बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४८४ नारदीयपुराणम् दोषदुष्टं सदा कालं सन्निमाष्टुं न शक्यते । अपि धातुरतो ग्राह्यं दोषाल्यत्वं गुणाधिकम् ॥४६०॥ एवं सुलग्ने दंपत्योः कारयेत्सम्यगीक्षणम् । हस्तोच्छ्रितां चतुर्हस्तैश्चतुरस्त्रां समंततः ॥४६१॥ स्तंभैश्चतुर्भिः सुलक्षणैर्वामभागे तु सन्नताम् । समंडपां चतुर्दिक्षु सोपानैरतिशोभिताम् ॥४६२ प्रागुदक्प्रवणां रंभास्तंभैहंसशुकादिभिः । विचित्रितां चित्रकुंभैर्विविधैस्तोरणांकुरैः ॥४६३॥ शृङ्गारपुष्पनिवहैर्वर्णकैः समलंकृताम् । विप्राशीर्वचनैः पुण्यस्त्रीभिर्दिव्यैर्मनोरमाम् ॥४६४॥ वादित्रनृत्यगीताद्यैहृदयानंदिनीं शुभाम् । एवंविधां समारोहेन्मिथुनं स्वाग्निवेदिकाम् ॥४६५॥ अष्टधा राशिकूटं च स्वाहुर्गुणराशयः । राशीशयोनिवर्णाख्यऋक्षवः पुत्रपौत्रदाः ॥४६६॥ एकराशौ पृथग्धिष्ण्ये दंपत्योः पाणिपीडनम् । उत्तमं मध्यमं मित्रं राश्यैकत्वं ययोस्तयोः ॥४६७॥ एकर्क्षे त्वेकराशौ हि विवाहः प्राणहानिदः । स्त्रीधिष्ण्यादाद्यनवके स्त्रीदूरमतिनिंदितम् ॥४६८॥ द्वितीये मध्यमं श्रेष्ठं तृतीये नवके नृभम् । तिस्रः पूर्वोत्तरा धातृयाम्यमाहेशतारकाः ॥४६९॥ विशेष—काल सदा दोषों से दुष्ट होता है; उसे ब्रह्मा भी सर्वथा निर्दोष नहीं बना सकते हैं, इसलिए जिसमें थोड़ा दोष और अधिक गुण हों, ऐसा काल ग्रहण करना चाहिए ॥४९०॥ वेदी और मण्डप—इस प्रकार वर-वधू के लिए शुभप्रद उत्तम समय में श्रेष्ठ लग्न का अनुसन्धान करना चाहिए। तदनन्तर एक हाथ ऊँची, चार हाथ लम्बी और चार हाथ चौड़ी उत्तर दिशा में नत (कुछ नीची) वेदी बनाकर सुन्दर चिकने चार खंभों का एक मण्डप तैयार करे, जिसमें चारों ओर सीढ़ियाँ बनायी गई हों। मण्डप भी पूर्व-उत्तर में निम्न हो। वहाँ चारों तरफ कदलीस्तम्भ गड़े हों। वह मण्डप शुक आदि पक्षियों के चित्रों से सुशोभित हो तथा वेदी नाना प्रकार के मांगलिक चित्रयुक्त कलशों से विचित्र शोभा धारण कर रही हो। भाँति-भाँति के बन्दनवार तथा अनेक प्रकार के फूलों के श्रृंगार से वह स्थान सुसज्जित हो । ऐसे मण्डप के बीच बनी हुई ब्राह्मणों के स्वस्तिवाचनपूर्वक आशीर्वादों, और पुण्यशीला स्त्रियों तथा दिव्य समारोहों से अत्यन्त मनोरम नृत्य, वाद्य और मांगलिक गीतों की ध्वनि से जो हृदय को आनन्द प्रदान करने वाली वेदी पर, वर और वधू को विवाह के लिए बिठाये ॥४९१-४९५॥ वर-वधू की कुण्डली का मिलान-- आठ प्रकार के भकूट, नक्षत्र, राशि, राशिस्वामी, योनि तथा वर्ण आदि सब गुण यदि ऋजु (अनुकूल या शुभ) हों तो ये पुत्र पौत्रादि का सुख प्रदान करने वाले होते हैं ॥४९६॥ वर और कन्या दोनों की राशि और नक्षत्र भिन्न हों तो उन दोनों का विवाह उत्तम होता है। दोनों की राशि भिन्न और नक्षत्र एक हो तो उनका विवाह मध्यम होता है और यदि दोनों का एक ही नक्षत्र, एक ही राशि हो तो उन दोनों का विवाह प्राणसंकट उपस्थित करने वाला होता है ॥४९७॥ स्त्रीदूर-दोष- कन्या के नक्षत्र से प्रथम नवक (नौ नक्षत्रों) के भीतर वर का नक्षत्र हो तो यह 'स्त्रीदूर' नामक दोष कहलाता है, जो अत्यन्त निन्दित है। द्वितीय नवक (१० से १८ तक) के भीतर हो तो मध्यम कहा गया है। यदि तृतीय नवक (१९ से २७ तक) के भीतर हो तो उन दोनों का विवाह श्रेष्ठ कहा गया है ॥४९८॥ गण विचार - पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढ़, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ, उत्तर भाद्रपद, रोहिणी, भरणी और आर्द्रा--ये नक्षत्र मनुष्यगण हैं। श्रवण, पुनर्वसु, हस्त, स्वाती, रेवती, अनुराधा, अश्विनी, पुष्य और