तरीयोगदुष्टं यल्लग्नं तत्परिवर्जयेत् ॥४५१॥ अपि सौम्यग्रहैर्युक्तं गुणैः सर्वैः समन्वितम् । षड्वृरिष्फगे चंद्रे लग्नदोषः स्वसंज्ञकः ॥४५२॥ तल्लग्नं वर्जयेद्यत्नाज्जीवशुक्रसमन्वितम् । उच्चगे नीचगे वापि मित्रभे शत्रुराशिगे ॥४५३॥ अपि सर्वगुणोपेतं दंपत्योर्निधनप्रदम् । शशांके ग्रहसंयुक्ते दोषः संग्रहसंज्ञकः ॥४५४॥

लग्न से छठे स्थान में शुक्र हो तो वह 'भृगुषष्ठ' नामक दोष कहलाता है । उच्चस्थ और शुभ ग्रह से युक्त होने पर भी उस लग्न को सदा त्याग देना चाहिए। लग्न से अष्टम स्थान में मंगल हो तो यह 'भौममहादोष' कहलाता है। यदि मंगल उच्च में हो और तीन शुभ ग्रह लग्न में हों तो इस लग्न का त्याग नहीं करना चाहिए (अर्थात् ऐसी स्थिति में अष्टम मंगल का दोष नष्ट हो जाता है) ॥४४५-४४६॥

गण्डान्तदोष—पूर्णा (५, १०, १५) तिथियों के अन्त और नन्दा (१, ६, ११) तिथियों की आदि की संधि में दो घड़ी 'तिथिगण्डान्त दोष है। यह जन्म, यात्रा, उपनयन और विवाहादि शुभ कार्यों में घातक होता है ॥४४७॥ कर्क लग्न के अन्त और सिंह लग्न के आदि की सन्धि में, वृश्चिक और धनु की सन्धि में तथा मीन और मेष लग्न की सन्धि में आधा घड़ी 'लग्नगण्डान्त' कहलाता है। यह भी घातक होता है ॥४४८॥ अश्लेषा का चतुर्थ चरण और मघा का प्रथम चरण तथा ज्येष्ठा के अन्त को १६ घड़ी और मूल का प्रथम चरण एवं रेवती नक्षत्र के अन्त की ग्यारह घड़ी और अश्विनी का प्रथम चरण—इस प्रकार इन दो-दो नक्षत्रों की सन्धि का काल 'नक्षत्रगण्डान्त' कहलाता है। ये तीनों प्रकार के गण्डान्त महाक्रूर होते हैं ॥४४७-४४६१/२॥

कर्तरीदोष—लग्न से बारहवें में मार्गी और द्वितीय में वक्री दोनों पापग्रह हों तो लग्न में आगे-पीछे दोनों ओर जाने के कारण यह 'कर्तरीदोष' कहलाता है। इसमें विवाह होने से यह कर्तरीदोष वर-वधू दोनों के के गला काटने वाला (उनका अनिष्ट करने वाला) होता है। ऐसे कर्तरीदोष से युक्त लग्न का परित्याग कर देना चाहिए ॥४५०-४५१॥

लग्नदोष—यदि लग्न से छठे, आठवें तथा बारहवें में चन्द्रमा हो तो यह 'लग्नदोष' कहलाता है। ऐसा लग्न शुभग्रहों तथा अन्य सम्पूर्ण गुणों से युक्त होने पर भी दोषयुक्त होता है। वह लग्न बृहस्पति और शुक्र से युक्त हो तथा चन्द्रमा उच्च, नीच, मित्र या शत्रुराशि में (कहीं भी) हो, तो भी यत्नपूर्वक त्याग देना चाहिए। क्योंकि यह सब गुणों से युक्त होने पर भी वर-वधू के लिए 'घातक' होता है ॥४५१-४५३१/२॥

संग्रहदोष—चन्द्रमा यदि किसी ग्रह से युक्त हो तो 'संग्रह' नामक दोष होता है। इस दोष में भी विवाह नहीं करना चाहिए। चन्द्रमा यदि सूर्य से युक्त हो तो दरिद्रता, मंगल से युक्त हो तो घात अथवा रोग

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४८१ तस्मिन्संग्रहदोषे तु विवाहं नैव कारयेत् । सूर्येण संयुते चंद्रे दारिद्र्यं भवति स्फुटम् ॥४५५॥ कुजेन मरणं व्याधिः सौम्येन त्वनपत्यता । दौर्भाग्यं गुरुणा युक्ते सापत्न्यं भार्गवेण तु ॥४५६॥ प्रव्रज्या सूर्यपुत्रेण राहुणा मूलसंक्षयः । केतुना संयुते चन्द्रे नित्यं कष्टं दरिद्रता ॥४५७॥ पापग्रहुते चन्द्रे दंपत्योर्मरणं भवेत् । शुभग्रहयुते चंद्रे स्वोच्चस्थे मित्रराशिगे ॥४५८॥ दोषायनं भवेल्लग्नं दंपत्योः श्रेयसे सदा । स्वोच्चगो वा स्वक्षंगो वा मित्रक्षेत्रगतोऽपि वा ॥४५८॥ पापग्रहयुतश्चन्द्रः करोति मरणं तयोः । दंपत्योरष्टमं लग्नमष्टमो राशिरैव च ॥४६०॥ यदि लग्नगतः सोऽपि दंपत्योर्मरणप्रदः । स राशिः शुभसंयुक्तो लग्नं वा शुभसंयुक्तम् ॥४६१॥ लग्नं विवर्जयेद्यस्मात्तद्वंशांशतदीशवराम् । दंपत्योर्द्वादशं लग्नं राशिर्वा यदि लग्नगः ॥४६२॥ अर्थहानिस्तयोरस्मात्तदंशस्वामिनं त्यजेत् । जन्मराश्युदयश्चैव जन्मलग्नोदयः शुभः ॥४६३॥ तयोरुपचयस्थानं लग्नेऽत्यंतशुभप्रदम् । खमार्गणा वेदपक्षाः खरामा वेदमार्गणाः ॥४६४॥ वह्निचंद्रा रूपदक्षाः खरामा व्योमबाहवः । द्विरामाः स्वान्नयः शून्यदक्षाः कुंजरक्ष्मयः ॥४६५॥ रूपपक्षा व्योमहक्षा वेदचंद्राश्चतुर्दश । शून्यचन्द्रा वेदचन्द्रा षड्व्रक्षा वेदबाहवः ॥४६६॥

