बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६६ आद्या निशाश्चतस्रस्तु याज्या ह्यपि समा परैः । ओजराश्यंशगे चंद्रे लग्ने पुंग्रहवोक्षिते ॥३१८॥ उपवीती युग्मतिथावनग्नः कामयेत्स्त्रियम् । पुत्रार्थी पुरुषस्त्यक्त्वा पौष्णमूलाहिपित्र्यभम् ॥३१९॥ प्रसिद्धे प्रथमे गर्भे तृतीये वा द्वितीयेके । मासे पुंसवनं कार्यं सीमंतं च यथा तथा ॥३२०॥ चतुर्थे मासिषष्ठे वाप्यष्टमे वा तदीश्वरे । बलोपपन्ने दंपत्योश्चंद्रताराबलान्विते ॥३२१॥ अरिक्तापर्वदिवसे कुजजीवाकँवासरे । तीक्ष्णमिश्रार्कवर्ज्येषु पुंभांशेराविनायके ॥३२२॥ शुद्धेऽष्टमे जन्मलग्नात्तद्योर्लग्ने न नैधने । शुभग्रहयुते दृष्टे पापद्दष्टिविवर्जिते ॥३२३॥ शुभग्रहेषु धीधर्मकेंद्रेष्वरिरिभ्रवे त्रिषु । पापेषु सत्सु चंद्रेशनिधनाद्यविवर्जिते ॥३२४॥ क्रूरग्रहाणामेकोपि लग्नादंत्यात्मजाष्टगः । सीमंतिनी वा तद्गर्भं बली हंति न संशयः ॥३२५॥ तस्मिञ्जन्ममुहूर्तेऽपि सूतकांतेऽपि वा शिशोः । जातकर्म प्रकर्तव्यं पितृपूजनपूर्वकम् ॥३२६॥ सूतकांते नामकर्म विधेयं तत्कुलोचितम् । नामपूर्वं प्रशस्तं स्यान्मंगलैः सुसमीक्षितैः ॥३२७॥ देशकालोपघाताद्यैः कालातिक्रमणं यदा । अनस्तगे भृगावीज्ये तत्कार्यं चोत्तरायणे ॥३२८॥ चरस्थिरमृदुक्षिप्रेनक्षत्रे शुभवासरे । चन्द्रताराबलोपेते दिवसे च शिशोः पितुः ॥३२६॥ गर्भाधान-संस्कार-मासिक धर्म के आरंभ से चार रात्रियां गर्भाधान में त्याज्य हैं । सम रात्रियों में जब चन्द्रमा विषमराशि और विषम नवमांश में हो, लग्न पर पुरुषग्रह (रवि, मंगल तथा वृहस्पति) की दृष्टि हो तो पुत्रार्थी पुरुष सम (२, ४, ६, ८, १०, १२) तिथियों में; रेवती, मूल, अश्लेषा और मघा इन नक्षत्रों को छोड़ कर अन्य नक्षत्रों में उपवीती और अनग्न (सवस्त्र) होकर स्त्री का संग करे ॥३१८-३१९॥ पुंसवन और सीमन्तोन्नयन - प्रथम गर्भ स्थिर हो जाने पर तृतीय या द्वितीय मास में पुंसवन कर्म करे । उसी प्रकार ४, ६ या ८वें मास में उस मास के स्वामी जब बली हों तथा स्त्री-पुरुष दोनों को चन्द्रमा और तारा का बल प्राप्त हो तो सीमन्त-कर्म करना चाहिए। रिक्ता तिथि और पर्व को छोड़कर अन्य तिथियों में, मंगल, बृहस्पति तथा रविवार में, तीक्ष्ण और मिश्र संज्ञक नक्षत्रों को छोड़कर अन्य नक्षत्रों में, जब चन्द्रमा विषमराशि और विषम राशि के नवमांश में हो, लग्न से अष्टम स्थान शुद्ध (ग्रहवर्जित) हो, स्त्री-पुरुष के जन्म-लग्न से अष्टम राशिलग्न न हो एवं शुभग्रह लग्न से ५, १, ४, ७, ९, १० में और पापग्रह ६, ११ तथा ३ में हों एवं चन्द्रमा १२, ८ तथा लग्न से अन्य स्थानों में हो तो पुंसवन और सीमन्तोन्नयन करने चाहिए ॥३२०-३२४॥ यदि एक भी बलवान् पापग्रह लग्न से १२, ५ और ८ भावों में हो तो वह सीमन्तिनी स्त्री अथवा उसके गर्भ का नाश कर देता है ॥३२५॥ जातकर्म और नामकर्म-जन्म के समय में ही जातकर्म कर लेना चाहिए । किसी प्रतिबन्धकवश उस समय न कर सके तो सूतक बीतने पर भी उक्त लग्न में पितरों का पूजन (नान्दीमुख श्राद्ध कर्म) करके बालक का जातकर्म-संस्कार अवश्य करना चाहिए एवं सूतक बीतने पर अपने कुल की रीति के अनुसार बालक का नामकरण-संस्कार भी करना चाहिए। भलीभांति विचार पूर्वक देवता आदि का वाचक, मंगलदायक एवं उत्तम नाम रखना चाहिए। यदि देशकालादि जन्म किसी प्रतिबन्ध से समय पर कर्म न हो सके तो समय के बाद जब गुरु और शुक्र का उदय हो, तब उत्तरायण में चर, स्थिर, मृदु और और क्षिप्र संज्ञक नक्षत्रों में शुभ- ग्रह के वार (सोम बुध, गुरु और शुक्र) में पिता और बालक के चन्द्रबल और ताराबल प्राप्त होने पर शुभ लग्न और शुभ नवांश में, लग्न से अष्टमभाव में कोई ग्रह न हो तब बालक का जातकर्म और नामकरण संस्कार करने चाहिए ॥३२६-३२९॥