भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 497

४७८ नारदीयपुराणम् उत्पातग्रहणादूर्ध्वं सप्ताहमाखिलग्रहे । नाखिले त्रिदिनं नेष्टं त्रिद्युस्पृक् च क्षयं तथा ॥४२३॥ ग्रस्तास्ते त्रिदिनं पूर्वं पश्चाद्ग्रस्तोदयेऽथवा । संध्यायां त्रिदिनं तद्वन्निशीथे सप्त एव च ॥४२४॥ मासान्ते पंच दिवसांस्त्यजेद्रिक्तां तथाष्टमीम् । व्यतीपातं वैधृतिं च संपूर्णं परिघार्द्धकम् ॥४२५॥ पौष्णभदृगुत्तरामैत्रमरुच्चंद्राकं पित्र्यभैः । समूलभैरविद्धैस्तैः स्वीकरग्रह इष्यते ॥४२६॥ विवाहे बलमावश्यं दंपत्योर्गुरुसूर्ययोः । चेत्पूजा यत्नतः कार्या दुर्बलग्रहयोस्तयोः ॥४२७॥ गोचरं वेधजं चाष्टवर्गजंरूपजं बलम् । यथोत्तरं बलाधिक्यं स्थूलं गोचरमार्गजम् ॥४२८॥ चंद्राताराबलं वीक्ष्य ततः पंचांगजं बलम् । तिथिरेकगुणा वारो द्विगुणस्त्रिगुणं च भम् ॥४२९॥ योगश्चतुगु णः पञ्चगुणः तिथ्यर्द्धसंज्ञितम् । ततो मुहूर्तो बलवांस्ततो लग्नंबलाधिकम् ॥४३०॥ ततो बलवती होरा द्रेष्काणो बलवांस्ततः । ततो नवांशो बलवान्द्वादशांशो बली ततः ॥४३१॥ त्रिंशांशो बलवांस्तस्माद्वीक्ष्यमेतद्बलाबलम् । शुभेक्षितयुताः शस्ता उद्वाहेऽखिलराशयः ॥४३२॥ चंद्राकॅज्यादयः पंच यस्य राशेस्तु खेचराः । इष्टस्तच्छुभदं लग्नं चत्वारोऽपि बलान्विताः ॥४३३॥

**विवाह में वर्ज्य--**भूकम्पादि उत्पात तथा सर्वग्रास सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण हो तो उसके बाद सात दिन तक का समय शुभ नहीं है। यदि खण्डग्रहण हो तो उसके बाद तीन दिन अशुभ होते हैं। तीन दिन का स्पर्श करने वाली (वृद्धि) तिथि, क्षयतिथि तथा ग्रस्तास्त (ग्रहण लगे चन्द्र, सूर्य का अस्त) हो तो पूर्व के तीन दिन अच्छे नहीं माने जाते। यदि ग्रहण लगे हुए सूर्य, चन्द्र का उदय हो तो बाद के तीन दिन अशुभ होते हैं । संध्या समय में ग्रहण हो तो पहले और बाद के भी तीन दिन अनिष्टकारक हैं तथा मध्यरात्रि में ग्रहण हो तो सात दिन (तीन पहले के और तीन बाद के तथा एक ग्रहण वाला दिन) अशुभ होते हैं ॥४२३-४२४॥ मास के अन्तिम दिन, रिक्ता, अष्टमी, व्यतीपात ओर वैधृतियोग सम्पूर्ण तथा परिघ योग का पूर्वार्ध--ये विवाह में वर्जित हैं ॥४२५॥ **विहित नक्षत्र--**रेवती, रोहिणी, तीनों उत्तरा, अनुराधा, स्वाती, मृगशिरा, हस्त, मघा और मूल-- ये ग्यारह नक्षत्र वेधरहित हों तो इन्हीं में स्त्री का विवाह शुभ कहा गया है ॥४२६॥ विवाह में वर को सूर्य का और कन्या को बृहस्पति का बल अवश्य प्राप्त होना चाहिए। यदि ये दोनों अनिष्टकारक हों तो यत्नपूर्वक इनकी पूजा करनी चाहिए ।॥४२७॥ गोचर, वेध और अष्टकवर्गसम्बन्धी बल उत्तरोत्तर अधिक है। इसलिए गोचरबल स्थूल (साधारण) माना जाता है। अर्थात् ग्रहों का अष्टकवर्ग-बल ग्रहण करना चाहिए । प्रथम तो वर-कन्या के चन्द्रबल और ताराबल देखने चाहिए। उसके बाद पंचांग (तिथि, वार आदि) के बल देखे । तिथि में एक, वार में दो, नक्षत्र में तीन, योग में चार और करण में पांच गुने बल होते हैं। इन सब की अपेक्षा मुहूर्त बली होता है। मुहूर्त से भी लग्न, लग्न से भी होरा (राश्यर्ध), होरा से द्रेष्काण, द्रेष्काण से नवमांश, नवमांश से भी द्वादशांश तथा उससे भी विंशांश बली होता है । इसलिए इन सबके बल देखने चाहिए ॥४२८-४३१॥ विवाह में शुभग्रह से युक्त या दृष्ट होने पर सभी राशियां प्रशस्त हैं। चन्द्रमा, सूर्य, बुध, बृहस्पति तथा शुक्र आदि पाँच ग्रह जिस राशि के इष्ट हों, वह लग्न शुभप्रद होता है। यदि चार ग्रह भी बली हों तो भी उन्हें शुभप्रद ही समझना चाहिए ॥४३२-४३३॥