बुध से युक्त हो तो अनपत्यता, गुरु से युक्त हो तो दौर्भाग्य, शुक्र से युक्त हो तो पत्नि-पत्नी में शत्रुता, शनि से युक्त हो तो प्रव्रज्या (गृहत्याग), राहु युक्त हो तो सर्वस्व हानि और केतु से युक्त हो तो कष्ट और दरिद्रता होती है ॥४५४-४५७॥ पापग्रह की निन्दा और शुभग्रहों की प्रशंसा-मुने ! इस प्रकार संग्रहदोष में चन्द्रमा यदि पापग्रह से युक्त हो तो वर-वधू दोनों के लिए घातक होता है। यदि वह शुभग्रहों से युक्त हो तो उस स्थिति में यदि उच्च या मित्र की राशि में चन्द्रमा हो तो लग्न दोषयुक्त रहने पर भी वरवधू के लिए कल्याणकारी होता है। परन्तु चन्द्रमा स्वोच्च में या स्वराशि में अथवा मित्र की राशि में रहने पर यदि पापग्रह से युक्त हो तो वरवधू दोनों के लिए घातक होता है ॥४५८-४५९॥ अष्टमराशि लग्नदोष--वर या वधू के जन्मलग्न से अथवा उनकी जन्मराशि से अष्टमराशि विवाह- लग्न में पड़े तो यह दोष भी वर-वधू के लिए घातक होता है। वह राशि या वह लग्न शुभग्रह से युक्त हो तो भी उस लग्न को, उस नवमांश से युक्त लग्न को अथवा उसके स्वामी को यत्नपूर्वक त्याग देना चाहिए ॥४६०-४६१३॥ द्वादश राशिदोष--वर-वधू के जन्म लग्न या जन्मराशि से द्वादश राशि यदि विवाहलग्न में पड़े तो वर-वधू के धन की हानि होती है। इसलिए उस लग्न को, उसके नवमांश को और उसके स्वामी को भी त्याग देना चाहिए ॥४६२३॥ जन्मलग्न और जन्म-राशि की प्रशंसा--जन्मराशि और जन्मलग्न का उदय विवाह में शुभ होता है तथा दोनों के उपचय (३, ६, १०, ११) स्थान यदि विवाह लग्न में हो तो अत्यन्त शुभप्रद होते हैं ॥ विषघटी ध्रुवाङ्क--अश्विनी का ध्रुवांक ५० भरणी का २४, कृत्तिका का ३०, रोहिणी का ५४, मृगशिरा का १३, आर्द्रा का २१, पुनर्वसु का ३०, पुष्य का २०, अश्लेषा का ३२, मघा का ३०, पूर्वा फाल्गुनी का २०, उत्तरा फाल्गुनी का १८, हस्त का २१, चित्रा का २०, स्वाती का १४, विशाखा का १४, उत्तराषाढ़ का २०, ६१ ना० पु०

४८२ नारदीयपुराणम् शून्यदश्राः शून्यचंद्राः पूर्णचंद्रा गतेंदवः । तर्कचन्द्रा वेदपक्षाः खरामाश्चाश्विमाक्रमात् ॥४६७॥ आभ्यः परास्तु घटिकाश्चतस्रो विषसंज्ञिताः । विवाहादिषु कार्येषु विषनाडीं विवर्जयेत् ॥४६८॥ भास्करादिषु वारेषु ये मुहूर्त्ताश्च निंदिताः । विवाहादिषु ते वर्ज्या अपिलक्षगुणैर्युताः ॥४६६॥ निहिता वारदोषा ये सूर्यवारादिषु क्रमात् । अपि सर्वगुणोपेतास्ते वर्ज्याः सर्वमंगले ॥४७०॥ एकागर्लान्त्रितुल्यं यत्तल्लग्नं च विवर्जयेत् । अपिशुक्रेज्यसंयुक्तं विषसंयुक्तदुग्धवत् ॥४७१॥ ग्रहणोत्पातभं त्याज्यं मंगलेषु ऋतुत्रयम् । यावच्च शशिना मुक्ता मुक्तभं दग्धकाष्ठवत् ॥४७२॥ मंगलेषु त्यजेत्खेटैर्विद्धं च क्रूरसंयुतम् । अखिलं पञ्चगव्यं सुराविद्युतं यथा ॥४७३॥ पाद एव शुभैर्विद्धमशुभं नैव कृत्स्नभम् । क्रूरविद्धं युतं धिष्ण्यं निखिलं नैव मंगलम् ॥४७४॥ तुलामियुनकन्यांशा धनुरंत्यार्धसंयुताः । एते नवांशाः शुभदा वृषमस्यांशकाः खलु ॥४७५॥ अत्यांशास्तेऽपि शुभदा यदि वर्गोत्तमाह्वयाः । अन्ये नवांशा न ग्राह्या यतस्ते कुनवांशकाः ॥४७६॥ कुनवांशकलग्नं यत्त्याज्यं सर्वगुणान्वितम् । यस्मिन्दिने महापातस्तद्दिनं वर्जयेच्छुभे ॥४७७॥ अपि सर्वगुणोपेतं दम्पत्योर्मृत्युदं यतः । अनुक्ताः स्वल्पदोषाः स्युर्विद्युन्नीहारवृष्टयः ॥४७८॥

श्रवण का १०, धनिष्ठा का १०, शतभिषा का १८, पूर्वभाद्रपद का १६, उत्तरभाद्रपद का २४ और रेवती का ध्रुवांक ३० है। इन अश्विनो आदि नक्षत्रों के अपने-अपने ध्रुवांक तुल्य घड़ी के बाद ४ घड़ी तक विषघटी होतो है। विवाह आदि शुभ कार्यों में विषघटिकाओं का त्याग कर देना चाहिए ॥४६३-४६८॥ रवि आदि वारों में जो मुहूर्त निन्दित कहा गया है, वह यदि अन्य लाख गुणों से युक्त हो तो भी विवाह आदि शुभ कार्यों में वर्जनीय ही है ॥४६९॥ रवि आदि दिनों में जो-जो वार-दोष कहे गये हैं वे अन्य सब गुणों से युक्त हों तो भी शुभ कार्य में त्याज्य हैं ॥४७०॥ नक्षत्र के जिस चरण में पूर्वोक्त 'एकार्गल दोष' हो, उस चरण (नवांश) से युक्त जो लग्न हो उसमें यदि गुरु, शुक्र का योग हो तो भी विषयुक्त दूध के समान उसका परित्याग कर देना चाहिए ॥४७१॥ ग्रहण तथा उत्पात से दूषित नक्षत्र को तीन ऋतु (६ मास) तक शुभ कार्य में छोड़ देना चाहिए। जब चन्द्रमा को भोगकर छोड़ दे तो वह नक्षत्र जली हुई लकड़ी के समान निष्फल हो जाता है अर्थात् दोषकारक नहीं रह जाता। शुभ कार्यों में ग्रह से विद्ध और पापग्रह से युक्त सम्पूर्ण नक्षत्र को मदिरामिश्रित पञ्चगव्य के समान त्याग देना चाहिए; परन्तु यदि नक्षत्र शुभग्रह से विद्ध हो तो उसका केवल विद्धचरण ही त्याज्य है, सम्पूर्ण नक्षत्र नहीं। किन्तु पापग्रह से विद्ध नक्षत्र शुभकार्य में सम्पूर्ण रूप से त्याज्य हैं ॥४७२-४७४॥ विहित नवमांश—वृष, तुला, मिथुन, कन्या और धन का उत्तरार्ध तथा इन राशियों के नवमांस विवाह लग्न शुभप्रद है किसी भी लग्न में अन्तिम नवमांश यदि वर्गोत्तम हो तभी उसे शुभप्रद समझना चाहिए। अन्यथा विवाहलग्न का अन्तिम नवमांश (२६ अंश ४० कला के बाद) अशुभ होता है। यहाँ अन्य नवमांश नहीं ग्रहण करने चाहिए। क्योंकि वे कुनवमांश कहलाते हैं। लग्न में कुनवमांश हों तो अन्य सब गुणों से युक्त होने पर भी वह त्याज्य है। जिस दिन महापात (सूर्य-चन्द्रमा का क्रान्ति-साम्य) हो, वह दिन भी शुभ कार्य में छोड़ देने योग्य है। क्योंकि वह अन्य सब 'गुणों' से युक्त होने पर भी वर-वधू के लिए घातक होता है। इन दोषों से भिन्न विद्युत्, नीहार (कुहरा) और वृष्टि आदि दोष, जिनका अभी वर्णन नहीं किया गया है, (स्वल्पदोष) कह- लाते हैं ॥४७५-४७८॥

