भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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४७६ नारदीयपुराणम् तृतीयपंचसप्ताष्टकर्मगो वा निशाकरः । लग्नात्करोति संबंधं दंपत्योर्गु रुवीक्षितः ॥४०१॥ तुलागोकर्कटा लग्नसंस्थाः शुक्रेन्दुसंयुताः । वीक्षिताः पृच्छतां नृणां कन्यालाभो भवेत्तदा ॥४०२॥ स्त्रीद्रेष्काणः स्त्रीनवांशो युग्मलग्नं समागतम् । वीक्षितं चंद्रशुक्राभ्यां कन्यालाभो भवेत्तदा ॥४०३॥ एवं स्त्रीणां भर्तृ लब्धिः पुंलग्ने पुंनवांशके । पृच्छकस्य भवेल्लग्नं पुंग्रहैरवलोकितम् ॥४०४॥ कृष्णपक्षे प्रश्नलग्नाद्यस्यराशी शशी यदा । पापद्दष्टोऽथ वा रंध्रे न संबंधो भवेत्तदा ॥४०५॥ पुण्यैर्निमित्तशकुनैः प्रश्नकाले तु मंगलम् । दंपत्योरशुभैरेतैरशुभं सर्वतो भवेत् ॥४०६॥ पंचांगशुद्धिदिवसे चंद्रताराबलान्विते । विवाहभक्ष्योदये वा कन्यावरणमन्वयैः ॥४०७॥ भूषणैः पुष्पतांबूलफलैर्गंधाक्षतादिभिः । शुक्लांबरैर्गीतवाद्यैर्विप्रनाशीर्वचनैः सह ॥४०८॥ कारयेत्कन्यकागेहे वरः प्रणवपूर्वकम् । तदा कुर्यात्पिता तस्याः प्रदानं प्रीतिपूर्वकम् ॥४०९॥ कुलशीलवयोरूपवित्तविद्यायुताय च । वराय च रूपवतीं कन्यां दद्याद्यवीयसीम् ॥४१०॥ संपुज्य प्रार्थयित्वा च शचीं देवीं गुणाश्रयाम् । त्रैलोक्यसुन्दरीं दिव्यगंधमाल्यांबरावृताम् ॥४११॥ सर्वरक्षणसंयुक्तां सर्वाभरणभूषिताम् । अनर्घमणिमालाभिर्भासयंतीं दिगंतरान् ॥४१२॥ में चन्द्रमा हो तथा उस पर गुरु की दृष्टि हो तो समझना चाहिए कि उस कन्या को शीघ्र ही पति प्राप्त होगा ॥४०१॥ यदि प्रश्नलग्न में तुला, वृष या कर्क राशि हो तथा वह शुक्र और चन्द्रमा से युक्त हो तो वर के लिए कन्या (पत्नी) लाभ होता है। अथवा सम राशि लग्न हो, उसमें समराशिका ही द्रेष्काण हो और समराशि का नवमांश तथा उस पर चन्द्रमा और शुक्र की दृष्टि हो तो वर को पत्नी की प्राप्ति होती है ॥४०२-४०३॥ इसी प्रकार यदि प्रश्नलग्न में पुरुषराशि और पुरुषराशि का नवमांश हो तथा उस पर पुरुषग्रह (रवि, मंगल और गुरु) की दृष्टि हो तो जिसके लिये प्रश्न किया गया है, उस कन्या को पति की प्राप्ति होती है ॥४०४॥ यदि प्रश्नसमय में कृष्णपक्ष हो और चन्द्रमा समराशि में होकर लग्न से छठे या आठवें भाव में पापग्रह से देखा जाता हो तो (निकट भविष्य में) विवाह-सम्बन्ध नहीं हो पाता है ॥४०५॥ यदि प्रश्नकाल में शुभ निमित्त और शुभ शकुन देखने सुनने में आयें तो वर-कन्या के लिए शुभ होता है तथा यदि निमित्त एवं शकुन आदि अशुभ हों तो अशुभ फल होता है ॥४०६॥ कन्या वरण- पंचांग (तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण) से शुद्ध दिन में यदि वर और कन्या के चन्द्रबल तथा ताराबल प्राप्त हों तो विवाह के लिए विहित नक्षत्र या उसके मुहूर्त में वर को चाहिए कि अपने कुल के श्रेष्ठ जनों के साथ गीत, वाद्य की ध्वनि और ब्राह्मणों के आशीर्वाद (शान्तिमन्त्रपाठ) आदि से युक्त होकर विविध आभूषण, शुभ वस्त्र, फूल, फल, पान, अक्षत, चन्दन और सुगन्धादि लेकर कन्या के घर में जाय और विनीत भाव से कन्या का वरण करे । (कन्या का वरण वर के बड़े भाई अथवा गुरुजन को करना चाहिए) उसके बाद कन्या का पिता प्रसन्नचित्त होकर अभीष्ट वर को कन्या दान करे ॥४०७-४०९॥ कन्या के पिता को चाहिए कि अपनी कन्या से श्रेष्ठ, कुल, शील, वयस्, रूप, धन और विद्या से युक्त वर को वर की अवस्था में छोटी, रूपवती अपनी कन्या प्रदान करे । कन्यादान से पूर्व सब गुणों की आश्रयभूता, तीनों लोकों में सबसे अधिक सुन्दरी, दिव्य गन्ध, माला और वस्त्र से सुशोभित, सम्पूर्ण शुभ लक्षणों से युक्त तथा सब आभूषणों से मण्डित, अमूल्य मणिमालाओं से दसों दिशाओं को प्रकाशित करती हुई, सहल दिव्य