भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४८३ प्रत्यर्कपरिवेषेन्द्रचापांबुधरगर्जनाः । लत्तोपग्रहपाताह्या मासद्ग्धाह्वया तिथिः ॥४७९॥ दग्धलग्नांधबधिरपंगुसंज्ञाश्च राशयः । एवामाद्यास्ततस्तेषां व्यवस्था क्रियतेऽधुना ॥४८०॥ अकालजा भवन्त्येते विद्युन्नीहारवृष्टयः । दोषाय मंगले ननमदोषाग्रैव कालतः ॥४८१॥ बृहस्पतिः केंद्रगतः शुक्नो वा यदि वा बुधः । एकोऽपि दोषनिचयं हरत्येव न संशयः ॥४८२॥ तिर्यक्पंचोर्ध्वगाः पञ्च रेखा द्वे द्वे च कोणयोः । द्वितीये शंभुकोणेऽग्निधिष्ण्यं चक्रे प्रविन्यसेत् ॥४८३॥ मान्यत्र साभिजित्येकरेखाखेटेन विद्धभम् । पुरतः पृष्ठतोऽर्काद्या दिनक्षं लत्तयंति यत् ॥४८४॥ अर्काकृतिगुणाष्टांगबाणाष्टनवसंख्यभम् । सूर्यनक्षाह्सर्पापंञ्चर्क्षात्त्यत्त्वाष्ट्रमितोडुविष्णुभम् ॥४८५॥ संख्यया दिनभे तावदशिभभात्पातदुष्टभम् । सौराष्ट्रे सालवदेशे तु लत्तितं भं विवर्जयेत् ॥४८६॥ कलिगवंगदेशेषु पातितं न शुभप्रदम् । बाल्हिके कुरुदेशे चान्यस्मिन्देशे न दूषणम् ॥४८७॥ तिथयो मासद्ग्धाश्च दग्धलग्नानि यान्यपि । मध्यदेशे विवर्ज्यानि न दुष्टानीतरेषु च ॥४८८॥ षङ्ग्वंधकाणलग्नानि मासशून्याश्च राशयः । गौडमालवयोस्त्याज्या अन्यदेशे न गर्हिताः ॥४८९॥

लघु दोष—विद्युत् नीहार वृष्टि, प्रतिसूर्य (दो सूर्य-सा दीखना) परिवेष (घेरा), इन्द्रधनुष, मेघगर्जन, लत्ता, उपग्रह, पात, मासद्ग्धतिथि, दग्ध, अन्ध, वधिर तथा पंगु—इन राशियों के लग्न, एवं छोटे-छोटे और भी अनेक दोष हैं । अब उनकी व्यवस्था का प्रतिपादन किया जाता है ॥४७९-४८०॥ विद्युत्, नीहार, वृष्टि--ये यदि असमय में हों तभी दोष समझे जाते हैं । यदि समय पर हों (जैसे जाड़े के दिन में पाला पड़े, वर्षा ऋतु में वर्षा हो तथा सघन मेघ में बिजली चमके) तो सब शुभ ही समझे जाते हैं ॥४८१॥ यदि वृहस्पति, शुक्र अथवा बुध इनमें से एक भी केन्द्र में हो तो इन सब दोषों को नष्ट कर देते हैं । इसमें संशय नहीं ॥४८२॥ पञ्चशलाका-वेध--पाँच रेखायें पड़ी और पाँच रेखायें खड़ी खींचकर दो-दो रेखायें कोणों में खींचने (बनाने) से पञ्चशलाका-चक्र बनता है । इस चक्र के ईशान कोण वाली दूसरी रेखा में कृत्तिका को लिखकर आगे प्रदक्षिणा-क्रम से रोहिणी आदि अभिजित् सहित सम्पूर्ण नक्षत्रों का उल्लेख करे । जिस रेखा में ग्रह हों, उसी रेखा की दूसरी ओर वाला नक्षत्र विद्ध समझा जाता है ॥४८३३॥ लत्तादोष--सूर्य आदि ग्रह क्रमशः अपने आश्रित नक्षत्र से आगे और पीछे १२, २२, ३, ७, ६, ५, ८ तथा ९वें दैनिक नक्षत्र को लातों से दूषित करते हैं, इसलिए इसका नाम 'लत्तादोष' है । पातदोष—सूर्य जिस नक्षत्र में हो उससे अश्लेषा, मघा, रेवती, चित्रा, अनुराधा और श्रवण तक की जितनी संख्या हो, उतनी ही यदि अश्विनी से दिननक्षत्र तक गिनने से संख्या हो तो वह नक्षत्र पातदोष से दूषित होता है ॥४८४-४८५३॥ परिहार--सौराष्ट्र (काठियावाड़) और शाल्वदेश में लत्तादोष वर्जित है । कलिंग (जगन्नाथपुरी से कृष्णा नदी तक का भूभाग), वंग (बंगाल), बाल्हिक (बलख) और कुरु (कुरुक्षेत्र) देश में पातदोष त्याज्य हैं; अन्य देशों में ये दोष त्याज्य नहीं हैं ॥४८६-४८७॥ मासद्ग्ध तिथि तथा दग्ध लग्न--ये मध्यदेश (प्रयाग से पश्चिम, कुरुक्षेत्र से पूर्व, विन्ध्य और हिमालय के मध्य) में वर्जित हैं । अन्य देशों में ये दूषित नहीं हैं ॥४८८॥ पंगु, अंध, काण लग्न तथा मासों में जो शून्य राशियां कही गई हैं, वे गौड़ (बंगाल से भुवनेश्वर तक) और मालव (मालवा) देश में त्याज्य हैं । अन्य देशों में निन्दित नहीं हैं ॥४८९॥