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४८३ प्रत्यर्कपरिवेषेन्द्रचापांबुधरगर्जनाः । लत्तोपग्रहपाताह्या मासद्ग्धाह्वया तिथिः ॥४७९॥ दग्धलग्नांधबधिरपंगुसंज्ञाश्च राशयः । एवामाद्यास्ततस्तेषां व्यवस्था क्रियतेऽधुना ॥४८०॥ अकालजा भवन्त्येते विद्युन्नीहारवृष्टयः । दोषाय मंगले ननमदोषाग्रैव कालतः ॥४८१॥ बृहस्पतिः केंद्रगतः शुक्नो वा यदि वा बुधः । एकोऽपि दोषनिचयं हरत्येव न संशयः ॥४८२॥ तिर्यक्पंचोर्ध्वगाः पञ्च रेखा द्वे द्वे च कोणयोः । द्वितीये शंभुकोणेऽग्निधिष्ण्यं चक्रे प्रविन्यसेत् ॥४८३॥ मान्यत्र साभिजित्येकरेखाखेटेन विद्धभम् । पुरतः पृष्ठतोऽर्काद्या दिनक्षं लत्तयंति यत् ॥४८४॥ अर्काकृतिगुणाष्टांगबाणाष्टनवसंख्यभम् । सूर्यनक्षाह्सर्पापंञ्चर्क्षात्त्यत्त्वाष्ट्रमितोडुविष्णुभम् ॥४८५॥ संख्यया दिनभे तावदशिभभात्पातदुष्टभम् । सौराष्ट्रे सालवदेशे तु लत्तितं भं विवर्जयेत् ॥४८६॥ कलिगवंगदेशेषु पातितं न शुभप्रदम् । बाल्हिके कुरुदेशे चान्यस्मिन्देशे न दूषणम् ॥४८७॥ तिथयो मासद्ग्धाश्च दग्धलग्नानि यान्यपि । मध्यदेशे विवर्ज्यानि न दुष्टानीतरेषु च ॥४८८॥ षङ्ग्वंधकाणलग्नानि मासशून्याश्च राशयः । गौडमालवयोस्त्याज्या अन्यदेशे न गर्हिताः ॥४८९॥

लघु दोष—विद्युत् नीहार वृष्टि, प्रतिसूर्य (दो सूर्य-सा दीखना) परिवेष (घेरा), इन्द्रधनुष, मेघगर्जन, लत्ता, उपग्रह, पात, मासद्ग्धतिथि, दग्ध, अन्ध, वधिर तथा पंगु—इन राशियों के लग्न, एवं छोटे-छोटे और भी अनेक दोष हैं । अब उनकी व्यवस्था का प्रतिपादन किया जाता है ॥४७९-४८०॥ विद्युत्, नीहार, वृष्टि--ये यदि असमय में हों तभी दोष समझे जाते हैं । यदि समय पर हों (जैसे जाड़े के दिन में पाला पड़े, वर्षा ऋतु में वर्षा हो तथा सघन मेघ में बिजली चमके) तो सब शुभ ही समझे जाते हैं ॥४८१॥ यदि वृहस्पति, शुक्र अथवा बुध इनमें से एक भी केन्द्र में हो तो इन सब दोषों को नष्ट कर देते हैं । इसमें संशय नहीं ॥४८२॥ पञ्चशलाका-वेध--पाँच रेखायें पड़ी और पाँच रेखायें खड़ी खींचकर दो-दो रेखायें कोणों में खींचने (बनाने) से पञ्चशलाका-चक्र बनता है । इस चक्र के ईशान कोण वाली दूसरी रेखा में कृत्तिका को लिखकर आगे प्रदक्षिणा-क्रम से रोहिणी आदि अभिजित् सहित सम्पूर्ण नक्षत्रों का उल्लेख करे । जिस रेखा में ग्रह हों, उसी रेखा की दूसरी ओर वाला नक्षत्र विद्ध समझा जाता है ॥४८३३॥ लत्तादोष--सूर्य आदि ग्रह क्रमशः अपने आश्रित नक्षत्र से आगे और पीछे १२, २२, ३, ७, ६, ५, ८ तथा ९वें दैनिक नक्षत्र को लातों से दूषित करते हैं, इसलिए इसका नाम 'लत्तादोष' है । पातदोष—सूर्य जिस नक्षत्र में हो उससे अश्लेषा, मघा, रेवती, चित्रा, अनुराधा और श्रवण तक की जितनी संख्या हो, उतनी ही यदि अश्विनी से दिननक्षत्र तक गिनने से संख्या हो तो वह नक्षत्र पातदोष से दूषित होता है ॥४८४-४८५३॥ परिहार--सौराष्ट्र (काठियावाड़) और शाल्वदेश में लत्तादोष वर्जित है । कलिंग (जगन्नाथपुरी से कृष्णा नदी तक का भूभाग), वंग (बंगाल), बाल्हिक (बलख) और कुरु (कुरुक्षेत्र) देश में पातदोष त्याज्य हैं; अन्य देशों में ये दोष त्याज्य नहीं हैं ॥४८६-४८७॥ मासद्ग्ध तिथि तथा दग्ध लग्न--ये मध्यदेश (प्रयाग से पश्चिम, कुरुक्षेत्र से पूर्व, विन्ध्य और हिमालय के मध्य) में वर्जित हैं । अन्य देशों में ये दूषित नहीं हैं ॥४८८॥ पंगु, अंध, काण लग्न तथा मासों में जो शून्य राशियां कही गई हैं, वे गौड़ (बंगाल से भुवनेश्वर तक) और मालव (मालवा) देश में त्याज्य हैं । अन्य देशों में निन्दित नहीं हैं ॥४८९॥

