भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 483

४६४ नारदीयपुराणम् धर्मायुवृष्टिष्व समं श्रेष्ठं नष्टं फलं क्रमात् । आयुधं वाहनाहारौ यज्जातीयं जनस्य च ॥२६०॥ स्वापोपविष्टास्तिष्ठन्तस्ते लोकाः क्षेममाप्नुयुः । अंधकं मंदसंज्ञं च मध्यसंज्ञं सुलोचनम् ॥२६१॥ पपौयाद्गणयेद्‌भानि रोहिण्यादिचतुर्विधम् । स्थिरभेष्‌वर्कसंक्रांतिर्ज्ञेया विष्णुपदाह्वया ॥२६२॥ षडशीतिमुखा ज्ञेया द्विस्वभावेषु राशिषु । तुलाघटाजयोर्ज्ञेयो विषुवत्सूर्यसंमः ॥२६३॥ याम्यायने स्थिरे त्वाद्याः पराः सौम्येन्दुमूर्तिभे । मेध्या विषुवति प्रोक्ताः पुण्यनाड्यस्तु षोडश ॥२६४॥ संध्या त्रिनाडी प्रमितार्कविवोर्दोदयास्ततः । प्राक्पश्चाद्याम्यसौम्ये चेत्पुण्यं पूर्वापरेहनि ॥२६५॥ यादृशेने॑न्दुना भानोः संक्रांतिस्तादृशं फलम् । नरः प्राप्नोति तद्राशौ शीतांशोः साध्वसाधु च ॥२६६॥ संक्रांतेः परतो भानुर्भुक्त्वा यावद्भिभिरंशकैः । रवेरयनसंक्रांतिस्तदा तद्राशिसंक्रमात् ॥२६७॥ संक्रांतिग्रहगर्भांक्षा जन्मन्युभयपार्श्वयोः । व्रतोद्वाहादिकेष्वेव द्वयं नेष्टं तु तत्क्रमात् ॥२६८॥ तिलोपरिलिखेच्चक्रं त्रित्रिशूलं त्रिकोणकम् । तत्र हेम विनिक्षिप्य दद्याद्दोषापवृत्तये ॥२६६॥ ताराबलेन शीतांशुर्बलवांस्तद्वशाद्रविः । बली संक्रममाणस्तु तद्गतखेटा बलाधिकाः ॥२७०॥ भोजन तथा उससे आजीविका या व्यवहार करने वाले मनुष्यादि प्राणियों का अनिष्ट होता है एवं जिस प्रकार सोये, बैठे और खड़े हुए संक्रान्ति होती है, उसी प्रकार सोये, बैठे और खड़े हुए प्राणियों का अनिष्ट होता है ॥२५८-२६०३॥ नक्षत्रों की अन्धाक्षादि संज्ञाएँ--रोहिणी नक्षत्र से आरंभ करके चार-चार नक्षत्रों को क्रमशः अन्ध, मन्दनेत्र, मध्यनेत्र और सुलोचन माने और पुनः आगे इसी क्रमसे सूर्य के नक्षत्र तक गिनकर नक्षत्रों की अन्ध आदि चार संज्ञायें समझना चाहिए। संक्रान्ति की विशेष संज्ञा-स्थिर राशियों (वृष, सिंह, वृश्चिक और कुम्भ) में सूर्य की संक्रान्ति का नाम 'विष्णुपदी', द्विस्वभाव राशियों मिथुन, कन्या, धनु और मीन) में 'षडशीतिमुख', तुला और मेष में, 'विषुव' मकर में 'सौम्यायन' और कर्क में 'याम्यायन' संज्ञा होता है ॥२६१-२६३३॥ (पुण्यकाल--) याम्यायन और स्थिरराशियों को (विष्णुपद) संक्रान्तिकाल से पूर्व १६ घड़ी, द्विस्वभाव राशियों की षडशीतिमुख और सौम्यायन-संक्रान्ति में संक्रान्ति-काल के पश्चात् १६ घड़ी तथा विषुव (मेष-तुला) संक्रांति के मध्य (संक्रान्तिकाल से ८ पूर्व और ८ पश्चात) की १६ घड़ी का समय पुण्यदायक होता है ॥२६४॥ सूर्योदय से पूर्व की तीन घड़ी प्रातःसंध्या तथा सूर्यास्त के बाद, की तीन घड़ी सायं संध्या कहलाती है। यदि सायं संध्या में याम्यायन या सौम्यायन कोई संक्रान्ति हो तो पूर्व दिन में और प्रातः संध्या में संक्रान्ति हो तो पर दिन में सूर्योदय के बाद पुण्यकाल होता हैं ॥२६५॥ जब सूर्य को संक्रान्ति होती है, उस समय प्रत्येक मनुष्य के लिए जैसा शुभ या अशुभ चन्द्रमा होता है, उसी के अनुसार इस महीने में मनुष्यों को चन्द्रमा का शुभ या अशुभ फल प्राप्त होता ॥२६६॥ किसी संक्रान्ति के बाद सूर्य जितने अंश भोग कर उस संक्रान्ति करे, आगे अयन संक्रान्ति को उतने समय संक्रान्ति या ग्रहण का जो नक्षत्र हो, वह तथा उसके आगे-पीछे वाले दोनों नक्षत्र उपनयन और विवाहादि शुभ कार्यों में अशुभ होते हैं। संक्रान्ति या ग्रहणजनित अनिष्ट फलों की शान्ति के लिए तिलों को ढेरी पर तीन त्रिशूल वाला त्रिष्ठकोण-चक्र लिखे और उस पर यथाशक्ति सुवर्ण रखकर ब्राह्मणों को दान दे ॥२६७-२६६॥ ग्रहगोचर-तारा के बल से चन्द्रमा बली होता है और चन्द्रमा के बली होने पर सूर्य बली हो जाता है तथा संक्रमणकारी सूर्य के बली होने से अन्य सब ग्रह भी बली समझे जाते हैं ॥२७०॥