बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४८७ नैवं कदाचिदुद्वाहो नैकदा मुंडनद्वयम् । दिवाजातस्तु पितरं रात्रौ तु जननीं तथा ॥५१८॥ आत्मानं संध्ययोर्हंति नास्ति गंडे विपर्ययः । सुतः सुता वा नियतं श्वशुरं हंति मूलजः ॥५१९॥ तदंत्यपादजो नैव तथाश्लेषाद्यपादजः । ज्येष्ठांत्यपादजौ ज्येष्ठं बालो हंति न बालिका ॥५२०॥ न बालिकांबुमूलर्क्षे मातरं पितरं तथा । सैंद्री धवाग्रजं हंति देवरं तु द्विदैवजा ॥५२१॥ आरभ्योद्वाहदिवसात् षष्ठे वाप्यष्टमे दिने । वधूप्रवेशः संपत्त्यै दशमे सप्तमे दिने ॥५२२॥ हायनद्वितयं जन्मलग्नदिवसानपि । संत्यज्य हातिशुक्रेऽपि यात्रा वैवाहिकी शुभा ॥५२३॥ श्रीप्रदं सर्वगीर्वाणस्थापनं चोत्तरायणे । गीर्वाणपुर्वगीर्वाणमतिनोद्धृश्यमानयोः ॥५२४॥ विचित्रैत्रेव्वेव मासेषु माघादिषु च पंचसु । शुक्लपक्षेषु कृष्णेषु तदादिष्वष्टसु शुभम् ॥५२५॥ दिनेषु यस्य देवस्य या तिथस्तत्र तस्य च । द्वितीयादिद्वये पंचम्यादितस्तिसृषु क्रमात् ॥५२६॥ दशम्यादेश्चतसृषु पौर्णमास्यां विशेषतः । व्युत्तगदितिचंद्रांत्यहस्तत्रयगुरूडुषु ॥५२७॥ साश्विधातृजलाधीशहरिमित्रवसुष्वपि । कुजवर्जितवारेषु कर्तुः सूर्ये बलप्रदे ॥५२८॥ चंद्रताराबलोपेते पूर्वाह्णे शोभने दिने । शुभलग्ने शुभांशे च कर्तुं नं निधनोदये ॥५२९॥ राशयः सकलाः श्रेष्ठाः शुभग्रहयुतेक्षिताः । पंचाष्टके शुभे लग्ने नैधने शुद्धिसंयुते ॥५३०॥ गण्डान्तदोष--पूर्वकथित गण्डान्त में यदि दिन में बालक का जन्म हो तो वह पिता का, रात्रि में जन्म हो तो माता का और संध्या (सायं या प्रातः) काल में जन्म हो तो वह अपने शरीर के लिए घातक होता है। गण्ड का यह परिमाण अन्यथा नहीं होता है। मूल में उत्पन्न होने वाली संतान पुत्र हो या कन्या, श्वशुर के लिए घातक होती है, किन्तु मूल के चतुर्थ चरण में जन्म लेने वाला बालक श्वशुर का विनाशक नहीं होता है। अश्लेषा के प्रथम चरण में जन्म लेने वाला बालक भो पिता का या श्वशुर का विनाशक नहीं होता है। ज्येष्ठा के अन्तिम चरण में उत्पन्न बालक हो श्वशुर के लिए घातक होता है, कन्या नहीं। इसी प्रकार पूर्वाषाढ या मूल में उत्पन्न कन्या भो माता या पिता का नाश करने वाली नहीं होती है। ज्येष्ठा नक्षत्र में उत्पन्न कन्या अपने पति के बड़े भाई के लिए और विशाखा में जन्म लेने वाली कन्या अपने देवर के लिए घातक होती है ॥५१८-५२१॥ वधू प्रवेश - विवाह के दिन से ६,८,१० और ७ वें दिन में वधू प्रवेश (पति-गृह में प्रथम प्रवेश) हो तो सम्पत्ति की वृद्धि होती है। द्वितीय वर्ष, जन्मराशि, जन्मलग्न और जन्मदिन को छोड़कर अन्य समय में सम्मुख शुक्र रहने पर भो वैवाहिक यात्रा (वधू प्रवेश) शुभ होती है ॥५२२-५२३॥ देव प्रतिष्ठा-उत्तरायण में, बृहस्पति और शुक्र उदित हों तो चैत्र को छोड़कर माघ आदि पाँच मासों के शुक्ल पक्ष में और कृष्णपक्ष में भी आरंभ से आठ दिन तक सब देवताओं की स्थापना शुभदायक होती है। जिस देवता की जो तिथि है उसमें उस देवता को और २, ३, ५, ६, ७, १०, ११, १२, १३ तथा पूर्णिमा-इन तिथियों में सब देवताओं की स्थापना शुभ होती है। तीनों उत्तरा, पुनर्वसु, मृगशिरा, रेवती, हस्त, चित्रा, स्वाती, पुष्य, अश्विनी, रोहिणी, शतभिषा, श्रवण, अनुराधा और धनिष्ठा--इन नक्षत्रों में तथा मंलवार को छोड़कर अन्य वारों में देव-प्रतिष्ठा करनी चाहिए । स्थापना करने वाले (यजमान) के लिए सूर्य, तारा और चन्द्रमा बलवान् हों, उस दिन के पूर्वाह्न में, शुभ समय, शुभ लग्न और शुभ नवमांश में तथा यजमान की जन्मराशि से अष्टम राशि को छोड़कर अन्य लग्नों में देवताओं की प्रतिष्ठा शुभ होती है ॥५२४-५२६॥ मेष आदि सब राशियां शुभग्रह से युक्त या दृष्ट हों तो देवस्थापन के लिए श्रेष्ठ समझी जाती हैं। प्रत्येक कार्य में पंचांग (तिथि, वार, नक्षत्र, भोग और करण) शुभ होने चाहिए और लग्न से अष्टम स्थान भी शुद्ध (ग्रहवर्जित) होना आवश्यक है ॥५३०॥ (१) लग्न में चन्द्रमा, सूर्य, मंगल, राहु, केतु और शनि कर्ता के