भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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४८६ नारदीयपुराणम् चतुस्त्रिद्वयंघ्रिमोत्थायाः कन्यायाश्चाश्विभात्क्रमात् । वह्निभादिषुखान्नाडीस्त्रिचतुःपंचपर्वसु ॥५०६॥ गणयेत्संख्यया चैकनाड्यां मृत्युर्न पार्श्वयोः । प्राजापत्यब्राह्मदैवा विवाहाश्चार्षसंयुताः ॥५१०॥ उक्तकाले तु कर्तव्याश्चत्वारः फलदायकाः । गांधर्वासुरपैशाचराक्षसाद्यास्तु सर्वदा ॥५११॥ चतुर्थमभिजिल्लग्नमुदयर्क्षाच्च सप्तमम् । गोधूलिकं तदुभयं विवाहे पुत्रपौत्रदम् ॥५१२॥ प्राच्यानां च कलिंगानां मुख्यं गोधूलिकं स्मृतम् । अभिजित्सर्वदेशेषु मुख्यो दोषविनाशकृत् ॥५१३॥ मध्यंदिनगते भानौ मुहूर्तोऽभिजदाह्वयः । नाशयत्यखिलान्दोषान्पिनाकी त्रिपुरं यथा ॥५१४॥ पुत्रोद्वाहात्परं पुत्रीविवाहो न ऋतुत्रये । न त्रयोवंतमुद्वाहान्मंगले नान्यन्मंगलम् ॥५१५॥ विवाहश्चैकजन्यानां षण्मासाभ्यंतरे यदि । असंशयं त्रिभिर्वर्षैस्तत्रैका विधवा भवेत् ॥५१६॥ प्रत्युद्वाहो नैव कार्यो नैकस्मै दुहितृद्वयम् । न चैकजन्ययोः पुंसोरेकजन्ये तु कन्यके ॥५१७॥ नाडी-विचार-चार चरण वाले नक्षत्र (अश्विनी, भरणी, रोहिणी, आर्द्रा, पुष्य, अश्लेषा मघा, पूर्वा फाल्गुनी, हस्त, स्वाती, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वा षाढ़, श्रवण, शतभिषा, उत्तर भाद्रपद, रेवती--इन) में उत्पन्न कन्या के लिए अश्विनी से आरंभ करके रेवती तक तीन पर्वों पर क्रम-उत्क्रम से गिनकर नाड़ी समझै। तीन चरण वाले (कृत्तिका, पुनर्वसु, उत्तरा फाल्गुनी, विशाखा, उत्तराषाढ़ ओर पूर्वाभाद्रपद) नक्षत्रों में उत्पन्न कन्या के लिए कृत्तिका से लेकर भरणी तक क्रम-उत्क्रम से चार पर्वों पर गिनकर नाड़ी का ज्ञान प्राप्त करे तथा दो चरणों वाले (मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा) नक्षत्रों में उत्पन्न कन्या की नाड़ी जानने के लिए मृगशिरा से लेकर रोहिणी तक पाँच पर्वों पर क्रम-उत्क्रम से गिने । यदि वर और वधू दोनों के नक्षत्र एक पर्व पर पड़े तो वे उनके लिए घातक हैं और भिन्न पर्वों पर पड़े तो शुभ होता है ॥५०९॥ विवाहों के भेद-ऊपर बताये हुए शुभ समय में (१) प्राजापत्य, (२) ब्राह्म, (३) दैव और (४) आर्ष ये- चार प्रकार के विवाह करने चाहिए। ये ही चारों विवाह उपयुक्त फल देने वाले होते हैं। इससे अतिरिक्त जो गान्धर्व, आसुर, पैशाच तथा राक्षस विवाह है, वे तो सब समय समान ही फल देने वाले होते हैं ॥५१०-५११॥ अभिजित्-और गोधूलि-लग्न--सूर्योदयकाल में जो लग्न रहता है, उससे चतुर्थ लग्न का नाम अभिजित है और सातवाँ गोधूलि-लग्न कहलाता है। ये दोनों विवाह में पुत्र-पौत्र प्रदान करने वाले होते हैं ॥५१२॥ पूर्व तथा कलिंग देशवासियों के लिए गोधूलि-लग्न प्रधान है और अभिजित् लग्न तो सब देशों के लिए मुख्य कहा गया है, क्योंकि वह सब दोषों का नाश करने वाला है ॥५१३॥ अभिजित्-प्रशंसा-सूर्य के मध्य आकाश में जाने पर अभिजित्-मुहूर्त होता है, वह समस्त दोषों को वैसे ही नष्ट कर देता है, जैसे त्रिपुरासुर को शंकर ने नष्ट किया था ॥५१४॥ पुत्र का विवाह करने के बाद छह मासों के भीतर पुत्री का विवाह नहीं करना चाहिए। एक पुत्र या पुत्री का विवाह करने के बाद दूसरे पुत्रका उपनयन भी नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार एक मंगल कार्य करने के बाद छह मासों के भीतर दूसरा मंगल कार्य नहीं करना चाहिए। एक गर्भ से उत्पन्न दो कन्याओं का विवाह यदि छह मास के भीतर हो तो निश्चय ही तीन वर्ष के भीतर उसमें से एक विधवा होती है ॥५१५-५१६॥ अपने पुत्र के साथ जिसकी पुत्री का विवाह हो, फिर उसके पुत्र के साथ अपनी पुत्री का विवाह करना 'प्रत्युद्वाह' कहलाता है । ऐसा कभी नहीं करना चाहिए तथा किसी एक ही वर को अपनी दो कन्यायें नहीं देनी चाहिए। दो सहोदर वरों को दो सहोदर कन्यायें नहीं देनी चाहिए। दो सहोदरों का एक ही दिन (एक साथ) विवाह या मुण्डन नहीं करना चाहिए ॥५१७॥