४८४ नारदीयपुराणम् दोषदुष्टं सदा कालं सन्निमाष्टुं न शक्यते । अपि धातुरतो ग्राह्यं दोषाल्यत्वं गुणाधिकम् ॥४६०॥ एवं सुलग्ने दंपत्योः कारयेत्सम्यगीक्षणम् । हस्तोच्छ्रितां चतुर्हस्तैश्चतुरस्त्रां समंततः ॥४६१॥ स्तंभैश्चतुर्भिः सुलक्षणैर्वामभागे तु सन्नताम् । समंडपां चतुर्दिक्षु सोपानैरतिशोभिताम् ॥४६२ प्रागुदक्प्रवणां रंभास्तंभैहंसशुकादिभिः । विचित्रितां चित्रकुंभैर्विविधैस्तोरणांकुरैः ॥४६३॥ शृङ्गारपुष्पनिवहैर्वर्णकैः समलंकृताम् । विप्राशीर्वचनैः पुण्यस्त्रीभिर्दिव्यैर्मनोरमाम् ॥४६४॥ वादित्रनृत्यगीताद्यैहृदयानंदिनीं शुभाम् । एवंविधां समारोहेन्मिथुनं स्वाग्निवेदिकाम् ॥४६५॥ अष्टधा राशिकूटं च स्वाहुर्गुणराशयः । राशीशयोनिवर्णाख्यऋक्षवः पुत्रपौत्रदाः ॥४६६॥ एकराशौ पृथग्धिष्ण्ये दंपत्योः पाणिपीडनम् । उत्तमं मध्यमं मित्रं राश्यैकत्वं ययोस्तयोः ॥४६७॥ एकर्क्षे त्वेकराशौ हि विवाहः प्राणहानिदः । स्त्रीधिष्ण्यादाद्यनवके स्त्रीदूरमतिनिंदितम् ॥४६८॥ द्वितीये मध्यमं श्रेष्ठं तृतीये नवके नृभम् । तिस्रः पूर्वोत्तरा धातृयाम्यमाहेशतारकाः ॥४६९॥ विशेष—काल सदा दोषों से दुष्ट होता है; उसे ब्रह्मा भी सर्वथा निर्दोष नहीं बना सकते हैं, इसलिए जिसमें थोड़ा दोष और अधिक गुण हों, ऐसा काल ग्रहण करना चाहिए ॥४९०॥ वेदी और मण्डप—इस प्रकार वर-वधू के लिए शुभप्रद उत्तम समय में श्रेष्ठ लग्न का अनुसन्धान करना चाहिए। तदनन्तर एक हाथ ऊँची, चार हाथ लम्बी और चार हाथ चौड़ी उत्तर दिशा में नत (कुछ नीची) वेदी बनाकर सुन्दर चिकने चार खंभों का एक मण्डप तैयार करे, जिसमें चारों ओर सीढ़ियाँ बनायी गई हों। मण्डप भी पूर्व-उत्तर में निम्न हो। वहाँ चारों तरफ कदलीस्तम्भ गड़े हों। वह मण्डप शुक आदि पक्षियों के चित्रों से सुशोभित हो तथा वेदी नाना प्रकार के मांगलिक चित्रयुक्त कलशों से विचित्र शोभा धारण कर रही हो। भाँति-भाँति के बन्दनवार तथा अनेक प्रकार के फूलों के श्रृंगार से वह स्थान सुसज्जित हो । ऐसे मण्डप के बीच बनी हुई ब्राह्मणों के स्वस्तिवाचनपूर्वक आशीर्वादों, और पुण्यशीला स्त्रियों तथा दिव्य समारोहों से अत्यन्त मनोरम नृत्य, वाद्य और मांगलिक गीतों की ध्वनि से जो हृदय को आनन्द प्रदान करने वाली वेदी पर, वर और वधू को विवाह के लिए बिठाये ॥४९१-४९५॥ वर-वधू की कुण्डली का मिलान-- आठ प्रकार के भकूट, नक्षत्र, राशि, राशिस्वामी, योनि तथा वर्ण आदि सब गुण यदि ऋजु (अनुकूल या शुभ) हों तो ये पुत्र पौत्रादि का सुख प्रदान करने वाले होते हैं ॥४९६॥ वर और कन्या दोनों की राशि और नक्षत्र भिन्न हों तो उन दोनों का विवाह उत्तम होता है। दोनों की राशि भिन्न और नक्षत्र एक हो तो उनका विवाह मध्यम होता है और यदि दोनों का एक ही नक्षत्र, एक ही राशि हो तो उन दोनों का विवाह प्राणसंकट उपस्थित करने वाला होता है ॥४९७॥ स्त्रीदूर-दोष- कन्या के नक्षत्र से प्रथम नवक (नौ नक्षत्रों) के भीतर वर का नक्षत्र हो तो यह 'स्त्रीदूर' नामक दोष कहलाता है, जो अत्यन्त निन्दित है। द्वितीय नवक (१० से १८ तक) के भीतर हो तो मध्यम कहा गया है। यदि तृतीय नवक (१९ से २७ तक) के भीतर हो तो उन दोनों का विवाह श्रेष्ठ कहा गया है ॥४९८॥ गण विचार - पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढ़, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ, उत्तर भाद्रपद, रोहिणी, भरणी और आर्द्रा--ये नक्षत्र मनुष्यगण हैं। श्रवण, पुनर्वसु, हस्त, स्वाती, रेवती, अनुराधा, अश्विनी, पुष्य और

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४८५ इति मर्त्यगणे ज्ञेयः स्यादमर्त्यगणः परः । हर्यदित्यार्कवात्वंत्यमित्राष्ट्विज्येंदुतारकाः ॥५००॥ रक्षोगणः पितृत्वाष्ट्रद्विदैवाग्नींद्रतारकाः । वसुवारीशमूलाहितारकाभिषु तास्ततः ॥५०१॥ दंपत्योर्जन्मभे चैकगणे प्रीतिरनेकधा । मध्यमा देवमर्त्यानां राक्षसानां तयोर्मृतिः ॥५०२॥ मृत्युः षष्टाष्टके पंचनवमे त्वनपत्यता । नैःस्वं द्विद्वीदशेऽन्येषु दंपत्योः प्रीतिरुत्तमा ॥५०३॥ एकाधिपे मित्रभावे शुभदं पाणिपीडनम् । द्विद्वादशे त्रिकोणे च न कदाचित्षडष्टके ॥५०४॥ अश्वेभमेषसर्पाहिह्योतुमेषोतुमूषकाः । आखुगोमहिषव्याघ्रकालीव्याघ्रमृगद्वयम् ॥५०५॥ श्वानः कपिर्बभ्रुयुगं कपिर्सिहतुरंगमाः । सिंहगोदंतिनो भानां योनयः स्युर्यथाश्विभात् ॥५०६॥ श्वैणं बभ्रूरगं मेषवानरौ सिंहवारणम् । गोव्याघ्रमाखुमार्जारं महिषाश्वं च शात्रवम् ॥५०७॥ झषालिकर्कटा विप्रास्तदूर्ध्वाः क्षत्रियादयः । पुंवर्णराशेः स्त्रीराशौ सति हीने यथाशुभम् ॥५०८॥ मृगशिरा—ये देवगण हैं तथा मघा, चित्रा, विशाखा, कृत्तिका, ज्येष्ठा, धनिष्ठा, शतभिषा, मूल और आश्लेषा— ये नक्षत्र राक्षसगण हैं ॥४९९-५०१॥ वर और कन्या के नक्षत्र किसी एक ही के गण हों तो दोनों में परस्पर सब प्रकार से प्रेम बढ़ता है । एक मनुष्यगण और दूसरे का देवगण होने पर दोनों में मध्यम प्रेम होता है तथा यदि एक का राक्षस और दूसरे का देव या मनुष्यगण हो तो वर-वधू दोनों को मृत्युतुल्य क्लेश प्राप्त होता है ॥५०२॥ राशिकूट--वर और कन्या की राशियों को परस्पर गिनने से यदि वे छठीं और आठवीं संख्या में पड़नी हों तो दोनों के लिए घातक हैं । यदि पांचवीं और नवीं संख्या में हों तो संतान की हानि होती है । यदि दूसरी और बारहवीं संख्या में हों तो वर-वधू दोनों निर्धन होते हैं। इनसे भिन्न संख्या में हों तो दोनों में परस्पर प्रेम होता है ॥५०३॥ परिहार—द्विर्द्वादश (२, १२) और नवपञ्चम अथवा दोष में यदि दोनों की राशियों का एक ही स्वामी हो अथवा दोनों के राशि-स्वामियों में मित्रता हो तो विवाह शुभ है कहा गया है। परन्तु षडष्टक (६, ८) में दोनों के स्वामी एक होने पर भी विवाह शुभदायक नहीं होता है ॥५०४॥ योनि-कूट—१ अश्व, २ गज, ३ मेष, ४ सर्प, ५ सर्प, ६ श्वान, ७ मार्जार, १० मूषक, ११ मूषक १२ गो, १३ महिष, १४ व्याघ्र, १५ महिष, १६ व्याघ्र, १७ मृग, १८ मृग, १६ श्वान, २० वानर, २१ नकुल, २२ नकुल, २३ वानर, २४ सिंह, २५ अश्व, २६ सिंह, २७ गो तथा २८ गज--ये क्रमशः अश्विनो से लेकर रेवती तक (अभि- जित् सहित) अट्ठाईस नक्षत्रों की योनियां हैं ॥५०५-५०६॥ इनमें श्वान और मृग में, नकुल और सर्प में, मेष और वानर में, सिंह और गज में, गो और व्याघ्र में, मूषक और मार्जार में तथा महिष और अश्व में परस्पर शत्रुता होती है ॥५०७॥ वर्ण-कूट—मीन, वृश्चिक और कर्कराशि ब्राह्मण वर्ण हैं, इनके बाद वाले क्रमशः क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण हैं । समान वर्ण के वर और बधू में तो विवाह स्वयंसिद्ध है ही वर की राशि के वर्ण से कन्या की राशि का वर्ण हीन हो तो भी विवाह शुभ होता है । इससे विपरीत (अर्थात् वर की राशि के वर्ण से कन्या की राशि का वर्ण श्रेष्ठ) हो तो अशुभ समझना चाहिए ॥५०८॥

