बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४५६ नारदीयपुराणम् शुक्लपक्षादिवसे चंद्रो यस्य शुभप्रदः । स पक्षस्तस्यशुभदः कृष्णपक्षोन्यथाऽशुभः ॥२८३॥ शुक्लपक्षे शुभश्चंद्रो द्वितीयोनवपंचमे । रिःफरंध्रांबुसंस्थैश्चेन्न विद्धो गगने चरैः ॥२८४॥ जन्म संपद्विपत् क्षेम प्रत्यरिः साधको वधः । मित्रं परममित्रं च जन्मभात्तु पुनः पुनः ॥२८५॥ जन्मात्रपञ्चसप्ताख्यास्तारा नेष्ट फलप्रदाः । शाकं गुडं च लवणं सतिलं कांचनं क्रमात् ॥२८६॥ अनिष्टफलनाशाय दद्यादेतद्द्विजातये । कृष्णे बलवती तारा शुक्लपक्षे बली शशी ॥२८७॥ यात्रोद्वाहादिकार्येषु नामतुल्यफलप्रदाः । षष्टिघ्नं गतचन्द्रक्षं तत्कालघटिकान्वितम् । वेदघ्नमिषुवेदांत्यमवस्था भानुभागताः ॥२८८॥ प्रवासनष्टाख्यमृता जयो हास्यं रतिर्मुदा । शनिभुक्तिर्ज्वरः कंपः सुस्थितिर्नामसन्निभाः ॥२८९॥ पट्टबंधनयाजोग्रसंधिविग्रहभूषणम् । धातवाकरं युद्धकर्म मेषलग्ने प्रसिद्ध्यति ॥२९०॥ मंगलाने स्थिराण्यंबुवेश्मकर्मप्रवर्तनम् । कृषिवणिज्यपश्वादिदृष्टलग्ने प्रसिद्ध्यति ॥२९१॥ कलाविज्ञानशिल्पानि भूषणावहसंश्रवम् । गजोद्वाहाभिषेकार्यं कर्त्तव्यं मिथुनोदये ॥२९२॥ चन्द्र-शुद्धि में विशेषता-शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन प्रतिपदा में जिस व्यक्ति के चन्द्रमा शुभ होते हैं उसके लिए शुक्ल-पक्ष और कृष्णपक्ष दोनों ही शुभ होते हैं। अन्यथा (यदि शुक्ल-प्रतिपदा में चन्द्रमा अशुभ हो तो) दोनों पक्ष अशुभ हो होते हैं। (पहले जो जन्मराशि से २, ९, ५ वें चन्द्रमा को अशुभ कहा गया है।) शुक्लपक्ष में २,९, तथा ५ वें स्थान में स्थित चन्द्रमा भी शुभप्रद ही होता है, यदि वह ६,८,१२ वें स्थानों में स्थित अन्य ग्रहों से विद्ध न हो ॥२८३-२८४॥ तारा विचार - अपने-अपने जन्म-नक्षत्र से नौ नक्षत्रों तक गिने तो क्रमशः १ जन्म, २ सम्पत्, ३ विपत्, ४ क्षेम, ५ प्रत्यरि, ६ साधक, ७, वध, ८ मित्र तथा ९ परम मित्र इस प्रकार ९ तारायें होती हैं। फिर इसी प्रकार आगे गिनने पर १० से १८ तक तथा १९ से २७ तक क्रमशः वे ही तारायें होंगी। इनमें १,३,५ और ७वीं तारा अपने नाम के अनुसार अनिष्ट फल देने वाली होती हैं। इन चारों ताराओं में इनके दोष की शान्ति के लिए ब्राह्मणों को क्रमशः शाक, गुड, लवण और तिल सहित सुवर्ण का दान देना चाहिए। कृष्णपक्ष में तारा बलवती होती है और शुक्लपक्ष में चन्द्रमा बलवान् होता है ॥२८५-२८७॥ चन्द्रमा की अवस्था - प्रत्येक राशि में चन्द्रमा की बारह-बारह अवस्थायें होती हैं, जो यात्रा तथा विवाह आदि शुभ कार्यों में अपने नाम के सदृश ही फल देती हैं। अवस्था का ज्ञान - अभीष्ट दिन में गत नक्षत्र-संख्या को ६० से गुणा कर के उसमें वर्तमान नक्षत्र की भुक्त (भयात) घड़ी को जोड़ दे, योगफल को चार से गुणा कर के गुणनफल में ४५ का भाग दे। जो लब्धि आये, उसमें पुनः १२ से भाग देने पर १ आदि शेष के अनुसार मेषादि राशियों में क्रमशः प्रवास, नष्ट, मृत, जय, हास्य, रति, मुदा, भुक्ति, ज्वर, कम्प और सुस्थिति-ये बारह गत अवस्थायें होती हैं। ये अपने-अपने नाम के समान फल देने वाली होती हैं ॥२८८-२८९॥ मेषादि लग्नों में कर्त्तव्य - पट्टबन्धन ( राजसिंहासन, राजमुकुट आदि धारण), यात्रा, उग्र कर्म, संधि, विग्रह, आभूषण-धारण, धातु, खान सम्बन्धी कार्य और युद्धकर्म-ये सब मेषलग्न में आरंभ करने से सिद्ध होते हैं ॥२९०॥ वृषलग्न में विवाह आदि मंगलकर्म, गृहारम्भ आदि स्थिरकर्म, जलाशय, गृह-प्रवेश, कृषि, वाणिज्य तथा पशुपालन आदि कार्य सिद्ध होते हैं ॥२९१॥ मिथुन लग्न में कला, विज्ञान, शिल्प, आभूषण, युद्ध, संश्रव (कीर्तिसाधक कर्म), राजकार्य, विवाह, राज्याभिषेक आदि कार्य करने चाहिए ॥२९२॥ कर्क लग्न में वापी,