बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४८८ नारदीयपुराणम् लग्नस्थाश्चन्द्रसूर्यारंराहुकेत्वर्कसूनवः । कर्तुर्मृत्युप्रदाश्चान्ये धनधान्यसुखप्रदाः ॥५३१॥ द्वितीये नेष्टदाः पापाः सौम्याश्चंद्रश्चवित्तदाः । तृतीये निखिलाः खेटाः पुत्रपौत्रसुखप्रदाः ॥५३२॥ चतुर्थे सुखदाः सौम्याः क्रूराः खेटाश्च दुःखदाः । ग्लानिदाः पंचमे क्रूराः सौम्याः पुत्रसुखप्रदाः ॥५३३॥ षष्ठे शुभाः शत्रुदाः स्युः पापाः शत्रुक्षयंकराः । व्याधिदाः सप्तमे पापाः सौम्याः शुभफलप्रदाः ॥५३४॥ अष्टमस्थाः खगाः सर्वे कर्तुर्मृत्युप्रदायकाः । धर्मे पापा घ्नन्ति सौम्याः शुभदा मंगलप्रदाः ॥५३५॥ कर्मगा दुःखदाः पापाः सौम्याश्चंद्रश्च कीर्तिदाः । लाभस्थानगताः सर्वे भूरिलाभप्रदा ग्रहाः ॥५३६॥ व्ययस्थानगताः शश्वद्बहुव्ययकरा ग्रहाः । हंत्यर्थहीनाः कर्तारं मंत्रहीनास्तु ऋत्विजम् ॥५३७॥ स्त्रियं लक्षणहीनास्तु न प्रतिष्ठासमो रिपुः । गुणाधिकतरे लग्ने दोषः स्वल्पतरो यदि ॥५३८॥ सुराणां स्थापनं तत्र कर्तुरिष्टार्थसिद्धिदम् । निर्माणायतनग्रामगृहादीनां समासतः ॥५३९॥ क्षेत्रमादौ परीक्षेत गंधवर्णरसांशकैः । मधुपुष्पाम्लपिशितगंधं विप्रानुपूर्वकम् ॥५४०॥ सितं रक्तं च हरितं कृष्णवर्णं यथाक्रमम् । मधुरं कटुकं तिक्तं कषायंकरसं क्रमात् ॥५४१॥ लिए घातक होते हैं। अन्य (बुध, गुरु और शुक्र) लग्न में धन, धान्य आदि सब सुख प्रदान करते हैं। (२) द्वितीय भाव में पापग्रह अनिष्ट फल देने वाले और शुभ ग्रह धन की वृद्धि करने वाले होते हैं। (३) तृतीय भाव में शुभ और पाप सब ग्रह पुत्र-पौत्रादि सुख को बढ़ाने वाले होते हैं। (४) चतुर्थ भाव में शुभ ग्रह शुभ-फल और पापग्रह पाप-फल देते हैं। (५) पञ्चम भाव में पापग्रह कष्टदायक और शुभ ग्रह पुत्रादि सुख देने वाले होते हैं। (६) षष्ठ भाव में शुभ ग्रह शत्रु वृद्धि करने वाले और पापग्रह शत्रु के लिए घातक होते हैं। (७) सप्तम भाव में पापग्रह रोगकारक और शुभ ग्रह शुभ फल देने वाले होते हैं। (८) अष्टम भाव में शुभग्रह और पापग्रह सभी कर्ता (यजमान) के लिए घातक होते हैं। (९) नवम भाव में पापग्रह हों तो वे धर्म को नष्ट करते हैं और शुभग्रह शुभ फल देने वाले होते हैं। (१०) दशम भाव में पापग्रह दुःखदायक और शुभ ग्रह सुयश की वृद्धि करने वाले होते हैं। (११) एकादश स्थान में पाप और शुभ सब ग्रह सब प्रकार से लाभकारक ही होते हैं। (१२) लग्न से द्वादश स्थान में पाप या शुभ सभी ग्रह व्यय को बढ़ाते हैं ॥५३१-५३६॥ प्रतिष्ठा में अन्य विशेष बात—प्रतिष्ठा कराने वाले पुरोहित (या आचार्य) को अर्थज्ञान न हो तो यजमान का अनिष्ट होता है। मन्त्रों का अशुद्ध उच्चारण हो तो ऋत्विजों (यज्ञ करने वालों) का और कर्म विधि- हीन हो तो कर्ता की स्त्री का अनिष्ट होता है। इसलिए नारद ! देवप्रतिष्ठा के समान दूसरा शत्रु भी नहीं है। यदि लग्न में अधिक गुण हों और थोड़े-से दोष हों तो उसमें देवताओं की प्रतिष्ठा कर लेनी चाहिए। इससे कर्ता (यजमान) के अभीष्ट मनोरथ की सिद्धि होती है। मुने! अब मैं संक्षेप से ग्राम, मन्दिर तथा गृह आदि के निर्माण की बात बताता हूँ ॥५३७-५३९॥ गृहनिर्माण के विषय में ज्ञातव्य बातें—गृह आदि बनाना हो तो पहले गन्ध, वर्ण, रस तथा आकृति के द्वारा क्षेत्र (भूमि) की परीक्षा कर लेनी चाहिए। यदि उस स्थान की मिट्टी में मधु के समान गन्ध हो तो ब्राह्मणों के, पुष्पसदृश गन्ध हो तो क्षत्रियों के, आम्ल के समान गन्ध हो तो वैश्यों के और मांस की-सी गन्ध हो तो वह स्थान शूद्रों के बसने योग्य जानना चाहिए। वहाँ की मिट्टी का रंग श्वेत हो तो ब्राह्मणों के, लाल हो तो क्षत्रियों के, पीत हो तो वैश्यों के और कृष्ण हो तो वह शूद्रों के निवास के योग्य है। यदि वहाँ की मिट्टी का स्वाद मधुर हो तो ब्राह्मणों के, कडुआ (मिर्च के समान) हो तो क्षत्रियों के, तिक्त हो तो वैश्यों के और कषाय (कसैला) हो तो उस स्थान को शूद्रों के निवास करने योग्य समझना चाहिए ॥५४०-५४१॥ ईशान, पूर्व और उत्तर