बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६७ वापोकूपतडागादि वारिबंधनमोक्षणम् । पौष्टिकं लिपिलेखादि कर्तव्यं कर्कटोदये ॥२६३॥ इक्षुधान्यवणिक्पण्यकृषिसेवादयस्थिरे । साहसाहवभूषाद्यं सिंहलग्ने प्रसिद्ध्यति ॥२६४॥ विद्याशिल्पौषधं कृत्यं भूषणं च चरस्थिरम्। कन्या लग्नं विधेयं च पौष्टिकाखिलमंगलम् ॥२६५॥ कृषिवाणिज्ययानं च पशुद्वाहव्रतादिकम् । तुलायामखिलं कर्म तुलाभाराश्रिते च यत् ॥२६६॥ स्थिरकर्माखिलं कार्यं राजसेवाभिषेचनम् । चौर्यकर्मस्थिरारंभाः कर्तव्याः वृश्चिकोदये ॥२६७॥ व्रतोद्वाहप्रयाणाश्वगजशिल्पकलादिकम् । चरस्थिरविमिश्रं च कर्तव्यं कार्मुकोदये ॥२६८॥ चापबंधनमोक्षास्त्रकृषिगोश्वादिकम् च यत् । प्रस्थानं पशुदासादि कर्तव्यं मकरोदये ॥२६६॥ कृषिवाणिज्यपशूवंशिल्पकर्मकलादिकम् । जलपात्रास्त्रशस्त्रादि कर्तव्यं कलशोदये ॥३००॥ व्रतोद्वाहाभिषेकांवुस्थापनं सन्निवेशनम् । भूषणं जलपात्राश्वकर्म मीनोदये शुभम् ॥३०१॥ मेषादिषु विलग्नेषु शुद्धेष्वेवं प्रसिद्ध्यति । क्रूरग्रहेक्षितेष्वप्रसंयुतेष्वप्रमेव हि ॥३०२॥ गोयुग्मकर्ककन्यांत्यतुलाचापधराः शुभाः । शुभर्क्षत्वाशुभास्त्य इतरा पापराशयः ॥३०३॥ ग्रहयोगावलोकाभ्यां राशिर्धत्ते ग्रहोद्भवम् । फलं ताभ्यां विहीनोऽसौ स्वभावमुपसर्पति ॥३०४॥ कूप, तड़ाग, जल रोकने के लिए बांध, जल निकालने के लिए नाली बनाना, पौष्टिक कर्म, चित्रकारी तथा लेखन आदि कार्य करने चाहिए ॥२६३॥ सिंह लग्न में ईख तथा धान्यसम्बन्धी सब कार्य, वाणिज्य, हाट, कृषिकर्म तथा सेवा आदि कर्म, स्थिर कार्य साहस, युद्ध तथा आभूषण बनाना आदि कार्य सिद्ध होते हैं ॥२९४॥ कन्या लग्न में विद्यारंभ, शिल्पकर्म, औषधि निर्माण और उसका धारण, समस्त चर और स्थिर कार्य, पौष्टिक कर्म तथा विवाहादि समस्त शुभ कार्य करने चाहिए ॥२९५॥ तुला लग्न में कृषिकर्म, व्यापार, यात्रा, पशुपालन, विवाह- उपनयनादि संस्कार तथा तोल सम्बन्धी जितने कार्य हैं, वे सब सिद्ध होते हैं ॥२९६॥ वृश्चिक लग्न में गुह्यारम्भादि समस्त स्थिर कार्य, राजसेवा, राज्याभिषेक, गोपनीय और स्थिर कर्मों का आरंभ करना चाहिए ॥२९७॥ धनु लग्न में उपनयन, विवाह, यात्रा, अश्वकृत्य, गजकृत्य, शिल्पकला तथा चर, स्थिर और मिश्रित कर्मों को करना चाहिए ॥२९८॥ मकर लग्न में धनुष बनाना, उसमें प्रत्यंचा बांधना, बाण छोड़ना, अस्त्र बनाना और चलाना, कृषि, गो पालन, अश्वकृत्य, गजकृत्य तथा पशुओं का क्रय-विक्रय और दास आदि की नियुक्ति-ये सब कार्य करने चाहिए ॥२९९॥ कुम्भ लग्न में कृषि, वाणिज्य, पशुपालन, जलाशय, शिल्पकर्म, कला आदि, जलपात्र (कलश आदि) तथा अस्त्र-शस्त्र का निर्माण आदि कार्य करना चाहिए ॥३००॥ मीन लग्न में उपनयन, विवाह, राज्या- भिषेक, जलाशय की प्रतिष्ठा, गृहप्रवेश, भूषण, जलपात्रनिर्माण तथा अश्व सम्बन्धी कृत्य शुभ होते हैं ॥३०१॥ इस प्रकार मेषादि लग्नों के शुद्ध (शुभ स्वामी से युक्त या दृष्ट) रहने से शुभ कार्य सिद्ध होते हैं (पापग्रह से युक्त या दृष्ट लग्न हो तो उसमें केवल क्रूर कर्म ही सिद्ध होते हैं ॥३०२॥ वृष, मिथुन, कर्क, कन्या, मीन, तुला ओर धनु ये शुभग्रह की राशि होने के कारण शुभ हैं तथा अन्य (मेष, सिंह, वृश्चिक, मकर और कुम्भ-ये) पापराशियाँ हैं ॥३०३॥ लग्न पर जैसे (शुभ या अशुभ) ग्रहों का योग या दृष्टि हो उसके अनुसार ही लग्न अपना फल देता है । यदि लग्न में ग्रह के योग या दृष्टि का अभाव हो तो लग्न अपने स्वभाव के अनुकूल फल देता है ॥३०४॥ किसी लग्न के आरंभ में कार्य का आरम्भ होने पर उसका पूर्ण फल मिलता है । लग्न के मध्य में मध्यम और अन्त में अल्प फल प्राप्त होता है। यह बात सब लग्नों में समझनी चाहिए ॥३०५॥ कार्यकर्ता के लिए सर्वत्र पहले लग्नबल, उसके बाद चन्द्रबल देखना चाहिए । चन्द्रमा यदि बली हो ओर सप्तम भाव में स्थित हो तो सब ग्रह बलवान् समझे जाते हैं ॥३०६॥ चन्द्रमा का बल आधार और अन्य ग्रहों के बल आधेय हैं । आधार के बल पर ही आधेय स्थिर रहता है ॥३०७॥ यदि