भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 489, कुल 1008 में से

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४७० नारदीयपुराणम् शुभलग्ने शुभांशे च निधने शुद्धिसंयुते । षष्ठे मास्यष्टमे वापि पुंसां स्त्रीणां तु पञ्चमे ॥३३०॥ सप्तमे मासि वा कार्यं नवान्नप्राशनं शुभम् । रिक्तां दिनक्षयं नन्दां द्वादशीमष्टमीमथ ॥३३१॥ त्यक्त्वान्यतिथिषु प्रोक्तं प्राशनं शुभवासरे । चरस्थिरमृदुक्षिप्रनक्षत्रे शुभनेधने ॥३३२॥ दशमे शुद्धिसंयुक्ते शुभलग्ने शुभांशके । पूर्वाह्णे सौम्यखेटेन संयुक्तर्वीक्षितेऽपि वा ॥३३३॥ त्रिषष्टलाभगेः क्रूरैः केंद्रधीधर्मगैः शुभैः । व्ययारिनिधनस्थे च चन्द्रेऽन्नप्राशनंशुभम् ॥३३४॥ तृतीये पञ्चमे चाब्दे स्वकुलाचारतोऽपि वा । बालानां जन्मतश्चौल स्वगृह्योक्तविधानतः ॥३३५॥ सौम्यायने नास्तगयोः सुरारिसुरमन्त्रिणोः । अपूर्वरिक्तातिथेषु शुक्रज्येन्दुवासरे ॥३३६॥ दसादितीयज्वेंद्रेन्द्रयूपभानि शुभानि च । चौलकर्मणि हस्तर्क्षार्त्रीणित्रीणि च विष्णुभात् ॥३३७॥ पट्टबंधनचोलान्नप्राशने चोपनायने । शुभदं जन्मऋक्षमशुभं त्वन्यकर्मणि ॥३३८॥ अष्टमे शुद्धिसंयुक्ते शुभलग्ने शुभांशके । जन्माष्टमं शीतांशौ षष्ठाष्टांत्यविवर्जिते ॥३३८॥ धनत्रिकोणकेंद्रस्थैः शुभैह्यायारिगैः परैः । अभ्यक्ते सन्ध्ययोर्वारि निशि भुक्त्वा न वाहवे ॥३४०॥ नोत्कटे भूषिते नैव याने न नवमेऽह्नि च । क्षौरकर्म महीपानां पञ्चमेपञ्चमेऽहनि ॥३४१॥

अन्न-प्राशन--बालकों का जन्म से ६वें या ८वें मास में और बालिकाओं का जन्म से ५वें या ७वें मास में अन्नप्राशनकर्म शुभ होता है । परन्तु रिक्ता (४, ९, १४), तिथिक्षय, नन्दा (१, ६, ११), १२, ८--इन तिथियों को छोड़कर (अन्य तिथियों में) शुभ दिन में चर, स्थिर, मृदु और क्षिप्रसंज्ञक नक्षत्र में लग्न से अष्टम और दशम स्थान शुद्ध (ग्रहरहित) होने पर शुभ नवांशयुक्त शुभ राशिलग्न में, लग्न पर शुभग्रह का योग या दृष्टि होने पर जब पापग्रह लग्न से ३, ६, ११ भाव में और शुभग्रह १, ४, ७, १०, ५, ९, भाव में हों तथा चन्द्रमा १२, ६, ८ स्थान से भिन्न स्थान में हो तो पूर्वाह्न-समय में बालकों का अन्नप्राशन शुभ होता है ॥३३०-३३४॥ चूड़ाकरण--बालकों के जन्म समय से तीसरे या पाँचवें वर्ष में अथवा अपने कुल के आचार-व्यवहार के अनुसार अन्य वर्षमास में भी उत्तरायण में, जब गुरु और शुक्र उदित हों (अस्त न हों), पर्व तथा रिक्ता को छोड़कर अन्य तिथियों में, शुक्र, गुरु, सोमवार में, अश्विनी, पुनर्वसु, पुष्य, मृगशिरा, ज्येष्ठा, रेवती, हस्त, चित्रा, स्वाती, श्रवण, धनिष्ठा और शतभिषा--इन नक्षत्रों में अपने-अपने गृह्यसूत्र में बतायी गई विधि के अनुसार चूडा- करणकर्म करना चाहिए । राजाओं के पट्टबन्धन, बालकों के चूडाकरण, अन्नप्राशन और उपनयन में जन्म- नक्षत्र प्रशस्त होता है । अन्य कर्मों में जन्म-नक्षत्र अशुभ कहा गया है । लग्न से अष्टम स्थान शुद्ध हो, शुभ राशि लग्न हो, उसमें शुभग्रह का नवमांश हो तथा जन्मराशि या जन्मलग्न से अष्टम राशिलग्न न हो, चन्द्रमा लग्न से ६, ८, १२ स्थानों से भिन्न स्थानों में हो, शुभग्रह २, ५, ९, १, ४, ७, १० भाव में हों तथा पापग्रह ३, ६, ११ भाव में हों तो चूडाकरण कर्म प्रशस्त होता है ॥३३५-३३९॥

सामान्य क्षौरकर्म--तेल लगाकर तथा प्रातः और सायं संध्या के समय क्षौर नहीं कराना चाहिए । इसी प्रकार मंगलवार को तथा रात्रि में क्षौर का निषेध है । दिन में भी भोजन के बाद क्षौर नहीं करना चाहिए । युद्धयात्रा में भी क्षौर कराना वर्जित है । शय्या पर बैठकर या चन्दनादि लगाकर क्षौर नहीं कराना चाहिए । जिस दिन कहीं यात्रा करनी हो उस दिन भी क्षौर न कराये । राजाओं के लिए क्षौर कराने के बाद उसके ५वें ५वें दिन क्षौर कराने का विधान है । चूडाकरण में जो नक्षत्र-वार आदि कहे गये हैं, उन्हीं नक्षत्रों और वार आदि में अथवा कभी भी क्षौर में विहित नक्षत्र और वार के उदय (मुहूर्त एवं क्षण) में क्षौर कराना शुभ होता है ॥३४०-३४१॥

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