४८६ नारदीयपुराणम् चतुस्त्रिद्वयंघ्रिमोत्थायाः कन्यायाश्चाश्विभात्क्रमात् । वह्निभादिषुखान्नाडीस्त्रिचतुःपंचपर्वसु ॥५०६॥ गणयेत्संख्यया चैकनाड्यां मृत्युर्न पार्श्वयोः । प्राजापत्यब्राह्मदैवा विवाहाश्चार्षसंयुताः ॥५१०॥ उक्तकाले तु कर्तव्याश्चत्वारः फलदायकाः । गांधर्वासुरपैशाचराक्षसाद्यास्तु सर्वदा ॥५११॥ चतुर्थमभिजिल्लग्नमुदयर्क्षाच्च सप्तमम् । गोधूलिकं तदुभयं विवाहे पुत्रपौत्रदम् ॥५१२॥ प्राच्यानां च कलिंगानां मुख्यं गोधूलिकं स्मृतम् । अभिजित्सर्वदेशेषु मुख्यो दोषविनाशकृत् ॥५१३॥ मध्यंदिनगते भानौ मुहूर्तोऽभिजदाह्वयः । नाशयत्यखिलान्दोषान्पिनाकी त्रिपुरं यथा ॥५१४॥ पुत्रोद्वाहात्परं पुत्रीविवाहो न ऋतुत्रये । न त्रयोवंतमुद्वाहान्मंगले नान्यन्मंगलम् ॥५१५॥ विवाहश्चैकजन्यानां षण्मासाभ्यंतरे यदि । असंशयं त्रिभिर्वर्षैस्तत्रैका विधवा भवेत् ॥५१६॥ प्रत्युद्वाहो नैव कार्यो नैकस्मै दुहितृद्वयम् । न चैकजन्ययोः पुंसोरेकजन्ये तु कन्यके ॥५१७॥ नाडी-विचार-चार चरण वाले नक्षत्र (अश्विनी, भरणी, रोहिणी, आर्द्रा, पुष्य, अश्लेषा मघा, पूर्वा फाल्गुनी, हस्त, स्वाती, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वा षाढ़, श्रवण, शतभिषा, उत्तर भाद्रपद, रेवती--इन) में उत्पन्न कन्या के लिए अश्विनी से आरंभ करके रेवती तक तीन पर्वों पर क्रम-उत्क्रम से गिनकर नाड़ी समझै। तीन चरण वाले (कृत्तिका, पुनर्वसु, उत्तरा फाल्गुनी, विशाखा, उत्तराषाढ़ ओर पूर्वाभाद्रपद) नक्षत्रों में उत्पन्न कन्या के लिए कृत्तिका से लेकर भरणी तक क्रम-उत्क्रम से चार पर्वों पर गिनकर नाड़ी का ज्ञान प्राप्त करे तथा दो चरणों वाले (मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा) नक्षत्रों में उत्पन्न कन्या की नाड़ी जानने के लिए मृगशिरा से लेकर रोहिणी तक पाँच पर्वों पर क्रम-उत्क्रम से गिने । यदि वर और वधू दोनों के नक्षत्र एक पर्व पर पड़े तो वे उनके लिए घातक हैं और भिन्न पर्वों पर पड़े तो शुभ होता है ॥५०९॥ विवाहों के भेद-ऊपर बताये हुए शुभ समय में (१) प्राजापत्य, (२) ब्राह्म, (३) दैव और (४) आर्ष ये- चार प्रकार के विवाह करने चाहिए। ये ही चारों विवाह उपयुक्त फल देने वाले होते हैं। इससे अतिरिक्त जो गान्धर्व, आसुर, पैशाच तथा राक्षस विवाह है, वे तो सब समय समान ही फल देने वाले होते हैं ॥५१०-५११॥ अभिजित्-और गोधूलि-लग्न--सूर्योदयकाल में जो लग्न रहता है, उससे चतुर्थ लग्न का नाम अभिजित है और सातवाँ गोधूलि-लग्न कहलाता है। ये दोनों विवाह में पुत्र-पौत्र प्रदान करने वाले होते हैं ॥५१२॥ पूर्व तथा कलिंग देशवासियों के लिए गोधूलि-लग्न प्रधान है और अभिजित् लग्न तो सब देशों के लिए मुख्य कहा गया है, क्योंकि वह सब दोषों का नाश करने वाला है ॥५१३॥ अभिजित्-प्रशंसा-सूर्य के मध्य आकाश में जाने पर अभिजित्-मुहूर्त होता है, वह समस्त दोषों को वैसे ही नष्ट कर देता है, जैसे त्रिपुरासुर को शंकर ने नष्ट किया था ॥५१४॥ पुत्र का विवाह करने के बाद छह मासों के भीतर पुत्री का विवाह नहीं करना चाहिए। एक पुत्र या पुत्री का विवाह करने के बाद दूसरे पुत्रका उपनयन भी नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार एक मंगल कार्य करने के बाद छह मासों के भीतर दूसरा मंगल कार्य नहीं करना चाहिए। एक गर्भ से उत्पन्न दो कन्याओं का विवाह यदि छह मास के भीतर हो तो निश्चय ही तीन वर्ष के भीतर उसमें से एक विधवा होती है ॥५१५-५१६॥ अपने पुत्र के साथ जिसकी पुत्री का विवाह हो, फिर उसके पुत्र के साथ अपनी पुत्री का विवाह करना 'प्रत्युद्वाह' कहलाता है । ऐसा कभी नहीं करना चाहिए तथा किसी एक ही वर को अपनी दो कन्यायें नहीं देनी चाहिए। दो सहोदर वरों को दो सहोदर कन्यायें नहीं देनी चाहिए। दो सहोदरों का एक ही दिन (एक साथ) विवाह या मुण्डन नहीं करना चाहिए ॥५१७॥

