भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४७७ विलासिनीसहस्राद्यैः सेवमानामर्हनिशम्। एवंविधां कुमारीं तां पूजांते प्रार्थयेदिति ॥४१३॥ देवींद्राणि नमस्तुभ्यं देवेंद्रप्रियभामिनि । विवाहे भाग्यमारोग्यं पुत्रलाभं च देहि मे ॥४१४॥ युग्मेऽब्दे जन्मतः स्त्रीणां प्रीतिदं पाणिपीडनम् । एतत्पुंसामयुग्मेऽब्दे व्यत्ययेनाशनम् तयोः ॥४१५॥ माघफाल्गुनवैशाखज्येष्ठमासाः शुभप्रदाः । मध्यमा कार्तिको मार्गशीर्षो वै निंदिताः परे ॥४१६॥ न कदाचिद्दिशर्क्षेषु भानोरार्द्राप्रवेशनात् । विवाहो देवतानां च प्रतिष्ठां चोपनयनम् ॥४१७॥ नास्तंगते सिते जीवे न तयोर्बालवृद्धयोः । न गुरौ सिंहराशिस्ये सिंहांशकगतेऽपि वा ॥४१८॥ पश्चात्प्रागुदितः शुक्नो दशत्रिदिवसं शिशुः । वृद्धः पंचदिनं पक्षं गुरुः पक्षं च सर्वतः ॥४१९॥ अप्रबुद्धो हृषीकेशो यावत्तावन्न मंगलम् । उत्सवे वासुदेवस्य दिवसे नान्यमंगलम् ॥४२०॥ न जन्ममासे जन्मर्भे न जन्मदिवसेऽपि च । आद्य गर्भसुतस्याथ दुहितुर्वा करग्रहः ॥४२१॥ नैवोद्वाहो ज्येष्ठ पुत्रीपुत्रयोश्च परस्परम् । ज्येष्ठमासे तयोरेकज्येष्ठे श्रेष्ठश्च नान्यथा ॥४२२॥ सहेलियों से सुसेविता सर्वगुणसम्पन्ना इन्द्राणी देवी की पूजा करके उनसे प्रार्थना करे—'हे देवि ! हे इन्द्राणि ! हे देवेन्द्रप्रियभामिनि ! आपको मेरा नमस्कार है। देवि ! इस विवाह में आप सौभाग्य, आरोग्य और पुत्र प्रदान करें।' इस प्रकार प्रार्थना करके पूजा के वाद विधानपूर्वक गुणयुक्त वर को अपनी कुमारी कन्या का दान करे ॥४१०-४१४॥ कन्या-वर को वर्षशुद्धि--कन्या के जन्म-समय से सम वर्षों में और वर के जन्मसमय से विषम वर्षों में होने वाला विवाह उन दोनों के प्रेम और प्रसन्नता को बढ़ाने वाला होता है। इससे विपरीत (कन्या के विषम और वर के सम वर्ष में) विवाह वर-कन्या दोनों के लिए घातक होता है ॥४१५॥ विवाहविहित मास—माघ, फाल्गुन, वैशाख और ज्येष्ठ--ये चार मास विवाह में श्रेष्ठ तथा कार्तिक और मार्गशीर्ष ये दो मास मध्यम हैं। अन्य मास निन्दित हैं ॥४१६॥ सूर्य जब आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश करे तब से दस नक्षत्र तक (अर्थात् आर्द्रा से स्वाती तक के नक्षत्रों में जब तक सूर्य रहें तब तक) विवाह, देवता की प्रतिष्ठा और उपनयन नहीं करने चाहिए। बृहस्पति और शुक्र जब अस्त हों, बाल अथवा वृद्ध हों तथा केवल बृहस्पति सिंह राशि या उसके नवमांश में हों, उस समय भी ऊपर कहे हुए शुभ कार्य नहीं करने चाहिए ॥४१७-४१८॥ गुरु तथा शुक्र के बाल्य और वृद्धत्व--शुक्र जब पश्चिम में उदय होता है तो दस दिन और पूर्व में उदय होता है तो तीन दिन तक बालक रहता है तथा जब पश्चिम में अस्त होने को रहता है तो अस्त से पाँच दिन पहले और पूर्व में अस्त होने से पन्द्रह दिन पहले वृद्ध हो जाता है। गुरु उदय के बाद पन्द्रह दिन बालक और अस्त से पहले पन्द्रह दिन वृद्ध रहता है ॥४१९॥ जब तक भगवान् हृषीकेश शयनावस्था में हों तब तक (अर्थात् आषाढ़-शुक्ला एकादशी से कार्तिक- शुक्ला-एकादशी तक) तथा भगवान् के उत्सव (उत्थान या जन्मदिन) में भी अन्य मंगलकार्य नहीं करने चाहिए ॥४२०॥ पहले गर्भ के पुत्र और कन्या के जन्ममास, जन्मनक्षत्र और जन्मतियिवार में भी विवाह नहीं करना चाहिए। आद्य गर्भ की कन्या और आद्य गर्भ के वर का परस्पर विवाह नहीं करना चाहिए। वर-कन्या में कोई एक ही ज्येष्ठ (आद्य गर्भ का) हो तो ज्येष्ठ मास में विवाह श्रेष्ठ है। यदि दोनों ज्येष्ठ हों तो ज्येष्ठ मास में विवाह अनिष्टकारक कहा गया है ॥४२१-४२२॥