भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

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षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४८६ अत्यन्तवृद्धिदं नृणामीशानप्रागुदक्प्लवम् । अन्यदिक्षु प्लवे तेषां शश्वदत्यन्तहानिदम् ॥५४२॥ समगर्तारत्निमात्रं खनित्वा तव पूरयेत् । अत्यन्तवृद्धिरधिके होने हानिः समे समम् ॥५४३॥ तया निशादौ तत्कृत्वा पानीयेन प्रपूरयेत् । प्रातर्दृष्टे जले वृद्धिः समं पंके क्षयः क्षये ॥५४४॥ एवं लक्षणसंयुक्तं सम्यक् क्षेत्रं समीक्ष्यते । दिङ्साधनाय तन्मध्ये समं मंडलमालिखेत् ॥५४५॥ द्वादशांगुलकं शंकुं स्थापयेत्तत्र दिक्क्रमम् । चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे षड्वर्गपरिशोधिते ॥५४६॥ रेखामार्गे च कर्त्तव्यं प्राकारं सुमनोहरम् । आयामेषु चतुर्दिक्षु प्रागादिषु च सत्स्वपि ॥५४७॥ अष्टावष्टौ प्रतिदिशं द्वाराणि स्युर्यथाक्रमम् । प्रदक्षिणक्रमात्तेषाममूनि च फलानि वै ॥५४८॥ हानिर्नैःस्व्थं धनप्राप्तिर्नृपपूजा महद्धनम् । अतिचौर्य्यमतिकोधो भीतिर्दिशि शचीपतेः ॥५४९॥ निधनं बंधनं भीतिरर्थाप्तिर्धनवर्धनम् । अनातंकं व्याधिमयं निःसत्त्वं दक्षिणादिशि ॥५५०॥ पुत्रहानिः शत्रुवृद्धिलक्ष्मीप्राप्तिर्द्धनागमः । सौभाग्यमतिदौर्भाग्यं दुःखं शोकश्च पश्चिमे ॥५५१॥ कलहहानिर्निःसत्त्वं हानिर्द्धान्यधनागमः । संपद्वृद्धिर्मार्सभीतिरामयं दिशि शीतगोः ॥५५२॥ दिशा में प्लव (नीची) भूमि सब के लिए अत्यन्त वृद्धि देने वाली होती है । अन्य दिशाओं में प्लव (नीची) भूमि सब के लिए हानि करने वाली होती है ॥५४२॥ गृह भूमि परीक्षा—जिस स्थान में घर बनाना हो वहाँ अरत्नि (कोहिनी से कनिष्ठा अंगुलि तक) के बराबर लंबाई, चौड़ाई और गहराई करके कुण्ड बनाये । फिर उसे उसी खोदी हुई मिट्टी से भरे। यदि भरने से मिट्टी शेष बच जाय तो उस स्थान में वास करने से सम्पत्ति को वृद्धि होती है । यदि मिट्टी कम हो जाय तो वहाँ रहने से सम्पत्ति की हानि होतो है। यदि सारी मिट्टी से वह कुण्ड भर जाय तो मध्यम फल जानना चाहिए ॥५४३॥ अथवा उसी प्रकार अरत्नि के माप का कुण्ड बनाकर सायंकाल उसको जल से पूरित कर दे और प्रातःकाल देखे; यदि कुण्ड में जल अवशिष्ट हो तो उस स्थान में वृद्धि होगी। यदि कोचड़ (गोली मिट्टी) ही बची हो तो मध्यम फल है और यदि कुण्ड की भूमि में दरार पड़ गयी हो तो उस स्थान में वास करने से हानि होगी ॥५४४॥ मुने ! इस प्रकार निवास करने योग्य स्थान की भली भांति परीक्षा करके उक्त लक्षणयुक्त भूमि में दिक्साधन (दिशाओं का ज्ञान) करने के लिए समतल भूमि में वृत्त (गोल रेखा) बनाये । वृत्त के मध्यभाग में द्वादशांगुल शंकु (बारह विभाग या पर्व से युक्त एक सोधी लकड़ी) की स्थापना करे और दिक्साधनविधि से दिशाओं का ज्ञान करे । फिर कर्ता के नाम के अनुसार षड्वर्ग शुभ क्षेत्रफल (वास्तुभूमि की लम्बाई-चौड़ाई का गुणनफल) ठीक करके अभीष्ट लम्बाई-चौड़ाई के बराबर (दिशासाधित रेखानुसार) चतुर्भुज बनाये । उस चतुर्भुज रेखामार्ग पर सुन्दर प्रकार (चहारदीवारी) बनाये। लम्बाई और चौड़ाई में पूर्व आदि चारो दिशाओं में आठ-आठ द्वार के भाग होते हैं। प्रदक्षिण क्रम से उनके निम्नांकित फल हैं। (जैसे पूर्वभाग में उत्तर से दक्षिण तक) १. हानि, २. निर्धनता, ३. धनलाभ, ४. राजसम्मान, ५. बहुत धन, ६. अतिचोरी, ७. अतिक्रोध तथा ८. भय—ये क्रमशः आठ द्वारों के फल हैं । दक्षिण दिशा में क्रमशः १. मरण, २. बन्धन, ३. भय, ४. धनलाभ, ५. धनवृद्धि, ६. निर्भयता, ७. व्याधिभय तथा ८. निर्बलता—ये (पूर्व से पश्चिम तक के) आठ द्वारों के फल हैं। पश्चिम दिशा में क्रमशः १. पुत्रहानि, २. शत्रुवृद्धि, ३. लक्ष्मीप्राप्ति, ४. धनलाभ, ५. सौभाग्य, ६. अतिदौर्भाग्य, ७. दुःख तथा ८. शोक—ये दक्षिण से उत्तर तक के आठ द्वारों के फल ६२ ना० पु०