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४८७ नैवं कदाचिदुद्वाहो नैकदा मुंडनद्वयम् । दिवाजातस्तु पितरं रात्रौ तु जननीं तथा ॥५१८॥ आत्मानं संध्ययोर्हंति नास्ति गंडे विपर्ययः । सुतः सुता वा नियतं श्वशुरं हंति मूलजः ॥५१९॥ तदंत्यपादजो नैव तथाश्लेषाद्यपादजः । ज्येष्ठांत्यपादजौ ज्येष्ठं बालो हंति न बालिका ॥५२०॥ न बालिकांबुमूलर्क्षे मातरं पितरं तथा । सैंद्री धवाग्रजं हंति देवरं तु द्विदैवजा ॥५२१॥ आरभ्योद्वाहदिवसात् षष्ठे वाप्यष्टमे दिने । वधूप्रवेशः संपत्त्यै दशमे सप्तमे दिने ॥५२२॥ हायनद्वितयं जन्मलग्नदिवसानपि । संत्यज्य हातिशुक्रेऽपि यात्रा वैवाहिकी शुभा ॥५२३॥ श्रीप्रदं सर्वगीर्वाणस्थापनं चोत्तरायणे । गीर्वाणपुर्वगीर्वाणमतिनोद्धृश्यमानयोः ॥५२४॥ विचित्रैत्रेव्वेव मासेषु माघादिषु च पंचसु । शुक्लपक्षेषु कृष्णेषु तदादिष्वष्टसु शुभम् ॥५२५॥ दिनेषु यस्य देवस्य या तिथस्तत्र तस्य च । द्वितीयादिद्वये पंचम्यादितस्तिसृषु क्रमात् ॥५२६॥ दशम्यादेश्चतसृषु पौर्णमास्यां विशेषतः । व्युत्तगदितिचंद्रांत्यहस्तत्रयगुरूडुषु ॥५२७॥ साश्विधातृजलाधीशहरिमित्रवसुष्वपि । कुजवर्जितवारेषु कर्तुः सूर्ये बलप्रदे ॥५२८॥ चंद्रताराबलोपेते पूर्वाह्णे शोभने दिने । शुभलग्ने शुभांशे च कर्तुं नं निधनोदये ॥५२९॥ राशयः सकलाः श्रेष्ठाः शुभग्रहयुतेक्षिताः । पंचाष्टके शुभे लग्ने नैधने शुद्धिसंयुते ॥५३०॥ गण्डान्तदोष--पूर्वकथित गण्डान्त में यदि दिन में बालक का जन्म हो तो वह पिता का, रात्रि में जन्म हो तो माता का और संध्या (सायं या प्रातः) काल में जन्म हो तो वह अपने शरीर के लिए घातक होता है। गण्ड का यह परिमाण अन्यथा नहीं होता है। मूल में उत्पन्न होने वाली संतान पुत्र हो या कन्या, श्वशुर के लिए घातक होती है, किन्तु मूल के चतुर्थ चरण में जन्म लेने वाला बालक श्वशुर का विनाशक नहीं होता है। अश्लेषा के प्रथम चरण में जन्म लेने वाला बालक भो पिता का या श्वशुर का विनाशक नहीं होता है। ज्येष्ठा के अन्तिम चरण में उत्पन्न बालक हो श्वशुर के लिए घातक होता है, कन्या नहीं। इसी प्रकार पूर्वाषाढ या मूल में उत्पन्न कन्या भो माता या पिता का नाश करने वाली नहीं होती है। ज्येष्ठा नक्षत्र में उत्पन्न कन्या अपने पति के बड़े भाई के लिए और विशाखा में जन्म लेने वाली कन्या अपने देवर के लिए घातक होती है ॥५१८-५२१॥ वधू प्रवेश - विवाह के दिन से ६,८,१० और ७ वें दिन में वधू प्रवेश (पति-गृह में प्रथम प्रवेश) हो तो सम्पत्ति की वृद्धि होती है। द्वितीय वर्ष, जन्मराशि, जन्मलग्न और जन्मदिन को छोड़कर अन्य समय में सम्मुख शुक्र रहने पर भो वैवाहिक यात्रा (वधू प्रवेश) शुभ होती है ॥५२२-५२३॥ देव प्रतिष्ठा-उत्तरायण में, बृहस्पति और शुक्र उदित हों तो चैत्र को छोड़कर माघ आदि पाँच मासों के शुक्ल पक्ष में और कृष्णपक्ष में भी आरंभ से आठ दिन तक सब देवताओं की स्थापना शुभदायक होती है। जिस देवता की जो तिथि है उसमें उस देवता को और २, ३, ५, ६, ७, १०, ११, १२, १३ तथा पूर्णिमा-इन तिथियों में सब देवताओं की स्थापना शुभ होती है। तीनों उत्तरा, पुनर्वसु, मृगशिरा, रेवती, हस्त, चित्रा, स्वाती, पुष्य, अश्विनी, रोहिणी, शतभिषा, श्रवण, अनुराधा और धनिष्ठा--इन नक्षत्रों में तथा मंलवार को छोड़कर अन्य वारों में देव-प्रतिष्ठा करनी चाहिए । स्थापना करने वाले (यजमान) के लिए सूर्य, तारा और चन्द्रमा बलवान् हों, उस दिन के पूर्वाह्न में, शुभ समय, शुभ लग्न और शुभ नवमांश में तथा यजमान की जन्मराशि से अष्टम राशि को छोड़कर अन्य लग्नों में देवताओं की प्रतिष्ठा शुभ होती है ॥५२४-५२६॥ मेष आदि सब राशियां शुभग्रह से युक्त या दृष्ट हों तो देवस्थापन के लिए श्रेष्ठ समझी जाती हैं। प्रत्येक कार्य में पंचांग (तिथि, वार, नक्षत्र, भोग और करण) शुभ होने चाहिए और लग्न से अष्टम स्थान भी शुद्ध (ग्रहवर्जित) होना आवश्यक है ॥५३०॥ (१) लग्न में चन्द्रमा, सूर्य, मंगल, राहु, केतु और शनि कर्ता के

