भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 487

४६८ नारदीयपुराणम् आदौ सम्पूर्णफलदं मध्ये मध्यफलप्रदम् । अन्ते तुच्छफले लग्ने सर्वस्मिन्नेवमेव हि ॥३०५॥ सर्वत्र प्रथमं लग्नं कर्त्तव्यंचंद्रबलं ततः । कल्प्यार्माददौ बलिनि सप्तमे बलिनो ग्रहाः ॥ ३०६॥ चंद्रस्य बलिमाधारमाधेयं चान्यखेटकम् । आधारभूतेनाधेयं धीयते परिधिष्ठितम् ॥३०७॥ चेदिन्दुः शुभदः सर्वे ग्रहाः शुभफलप्रदाः । अशुभश्चेदशुभादा वर्जयित्वा धनाधिपम् ॥३०८॥ लग्नस्याभ्युदिता येंशास्तेष्वंशेषु स्थितो ग्रहः । लग्नोद्भवं फलं धत्ते धनातीतो द्वितीयकम् ॥३०९॥ एवं स्थानेषु शेषेषु चैवमेवं प्रकल्पयेत् । लग्नं सर्वगुणोपेतं लभ्यतेऽल्पैर्दिनैर्नहि ॥३१०॥ दोषाल्पत्वं गुणाधिक्यं बहु संततमित्यते । दोषाद् दृष्टो हि कालस्तमपि माष्टुं पितामहः ॥३११॥ अप्यशौचगुणाधिक्यं दोषान्यत्ते ततो हि ते । अमारिक्ताष्टमीषष्ठीद्वादशीप्रतिपत्स्वपि ॥३१२॥ परिघस्य च पूर्वार्द्ध व्यतीपाते सवैधृतौ । संध्यासूपप्लवे विष्ट्यामशुभं प्रथमार्त्तवम् ॥३१३॥ रुग्णा पतिप्रिया दुःखा पुत्रिणी भोगनी तथा । पतिव्रता क्लेशयुक्ता सूर्यवारादिषु क्रमात् ॥३१४॥ याम्याग्निरौद्रभाग्याहिद्विशेंद्राद्विह्य पहिद्भाः । तारका न हिता मासा मधुर्जशुचिपौषकाः ॥३१५॥ भद्रा च संक्रमो निद्रा रात्रिश्चंद्रार्कयोर्ग्रहः । कुलटा पापभोगेषु निन्द्यर्क्षे निन्द्यवासरे ॥३१६॥ तिलाज्यदूर्वा जुहुयाद्गायत्र्याष्टशतं बुधः । सुवर्णगोतिलान्दद्यात्सर्वदोषानुपत्तये ॥३१७॥ चन्द्रमा शुभदायक हो तो सब ग्रह शुभ फल देने वाले होते हैं। यदि चन्द्रमा अशुभ हो तो अन्य सब ग्रह भी अशुभ फल देने वाले हो जाते हैं। लेकिन धनस्थान स्वामी को छोड़कर ही यह नियम लागू होता है; क्योंकि यदि धनेश शुभ हो तो वह चन्द्रमा के अशुभ होने पर भी अपना शुभ फल ही देता है ॥३०८॥ लग्न के जितने अंश उदित हो गये (क्षितिज से ऊपर आ गये) हों, उनमें जो ग्रह हो वह लग्न के फल को देता है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि लग्न के जितने भावांश हों, उनके भीतर रहने वाला ग्रह लग्नभाव का फल देता है तथा उससे आगे-पीछे हो तो लग्नराशि में रहता हुआ भी आगे-पीछे के भाव का फल देता है। लग्न के कथित अंश से जो ग्रह आगे बढ़ जाता है, वह द्वितीय भाव का फल देता है। इस प्रकार सब भावों में ग्रहों की स्थिति और फल की कल्पना करनी चाहिए। सब गुणों से युक्त लग्न तो थोड़े दिनों में नहीं मिल सकता; अतः स्वल्प दोष और अधिक गुणों से युक्त लग्न को ही सब कार्यों में सर्वदा ग्रहण करना चाहिए; क्योंकि अधिक दोषों से युक्त काल को ब्रह्मा भी शुद्ध नहीं कर सकते; इसलिए थोड़े दोष से युक्त होने पर भी अधिक गुण वाला लग्न-काल हितकर होता है ॥३०९-३११ १/२॥ स्त्रियों के प्रथम रजोदर्शन-अमावास्या, रिक्ता (४, ९, १४), ८, ६, १२ और प्रतिपदा- इन तिथियों में परिघ योग के पूर्वार्ध में, व्यतीपात और वैधृति में, संध्या के समय, सूर्य और चन्द्र के ग्रहणकाल में तथा विष्टि (भद्रा) में स्त्री का प्रथम मासिक धर्म अशुभ होता है। रवि आदि वारों में प्रथम रजोदर्शन हो तो वह स्त्री क्रमशः रोगयुक्ता, पति की प्रिया, दुःखयुक्ता, पुत्रवती, भोगवती, पतिव्रता एवं क्लेशयुक्त होती है ॥३१२-३१४॥ भरणी, कृत्तिका, आर्द्रा, पूर्वा फाल्गुनी, अश्लेषा, विशाखा, ज्येष्ठा, पूर्वाषाढ़ और पूर्व भाद्रपद-ये नक्षत्र तथा चैत्र, कार्तिक, आषाढ़ और पौष-ये मास प्रथम मासिक धर्म में अनिष्टकारक होते हैं। भद्रा सूर्य की संक्रान्ति, निद्रा अवस्था-रात्रिकाल, सूर्यग्रहण तथा चन्द्रग्रहण-ये सब प्रथम मासिक धर्म में शुभ नहीं हैं। अशुभ योग, निन्द्य नक्षत्र तथा निन्दित दिन में प्रथम मासिक धर्म हो तो वह स्त्री कुलटा स्वभाव वाली होती है ॥३१५-३१६॥ इसलिए इन सब दोषों की शान्ति के लिए विज्ञ पुरुष को तिल, घृत और दूर्वा से गायत्री मंत्र द्वारा १०८ बार आहुति तथा सुवर्णदान, गोदान एवं तिलदान करना चाहिए ॥३१७॥