भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४८५ इति मर्त्यगणे ज्ञेयः स्यादमर्त्यगणः परः । हर्यदित्यार्कवात्वंत्यमित्राष्ट्विज्येंदुतारकाः ॥५००॥ रक्षोगणः पितृत्वाष्ट्रद्विदैवाग्नींद्रतारकाः । वसुवारीशमूलाहितारकाभिषु तास्ततः ॥५०१॥ दंपत्योर्जन्मभे चैकगणे प्रीतिरनेकधा । मध्यमा देवमर्त्यानां राक्षसानां तयोर्मृतिः ॥५०२॥ मृत्युः षष्टाष्टके पंचनवमे त्वनपत्यता । नैःस्वं द्विद्वीदशेऽन्येषु दंपत्योः प्रीतिरुत्तमा ॥५०३॥ एकाधिपे मित्रभावे शुभदं पाणिपीडनम् । द्विद्वादशे त्रिकोणे च न कदाचित्षडष्टके ॥५०४॥ अश्वेभमेषसर्पाहिह्योतुमेषोतुमूषकाः । आखुगोमहिषव्याघ्रकालीव्याघ्रमृगद्वयम् ॥५०५॥ श्वानः कपिर्बभ्रुयुगं कपिर्सिहतुरंगमाः । सिंहगोदंतिनो भानां योनयः स्युर्यथाश्विभात् ॥५०६॥ श्वैणं बभ्रूरगं मेषवानरौ सिंहवारणम् । गोव्याघ्रमाखुमार्जारं महिषाश्वं च शात्रवम् ॥५०७॥ झषालिकर्कटा विप्रास्तदूर्ध्वाः क्षत्रियादयः । पुंवर्णराशेः स्त्रीराशौ सति हीने यथाशुभम् ॥५०८॥ मृगशिरा—ये देवगण हैं तथा मघा, चित्रा, विशाखा, कृत्तिका, ज्येष्ठा, धनिष्ठा, शतभिषा, मूल और आश्लेषा— ये नक्षत्र राक्षसगण हैं ॥४९९-५०१॥ वर और कन्या के नक्षत्र किसी एक ही के गण हों तो दोनों में परस्पर सब प्रकार से प्रेम बढ़ता है । एक मनुष्यगण और दूसरे का देवगण होने पर दोनों में मध्यम प्रेम होता है तथा यदि एक का राक्षस और दूसरे का देव या मनुष्यगण हो तो वर-वधू दोनों को मृत्युतुल्य क्लेश प्राप्त होता है ॥५०२॥ राशिकूट--वर और कन्या की राशियों को परस्पर गिनने से यदि वे छठीं और आठवीं संख्या में पड़नी हों तो दोनों के लिए घातक हैं । यदि पांचवीं और नवीं संख्या में हों तो संतान की हानि होती है । यदि दूसरी और बारहवीं संख्या में हों तो वर-वधू दोनों निर्धन होते हैं। इनसे भिन्न संख्या में हों तो दोनों में परस्पर प्रेम होता है ॥५०३॥ परिहार—द्विर्द्वादश (२, १२) और नवपञ्चम अथवा दोष में यदि दोनों की राशियों का एक ही स्वामी हो अथवा दोनों के राशि-स्वामियों में मित्रता हो तो विवाह शुभ है कहा गया है। परन्तु षडष्टक (६, ८) में दोनों के स्वामी एक होने पर भी विवाह शुभदायक नहीं होता है ॥५०४॥ योनि-कूट—१ अश्व, २ गज, ३ मेष, ४ सर्प, ५ सर्प, ६ श्वान, ७ मार्जार, १० मूषक, ११ मूषक १२ गो, १३ महिष, १४ व्याघ्र, १५ महिष, १६ व्याघ्र, १७ मृग, १८ मृग, १६ श्वान, २० वानर, २१ नकुल, २२ नकुल, २३ वानर, २४ सिंह, २५ अश्व, २६ सिंह, २७ गो तथा २८ गज--ये क्रमशः अश्विनो से लेकर रेवती तक (अभि- जित् सहित) अट्ठाईस नक्षत्रों की योनियां हैं ॥५०५-५०६॥ इनमें श्वान और मृग में, नकुल और सर्प में, मेष और वानर में, सिंह और गज में, गो और व्याघ्र में, मूषक और मार्जार में तथा महिष और अश्व में परस्पर शत्रुता होती है ॥५०७॥ वर्ण-कूट—मीन, वृश्चिक और कर्कराशि ब्राह्मण वर्ण हैं, इनके बाद वाले क्रमशः क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण हैं । समान वर्ण के वर और बधू में तो विवाह स्वयंसिद्ध है ही वर की राशि के वर्ण से कन्या की राशि का वर्ण हीन हो तो भी विवाह शुभ होता है । इससे विपरीत (अर्थात् वर की राशि के वर्ण से कन्या की राशि का वर्ण श्रेष्ठ) हो तो अशुभ समझना चाहिए ॥५०८॥