४८८ नारदीयपुराणम् लग्नस्थाश्चन्द्रसूर्यारंराहुकेत्वर्कसूनवः । कर्तुर्मृत्युप्रदाश्चान्ये धनधान्यसुखप्रदाः ॥५३१॥ द्वितीये नेष्टदाः पापाः सौम्याश्चंद्रश्चवित्तदाः । तृतीये निखिलाः खेटाः पुत्रपौत्रसुखप्रदाः ॥५३२॥ चतुर्थे सुखदाः सौम्याः क्रूराः खेटाश्च दुःखदाः । ग्लानिदाः पंचमे क्रूराः सौम्याः पुत्रसुखप्रदाः ॥५३३॥ षष्ठे शुभाः शत्रुदाः स्युः पापाः शत्रुक्षयंकराः । व्याधिदाः सप्तमे पापाः सौम्याः शुभफलप्रदाः ॥५३४॥ अष्टमस्थाः खगाः सर्वे कर्तुर्मृत्युप्रदायकाः । धर्मे पापा घ्नन्ति सौम्याः शुभदा मंगलप्रदाः ॥५३५॥ कर्मगा दुःखदाः पापाः सौम्याश्चंद्रश्च कीर्तिदाः । लाभस्थानगताः सर्वे भूरिलाभप्रदा ग्रहाः ॥५३६॥ व्ययस्थानगताः शश्वद्बहुव्ययकरा ग्रहाः । हंत्यर्थहीनाः कर्तारं मंत्रहीनास्तु ऋत्विजम् ॥५३७॥ स्त्रियं लक्षणहीनास्तु न प्रतिष्ठासमो रिपुः । गुणाधिकतरे लग्ने दोषः स्वल्पतरो यदि ॥५३८॥ सुराणां स्थापनं तत्र कर्तुरिष्टार्थसिद्धिदम् । निर्माणायतनग्रामगृहादीनां समासतः ॥५३९॥ क्षेत्रमादौ परीक्षेत गंधवर्णरसांशकैः । मधुपुष्पाम्लपिशितगंधं विप्रानुपूर्वकम् ॥५४०॥ सितं रक्तं च हरितं कृष्णवर्णं यथाक्रमम् । मधुरं कटुकं तिक्तं कषायंकरसं क्रमात् ॥५४१॥ लिए घातक होते हैं। अन्य (बुध, गुरु और शुक्र) लग्न में धन, धान्य आदि सब सुख प्रदान करते हैं। (२) द्वितीय भाव में पापग्रह अनिष्ट फल देने वाले और शुभ ग्रह धन की वृद्धि करने वाले होते हैं। (३) तृतीय भाव में शुभ और पाप सब ग्रह पुत्र-पौत्रादि सुख को बढ़ाने वाले होते हैं। (४) चतुर्थ भाव में शुभ ग्रह शुभ-फल और पापग्रह पाप-फल देते हैं। (५) पञ्चम भाव में पापग्रह कष्टदायक और शुभ ग्रह पुत्रादि सुख देने वाले होते हैं। (६) षष्ठ भाव में शुभ ग्रह शत्रु वृद्धि करने वाले और पापग्रह शत्रु के लिए घातक होते हैं। (७) सप्तम भाव में पापग्रह रोगकारक और शुभ ग्रह शुभ फल देने वाले होते हैं। (८) अष्टम भाव में शुभग्रह और पापग्रह सभी कर्ता (यजमान) के लिए घातक होते हैं। (९) नवम भाव में पापग्रह हों तो वे धर्म को नष्ट करते हैं और शुभग्रह शुभ फल देने वाले होते हैं। (१०) दशम भाव में पापग्रह दुःखदायक और शुभ ग्रह सुयश की वृद्धि करने वाले होते हैं। (११) एकादश स्थान में पाप और शुभ सब ग्रह सब प्रकार से लाभकारक ही होते हैं। (१२) लग्न से द्वादश स्थान में पाप या शुभ सभी ग्रह व्यय को बढ़ाते हैं ॥५३१-५३६॥ प्रतिष्ठा में अन्य विशेष बात—प्रतिष्ठा कराने वाले पुरोहित (या आचार्य) को अर्थज्ञान न हो तो यजमान का अनिष्ट होता है। मन्त्रों का अशुद्ध उच्चारण हो तो ऋत्विजों (यज्ञ करने वालों) का और कर्म विधि- हीन हो तो कर्ता की स्त्री का अनिष्ट होता है। इसलिए नारद ! देवप्रतिष्ठा के समान दूसरा शत्रु भी नहीं है। यदि लग्न में अधिक गुण हों और थोड़े-से दोष हों तो उसमें देवताओं की प्रतिष्ठा कर लेनी चाहिए। इससे कर्ता (यजमान) के अभीष्ट मनोरथ की सिद्धि होती है। मुने! अब मैं संक्षेप से ग्राम, मन्दिर तथा गृह आदि के निर्माण की बात बताता हूँ ॥५३७-५३९॥ गृहनिर्माण के विषय में ज्ञातव्य बातें—गृह आदि बनाना हो तो पहले गन्ध, वर्ण, रस तथा आकृति के द्वारा क्षेत्र (भूमि) की परीक्षा कर लेनी चाहिए। यदि उस स्थान की मिट्टी में मधु के समान गन्ध हो तो ब्राह्मणों के, पुष्पसदृश गन्ध हो तो क्षत्रियों के, आम्ल के समान गन्ध हो तो वैश्यों के और मांस की-सी गन्ध हो तो वह स्थान शूद्रों के बसने योग्य जानना चाहिए। वहाँ की मिट्टी का रंग श्वेत हो तो ब्राह्मणों के, लाल हो तो क्षत्रियों के, पीत हो तो वैश्यों के और कृष्ण हो तो वह शूद्रों के निवास के योग्य है। यदि वहाँ की मिट्टी का स्वाद मधुर हो तो ब्राह्मणों के, कडुआ (मिर्च के समान) हो तो क्षत्रियों के, तिक्त हो तो वैश्यों के और कषाय (कसैला) हो तो उस स्थान को शूद्रों के निवास करने योग्य समझना चाहिए ॥५४०-५४१॥ ईशान, पूर्व और उत्तर

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४८६ अत्यन्तवृद्धिदं नृणामीशानप्रागुदक्प्लवम् । अन्यदिक्षु प्लवे तेषां शश्वदत्यन्तहानिदम् ॥५४२॥ समगर्तारत्निमात्रं खनित्वा तव पूरयेत् । अत्यन्तवृद्धिरधिके होने हानिः समे समम् ॥५४३॥ तया निशादौ तत्कृत्वा पानीयेन प्रपूरयेत् । प्रातर्दृष्टे जले वृद्धिः समं पंके क्षयः क्षये ॥५४४॥ एवं लक्षणसंयुक्तं सम्यक् क्षेत्रं समीक्ष्यते । दिङ्साधनाय तन्मध्ये समं मंडलमालिखेत् ॥५४५॥ द्वादशांगुलकं शंकुं स्थापयेत्तत्र दिक्क्रमम् । चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे षड्वर्गपरिशोधिते ॥५४६॥ रेखामार्गे च कर्त्तव्यं प्राकारं सुमनोहरम् । आयामेषु चतुर्दिक्षु प्रागादिषु च सत्स्वपि ॥५४७॥ अष्टावष्टौ प्रतिदिशं द्वाराणि स्युर्यथाक्रमम् । प्रदक्षिणक्रमात्तेषाममूनि च फलानि वै ॥५४८॥ हानिर्नैःस्व्थं धनप्राप्तिर्नृपपूजा महद्धनम् । अतिचौर्य्यमतिकोधो भीतिर्दिशि शचीपतेः ॥५४९॥ निधनं बंधनं भीतिरर्थाप्तिर्धनवर्धनम् । अनातंकं व्याधिमयं निःसत्त्वं दक्षिणादिशि ॥५५०॥ पुत्रहानिः शत्रुवृद्धिलक्ष्मीप्राप्तिर्द्धनागमः । सौभाग्यमतिदौर्भाग्यं दुःखं शोकश्च पश्चिमे ॥५५१॥ कलहहानिर्निःसत्त्वं हानिर्द्धान्यधनागमः । संपद्वृद्धिर्मार्सभीतिरामयं दिशि शीतगोः ॥५५२॥ दिशा में प्लव (नीची) भूमि सब के लिए अत्यन्त वृद्धि देने वाली होती है । अन्य दिशाओं में प्लव (नीची) भूमि सब के लिए हानि करने वाली होती है ॥५४२॥ गृह भूमि परीक्षा—जिस स्थान में घर बनाना हो वहाँ अरत्नि (कोहिनी से कनिष्ठा अंगुलि तक) के बराबर लंबाई, चौड़ाई और गहराई करके कुण्ड बनाये । फिर उसे उसी खोदी हुई मिट्टी से भरे। यदि भरने से मिट्टी शेष बच जाय तो उस स्थान में वास करने से सम्पत्ति को वृद्धि होती है । यदि मिट्टी कम हो जाय तो वहाँ रहने से सम्पत्ति की हानि होतो है। यदि सारी मिट्टी से वह कुण्ड भर जाय तो मध्यम फल जानना चाहिए ॥५४३॥ अथवा उसी प्रकार अरत्नि के माप का कुण्ड बनाकर सायंकाल उसको जल से पूरित कर दे और प्रातःकाल देखे; यदि कुण्ड में जल अवशिष्ट हो तो उस स्थान में वृद्धि होगी। यदि कोचड़ (गोली मिट्टी) ही बची हो तो मध्यम फल है और यदि कुण्ड की भूमि में दरार पड़ गयी हो तो उस स्थान में वास करने से हानि होगी ॥५४४॥ मुने ! इस प्रकार निवास करने योग्य स्थान की भली भांति परीक्षा करके उक्त लक्षणयुक्त भूमि में दिक्साधन (दिशाओं का ज्ञान) करने के लिए समतल भूमि में वृत्त (गोल रेखा) बनाये । वृत्त के मध्यभाग में द्वादशांगुल शंकु (बारह विभाग या पर्व से युक्त एक सोधी लकड़ी) की स्थापना करे और दिक्साधनविधि से दिशाओं का ज्ञान करे । फिर कर्ता के नाम के अनुसार षड्वर्ग शुभ क्षेत्रफल (वास्तुभूमि की लम्बाई-चौड़ाई का गुणनफल) ठीक करके अभीष्ट लम्बाई-चौड़ाई के बराबर (दिशासाधित रेखानुसार) चतुर्भुज बनाये । उस चतुर्भुज रेखामार्ग पर सुन्दर प्रकार (चहारदीवारी) बनाये। लम्बाई और चौड़ाई में पूर्व आदि चारो दिशाओं में आठ-आठ द्वार के भाग होते हैं। प्रदक्षिण क्रम से उनके निम्नांकित फल हैं। (जैसे पूर्वभाग में उत्तर से दक्षिण तक) १. हानि, २. निर्धनता, ३. धनलाभ, ४. राजसम्मान, ५. बहुत धन, ६. अतिचोरी, ७. अतिक्रोध तथा ८. भय—ये क्रमशः आठ द्वारों के फल हैं । दक्षिण दिशा में क्रमशः १. मरण, २. बन्धन, ३. भय, ४. धनलाभ, ५. धनवृद्धि, ६. निर्भयता, ७. व्याधिभय तथा ८. निर्बलता—ये (पूर्व से पश्चिम तक के) आठ द्वारों के फल हैं। पश्चिम दिशा में क्रमशः १. पुत्रहानि, २. शत्रुवृद्धि, ३. लक्ष्मीप्राप्ति, ४. धनलाभ, ५. सौभाग्य, ६. अतिदौर्भाग्य, ७. दुःख तथा ८. शोक—ये दक्षिण से उत्तर तक के आठ द्वारों के फल ६२ ना० पु०

