बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४७६ जामित्रशुद्ध्यैकविंशन्महादोषविवर्जितम् । एकविंशतिदोषाणां नामरूपफलानि च ॥४३४॥ वक्ष्यतेऽत्र समासेन शृणु नारद सांप्रतम् । पञ्चांगशुद्धिराहित्यं दोषस्त्वाद्यः प्रकीर्तितः ॥४३५॥ उदयास्तशुद्धिहीनिद्वितीयः सूर्यसंक्रमः । तृतीयः पापषड्वर्गो भृगुः षष्ठः कुजोऽष्टमः ॥४३६॥ गंडांतं कर्तरी रिष्फषडष्टेष्वनुगतो ग्रहः । दंपत्योरष्टमं लग्नं राशिविषघटी तथा ॥४३७॥ दुर्मुहूर्तो वारदोषः खार्जूरिकसमाङ्घ्रिभम् । ग्रहणोत्पातभं क्रूरविद्धक्षं क्रूरसंयुतम् ॥४३८॥ कुनवांशो महापातो वैधृतिश्चैकविंशतिः । तिथिवारसंयोगानां करणस्य च मेलनम् ॥४३९॥ पंचांगमस्य शुद्धिरिस्तु पंचांगशुद्धिरीरिता । यस्मिन्पंचांगदोषोऽस्ति तस्मिल्लग्ने निरर्थकम् ॥४४०॥ त्यजेत्पंचैष्टिकं चापि विषसंयुक्तदुग्धवत् । लग्नं लग्नांशको स्वस्वपतिना वीक्षितौ युतौ ॥४४१॥ न चेदान्योन्यपतिना शुभमित्रेण वा तथा । वरस्य मृत्युः स्यात्ताभ्यां सप्तसप्तोदयांशकौ ॥४४२॥ एवं तौ न युतौ दृष्टौ मृत्युर्वध्वाः करग्रहे । त्याज्याः सूर्यस्य संक्रांतेः पूर्वतः परतस्तथा ॥४४३॥ विवाहादिषु कार्येषु नाड्यः षोडशषोडश । षड्वर्गः शुभदः श्रेष्ठो विवाहस्थापनादिषु ॥४४४॥ मुने ! लग्न से सप्तम स्थान शुद्ध (ग्रहवर्जित) हो और २१ महा दोषों से रहित हो तो उसे विवाह में ग्रहण करना चाहिए। अब मैं उन इक्कीस दोषों के नाम, स्वरूप और फल का संक्षेप से वर्णन करता हूँ, सुनो ॥४३४॥ विवाह के २१ दोष--'पञ्चांग-शुद्धि का न होना, यह प्रथम दोष कहा गया है। उदयास्त की शुद्धि का न होना २, उस दिन सूर्य की संक्रान्ति का होना ३, पापग्रह का षड्वर्ग में रहना ४, लग्न से छठे भाव में शुक्र की स्थिति ५, अष्टम में मंगल का रहना ६, गण्डान्त होना ७, कर्तरीयोग ८, बारहवें, छठे और आठवें चन्द्रमा का होना तथा चन्द्रमा के साथ किसी अन्य ग्रह का होना ९, वर-कन्या की जन्मराशि से अष्टम राशि लग्न हो या दैनिक चन्द्रराशि हो १०, विषघटो ११, दुर्मुहूर्त १२, वारदोष १३, खर्जूर १४, नक्षत्रैकचरण १५, ग्रहण और उत्पात के नक्षत्र १६, पापग्रह से विद्ध नक्षत्र १७; पाप से युक्त नक्षत्र १८, पापग्रह का नवमांश १६, महापात २० और वैधृति २१--विवाह में ये २१ दोष कहे गये हैं ॥४३५-४३८॥ मुने ! तिथि, वार, नक्षत्र योग और करण-इन पाँचों का मेल पंचांग कहलाता है । उसको शुद्धि पंचांगशुद्धि कहलाती है । जिस दिन पंचांग के दोष हों, उस दिन विवाह लग्न बताना निरर्थक है। इस प्रकार का लग्न यदि पाँच इष्ट ग्रहों से युक्त हो तो भी उसको विषमिश्रित दूध के समान त्याग देना चाहिए ॥४३६- ४४०॥ लग्न या उसके नवमांश अपने-अपने स्वामी से युक्त या दृष्ट न हों अथवा परस्पर (लग्नेश से नवमांश और नवमांशपति से) लग्नेश युक्त या दृष्ट न हों अथवा अपने स्वामी के शुभग्रह मित्र से लग्न से युक्त या दृष्ट न हों तो वर के लिए घातक होते हैं । इसी प्रकार सप्तम और उसके नवमांश में भी ये दोनों यदि अपने-अपने स्वामो से अथवा परस्पर युक्त या दृष्ट नहीं हों या अपने-अपने स्वामी के शुभ मित्र से युक्त या दृष्ट न हों तो वह वधू के लिए घातक है ॥४४१-४४२॥ सूर्य की संक्रान्ति के समय से पूर्व और पश्चात् सोलह-सोलह घड़ी विवाह आदि शुभ कार्यों में त्याज्य है। लग्न का षड्वर्ग (राशि, होरा, द्रेष्काण, नवमांश, द्वादशांश तथा त्रिंशांश) शुभ हो तो विवाह, देवप्रतिष्ठा आदि कार्यों में श्रेष्ठ होता है ॥४४३-४४४॥