४६० नारदीयपुराणम् एवं गृहादिषु द्वारविस्ताराद्विगुणोच्छ्रितम् । पश्चिमे दक्षिणे वापि कपाटं स्थापयेद्गृहे ॥५५३॥ प्राकारांतःक्षिति कुर्यादेकाशीतिपदं यथा । मध्ये नवपदे ब्रह्मस्थानं तदतिनिन्दितम् ॥५५४॥ द्वात्रिंशदंशाः प्राकारसमीपांशाः समंततः । पिशाचांशे गृहारंभो दुःखशोकभयप्रदः ॥५५५॥ शेषांशाः स्युश्च निर्माणे पुत्रपौत्रधनप्रदाः । शिराः स्युर्वास्तुतो रेखा दिग्विदिग्मध्यसंभवाः ॥५५६॥ ब्रह्मभागाः पिशाचांशाः शिराणां यत्र संहतिः । तत्र तत्र विजातीयाद्वास्तुनो मर्मसंधयः ॥५५७॥ मर्माणि संधयो नेष्टाः स्वस्थेऽप्येवं निवेशने । सौम्यफाल्गुनवैशाखमाघश्रावणकार्तिकाः ॥५५८॥ मासाः स्युगृ हनिर्माणे पुत्रारोग्यधनप्रदाः । अकारादिषु भागेषु दिक्षु प्रागादिषु क्रमात् ॥५५६॥ खरोऽश्वोऽथ हरिः श्वाख्यः सर्पाखुगजशशकाः । दिग्दर्गाणामियं योनिः स्ववर्गात्पंचमो रिपुः ॥५६०॥ साध्यवर्गः पुरः स्थाप्य पृष्ठतः साधकं न्यसेत् । व्यत्यये नाशनं तस्य ऋणमल्पं धनाच्छुभम् ॥५६१॥ आरभ्य साधकं धिष्ण्यं साध्यं यावच्चतुर्गुणम् । विभजेत्सप्तभिः शेषं साधकस्य धनं तदा ॥५६२॥ हैं। इसी प्रकार उत्तर दिशा में (पश्चिम से पूर्व तक) १. स्त्रीहानि, २. निर्बलता, ३. हानि, ४. धान्यलाभ, ५. धनागम, ६. सम्पत्तिवृद्धि, ७. भय तथा ८. रोग-ये क्रमशः आठ द्वारों के फल हैं ॥५४५-५५३॥ इसी तरह पूर्व आदि दिशाओं के गृहादि में भी द्वार और उसके फल समझने चाहिए। द्वार का जितना विस्तार (चौड़ाई) हो, उससे दुगुनी ऊंची किंवाड़े बनाकर उन्हें घर में (चहार दीवारी के) दक्षिण या पश्चिम भाग में लगाये ॥५५३॥ चहारदीवारी के भीतर जितनी भूमि हो, उसके इक्यासी पद (समान खण्ड) बनाये। उनके बीच के नौ खण्डों में ब्रह्मा का स्थान है। यह गृहनिर्माण में अत्यन्त निन्दित है। चहारदीवारी से मिले हुए जो चारों ओर के ३२ भाग हैं, वे पिशाचांश हैं। उनमें घर बनाने से दुःख, शोक और भय प्राप्त होता है। शेष अंशों (पदों) में घर बनाये जायं तो पुत्र, पौत्र और धन की वृद्धि होती है ॥५५४-५५५॥ वास्तु भूमि की दिशा-विदिशाओं की रेखा वास्तु की शिरा कहलाती है। एवं ब्राह्मभाग, पिशाचभाग तथा शिरा का जहाँ-जहाँ योग हो वहाँ-वहाँ वास्तु की मर्मसन्धि वह मर्मसन्धि तथा गृहारम्भ तथा गृह-प्रवेश में अनिष्टकारक समझी जाती है ॥५५६-५५७॥ गृहारम्भ में प्रशस्त मास--मार्गशीर्ष, फाल्गुन, वैशाख, माघ, श्रावण और कार्तिक-ये मास गृहारंभ में पुत्र, आरोग्य और धन देने वाले होते हैं ॥५५८॥ दिशाओं में वर्ग और वर्गेश--पूर्व आदि आठों दिशाओं में क्रमशः अकारादि आठ वर्ग होते हैं। इन दिशा वर्गों के क्रमशः गरुड, मार्जार, सिंह, श्वान, सर्प, मूषक, गज और शशक (खरगोश) ये योनियाँ होती हैं। इन योनि वर्गों में अपने से पांचवे वर्ग वाले परस्पर शत्रु होते हैं ॥५५९-५६०॥ जिस ग्राम में या जिस स्थान में घर बनाना हो, वह साध्य तथा घर बनाने वाला साधक, कर्ता और भर्ता आदि कहलाता है। इसको ध्यान में रखना चाहिए ।) साध्य (ग्राम) की वर्गसंख्या को लिखकर, उसके पीछे (बायें भाग में) साधक की वर्गसंख्या लिखे। उसमें आठ का भाग देकर जो शेष बचे, वह साधक का धन होता है। इसके विपरीत विधि से (अर्थात् साधक की वर्गसंख्या के बायें भाग में साध्य की वर्गसंख्या रखकर जो संख्या बने, उसमें आठ से भाग देकर शेष) साधक का ऋण होता है। इस प्रकार ऋण की संख्या अल्प और धन-संख्या अधिक हो तो शुभ माने (अर्थात् उस ग्राम या उस दिशा में बनाया हुआ घर रहने योग्य है, ऐसा समझे) ॥५६१॥ इसी प्रकार, साधक के नक्षत्र से साध्य के नक्षत्र तक गिनकर जो संख्या हो उसको चार से गुणा करके गुणनफल में सात से भाग दे तो शेष साधक का धन होता है ॥५६२॥